महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
व्यासजीका सृष्टिके प्रारम्भमें भगवान् नारायणके अंशसे सरस्वतीपुत्र अपान्तरतमाके रूपमें जन्म होनेकी और उनके प्रभावकी कथा
एकोनपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
व्यासजीका सृष्टिके प्रारम्भमें भगवान् नारायणके अंशसे सरस्वतीपुत्र अपान्तरतमाके रूपमें जन्म होनेकी और उनके प्रभावकी कथा
जनमेजय उवाच
सांख्यं योगः पाञ्चरात्रं वेदारण्यकमेव च ।
ज्ञानान्येतानि ब्रह्मर्षे लोकेषु प्रचरन्ति ह ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मर्षे! सांख्य, योग, पाञ्चरात्र और वेदोंके आरण्यकभाग—ये चार प्रकारके ज्ञान सम्पूर्ण लोकोंमें प्रचलित हैं ॥ १ ॥
किमेतान्येकनिष्ठानि पृथङ्निष्ठानि वा मुने ।
प्रब्रूहि वै मया पृष्टः प्रवृत्तिं च यथाक्रमम् ॥ २ ॥
मुने! क्या ये सब एक ही लक्ष्यका बोध करानेवाले हैं अथवा पृथक्-पृथक् लक्ष्यके प्रतिपादक हैं? मेरे इस प्रश्नका आप यथावत् उत्तर दें और प्रवृत्तिका भी क्रमशः वर्णन करें ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
जज्ञे बहुज्ञं परमत्युदारं
यं द्वीपमध्ये सुतमात्मयोगात् ।
पराशरात् सत्यवती महर्षिं
तस्मै नमोऽज्ञानतमोनुदाय ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! देवी सत्यवतीने यमुनातटवर्ती द्वीपमें पराशर मुनिसे अपने शरीरका संयोग करके जिन बहुज्ञ और अत्यन्त उदार महर्षिको पुत्ररूपसे उत्पन्न किया था, अज्ञानरूपी अन्धकारको दूर करनेवाले ज्ञानसूर्यस्वरूप उन गुरुदेव व्यासजीको मेरा नमस्कार है ॥ ३ ॥
पितामहाद् यं प्रवदन्ति षष्ठं
महर्षिमार्षेयविभूतियुक्तम् ।
नारायणस्यांशजमेकपुत्रं
द्वैपायनं वेद महानिधानम् ॥ ४ ॥
ब्रह्माजीके आदिपुरुष जो नारायण हैं, उनके स्वरूपभूत जिन महर्षिको पूर्वपुरुष नारायणसे छठी पीढ़ीमें* उत्पन्न बताते हैं, जो ऋषियोंके सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे सम्पन्न हैं,
नारायणके अंशसे उत्पन्न हैं, अपने पिताके एक ही पुत्र हैं और द्वीपमें उत्पन्न होनेके कारण द्वैपायन कहलाते हैं, उन वेदके महान् भण्डाररूप व्यासजीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ४ ॥
तमादिकालेषु महाविभूति-
र्नारायणो ब्रह्ममहानिधानम् ।
ससर्ज पुत्रार्थमुदारतेजा
व्यासं महात्मानमजं पुराणम् ॥ ५ ॥
प्राचीनकालमें उदार तेजस्वी, महान् वैभवसम्पन्न भगवान् नारायणने वैदिक ज्ञानकी महानिधिरूप महात्मा अजन्मा और पुराणपुरुष व्यासजीको अपने पुत्ररूपसे उत्पन्न किया था ॥ ५ ॥
जनमेजय उवाच
त्वयैव कथितं पूर्वं सम्भवे द्विजसत्तम ।
वसिष्ठस्य सुतः शक्तिः शक्तिपुत्रः पराशरः ॥ ६ ॥
पराशरस्य दायादः कृष्णद्वैपायनो मुनिः ।
भूयो नारायणसुतं त्वमेवैनं प्रभाषसे ॥ ७ ॥
