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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

१६९-

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एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः

गौतमका समुद्रकी ओर प्रस्थान और संध्याके समय एक दिव्य बकपक्षीके घरपर अतिथि होना

भीष्म उवाच

तस्यां निशायां व्युष्टायां गते तस्मिन् द्विजोत्तमे ।
निष्क्रम्य गौतमोऽगच्छत् समुद्रं प्रति भारत ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—भारत! जब रात बीती, सबेरा हुआ और वह श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँसे चला गया, तब गौतम भी घर छोड़कर समुद्रकी ओर चल दिया ॥ १ ॥

सामुद्रिकान् स वणिजस्ततोऽपश्यत् स्थितान् पथि ।
स तेन सह सार्थेन प्रययौ सागरं प्रति ॥ २ ॥
रास्तेमें उसने देखा कि समुद्रके आस-पास रहनेवाले कुछ व्यापारी वैश्य ठहरे हुए हैं। वह उन्हींके दलके साथ हो लिया और समुद्रकी ओर जाने लगा ॥ २ ॥

स तु सार्थो महान् राजन् कस्मिंश्चिद् गिरिगह्वरे ।
मत्तेन द्विरदेनाथ निहतः प्रायशोऽभवत् ॥ ३ ॥
राजन्! वैश्योंका वह महान् दल किसी पर्वतकी गुफामें डेरा डाले हुए था। इतनेहीमें एक मतवाले हाथीने उसपर आक्रमण कर दिया। उस दलके अधिकांश मनुष्य उसके द्वारा मारे गये ॥ ३ ॥

स कथंचिद् भयात् तस्माद् विमुक्तो ब्राह्मणस्तथा ।
कांदिग्भूतो जीवितार्थी प्रदुद्रावोत्तरां दिशम् ॥ ४ ॥
गौतम ब्राह्मण किसी तरह उस भयसे छूट तो गया; परंतु उस घबराहटमें वह यह निर्णय न कर सका कि मुझे किस दिशामें जाना है? अपने प्राण बचानेके लिये वह उत्तर दिशाकी ओर भाग चला ॥ ४ ॥

स तु सार्थपरिभ्रष्टस्तस्माद् देशात् तथा च्युतः ।
एकाकी व्यचरत् तत्र वने किंपुरुषो यथा ॥ ५ ॥
व्यापारियोंके दलका साथ छूट गया, अतः उस देशसे भी भ्रष्ट होकर वह अकेला ही उस वनमें विचरने लगा; मानो कोई किंपुरुष घूम रहा हो ॥ ५ ॥

स पन्थानमथासाद्य समुद्राभिसरं तदा ।
आससाद वनं रम्यं दिव्यं पुष्पितपादपम् ॥ ६ ॥
उस समय समुद्रकी ओर जानेवाला एक मार्ग उसे मिल गया और उसीको पकड़कर वह दिव्य एवं रमणीय वनमें जा पहुँचा। वहाँके सभी वृक्ष सुन्दर फूलोंसे सुशोभित

