महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
सत्य-असत्यका विवेचन, धर्मका लक्षण तथा व्यावहारिक नीतिका वर्णन
नवाधिकशततमोऽध्यायः
सत्य-असत्यका विवेचन, धर्मका लक्षण तथा व्यावहारिक नीतिका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
कथं धर्मे स्थातुमिच्छन् नरो वर्तेत भारत ।
विद्वन् जिज्ञासमानाय प्रब्रूहि भरतर्षभ ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भरतनन्दन! धर्ममें स्थित रहनेकी इच्छावाला मनुष्य कैसा बर्ताव करे? विद्वन्! मैं इस बातको जानना चाहता हूँ। भरतश्रेष्ठ! आप मुझसे इसका वर्णन कीजिये ॥ १ ॥
सत्यं चैवानृतं चोभे लोकानावृत्य तिष्ठतः ।
तयोः किमाचरेद् राजन् पुरुषो धर्मनिश्चितः ॥ २ ॥
राजन्! सत्य और असत्य—ये दोनों सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करके स्थित हैं; किंतु धर्मपर विश्वास करनेवाला मनुष्य इन दोनोंमेंसे किसका आचरण करे? ॥ २ ॥
किंस्वित् सत्यं किमनृतं किंस्विद् धर्म्यं सनातनम् ।
कस्मिन् काले वदेत् सत्यं कस्मिन् कालेऽनृतं वदेत् ॥ ३ ॥
क्या सत्य है और क्या झूठ? तथा कौन-सा कार्य सनातन धर्मके अनुकूल है? किस समय सत्य बोलना चाहिये और किस समय झूठ? ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
सत्यस्य वचनं साधु न सत्याद् विद्यते परम् ।
यत्तू लोकेषु दुर्ज्ञानं तत् प्रवक्ष्यामि भारत ॥ ४ ॥
**भीष्मजीने कहा—**भारत! सत्य बोलना अच्छा है। सत्यसे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है; परंतु लोकमें जिसे जानना अत्यन्त कठिन है, उसीको मैं बता रहा हूँ ॥ ४ ॥
भवेत् सत्यं न वक्तव्यं वक्तव्यमनृतं भवेत् ।
यत्रानृतं भवेत् सत्यं सत्यं वाप्यनृतं भवेत् ॥ ५ ॥
जहाँ झूठ ही सत्यका काम करे (किसी प्राणीको संकटसे बचाये) अथवा सत्य ही झूठ बन जाय (किसीके जीवनको संकटमें डाल दे); ऐसे अवसरोंपर सत्य नहीं बोलना चाहिये। वहाँ झूठ बोलना ही उचित है ॥ ५ ॥
तादृशो बध्यते बालो यत्र सत्यमनिष्ठितम् ।
सत्यानृते विनिश्चित्य ततो भवति धर्मवित् ॥ ६ ॥
जिसमें सत्य स्थिर न हो, ऐसा मूर्ख मनुष्य ही मारा जाता है। सत्य और असत्यका निर्णय करके सत्यका पालन करनेवाला पुरुष ही धर्मज्ञ माना जाता है ॥ ६ ॥
अप्यनार्योऽकृतप्रज्ञः पुरुषोऽप्यतिदारुणः ।
सुमहत् प्राप्नुयात् पुण्यं बलाकोऽन्धवधादिव ॥ ७ ॥
जो नीच है, जिसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है तथा जो अत्यन्त कठोर स्वभावका है, वह मनुष्य भी कभी अंधे पशुको मारनेवाले बलाक नामक व्याधकी भाँति महान् पुण्य प्राप्त कर लेता है* ॥ ७ ॥
किमाश्चर्यं च यन्मूढो धर्मकामोऽप्यधर्मवित् ।
सुमहत् प्राप्नुयात् पुण्यं गङ्गायामिव कौशिकः ॥ ८ ॥
कैसा आश्चर्य है कि धर्मकी इच्छा रखनेवाला मूर्ख (तपस्वी) (सत्य बोलकर भी) अधर्मके फलको प्राप्त हो जाता है। (कर्णपर्व अध्याय ६९) और गंगाके तटपर रहनेवाले एक उल्लूकी भाँति कोई (हिंसा करके भी) महान् पुण्य प्राप्त कर लेता है³. ॥ ८ ॥