**जनमेजयने कहा—**द्विजश्रेष्ठ! आपहीने पहले आदिपर्वकी कथा सुनाते समय यह कहा था कि वसिष्ठके पुत्र शक्ति, शक्तिके पुत्र पराशर और पराशरके पुत्र मुनिवर श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास हैं और अब पुनः आप इन्हें नारायणका पुत्र बतला रहे हैं ॥ ६-७ ॥
किमतः पूर्वजं जन्म व्यासस्यामिततेजसः ।
कथयस्वोत्तममते जन्म नारायणोद्भवम् ॥ ८ ॥
श्रेष्ठ बुद्धिवाले मुनीश्वर! क्या अमिततेजस्वी व्यासजीका इससे पहले भी कोई जन्म हुआ था? नारायणसे व्यासजीका जन्म कब और कैसे हुआ? यह बतानेकी कृपा करें ॥ ८ ॥
वैशम्पायन उवाच
वेदार्थान् वेत्तुकामस्य धर्मिष्ठस्य तपोनिधेः ।
गुरोर्मे ज्ञाननिष्ठस्य हिमवत्पाद आसतः ॥ ९ ॥
कृत्वा भारतमाख्यानं तपःश्रान्तस्य धीमतः ।
शुश्रूषां तत्परा राजन् कृतवन्तो वयं तदा ॥ १० ॥
सुमन्तुर्जैमिनिश्चैव पैलश्च सुदृढव्रतः ।
अहं चतुर्थः शिष्यो वै शुकोव्यासात्मजस्तथा ॥ ११ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! मेरे धर्मिष्ठ गुरु वेदव्यास तपस्याकी निधि और ज्ञाननिष्ठ हैं। पहले वे वेदोंके अर्थका वास्तविक ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे हिमालयके एक शिखरपर रहते थे। ये महाभारत नामक इतिहासकी रचना करके तपस्या करते-करते थक
गये थे। उन दिनों इन बुद्धिमान् गुरुकी सेवामें तत्पर हम पाँच शिष्य उनके साथ रहते थे। सुमन्तु, जैमिनि, दृढ़तापूर्वक उत्तम धर्मका पालन करनेवाले पैल, चौथा मैं और पाँचवें व्यासपुत्र शुकदेव थे ॥ ९-११ ॥
एभिः परिवृतो व्यासः शिष्यैः पञ्चभिरुत्तमैः ।
शुशुभे हिमवत्पादे भूतैर्भूतपतिर्यथा ॥ १२ ॥
इन पाँच उत्तम शिष्योंसे घिरे हुए व्यासजी हिमालयके शिखरपर भूतोंसे परिवेष्टित भूतनाथ भगवान् शिवके समान शोभा पाते थे ॥ १२ ॥
वेदानावर्तयन् साङ्गान् भारतार्थांश्च सर्वशः ।
तमेकमनसं दान्तं युक्ता वयमुपास्महे ॥ १३ ॥
वहाँ व्यासजी अंगोंसहित सब वेदों तथा महाभारतके अर्थोंकी आवृत्ति करते और हम सब शिष्योंको पढ़ाते थे एवं हम सब लोग सदा उद्यत रहकर उन एकाग्रचित्त एवं जितेन्द्रिय गुरुकी सेवा करते थे ॥ १३ ॥
कथान्तरेऽथ कस्मिंश्चित् पृष्टोऽस्माभिर्द्विजोत्तमः ।
वेदार्थान् भारतार्थांश्च जन्म नारायणात् तथा ॥ १४ ॥
एक दिन किसी बातचीतके प्रसंगमें हमलोगोंने द्विजश्रेष्ठ व्यासजीसे वेदों और महाभारतका अर्थ तथा भगवान् नारायणसे उनके जन्म होनेका वृत्तान्त पूछा ॥ १४ ॥
स पूर्वमुक्त्वा वेदार्थान् भारतार्थांश्च तत्त्ववित् ।
नारायणादिदं जन्म व्याहर्तुमुपचक्रमे ॥ १५ ॥
तत्त्वज्ञानी व्यासजीने पहले हमें वेदों और महाभारतका अर्थ बताया। उसके बाद भगवान् नारायणसे अपने जन्मका वृत्तान्त इस प्रकार बताना आरम्भ किया— ॥ १५ ॥
शृणुध्वमाख्यानवरमिदमार्षेयमुत्तमम् ।
आदिकालोद्भवं विप्रास्तपसाधिगतं मया ॥ १६ ॥
‘विप्रगण! ऋषिसम्बन्धी यह उत्तम आख्यान सुनो। प्राचीन कालका यह वृत्तान्त मैंने तपस्याके द्वारा जाना है ॥ १६ ॥
