संग्रह पर लौटें
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ
३२९-
पृष्ठ 2199स्थायी लिंक
एकोनत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
शुकदेवजीको नारदजीका वैराग्य और ज्ञानका उपदेश
भीष्म उवाच
एतस्मिन्नन्तरे शून्ये नारदः समुपागमत् ।
शुकं स्वाध्यायनिरतं वेदार्थान् वक्तुमीप्सितान् ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! व्यासजीके चले जानेके बाद उस सूने आश्रममें स्वाध्यायपरायण शुकदेवसे अपना इच्छित वेदोंका अर्थ कहनेके लिये देवर्षि नारदजी पधारे ॥ १ ॥
देवर्षिं तु शुको दृष्ट्वा नारदं समुपस्थितम् ।
अर्घ्यपूर्वेण विधिना वेदोक्तेनाभ्यपूजयत् ॥ २ ॥
देवर्षि नारदको उपस्थित देख शुकदेवने वेदोक्त विधिसे अर्घ्य आदि निवेदन करके उनका पूजन किया ॥ २ ॥
नारदोथाब्रवीत् प्रीतो ब्रूहि धर्मभृतां वर ।
केन त्वां श्रेयसा वत्स योजयामीति हृष्टवत् ॥ ३ ॥