तादृशोऽयमनुप्रश्नो यत्र धर्मः सुदुर्लभः ।
दुष्करः प्रतिसंख्यातुं तत् केनात्र व्यवस्यति ॥ ९ ॥
युधिष्ठिर! तुम्हारा यह पिछला प्रश्न भी ऐसा ही है। इसके अनुसार धर्मके स्वरूपका विवेचन करना या समझना बहुत कठिन है; इसीलिये उसका प्रतिपादन करना भी दुष्कर ही है; अतः धर्मके विषयमें कोई किस प्रकार निश्चय करे? ॥ ९ ॥
प्रभवार्थाय भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम् ।
यः स्यात् प्रभवसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः ॥ १० ॥
प्राणियोंके अभ्युदय और कल्याणके लिये ही धर्मका प्रवचन किया गया है; अतः जो इस उद्देश्यसे युक्त हो अर्थात् जिससे अभ्युदय और निःश्रेयस सिद्ध होते हों, वही धर्म है, ऐसा शास्त्रवेत्ताओंका निश्चय है ॥ १० ॥
धारणाद् धर्ममित्याहुर्धर्मेण विधृताः प्रजाः ।
यः स्याद् धारणसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः ॥ ११ ॥
धर्मका नाम ‘धर्म’ इसलिये पड़ा है कि वह सबको धारण करता है—अधोगतिमें जानेसे बचाता है और जीवनकी रक्षा करता है। धर्मने ही सारी प्रजाको धारण कर रखा है; अतः जिससे धारण और पोषण सिद्ध होता हो, वही धर्म है; ऐसा धर्मवेत्ताओंका निश्चय है ॥ ११ ॥
अहिंसार्थाय भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम् ।
यः स्यादहिंसासम्पृक्तः स धर्म इति निश्चयः ॥ १२ ॥
प्राणियोंकी हिंसा न हो, इसके लिये धर्मका उपदेश किया गया है; अतः जो अहिंसासे युक्त हो, वही धर्म है, ऐसा धर्मात्माओंका निश्चय है ॥ १२ ॥
(अहिंसा सत्यमक्रोधस्तपो दानं दमो मतिः ।
अनसूयाप्यमात्सर्यमनीर्ष्या शीलमेव च ।।
एष धर्मः कुरुश्रेष्ठ कथितः परमेष्ठिना ।
ब्रह्मणा देवदेवेन अयं चैव सनातनः ।।
अस्मिन् धर्मे स्थितो राजन् नरो भद्राणि पश्यति ।)
राजन्! कुरुश्रेष्ठ! अहिंसा, सत्य, अक्रोध, तपस्या दान, मन, और इन्द्रियोंका संयम, विशुद्ध बुद्धि, किसीके दोष न देखना, किसीसे डाह और जलन न रखना तथा उत्तम शीलस्वभावका परिचय देना—ये धर्म हैं, देवाधिदेव परमेष्ठी ब्रह्माजीने इन्हींको सनातन धर्म बताया है। जो मनुष्य इस सनातन धर्ममें स्थित है, उसे ही कल्याणका दर्शन होता है ।।
श्रुतिधर्म इति ह्येके नेत्याहुरपरे जनाः ।
न च तत्प्रत्यसूयामो न हि सर्वं विधीयते ।। १३ ।।
वेदमें जिसका प्रतिपादन किया गया है, वही धर्म है, यह एक श्रेणीके विद्वानोंका मत है; किंतु दूसरे लोग धर्मका यह लक्षण नहीं स्वीकार करते हैं। हम किसी भी मतपर दोषारोपण नहीं करते। इतना अवश्य है कि वेदमें सभी बातोंका विधान नहीं है ।। १३ ।।
येऽन्यायेन जिहीर्षन्तो धनमिच्छन्ति कस्यचित् ।
तेभ्यस्तु न तदाख्येयं स धर्म इति निश्चयः ।। १४ ।।
जो अन्यायसे अपहरण करनेकी इच्छा रखकर किसी धनीके धनका पता लगाना चाहते हों, उन लुटेरोंसे उसका पता न बतावे और यही धर्म है, ऐसा निश्चय रखे ।। १४ ।।
