महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1906)
चतुःषष्टितमोऽध्यायः
पाण्डवोंका हिमालयपर पहुँचकर वहाँ पड़ाव डालना और रातमें उपवासपूर्वक निवास करना
वैशम्पायन उवाच
ततस्ते प्रययुर्हृष्टाः प्रहृष्टनरवाहनाः ।
रथघोषेण महता पूरयन्तो वसुंधराम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! पाण्डवोंके साथ जो मनुष्य और वाहन थे, वे सब-के-सब बड़े हर्षमें भरे हुए थे। वे स्वयं भी अपने रथके महान् घोषसे इस पृथ्वीको गुँजाते हुए प्रसन्नतापूर्वक यात्रा कर रहे थे ॥ १ ॥
संस्तूयमानाः स्तुतिभिः सूतमागधवन्दिभिः ।
स्वेन सैन्येन संवीता यथादित्याः स्वरश्मिभिः ॥ २ ॥
सूत, मागध और वन्दीजन अनेक प्रकारके प्रशंसासूचक वचनोंद्वारा उनके गुण गाते चलते थे। अपनी सेनासे घिरे हुए पाण्डव ऐसे जान पड़ते थे, मानो अपनी किरणमालाओंसे मण्डित सूर्य प्रकाशित हो रहे हों ॥ २ ॥
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि ।
बभौ युधिष्ठिरस्तत्र पौर्णमास्यामिवोडुराट् ॥ ३ ॥
राजा युधिष्ठिरके मस्तकपर श्वेत छत्र तना हुआ था, जिससे वे वहाँ पूर्णमासीके चन्द्रमाके समान शोभा पा रहे थे ॥ ३ ॥
जयाशिषः प्रहृष्टानां नराणां पथि पाण्डवः ।
प्रत्यगृह्लाद् यथान्यायं यथावत् पुरुषर्षभः ॥ ४ ॥
मार्गमें बहुत-से मनुष्य प्रसन्न होकर राजा युधिष्ठिरको विजयसूचक आशीर्वाद देते थे और वे पुरुषशिरोमणि नरेश यथोचितरूपसे सिर झुकाकर उन यथार्थ वचनोंको ग्रहण करते थे ॥ ४ ॥
तथैव सैनिका राजन् राजानमनुयान्ति ये ।
तेषां हलहलाशब्दो दिवं स्तब्ध्वा व्यतिष्ठत ॥ ५ ॥
राजन्! राजा युधिष्ठिरके पीछे-पीछे जो बहुत-से सैनिक चल रहे थे, उनका महान् कोलाहल आकाशको स्तब्ध करके गूँज उठता था ॥ ५ ॥
सरांसि सरितश्चैव वनान्युपवनानि च ।
अत्यक्रामन्महाराजो गिरिं चाप्यन्वपद्यत ॥ ६ ॥
तस्मिन् देशे च राजेन्द्र यत्र तद् द्रव्यमुत्तमम् ।
राजन्! अनेकानेक सरोवरों, सरिताओं, वनों, उपवनों तथा पर्वतको लाँघकर महाराज युधिष्ठिर उस स्थानमें जा पहुँचे, जहाँ वह (राजा मरुत्तका रखा हुआ) उत्तम द्रव्य संचित था ।। ६ १/२ ।।
चक्रे निवेशनं राजा पाण्डवः सह सैनिकैः ।
शिवे देशे समे चैव तदा भरतसत्तम ।। ७ ।।
अग्रतो ब्राह्मणान् कृत्वा तपोविद्यादमान्वितान् ।
पुरोहितं च कौरव्य वेदवेदाङ्गपारगम् ।
आग्निवेश्यं च राजानो ब्राह्मणाः सपुरोधसः ।। ८ ।।
कृत्वा शान्तिं यथान्यायं सर्वशः पर्यवारयन् ।
कृत्वा तु मध्ये राजानममात्यांश्च यथाविधि ।। ९ ।।
कुरुवंशी भरतश्रेष्ठ! वहाँ एक समतल एवं सुखद स्थानमें पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरने तप, विद्या और इन्द्रिय-संयमसे युक्त ब्राह्मणों एवं वेद-वेदांगके पारगामी विद्वान् राजपुरोहित धौम्य मुनिको आगे रखकर सैनिकोंके साथ पड़ाव डाला। बहुत-से राजा, ब्राह्मण और पुरोहितने यथोचित रीतिसे शान्तिकर्म करके युधिष्ठिर और उनके मन्त्रियोंको विधिपूर्वक बीचमें रखकर उन्हें सब ओरसे घेर रखा था ।। ७—९ ।।
षट्पदं नवसंख्यानं निवेशं चक्रिरे द्विजाः ।