थे ॥ ६ ॥
सर्वर्तुकैराम्रवणैः पुष्पितैरुपशोभितम् ।
नन्दनोद्देशसदृशं यक्षकिन्नरसेवितम् ॥ ७ ॥
सभी ऋतुओंमें फूलने-फलनेवाली आम्रवृक्षोंकी पंक्तियाँ उस वनकी शोभा बढ़ा रही थीं। यक्षों और किन्नरोंसे सेवित वह प्रदेश नन्दनवनके समान मनोरम जान पड़ता था ॥ ७ ॥
शालैस्तालैस्तमालैश्च कालागुरुवनैस्तथा ।
चन्दनस्य च मुख्यस्य पादपैरुपशोभितम् ।
गिरिप्रस्थेषु रम्येषु तेषु तेषु सुगन्धिषु ॥ ८ ॥
समन्ततो द्विजश्रेष्ठास्तत्राकूजन्त वै तदा ।
शाल, ताल, तमाल, काले अगुरुके वन तथा श्रेष्ठ चन्दनके वृक्ष उस वनको सुशोभित करते थे। वहाँके रमणीय और सुगन्धित पर्वतीय समतल प्रदेशोंमें चारों ओर उत्तमोत्तम पक्षी कलरव कर रहे थे ॥ ८ १/२ ॥
मनुष्यवदनाश्चान्ये भारुण्डा इति विश्रुताः ॥ ९ ॥
भूलिङ्गशकुनाश्चान्ये सामुद्राः पर्वतोद्भवाः ।
कहीं मनुष्योंके समान मुखवाले 'भारुण्ड' नामक पक्षी बोलते थे। कहीं समुद्रतट और पर्वतोंपर रहनेवाले भूलिङ्ग पक्षी तथा अन्य विहंगम चहचहा रहे थे ॥ ९ १/२ ॥
स तान्यतिमनोज्ञानि विहगानां रुतानि वै ॥ १० ॥
शृण्वन् सुरमणीयानि विप्रोऽगच्छत गौतमः ।
पक्षियोंके उन मधुर मनोहर एवं रमणीय कलरवोंको सुनता हुआ गौतम ब्राह्मण आगे बढ़ता चला गया ॥ १० १/२ ॥
ततोऽपश्यत् सुरम्येषु सुवर्णसिकताचिते ॥ ११ ॥
देशे समे सुखे चित्रे स्वर्गोद्देशसमे नृप ।
श्रिया जुष्टं महावृक्षं न्यग्रोधं च सुमण्डलम् ॥ १२ ॥
शाखाभिरनुरूपाभिर्भूयिष्ठं छत्रसंनिभम् ।
तस्य मूलं च संसिक्तं वरचन्दनवारिणा ॥ १३ ॥
नरेश्वर! तदनन्तर उन रमणीय प्रदेशोंमेंसे एक ऐसे स्थानपर जो सुवर्णमयी बालुकाराशिसे व्याप्त, समतल, सुखद, विचित्र तथा स्वर्गीय भूमिके समान मनोहर था, गौतमने एक अत्यन्त शोभायमान बरगदका विशाल वृक्ष देखा, जो चारों ओर मण्डलाकार फैला हुआ था। अपनी बहुत-सी सुन्दर शाखाओंके कारण वह वृक्ष एक महान् छत्रके समान जान पड़ता था। उसकी जड़ चन्दनमिश्रित जलसे सींची गयी थी ॥ ११-१३ ॥
दिव्यपुष्पान्वितं श्रीमत् पितामहसभोपमम् ।
तं दृष्ट्वा गौतमः प्रीतो मनःकान्तमनुत्तमम् ॥ १४ ॥