प्राप्ते प्रजाविसर्गे वै सप्तमे पद्मसंभवे ।
नारायणो महायोगी शुभाशुभविवर्जितः ॥ १७ ॥
ससृजे नाभितः पूर्वं ब्रह्माणममितप्रभः ।
ततः स प्रादुरभवदथैनं वाक्यमब्रवीत् ॥ १८ ॥
‘जब सातवें कल्पके आरम्भमें सातवीं बार ब्रह्माजीके कमलसे जन्म-ग्रहण करनेका अवसर आया, तब शुभ और अशुभसे रहित अमिततेजस्वी महायोगी भगवान् नारायणने सबसे पहले अपने नाभिकमलसे ब्रह्माजीको उत्पन्न किया। जब ब्रह्माजी प्रकट हो गये, तब उनसे भगवान्ने यह बात कही— ॥ १७-१८ ॥
मम त्वं नाभितो जातः प्रजासर्गकरः प्रभुः ।
सृज प्रजास्त्वं विविधा ब्रह्मन् सजडपण्डिताः ॥ १९ ॥
‘ब्रह्मन्! तुम मेरी नाभिसे प्रजावर्गकी सृष्टि करनेके लिये उत्पन्न हुए हो और इस कार्यमें समर्थ हो; अतः जड-चेतनसहित नाना प्रकारकी प्रजाओंकी सृष्टि करो’ ॥ १९ ॥
स एवमुक्तो विमुखश्चिन्ताव्याकुलमानसः ।
प्रणम्य वरदं देवमुवाच हरिमीश्वरम् ॥ २० ॥
‘भगवान्के इस प्रकार आदेश देनेपर ब्रह्माजीका मन चिन्तासे व्याकुल हो उठा। वे सृष्टिकार्यसे विमुख हो वरदायक देवता सर्वेश्वर श्रीहरिको प्रणाम करके इस प्रकार बोले— ॥ २० ॥
का शक्तिर्मम देवेश प्रजाः स्रष्टुं नमोऽस्तु ते ।
अप्रज्ञावानहं देव विधत्स्व यदनन्तरम् ॥ २१ ॥
“देवेश्वर! मुझमें प्रजाकी सृष्टि करनेकी क्या शक्ति है? आपको नमस्कार है। देव! मैं सृष्टिविषयक बुद्धिसे सर्वथा रहित हूँ—यह जानकर अब आपको जो उचित जान पड़े, वह कीजिये’ ॥ २१ ॥
स एवमुक्तो भगवान् भूत्वाथान्तर्हितस्ततः ।
चिन्तयामास देवेशो बुद्धिं बुद्धिमतां वरः ॥ २२ ॥
‘ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ देवेश्वर भगवान् विष्णुने अदृश्य होकर बुद्धिका चिन्तन किया ॥ २२ ॥
स्वरूपिणी ततो बुद्धिरुपतस्थे हरिं प्रभुम् ।
योगेन चैनां नियोगः स्वयं नियुयुजे तदा ॥ २३ ॥
‘उनके चिन्तन करते ही मूर्तिमती बुद्धि उन सामर्थ्यशाली श्रीहरिकी सेवामें उपस्थित हो गयी। तदनन्तर जिनपर दूसरोंका वश नहीं चलता, उन भगवान् नारायणने स्वयं ही उस बुद्धिको उस समय योगशक्तिसे सम्पन्न कर दिया ॥ २३ ॥
स तामैश्वर्ययोगस्थां बुद्धिं गतिमतीं सतीम् ।
उवाच वचनं देवो बुद्धिं वै प्रभुरव्ययः ॥ २४ ॥
‘अविनाशी प्रभु नारायणदेवने ऐश्वर्ययोगमें स्थित हुई उस सती-साध्वी प्रगतिशील बुद्धिसे कहा— ॥ २४ ॥
ब्रह्माणं प्रविशस्वेति लोकसृष्ट्यर्थसिद्धये ।
ततस्तमीश्वरादिष्टा बुद्धिः क्षिप्रं विवेश सा ॥ २५ ॥
“तुम संसारकी सृष्टिरूप अभीष्ट कार्यकी सिद्धिके लिये ब्रह्माजीके भीतर प्रवेश करो।’ ईश्वरका यह आदेश पाकर बुद्धि शीघ्र ही ब्रह्माजीमें प्रवेश कर गयी ॥
अथैनं बुद्धिसंयुक्तं पुनः स ददृशे हरिः ।
भूयश्चैव वचः प्राह सृजेमा विविधाः प्रजाः ॥ २६ ॥
'जब ब्रह्माजी सृष्टिविषयक बुद्धिसे संयुक्त हो गये, तब श्रीहरिने पुनः उनकी ओर स्नेहपूर्ण दृष्टिसे देखा और फिर इस प्रकार कहा—'अब तुम इन नाना प्रकारकी प्रजाओंकी सृष्टि करो' ॥ २६ ॥