अकूजनेन चेन्मोक्षो नावकूजेत् कथंचन ।
अवश्यं कूजितव्ये वा शङ्केरेन् वाप्यकूजनात् ।। १५ ।।
श्रेयस्तत्रानृतं वक्तुं सत्यादिति विचारितम् ।
यदि न बतानेसे उस धनीका बचाव हो जाता हो तो किसी तरह वहाँ कुछ बोले ही नहीं; परंतु यदि बोलना अनिवार्य हो जाय और न बोलनेसे लुटेरोंके मनमें संदेह पैदा होने लगे तो वहाँ सत्य बोलनेकी अपेक्षा झूठ बोलनेमें ही कल्याण है; यही इस विषयमें विचारपूर्वक निर्णय किया गया है ।। १५ १/२ ।।
यः पापैः सह सम्बन्धान्मुच्यते शपथदपि ।। १६ ।।
न तेभ्योऽपि धनं देयं शक्ये सति कथंचन ।
पापेभ्यो हि धनं दत्तं दातारमपि पीडयेत् ।। १७ ।।
यदि शपथ खा लेनेसे भी पापियोंके हाथसे छुटकारा मिल जाय तो वैसा ही करे। जहाँतक वश चले, किसी तरह भी पापियोंके हाथमें धन न जाने दे; क्योंकि पापाचारियोंको दिया हुआ धन दाताको भी पीड़ित कर देता है ।। १६-१७ ।।
स्वशरीरोपरोधेन धनमादातुमिच्छतः ।
सत्यसम्प्रतिपत्त्यर्थं यद् ब्रूयुः साक्षिणः क्वचित् ।। १८ ।।
अनुक्त्वा तत्र तद्वाच्यं सर्वे तेऽनृतवादिनः ।
जो कर्जदारको अपने अधीन करके उससे शारीरिक सेवा कराकर धन वसूल करना चाहता है, उसके दावेको सही साबित करनेके लिये यदि कुछ लोगोंको गवाही देनी पड़े और वे गवाह अपनी गवाहीमें कहने योग्य सत्य बातको न कहें तो वे सब-के-सब मिथ्यावादी होते हैं ।। १८ १/२ ।।
प्राणात्यये विवाहे च वक्तव्यमनृतं भवेत् ।। १९ ।।
अर्थस्य रक्षणार्थाय परेषां धर्मकारणात् ।
परंतु प्राण-संकटके समय, विवाहके अवसरपर, दूसरेके धनकी रक्षाके लिये तथा धर्मकी रक्षाके लिये असत्य बोला जा सकता है ।। १९ १/२ ।।
परेषां सिद्धिमाकांक्षन् नीचः स्याद् धर्मभिक्षुकः ।। २० ।।
प्रतिश्रुत्य प्रदातव्यः स्वकार्यस्तु बलात्कृतः ।
कोई नीच मनुष्य भी यदि दूसरोंकी कार्यसिद्धिकी इच्छासे धर्मके लिये भीख माँगने आवे तो उसे देनेकी प्रतिज्ञा कर लेनेपर अवश्य ही धनका दान देना चाहिये। इस प्रकार धनोपार्जन करनेवाला यदि कपटपूर्ण व्यवहार करता है तो वह दण्डका पात्र होता है ।। २० १/२ ।।
यः कश्चिद् धर्मसमयात् प्रच्युतो धर्मसाधनः ।। २१ ।।
दण्डेनैव स हन्तव्यस्तं पन्थानं समाश्रितः ।
जो कोई धर्मसाधक मनुष्य धार्मिक आचारसे भ्रष्ट हो पापमार्गका आश्रय ले, उसे अवश्य दण्डके द्वारा मारना चाहिये ।। २१ १/२ ।।
च्युतः सदैव धर्मेभ्योऽमानवं धर्ममास्थितः ।। २२ ।।
शठः स्वधर्ममुत्सृज्य तमिच्छेदुपजीवितुम् ।
सर्वोपायैर्निहन्तव्यः पापो निकृतिजीवनः ।। २३ ।।
धनमित्येव पापानां सर्वेषामिह निश्चयः ।
जो दुष्ट धर्ममार्गसे भ्रष्ट होकर आसुरी प्रवृत्तिमें लगा रहता है और स्वधर्मका परित्याग करके पापसे जीविका चलाना चाहता है, कपटसे जीवन-निर्वाह करनेवाले उस पापात्माको सभी उपायोंसे मार डालना चाहिये; क्योंकि सभी पापात्माओंका यही विचार रहता है कि जैसे बने, वैसे धनको लूट-खसोट कर रख लिया जाय ।। २२-२३ १/२ ।।
