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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 1929)

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सप्ततितमोऽध्यायः

श्रीकृष्णद्वारा राजा परिक्षित्का नामकरण तथा पाण्डवोंका हस्तिनापुरके समीप आगमन

वैशम्पायन उवाच

ब्रह्मास्त्रं तु यदा राजन् कृष्णेन प्रतिसंहृतम् ।
तदा तद् वेश्म त्वत्पित्रा तेजसाभिविदीपितम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! भगवान् श्रीकृष्णने जब ब्रह्मास्त्रको शान्त कर दिया, उस समय वह सूतिकागृह तुम्हारे पिताके तेजसे देदीप्यमान होने लगा ॥ १ ॥

ततो रक्षांसि सर्वाणि नेशुस्त्यक्त्वा गृहं तु तत् ।
अन्तरिक्षे च वागासीत् साधु केशव साध्विति ॥ २ ॥
फिर तो बालकोंका विनाश करनेवाले समस्त राक्षस उस घरको छोड़कर भाग गये। इसी समय आकाशवाणी हुई—‘केशव! तुम्हें साधुवाद! तुमने बहुत अच्छा कार्य किया’ ॥ २ ॥

तदस्त्रं ज्वलितं चापि पितामहमगात् तदा ।
ततः प्राणान् पुनर्लेभे पिता तव नरेश्वर ॥ ३ ॥
साथ ही वह प्रज्वलित ब्रह्मास्त्र ब्रह्मलोकको चला गया। नरेश्वर! इस तरह तुम्हारे पिताको पुनर्जीवन प्राप्त हुआ ॥ ३ ॥

व्यचेष्टत च बालोऽसौ यथोत्साहं यथाबलम् ।
बभूवुर्मुदिता राजंस्ततस्ता भरतस्त्रियः ॥ ४ ॥
राजन्! उत्तराका वह बालक अपने उत्साह और बलके अनुसार हाथ-पैर हिलाने लगा, यह देख भरतवंशकी उन सभी स्त्रियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ४ ॥

ब्राह्मणान् वाचयामासुर्गोविन्दस्यैव शासनात् ।
ततस्ता मुदिताः सर्वाः प्रशंसुर्जर्नादनम् ॥ ५ ॥
उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराया। फिर वे सब आनन्दमग्न होकर श्रीकृष्णके गुण गाने लगीं ॥ ५ ॥

स्त्रियो भरतसिंहानां नावं लब्ध्वेव पारगाः ।
कुन्ती द्रुपदपुत्री च सुभद्रा चोत्तरा तथा ॥ ६ ॥
स्त्रियश्चान्या नृसिंहानां बभूवुर्हृष्टमानसाः ।

जैसे नदीके पार जानेवाले मनुष्योंको नाव पाकर बड़ी खुशी होती है, उसी प्रकार भरतवंशी वीरोंकी वे स्त्रियाँ—कुन्ती, द्रौपदी, सुभद्रा, उत्तरा एवं नरवीरोंकी स्त्रियाँ उस बालकके जीवित होनेसे मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुईं ।। ६१ १/२ ।।

तत्र मल्ला नटाश्चैव ग्रन्थिकाः सौख्यशायिकाः ।। ७ ।।
सूतमागधसंघाश्चाप्यस्तुवंस्तं जनार्दनम् ।
कुरुवंशस्तवाख्याभिराशीर्भिर्भरतर्षभ ।। ८ ।।

भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर मल्ल, नट, ज्योतिषी, सुखका समाचार पूछनेवाले सेवक तथा सूतों और मागधोंके समुदाय कुरुवंशकी स्तुति और आशीर्वादके साथ भगवान् श्रीकृष्णका गुणगान करने लगे ।। ७-८ ।।

उत्थाय तु यथाकालमुत्तरा यदुनन्दनम् ।
अभ्यवादयत प्रीता सह पुत्रेण भारत ।। ९ ।।

भरतनन्दन! फिर प्रसन्न हुई उत्तरा यथासमय उठकर पुत्रको गोदमें लिये हुए यदुनन्दन श्रीकृष्णके समीप आयी और उन्हें प्रणाम किया ।। ९ ।।

तस्य कृष्णो ददौ हृष्टो बहुरत्नं विशेषतः ।
तथान्ये वृष्णिशार्दूला नाम चास्याकरोत् प्रभुः ।। १० ।।
पितुस्तव महाराज सत्यसंधो जनार्दनः ।

भगवान् श्रीकृष्णने भी प्रसन्न होकर उस बालकको बहुत-से रत्न उपहारमें दिये। फिर अन्य यदुवंशियोंने भी नाना प्रकारकी वस्तुएँ भेंट कीं। महाराज! इसके बाद सत्यप्रतिज्ञ भगवान् श्रीकृष्णने तुम्हारे पिताका इस प्रकार नामकरण किया ।। १० १/२ ।।

परिक्षीणे कुले यस्माज्जातोऽयमभिमन्युजः ।। ११ ।।
परिक्षिदिति नामास्य भवत्वित्यब्रवीत् तदा ।