बाढमित्येव कृत्वासौ यथाऽऽज्ञां शिरसा हरेः ।
एवमुक्त्वा स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ २७ ॥
'तब 'बहुत अच्छा' कहकर उन्होंने श्रीहरिकी आज्ञा शिरोधार्य की। इस प्रकार उन्हें सृष्टिका आदेश देकर भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ २७ ॥
प्राप चैनं मुहूर्तेन संस्थानं देवसंज्ञितम् ।
तां चैव प्रकृतिं प्राप्य एकीभावगतोऽभवत् ॥ २८ ॥
'वे एक ही मुहूर्तमें अपने देवधाममें जा पहुँचे और अपनी प्रकृतिको प्राप्त हो उसके साथ एकीभूत हो गये ॥ २८ ॥
अथास्य बुद्धिरभवत् पुनरन्या तदा किल ।
सृष्टाः प्रजा इमाः सर्वा ब्रह्मणा परमेष्ठिना ॥ २९ ॥
'तदनन्तर कुछ कालके बाद भगवान्के मनमें फिर दूसरा विचार उठा। वे सोचने लगे, परमेष्ठी ब्रह्माने इन समस्त प्रजाओंकी सृष्टि तो कर दी ॥ २९ ॥
दैत्यदानवगन्धर्वरक्षोगणसमाकुला ।
जाता हीयं वसुमती भाराक्रान्ता तपस्विनी ॥ ३० ॥
'किंतु दैत्य, दानव, गन्धर्व और राक्षसोंसे व्याप्त हुई यह तपस्विनी पृथ्वी भारसे पीड़ित हो गयी है ॥
बहवो बलिनः पृथ्व्यां दैत्यदानवराक्षसाः ।
भविष्यन्ति तपोयुक्ता वरान् प्राप्स्यन्ति चोत्तमान् ॥ ३१ ॥
'इस पृथ्वीपर बहुत-से ऐसे बलवान् दैत्य, दानव और राक्षस होंगे, जो तपस्यामें प्रवृत्त हो उत्तमोत्तम वर प्राप्त करेंगे ॥ ३१ ॥
अवश्यमेव तैः सर्वैर्वरदानेन दर्पितैः ।
बाधितव्याः सुरगणा ऋषयश्च तपोधनाः ॥ ३२ ॥
'वरदानसे घमंडमें आकर वे समस्त दानव निश्चय ही देवसमूहों तथा तपोधन ऋषियोंको बाधा पहुँचायेंगे ॥ ३२ ॥
तत्र न्याय्यमिदं कर्तुं भारावतरणं मया ।
अथ नानासमुद्भूतैर्वसुधायां यथाक्रमम् ॥ ३३ ॥
'अतः अब मुझे पृथ्वीपर क्रमशः नाना अवतार धारण करके इसके भारको उतारना उचित होगा ॥ ३३ ॥
निग्रहेण च पापानां साधूनां प्रग्रहेण च ।
इयं तपस्विनी सत्या धारयिष्यति मेदिनी ॥ ३४ ॥
‘पापियोंको दण्ड देने और साधु पुरुषोंपर अनुग्रह करनेसे यह तपस्विनी सत्यस्वरूपा पृथ्वी बलसे टिकी रह सकेगी ॥ ३४ ॥
मया ह्येषा हि ध्रियते पातालस्थेन भोगिना ।
मया धृता धारयति जगद् विश्वं चराचरम् ॥ ३५ ॥
‘मैं पातालमें शेषनागके रूपसे रहकर इस पृथ्वीको धारण करता हूँ और मेरेद्वारा धारित होकर यह सम्पूर्ण चराचर जगत्को धारण करती है ॥ ३५ ॥
तस्मात् पृथ्व्याः परित्राणं करिष्ये सम्भवं गतः ।
एवं स चिन्तयित्वा तु भगवान् मधुसूदनः ॥ ३६ ॥
रूपाण्यनेकान्यसृजत् प्रादुर्भावे भवाय सः ।
वाराहं नारसिंहं च वामनं मानुषं तथा ॥ ३७ ॥
एभिर्मया निहन्तव्या दुर्विनीताः सुरारयः ।
‘इसलिये मैं अवतार लेकर इस पृथ्वीकी रक्षा अवश्य करूँगा। ऐसा सोच-विचारकर भगवान् मधुसूदनने जगत्के लिये अवतार ग्रहण करनेके निमित्त अपने अनेक रूपोंकी सृष्टि की अर्थात् वाराह, नरसिंह, वामन एवं मनुष्यरूपोंका स्मरण किया। उन्होंने यह निश्चय किया था कि मुझे इन अवतारोंद्वारा उद्दण्ड दैत्योंका वध करना है ॥ ३६-३७ १/२ ॥
