महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1583)
पञ्चमोऽध्यायः
इन्द्रकी प्रेरणासे बृहस्पतिजीका मनुष्यको यज्ञ न करानेकी प्रतिज्ञा करना
युधिष्ठिर उवाच
कथंवीर्यः समभवत् स राजा वदतां वर ।
कथं च जातरूपेण समयुज्यत स द्विज ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**वक्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! राजा मरुत्तका पराक्रम कैसा था? तथा उन्हें सुवर्णकी प्राप्ति कैसे हुई? ॥ १ ॥
क्व च तत् साम्प्रतं द्रव्यं भगवन्नवतिष्ठते ।
कथं च शक्यमस्माभिस्तदवाप्तुं तपोधन ॥ २ ॥
भगवन्! तपोधन! वह द्रव्य इस समय कहाँ है? और हम उसे किस तरह प्राप्त कर सकते हैं? ॥ २ ॥
व्यास उवाच
असुराश्चैव देवाश्च दक्षस्यासन् प्रजापतेः ।
अपत्यं बहुलं तात संस्पर्धन्त परस्परम् ॥ ३ ॥
**व्यासजीने कहा—**तात! प्रजापति दक्षके देवता और असुर नामक बहुत-सी संतानें हैं, जो आपसमें स्पर्धा रखती हैं ॥ ३ ॥
तथैवाङ्गिरसः पुत्रौ व्रततुल्यौ बभूवतुः ।
बृहस्पतिर्बृहत्तेजाः संवर्तश्च तपोधनः ॥ ४ ॥
इसी प्रकार महर्षि अंगिराके दो पुत्र हुए, जो व्रतका पालन करनेमें एक समान हैं। उनमेंसे एक हैं महातेजस्वी बृहस्पति और दूसरे हैं तपस्याके धनी संवर्त ॥ ४ ॥
तावतिस्पर्धिनौ राजन् पृथगास्तां परस्परम् ।
बृहस्पतिः स संवर्तं बाधते स्म पुनः पुनः ॥ ५ ॥
राजन्! वे दोनों भाई एक-दूसरेसे अलग रहते और आपसमें बड़ी स्पर्धा रखते थे। बृहस्पति अपने छोटे भाई संवर्तको बारंबार सताया करते थे ॥ ५ ॥
स बाध्यमानः सततं भ्रात्रा ज्येष्ठेन भारत ।
अर्थानुत्सृज्य दिग्वासा वनवासमरोचयत् ॥ ६ ॥
भारत! अपने बड़े भाईके द्वारा सदा सताये जानेपर संवर्त धन-दौलतका मोह छोड़ घरसे निकल गये और दिगम्बर होकर वनमें रहने लगे। घरकी अपेक्षा वनवासमें ही उन्होंने सुख माना ॥ ६ ॥
वासवोऽप्यसुरान् सर्वान् विजित्य च निपात्य च ।
इन्द्रत्वं प्राप्य लोकेषु ततो वव्रे पुरोहितम् ॥ ७ ॥
पुत्रमङ्गिरसो ज्येष्ठं विप्रज्येष्ठं बृहस्पतिम् ।
इसी समय इन्द्रने समस्त असुरोंको जीतकर मार गिराया तथा त्रिभुवनका साम्राज्य प्राप्त कर लिया। तदनन्तर उन्होंने अंगिराके ज्येष्ठ पुत्र विप्रवर बृहस्पतिको अपना पुरोहित बनाया ॥ ७ ½ ॥
याज्यस्त्वङ्गिरसः पूर्वमासीद् राजा करंधमः ॥ ८ ॥
वीर्येणाप्रतिमो लोके वृत्तेन च बलेन च ।
शतक्रतुरिवौजस्वी धर्मात्मा संशितव्रतः ॥ ९ ॥
इसके पहले अंगिराके यजमान राजा करन्धम थे। संसारमें बल, पराक्रम और सदाचारके द्वारा उनकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं था। वे इन्द्रतुल्य तेजस्वी, धर्मात्मा और कठोर व्रतका पालन करनेवाले थे ॥ ८-९ ॥