'कुरुकुलके परिक्षीण हो जानेपर यह अभिमन्युका बालक उत्पन्न हुआ है। इसलिये इसका नाम परिक्षित् होना चाहिये।' ऐसा भगवान्‌ने कहा ।। ११ १/२ ।।

सोऽवर्धत यथाकालं पिता तव जनाधिप ।। १२ ।।
मनःप्रह्लादनश्चासीत् सर्वलोकस्य भारत ।

नरेश्वर! इस प्रकार नामकरण हो जानेके बाद तुम्हारे पिता परिक्षित् कालक्रमसे बड़े होने लगे। भारत! वे सब लोगोंके मनको आनन्दमग्न किये रहते थे ।। १२ १/२ ।।

मासजातस्तु ते वीर पिता भवति भारत ।। १३ ।।
अथाजग्मुः सुबहुलं रत्नमादाय पाण्डवाः ।

वीर भरतनन्दन! जब तुम्हारे पिताकी अवस्था एक महीनेकी हो गयी, उस समय पाण्डवलोग बहुत-सी रत्नराशि लेकर हस्तिनापुरको लौटे ।। १३ १/२ ।।

तान् समीपगतान् श्रुत्वा निर्ययुर्वृष्णिपुङ्गवाः ।। १४ ।।

वृष्णिवंशके प्रमुख वीरोंने जब सुना कि पाण्डव लोग नगरके समीप आ गये हैं, तब वे उनकी अगवानीके लिये बाहर निकले ।। १४ ।।

अलंचक्रुश्च माल्यौघैः पुरुषा नागसाह्वयम् ।
पताकाभिर्विचित्राभिर्ध्वजैश्च विविधैरपि ।। १५ ।।
पुरवासी मनुष्योंने फूलोंकी मालाओं, वन्दनवारों, भाँति-भाँतिकी ध्वजाओं तथा विचित्र-विचित्र पताकाओंसे हस्तिनापुरको सजाया था ।। १५ ।।

वेश्मानि समलंचक्रुः पौराश्चापि जनेश्वर ।
देवतायतनानां च पूजाः सुविविधास्तथा ।। १६ ।।
संदिदेशाथ विदुरः पाण्डुपुत्रप्रियेप्सया ।
राजमार्गाश्च तत्रासन् सुमनोभिरलंकृताः ।। १७ ।।
नरेश्वर! नागरिकोंने अपने-अपने घरोंकी भी सजावट की थी। विदुरजीने पाण्डवोंका प्रिय करनेकी इच्छासे देवमन्दिरोंमें विविध प्रकारसे पूजा करनेकी आज्ञा दी। हस्तिनापुरके सभी राजमार्ग फूलोंसे अलंकृत किये गये थे ।। १६-१७ ।।

शुशुभे तत्पुरं चापि समुद्रौघनिभस्वनम् ।
नर्तकैश्चापि नृत्यद्भिर्गायकानां च निःस्वनैः ।। १८ ।।
नाचते हुए नर्तकों और गानेवाले गायकोंके शब्दोंसे उस नगरकी बड़ी शोभा हो रही थी। वहाँ समुद्रकी जलराशिकी गर्जनाके समान कोलाहल हो रहा था ।। १८ ।।

आसीद् वैश्रवणस्येव निवासस्तत्पुरं तदा ।
वन्दिभिश्च नरै राजन् स्त्रीसहायैश्च सर्वशः ।। १९ ।।
तत्र तत्र विविक्तेषु समन्तादुपशोभितम् ।
पताका धूयमानाश्च समन्तान्मातरिश्वना ।। २० ।।
अदर्शयन्निव तदा कुरून् वै दक्षिणोत्तरान् ।
राजन्! उस समय वह नगर कुबेरकी अलकापुरीके समान प्रतीत होता था। वहाँ सब ओर एकान्त स्थानोंमें स्त्रियोंसहित बंदीजन खड़े थे, जिनसे उस पुरीकी शोभा बढ़ गयी थी। उस समय हवाके झोंकेसे नगरमें सब ओर पताकाएँ फहरा रही थीं, जो दक्षिण और उत्तर कुरु नामक देशोंकी शोभा दिखाती थीं ।। १९-२० १/२ ।।

अघोषयंस्तदा चापि पुरुषा राजधूर्गताः ।
सर्वराष्ट्रविहारोऽद्य रत्नाभरणलक्षणः ।। २१ ।।
राज-काज सँभालनेवाले पुरुषोंने सब ओर यह घोषणा करा दी कि आज समूचे राष्ट्रमें उत्सव मनाया जाय और सब लोग रत्नोंके आभूषण या उत्तमोत्तम गहने-कपड़े पहनकर इस उत्सवमें सम्मिलित हों ।। २१ ।।

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापरर्वणि पाण्डवागमने
सप्ततितमोऽध्यायः ।। ७० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें पाण्डवोंका
आगमनविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७० ।।