अथ भूयो जगत्स्रष्टा भोःशब्देनानुनादयन् ॥ ३८ ॥
सरस्वतीमुच्चचार तत्र सारस्वतोऽभवत् ।
अपान्तरतमा नाम सुतो वाक्सम्भवः प्रभुः ॥ ३९ ॥
‘तदनन्तर जगत्स्रष्टा श्रीहरिने ‘भोः' शब्दसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए सरस्वती (वाणी) का उच्चारण किया। इससे वहाँ सारस्वतका आविर्भाव हुआ। सरस्वती या वाणीसे उत्पन्न हुए उस शक्तिशाली पुत्रका नाम ‘अपान्तरतमा' हुआ ॥ ३८-३९ ॥
भूतभव्यभविष्यज्ञः सत्यवादी दृढव्रतः ।
तमुवाच नतं मूर्ध्ना देवानामादिरव्ययः ॥ ४० ॥
‘वे अपान्तरतमा भूत, वर्तमान और भविष्यके ज्ञाता, सत्यवादी तथा दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले थे। मस्तक झुकाकर खड़े हुए उस पुत्रसे देवताओंके आदिकारण अविनाशी श्रीहरिने कहा— ॥ ४० ॥
वेदाख्याने श्रुतिः कार्या त्वया मतिमतां वर ।
तस्मात् कुरु यथाऽऽज्ञप्तं ममैतद् वचनं मुने ॥ ४१ ॥
‘बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ मुने! तुम्हें वेदोंकी व्याख्याके लिये ऋक्, साम, यजुष् आदि श्रुतियोंका पृथक्-पृथक् संग्रह करना चाहिये। अतः तुम मेरी आज्ञाके अनुसार कार्य करो। मुझे तुमसे इतना ही कहना है’ ॥ ४१ ॥
तेन भिन्नास्तदा वेदा मनोः स्वायम्भुवेऽन्तरे ।
ततस्तुतोष भगवान् हरिस्तेनास्य कर्मणा ॥ ४२ ॥
तपसा च सुतप्तेन यमेन नियमेन च ।
मन्वन्तरेषु पुत्रत्वमेवमेव प्रवर्तकः ॥ ४३ ॥
‘अपान्तरतमाने स्वायम्भुव मन्वन्तरमें भगवान्की आज्ञाके अनुसार वेदोंका विभाग किया। उनके इस कर्मसे तथा उनके द्वारा की हुई उत्तम तपस्या, यम और नियमसे भी भगवान् श्रीहरि बहुत संतुष्ट हुए और बोले—‘बेटा! तुम सभी मन्वन्तरोंमें इसी प्रकार धर्मके प्रवर्तक होओगे’ ।।
भविष्यस्यचलो ब्रह्मन्नप्रधृष्यश्च नित्यशः ।
पुनस्तिष्ये च सम्प्राप्ते कुरवो नाम भारताः ॥ ४४ ॥
भविष्यन्ति महात्मानो राजानः प्रथिता भुवि ।
‘ब्रह्मन्! तुम सदा ही अविचल एवं अजेय बने रहोगे। फिर द्वापर और कलियुगकी संधिका समय आनेपर भरतवंशमें कुरुवंशी क्षत्रिय होंगे। वे महामनस्वी राजा समस्त भूमण्डलमें विख्यात होंगे ।।
तेषां त्वत्तः प्रसूतानां कुलभेदो भविष्यति ॥ ४५ ॥
परस्परविनाशार्थं त्वामृते द्विजसत्तम ।
‘द्विजश्रेष्ठ! उनमेंसे जो लोग तुम्हारी संतानोंके वंशज होंगे, उनमें परस्पर विनाशके लिये फूट हो जायगी। तुम्हारे सहयोगके बिना उनमें विग्रह होगा ।। ४५ १/२ ।।
तत्राप्यनेकधा वेदान् भेत्स्यसे तपसान्वितः ॥ ४६ ॥
कृष्णे युगे च सम्प्राप्ते कृष्णवर्णो भविष्यसि ।
‘उस समय भी तुम तपोबलसे सम्पन्न हो वेदोंके अनेक विभाग करोगे। उस समय कलियुग आ जानेपर तुम्हारे शरीरका वर्ण काला होगा ।। ४६ १/२ ।।
धर्माणां विविधानां च कर्ता ज्ञानकरस्तथा ।
भविष्यसि तपोयुक्तो न च रागाद् विमोक्ष्यसे ॥ ४७ ॥