वाहनं यस्य योधाश्च मित्राणि विविधानि च ।
शयनानि च मुख्यानि महार्हाणि च सर्वशः ॥ १० ॥
ध्यानादेवाभवद् राजन् मुखवातेन सर्वशः ।
स गुणैः पार्थिवान् सर्वान् वशे चक्रे नराधिपः ॥ ११ ॥
राजन्! उनके लिये वाहन, योद्धा, नाना प्रकारके मित्र तथा श्रेष्ठ और सब प्रकारकी बहुमूल्य शय्याएँ चिन्तन करनेसे और मुखजनित वायुसे ही प्रकट हो जाती थीं। राजा करन्धमने अपने गुणोंसे समस्त राजाओंको अपने वशमें कर लिया था ॥ १०-११ ॥
संजीव्य कालमिष्टं च सशरीरो दिवं गतः ।
बभूव तस्य पुत्रस्तु ययातिरिव धर्मवित् ॥ १२ ॥
अविक्षिन्नाम शत्रुंजित् स वशे कृतवान् महीम् ।
विक्रमेण गुणैश्चैव पितेवासीत् स पार्थिवः ॥ १३ ॥
कहते हैं राजा करन्धम अभीष्ट कालतक इस संसारमें जीवन धारण करके अन्तमें सशरीर स्वर्गलोकको चले गये थे। उनके पुत्र अविक्षित् ययातिके समान धर्मज्ञ थे। उन्होंने अपने पराक्रम और गुणोंके द्वारा शत्रुओंपर विजय पाकर सारी पृथ्वीको अपने वशमें कर लिया था। वे राजा अपनी प्रजाके लिये पिताके समान थे ॥ १२-१३ ॥
तस्य वासवतुल्योऽभून्मरुत्तो नाम वीर्यवान् ।
पुत्रस्तमनुरक्ताभूत् पृथिवी सागराम्बरा ॥ १४ ॥
अविक्षित्के पुत्रका नाम मरुत्त था, जो इन्द्रके समान पराक्रमी थे। समुद्ररूपी वस्त्रसे आच्छादित हुई यह सारी पृथ्वी—समस्त भूमण्डलकी प्रजा उनमें अनुराग रखती थी ॥ १४ ॥
स्पर्धते स स्म सततं देवराजेन नित्यदा ।
वासवोऽपि मरुत्तेन स्पर्धते पाण्डुनन्दन ।। १५ ।।
पाण्डुनन्दन! राजा मरुत्त सदा देवराज इन्द्रसे स्पर्धा रखते थे और इन्द्र भी मरुत्तके साथ स्पर्धा रखते थे ।। १५ ।।
शुचिः स गुणवानासीन्मरुत्तः पृथिवीपतिः ।
यतमानोऽपि यं शक्रो न विशेषयति स्म ह ।। १६ ।।
पृथिवीपति मरुत्त पवित्र एवं गुणवान् थे। इन्द्र उनसे बढ़नेके लिये सदा प्रयत्न करते थे तो भी कभी बढ़ नहीं पाते थे ।। १६ ।।
सोऽशक्नुवन् विशेषाय समाहूय बृहस्पतिम् ।
उवाचेदं वचो देवैः सहितो हरिवाहनः ।। १७ ।।
जब देवताओंसहित इन्द्र किसी तरह बढ़ न सके, तब बृहस्पतिको बुलाकर उनसे इस प्रकार कहने लगे— ।। १७ ।।
बृहस्पते मरुत्तस्य मा स्म कार्षीः कथंचन ।
दैवं कर्मार्थ पित्र्यं वा कर्तासि मम चेत् प्रियम् ।। १८ ।।
‘बृहस्पतिजी! यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो राजा मरुत्तका यज्ञ तथा श्राद्धकर्म किसी तरह न कराइयेगा ।। १८ ।।
अहं हि त्रिषु लोकेषु सुराणां च बृहस्पते ।
इन्द्रत्वं प्राप्तवानेको मरुत्तस्तु महीपतिः ।। १९ ।।
‘बृहस्पते! एकमात्र मैं ही तीनों लोकोंका स्वामी और देवताओंका इन्द्र हूँ। मरुत्त तो केवल पृथ्वीके राजा हैं ।। १९ ।।