ब्रह्माजीकी सभाके समान शोभा पानेवाला वह वृक्ष दिव्य पुष्पोंसे सुशोभित था। उस परम उत्तम मनोरम वटवृक्षको देखकर गौतमको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ १४ ॥
मेध्यं सुरगृहप्रख्यं पुष्पितैः पादपैर्वृतम् ।
तमासाद्य मुदा युक्तस्तस्याधस्तादुपाविशत् ॥ १५ ॥
वह पवित्र, देवगृहके समान सुन्दर और खिले हुए वृक्षोंसे घिरा हुआ था। उस वृक्षके पास जाकर वह बड़े हर्षके साथ उसके नीचे छायामें बैठा ॥ १५ ॥
तत्रासीनस्य कौन्तेय गौतमस्य सुखः शिवः ।
पुष्पाणि समुपस्पृश्य प्रववावनिलः शुभः ।
ह्लादयन् सर्वगात्राणि गौतमस्य तदा नृप ॥ १६ ॥
कुन्तीनन्दन! गौतमके वहाँ बैठते ही फूलोंका स्पर्श करके सुन्दर-मन्द-सुगन्ध वायु चलने लगी, जो बड़ी ही सुखद और कल्याणप्रद जान पड़ती थी। नरेश्वर! वह गौतमके सम्पूर्ण अङ्गोंको आह्लाद प्रदान कर रही थी ॥ १६ ॥
स तु विप्रः प्रशान्तश्च स्पृष्टः पुण्येन वायुना ।
सुखमासाद्य सुष्वाप भास्करश्चास्तमभ्ययात् ॥ १७ ॥
उस पवित्र वायुका स्पर्श पाकर गौतमको बड़ी शान्ति मिली। वह सुखका अनुभव करता हुआ वहीं लेट गया। उधर सूर्य भी डूब गया ॥ १७ ॥
ततोऽस्तं भास्करे याते संध्याकाल उपस्थिते ।
आजगाम स्वभवनं ब्रह्मलोकात् खगोत्तमः ॥ १८ ॥
तदनन्तर, सूर्यके अस्ताचलको चले जानेके पश्चात् संध्याकाल उपस्थित होनेपर ब्रह्मलोकसे वहाँ एक श्रेष्ठ पक्षी आया। वह वृक्ष ही उसका घर या वासस्थान था ॥ १८ ॥
नाडीजङ्घ इति ख्यातो दयितो ब्रह्मणः सखा ।
बकराजो महाप्राज्ञः कश्यपस्यात्मसम्भवः ॥ १९ ॥
वह महर्षि कश्यपका पुत्र और ब्रह्माजीका प्रिय सखा था। उसका नाम था नाडीजङ्घ। वह बगुलोंका राजा और महाबुद्धिमान् था ॥ १९ ॥
राजधर्मेति विख्यातो बभूवाप्रतिमो भुवि ।
देवकन्यासूतः श्रीमान् विद्वान् देवसमप्रभः ॥ २० ॥
वह अनुपम पक्षी इस भूतलपर राजधर्माके नामसे विख्यात था। देवकन्यासे उत्पन्न होनेके कारण उसके शरीरकी कान्ति देवताके समान थी। वह बड़ा विद्वान् था और दिव्य तेजसे सम्पन्न दिखायी देता था ॥ २० ॥
मृष्टाभरणसम्पन्नो भूषणैरर्कसंनिभैः ।
भूषितः सर्वगात्रेषु देवगर्भः श्रिया ज्वलन् ॥ २१ ॥
उसके अङ्गोंमें सूर्यदेवकी किरणोंके समान चमकीले आभूषण शोभा देते थे। वह देवकुमार अपने सभी अङ्गोंमें विशुद्ध एवं दिव्य आभरणोंसे विभूषित हो दिव्य दीप्तिसे

देदीप्यमान होता था ॥ २१ ॥
तमागतं खगं दृष्ट्वा गौतमो विस्मितोऽभवत् ।
क्षुत्पिपासापरिश्रान्तो हिंसार्थी चाभ्यवैक्षत ॥ २२ ॥
उस पक्षीको आया देख गौतम आश्चर्यसे चकित हो उठा। उस समय वह भूखा-प्यासा तो था ही, रास्ता चलनेकी थकावटसे भी चूर-चूर हो रहा था। अतः राजधर्माको मार डालनेकी इच्छासे उसकी ओर देखा ॥ २२ ॥

राजधर्मोवाच
स्वागतं भवतो विप्र दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मे गृहम् ।
अस्तं च सविता यातः संध्येयं समुपस्थिता ॥ २३ ॥
**राजधर्मा (पास आकर) बोला—**विप्रवर! आपका स्वागत है। यह मेरा घर है। आप यहाँ पधारे, यह मेरे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है। सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये। यह संध्याकाल उपस्थित है ॥ २३ ॥
मम त्वं निलयं प्राप्तः प्रियातिथिरनिन्दितः ।
पूजितो यास्यसि प्रातर्विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ २४ ॥
आप मेरे घर आये हुए प्रिय एवं उत्तम अतिथि हैं। मैं शास्त्रीय विधिके अनुसार आज आपकी पूजा करूँगा। रातमें मेरा आतिथ्य स्वीकार करके कल प्रातःकाल यहाँसे जाइयेगा ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कृतघ्नोपाख्याने
एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कृतघ्नका उपाख्यानविषयक एक सौ उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६९ ॥