मत्तानां वारणेन्द्राणां निवेशं च यथाविधि ।। १० ।।
कारयित्वा स राजेन्द्रो ब्राह्मणानिदमब्रवीत् ।
ब्राह्मणोंने जो छावनी वहाँ बनायी थी, उसमें पूर्वसे पश्चिमको और उत्तरसे दक्षिणको जानेवाली तीन-तीनके क्रमसे कुल छः सड़कें थीं तथा उस छावनीके नौ खण्ड थे। महाराज युधिष्ठिरने मतवाले गजराजोंके रहनेके लिये भी स्थानका विधिवत् निर्माण कराकर ब्राह्मणोंसे इस प्रकार कहा— ।। १० १/२ ।।
अस्मिन् कार्ये द्विजश्रेष्ठा नक्षत्रे दिवसे शुभे ।। ११ ।।
यथा भवन्तो मन्यन्ते कर्तुमर्हन्ति तत् तथा ।
न नः कालात्ययो वै स्यादिहैव परिलम्बताम् ।। १२ ।।
इति निश्चित्य विप्रेन्द्राः क्रियतां यदनन्तरम् ।
‘विप्रवरो! किसी शुभ नक्षत्र और शुभ दिनको इस कार्यकी सिद्धिके लिये आपलोग जो भी ठीक समझें, वह उपाय करें। ऐसा न हो कि यहीं लटके रहकर हमारा बहुत अधिक समय व्यतीत हो जाय। द्विजेन्द्रगण! इस विषयमें कुछ निश्चय करके इस समय जो करना उचित हो, उसे आप लोग अविलम्ब करें’ ।। ११-१२ १/२ ।।
श्रुत्वैतद् वचनं राज्ञो ब्राह्मणाः सपुरोधसः ।
इदमूचुर्वचो हृष्टा धर्मराजप्रियेप्सवः ।। १३ ।।
धर्मराज राजा युधिष्ठिरकी यह बात सुनकर उनका प्रिय करनेकी इच्छावाले ब्राह्मण और पुरोहित प्रसन्नतापूर्वक इस प्रकार बोले- ॥ १३ ॥
अद्यैव नक्षत्रमहश्च पुण्यं
यतामहे श्रेष्ठतमक्रियासु ।
अम्भोभिरद्येह वसाम राज-
न्नुपोष्यतां चापि भवद्भिरद्य ॥ १४ ॥
‘राजन्! आज ही परम पवित्र नक्षत्र और शुभ दिन है; अतः आज ही हम श्रेष्ठतम कर्म करनेका प्रयत्न आरम्भ करते हैं। हमलोग तो आज केवल जल पीकर रहेंगे और आपलोगोंको भी आज उपवास करना चाहिये' ॥ १४ ॥
श्रुत्वा तु तेषां द्विजसत्तमानां
कृतोपवासा रजनीं नरेन्द्राः ।
ऊषुः प्रतीताः कुशसंस्तरेषु
यथाध्वरे प्रज्वलिता हुताशाः ॥ १५ ॥
उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका यह वचन सुनकर समस्त पाण्डव रातमें उपवास करके कुशकी चटाइयोंपर निर्भय होकर सोये। वे ऐसे जान पड़ते थे, मानो यज्ञमण्डपमें पाँच वेदियोंपर स्थापित पाँच अग्नि प्रज्वलित हो रहे हों ॥ १५ ॥
ततो निशा सा व्यगमन्महात्मनां
संशृण्वतां विप्रसमीरिता गिरः ।
ततः प्रभाते विमले द्विजर्षभा
वचोऽब्रुवन् धर्मसुतं नराधिपम् ॥ १६ ॥
तदनन्तर ब्राह्मणोंकी कही हुई बातें सुनते हुए महात्मा पाण्डवोंकी वह रात सकुशल व्यतीत हुई। फिर निर्मल प्रभातका उदय होनेपर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने धर्मनन्दन राजा युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीता पर्वणि द्रव्यानयनोपक्रमे
चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें द्रव्य लानेका उपक्रमविषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥
* ज्योतिष शास्त्रके अनुसार तीनों उत्तरा तथा रोहिणी—ये ध्रुवसंज्ञक नक्षत्र हैं। दिनोंमें रविवारको ध्रुव बताया गया है। उत्तरा और रविवारका संयोग होनेपर अमृतसिद्धि नामक योग होता है; अतः इसी योगमें पाण्डवोंके प्रस्थान करनेका अनुमान किया जा सकता है।