कथं ह्यमर्त्यं ब्रह्मंस्त्वं याजयित्वा सुराधिपम् ।
याजयेर्मृत्युसंयुक्तं मरुत्तमविशङ्कया ।। २० ।।
‘ब्रह्मन्! आप अमर देवराजका यज्ञ कराकर—देवेन्द्रके पुरोहित होकर मरणधर्मा मरुत्तका यज्ञ कैसे निःशंक होकर कराइयेगा? ।। २० ।।
मां वा वृणीष्व भद्रं ते मरुत्तं वा महीपतिम् ।
परित्यज्य मरुत्तं वा यथाजोषं भजस्व माम् ।। २१ ।।
‘आपका कल्याण हो। आप मुझे अपना यजमान बनाइये अथवा पृथिवीपति मरुत्तको। या तो मुझे छोड़िये या मरुत्तको छोड़कर चुपचाप मेरा आश्रय लीजिये’ ।। २१ ।।
एवमुक्तः स कौरव्य देवराज्ञा बृहस्पतिः ।
मुहूर्तमिव संचिन्त्य देवराजानमब्रवीत् ।। २२ ।।
कुरुनन्दन! देवराज इन्द्रके ऐसा कहनेपर बृहस्पतिने दो घड़ीतक सोच-विचारकर उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया— ।। २२ ।।
त्वं भूतानामधिपतिस्त्वयि लोकाः प्रतिष्ठिताः ।
नमुचेर्विश्वरूपस्य निहन्ता त्वं बलस्य च ।। २३ ।।
'देवराज! तुम सम्पूर्ण जीवोंके स्वामी हो, तुम्हारे ही आधारपर समस्त लोक टिके हुए हैं। तुम नमुचि, विश्वरूप और बलासुरके विनाशक हो ।। २३ ।।
त्वमाजहर्थ देवानामेको वीरश्रियं पराम् ।
त्वं बिभर्षि भुवं द्यां च सदैव बलसूदन ।। २४ ।।
'बलसूदन! तुम अद्वितीय वीर हो। तुमने उत्तम सम्पत्ति प्राप्त की है। तुम पृथ्वी और स्वर्ग दोनोंका भरण-पोषण एवं संरक्षण करते हो ।। २४ ।।
पौरोहित्यं कथं कृत्वा तव देवगणेश्वर ।
याजयेयमहं मर्त्यं मरुत्तं पाकशासन ।। २५ ।।
'देवेश्वर! पाकशासन! तुम्हारी पुरोहिती करके मैं मरणधर्मा मरुत्तका यज्ञ कैसे करा सकता हूँ ।। २५ ।।
समाश्र्वसिहि देवेन्द्र नाहं मर्त्यस्य कर्हिचित् ।
ग्रहीष्यामि स्रुवं यज्ञे शृणु चेदं वचो मम ।। २६ ।।
'देवेन्द्र! धैर्य धारण करो। अब मैं कभी किसी मनुष्यके यज्ञमें जाकर सुवा हाथमें नहीं लूँगा। इसके सिवा मेरी यह बात भी ध्यानसे सुन लो ।। २६ ।।
हिरण्यरेता नोष्णः स्यात् परिवर्तत मेदिनी ।
भासं तु न रविः कुर्यान्न तु सत्यं चलेन्मयि ।। २७ ।।
'आग चाहे ठण्डी हो जाय, पृथ्वी उलट जाय और सूर्यदेव प्रकाश करना छोड़ दें; किंतु मेरी यह सच्ची प्रतिज्ञा नहीं टल सकती' ।। २७ ।।
वैशम्पायन उवाच
बृहस्पतिवचः श्रुत्वा शक्रो विगतमत्सरः ।
प्रशस्यैनं विवेशाथ स्वमेव भवनं तदा ।। २८ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! बृहस्पतिजीकी बात सुनकर इन्द्रका मात्सर्य दूर हो गया और तब वे उनकी प्रशंसा करके अपने घरमें चले गये ।। २८ ।।
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५ ।।