अविषह्या ह्यसम्भोज्या निकृत्या पतनं गताः ।। २४ ।।
च्युता देवमनुष्येभ्यो यथा प्रेतास्तथैव ते ।
निर्याज्ञास्तपसा हीना मा स्म तैः सह सङ्गमः ।। २५ ।।
ऐसे लोग दूसरोंके लिये असह्य हो उठते हैं। इनका अन्न न तो स्वयं भोजन करे और न इन्हें ही अपना अन्न दे; क्योंकि ये छल-कपटके द्वारा पतनके गर्तमें गिर चुके हैं और
देवलोक तथा मनुष्यलोक दोनोंसे वंचित हो प्रेतोंके समान अवस्थाको पहुँच गये हैं। इतना ही नहीं, वे यज्ञ और तपस्यासे भी हीन हैं; अतः तुम कभी उनका संग न करो ।। २४-२५ ।।
धननाशाद् दुःखतरं जीविताद् विप्रयोजनम् ।
अयं ते रोचतां धर्म इति वाच्यः प्रयत्नतः ।। २६ ।।
'किसीके धनका नाश करनेसे भी अधिक दुःखदायक कर्म है जीवनका नाश; अतः तुम्हें धर्मकी ही रुचि रखनी चाहिये' यह बात तुम्हें दुष्टोंको यत्नपूर्वक बतानी और समझानी चाहिये ।। २६ ।।
न कश्चिदस्ति पापानां धर्म इत्येष निश्चयः ।
तथागतं च यो हन्यान्नासौ पापेन लिप्यते ।। २७ ।।
पापियोंका तो यही निश्चय होता है कि धर्म कोई वस्तु नहीं है; ऐसे लोगोंको जो मार डाले, उसे पाप नहीं लगता ।। २७ ।।
स्वकर्मणा हतं हन्ति हत एव स हन्यते ।
तेषु यः समयं कश्चिद् कुर्वीत हतबुद्धिषु ।। २८ ।।
पापी मनुष्य अपने कर्मसे ही मरा हुआ है; अतः उसको जो मारता है, वह मरे हुएको ही मारता है। उसके मारनेका पाप नहीं लगता; अतः जो कोई भी मनुष्य इन हतबुद्धि पापियोंके वधका नियम ले सकता है ।।
यथा काकाश्च गृध्राश्च तथैवोपधिजीविनः ।
ऊर्ध्वं देहविमोक्षात् ते भवन्त्येतासु योनिषु ।। २९ ।।
जैसे कौए और गीध होते हैं, वैसे ही कपटसे जीविका चलानेवाले लोग भी होते हैं। वे मरनेके बाद इन्हीं योनियोंमें जन्म लेते हैं ।। २९ ।।
यस्मिन् यथा वर्तते यो मनुष्य-
स्तस्मिंस्तथा वर्तितव्यं स धर्मः ।
मायाचारो मायया बाधितव्यः
साध्वाचारः साधुना प्रत्युपेयः ।। ३० ।।
जो मनुष्य जिसके साथ जैसा बर्ताव करे, उसके साथ भी उसे वैसा ही बर्ताव करना चाहिये; यह धर्म (न्याय) है। कपटपूर्ण आचरण करनेवालेको वैसे ही आचरणके द्वारा दबाना उचित है और सदाचारीको सद्व्यवहारके द्वारा ही अपनाना चाहिये ।। ३० ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सत्यानृतकविभागे
नवाधिकशततमोऽध्यायः ।। १०९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें
सत्यासत्यविभागविषयक एक सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०९ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३२ १/३ श्लोक हैं)
* देखिये कर्णपर्व अध्याय ६९ श्लोक ३८ से ४५ तक।
१. गंगाके तटपर किसी सर्पिणीने सहस्रों अण्डे देकर रख दिये थे। उन अण्डोंको एक उल्लूने रातमें फोड़-फोड़कर नष्ट कर दिया। इससे वह महान् पुण्यका भागी हुआ; अन्यथा उन अण्डोंसे हजारों विषैले सर्प पैदा होकर कितने ही लोगोंका विनाश कर डालते।