‘तुम नाना प्रकारके धर्मोंके प्रवर्तक, ज्ञानदाता और तपस्वी होओगे, परंतु रागसे सर्वथा मुक्त नहीं रहोगे ।। ४७ ।।
वीतरागश्च पुत्रस्ते परमात्मा भविष्यति ।
महेश्वरप्रसादेन नैतद् वचनमन्यथा ॥ ४८ ॥
‘तुम्हारा पुत्र भगवान् महेश्वरकी कृपासे वीतराग होकर परमात्मस्वरूप हो जायगा। मेरी यह बात टल नहीं सकती ।। ४८ ।।
यं मानसं वै प्रवदन्ति विप्राः
पितामहस्योत्तमबुद्धियुक्तम् ।
वसिष्ठमग्र्यं च तपोनिधानं
यस्यातिसूर्यं व्यतिरिच्यते भाः ॥ ४९ ॥
तस्यान्वये चापि ततो महर्षिः
पराशरो नाम महाप्रभावः ।
पिता स ते वेदनिधिर्वरिष्ठो
महातपा वै तपसो निवासः ॥ ५० ॥
'जिन्हें ब्राह्मणलोग ब्रह्माजीका मानसपुत्र कहते हैं, जो उत्तम बुद्धिसे युक्त, तपस्याकी निधि एवं सर्वश्रेष्ठ वसिष्ठ मुनिके नामसे प्रसिद्ध हैं और जिनका तेज भगवान् सूर्यसे भी बढ़कर प्रकाशित होता है, उन्हीं ब्रह्मर्षि वसिष्ठके वंशमें पराशर नामवाले महान् प्रभावशाली महर्षि होंगे। वे वैदिक ज्ञानके भण्डार, मुनियोंमें श्रेष्ठ, महान् तपस्वी एवं तपस्याके आवासस्थान होंगे। वे ही पराशर मुनि उस समय तुम्हारे पिता होंगे ॥ ४९-५० ॥
कानीनगर्भः पितृकन्यकायां
तस्मादृषेस्त्वं भविता च पुत्रः ॥ ५१ ॥
'उन्हीं ऋषिसे तुम पिताके घरमें रहनेवाली एक कुमारी कन्याके पुत्ररूपसे जन्म लोगे और कानीनगर्भ (कन्याकी संतान) कहलाओगे ॥ ५१ ॥
भूतभव्यभविष्याणां छिन्नसर्वार्थसंशयः ।
ये ह्यतिक्रान्तकाः पूर्वं सहस्रयुगपर्ययाः ॥ ५२ ॥
तांश्च सर्वान् मयोद्दिष्टान् द्रक्ष्यसे तपसान्वितः ।
पुनर्द्रक्ष्यसि चानेकसहस्रयुगपर्ययान् ॥ ५३ ॥
'भूत, वर्तमान और भविष्यके सभी विषयोंमें तुम्हारा संशय नष्ट हो जायगा। पहले जो सहस्र-युगोंके कल्प व्यतीत हो चुके हैं, उन सबको मेरी आज्ञासे तुम देख सकोगे और तपोबलसे सम्पन्न बने रहोगे। भविष्यमें होनेवाले अनेक कल्प भी तुम्हें दृष्टिगोचर होंगे ॥ ५२-५३ ॥
अनादिनिधनं लोके चक्रहस्तं च मां मुने ।
अनुध्यानान्मम मुने नैतद् वचनमन्यथा ॥ ५४ ॥
“मुने! तुम निरन्तर मेरा चिन्तन करनेसे जगत्में मुझ अनादि और अनन्त परमेश्वरको चक्र हाथमें लिये देखोगे। मेरी यह बात कभी मिथ्या नहीं होगी ॥ ५४ ॥
भविष्यति महासत्त्व ख्यातिश्चाप्यतुला तव ।
शनैश्चरः सूर्यपुत्रो भविष्यति मनुर्महान् ॥ ५५ ॥
तस्मिन्मन्वन्तरे चैव मन्वादिगणपूर्वकः ।
त्वमेव भविता वत्स मत्प्रसादान्न संशयः ॥ ५६ ॥
“महान् शक्तिशाली मुनीश्वर! जगत्में तुम्हारी अनुपम ख्याति होगी। वत्स! जब सूर्यपुत्र शनैश्चर मन्वन्तरके प्रवर्तक हो महामनुके पदपर प्रतिष्ठित होंगे, उस मन्वन्तरमें तुम्हीं मेरे कृपाप्रसादसे मन्वादि गणोंमें प्रधान होओगे। इसमें संशय नहीं है ॥ ५५-५६ ॥
यत्किंचिद् विद्यते लोके सर्वं तन्मद्विचेष्टितम् ।
अन्यो ह्यन्यं चिन्तयति स्वच्छन्दं विदधाम्यहम् ॥ ५७ ॥
“संसारमें जो कुछ हो रहा है, वह सब मेरी ही चेष्टाका फल है। दूसरे लोग दूसरी-दूसरी बातें सोचते रहते हैं, परंतु मैं स्वतन्त्रतापूर्वक अपनी इच्छाके अनुसार कार्य करता हूँ' ॥ ५७ ॥
एवं सारस्वतमृषिमपान्तरतमं तथा ।
उक्त्वा वचनमीशानः साधयस्वेत्यथाब्रवीत् ॥ ५८ ॥
'सरस्वती-पुत्र अपान्तरतम मुनिसे ऐसा कहकर भगवान् उन्हें विदा करते हुए बोले—'जाओ, अपना काम करो' ॥ ५८ ॥
सोऽहं तस्य प्रसादेन देवस्य हरिमेधसः ।
अपान्तरतमा नाम ततो जातोऽऽज्ञया हरेः ।
पुनश्च जातो विख्यातो वसिष्ठकुलनन्दनः ॥ ५९ ॥
'इस प्रकार मैं भगवान् विष्णुके कृपा-प्रसादसे पहले अपान्तरतमा नामसे उत्पन्न हुआ था और अब उन्हीं श्रीहरिकी आज्ञासे पुनः वसिष्ठकुलनन्दन व्यासके नामसे उत्पन्न होकर प्रसिद्धिको प्राप्त हुआ हूँ ॥ ५९ ॥
तदेतत् कथितं जन्म मया पूर्वकमात्मनः ।
नारायणप्रसादेन तथा नारायणांशजम् ॥ ६० ॥
'नारायणकी कृपासे और उन्हींके अंशसे जो पहले मेरा जन्म हुआ था, उसका यह वृत्तान्त मैंने तुम सब लोगोंसे कहा है ॥ ६० ॥
मया हि सुमहत् तप्तं तपः परमदारुणम् ।
पुरा मतिमतां श्रेष्ठाः परमेण समाधिना ॥ ६१ ॥
'बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ शिष्यगण! पूर्वकालमें मैंने उत्तम समाधिके द्वारा अत्यन्त कठोर एवं बड़ी भारी तपस्या की थी ॥ ६१ ॥
एतद् वः कथितं सर्वं यन्मां पृच्छत पुत्रकाः ।
पूर्वजन्म भविष्यं च भक्तानां स्नेहतो मया ॥ ६२ ॥
'पुत्रो! तुमलोग मुझसे जो कुछ पूछते थे, वह सब मैंने तुम्हें कह सुनाया। तुम गुरुभक्त शिष्योंके स्नेहवश ही मैंने यह अपने पूर्वजन्म और भविष्यका वृत्तान्त तुम्हें बताया है' ॥ ६२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एष ते कथितः पूर्वं सम्भवोऽस्मद्गुरोर्नृप ।
व्यासस्याक्लिष्टमनसो यथा पृष्टः पुनः शृणु ॥ ६३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**नरेश्वर! तुमने जैसा मुझसे प्रश्न किया था, उसके अनुसार मैंने पहले क्लेशरहित चित्तवाले अपने गुरु व्यासजीके जन्मका वृत्तान्त कहा है। अब दूसरी बातें सुनो ॥ ६३ ॥
सांख्यं योगः पाञ्चरात्रं वेदाः पाशुपतं तथा ।
ज्ञानान्येतानि राजर्षे विद्धि नानामतानि वै ॥ ६४ ॥
राजर्षे! सांख्य, योग, पाञ्चरात्र, वेद और पाशुपत-शास्त्र—इन ज्ञानोंको तुम नाना प्रकारके मत समझो ॥
सांख्यस्य वक्ता कपिलः परमर्षिः स उच्यते ।
हिरण्यगर्भो योगस्य वेत्ता नान्यः पुरातनः ॥ ६५ ॥
सांख्यशास्त्रके वक्ता कपिल हैं। वे परम ऋषि कहलाते हैं। योगशास्त्रके पुरातन ज्ञाता हिरण्यगर्भ ब्रह्माजी ही हैं, दूसरा नहीं ॥ ६५ ॥
अपान्तरतमाश्चैव वेदाचार्यः स उच्यते ।
प्राचीनगर्भं तमृषिं प्रवदन्तीह केचन ॥ ६६ ॥
मुनिवर अपान्तरतमा वेदोंके आचार्य बताये जाते हैं। यहाँ कुछ लोग उन महर्षिको प्राचीनगर्भ कहते हैं ॥
उमापतिर्भूतपतिः श्रीकण्ठो ब्रह्मणः सुतः ।
उक्तवानिदमव्यग्रो ज्ञानं पाशुपतं शिवः ॥ ६७ ॥
ब्रह्माजीके पुत्र भूतनाथ श्रीकण्ठ उमापति भगवान् शिवने शान्तचित्त होकर पाशुपतज्ञानका उपदेश किया है ॥
पाञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य वेत्ता तु भगवान् स्वयम् ।
सर्वेषु च नृपश्रेष्ठ ज्ञानेष्वेतेषु दृश्यते ॥ ६८ ॥
यथागमं यथाज्ञानं निष्ठा नारायणः प्रभुः ।
न चैनमेवं जानन्ति तमोभूता विशाम्पते ॥ ६९ ॥
नृपश्रेष्ठ! सम्पूर्ण पाञ्चरात्रके ज्ञाता तो साक्षात् भगवान् नारायण ही हैं। यदि वेदशास्त्र और अनुभवके अनुसार विचार किया जाय तो इन सभी ज्ञानोंमें इनके परम तात्पर्य्यरूपसे भगवान् नारायण ही स्थित दिखायी देते हैं। प्रजानाथ! जो अज्ञानमें डूबे हुए हैं, वे लोग भगवान् श्रीहरिको इस रूपमें नहीं जानते हैं ॥ ६८-६९ ॥
तमेव शास्त्रकर्तारः प्रवदन्ति मनीषिणः ।
निष्ठां नारायणमृषिं नान्योऽस्तीति वचो मम ॥ ७० ॥
शास्त्रके रचयिता ज्ञानीजन उन नारायण ऋषिको ही समस्त शास्त्रोंका परम लक्ष्य बताते हैं; दूसरा कोई उनके समान नहीं है—यह मेरा कथन है ॥ ७० ॥
निःसंशेषु सर्वेषु नित्यं वसति वै हरिः ।
ससंशयान् हेतुबलान् नाध्यावसति माधवः ॥ ७१ ॥
ज्ञानके बलसे जिनके संशयका निवारण हो गया है, उन सबके भीतर सदा श्रीहरि निवास करते हैं; परंतु कुतर्कके बलसे जो संशयमें पड़े हुए हैं, उनके भीतर भगवान् माधवका निवास नहीं है ॥ ७१ ॥
पाञ्चरात्रविदो ये तु यथाक्रमपरा नृप ।
एकान्तभावोपगतास्ते हरिं प्रविशन्ति वै ॥ ७२ ॥
नरेश्वर! जो पाञ्चरात्रके ज्ञाता हैं और उसमें बताये हुए क्रमके अनुसार सेवापरायण हो अनन्यभावसे भगवान्की शरणमें प्राप्त हैं, वे उन भगवान् श्रीहरिमें ही प्रवेश करते हैं ॥ ७२ ॥
सांख्यं च योगं च सनातने द्वे
वेदाश्च सर्वे निखिलेन राजन् ।
सर्वैः समस्तैर्ऋषिभिर्निरुक्तो
नारायणो विश्वमिदं पुराणम् ॥ ७३ ॥
राजन्! सांख्य और योग—ये दो सनातन शास्त्र तथा सम्पूर्ण वेद सर्वथा यही कहते हैं और समस्त ऋषियोंने भी यही बताया है कि यह पुरातन विश्व भगवान् नारायण ही हैं ॥ ७२ ॥
शुभाशुभं कर्म समीरितं यत्
प्रवर्तते सर्वलोकेषु किञ्चित् ।
तस्मादृषेस्तद्भवतीति विद्याद्
दिव्यन्तरिक्षे भुवि चाप्सु चेति ॥ ७४ ॥
स्वर्ग, अन्तरिक्ष, भूतल और जल—इन सभी स्थानोंमें और सम्पूर्ण लोकोंमें जो कुछ भी शुभाशुभ कर्म होता बताया गया है, वह सब नारायणकी सत्तासे ही हो रहा है—ऐसा जानना चाहिये ॥ ७४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि द्वैपायनोत्पत्तौ एकोनपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३४९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें द्वैपायनकी उत्पत्तिविषयक तीन सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४९ ॥
* १. नारायण, २. ब्रह्मा, ३. वसिष्ठ, ४. शक्ति, ५. पराशर, ६. व्यास—इस प्रकार व्यासजी छठी पीढ़ीमें उत्पन्न हुए हैं।