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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

राजधर्मान् द्विजश्रेष्ठ चातुर्वर्ण्यस्य चाखिलान् ॥ १ ॥

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सप्तत्रिंशोऽध्यायः

व्यासजी तथा भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे महाराज युधिष्ठिरका नगरमें प्रवेश

युधिष्ठिर उवाच

श्रोतुमिच्छामि भगवन् विस्तरेण महामुने ।
राजधर्मान् द्विजश्रेष्ठ चातुर्वर्ण्यस्य चाखिलान् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**भगवन्! महामुने! द्विजश्रेष्ठ! मैं चारों वर्णोंके सम्पूर्ण धर्मोंका तथा राजधर्मका भी विस्तारपूर्वक वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

आपत्सु च यथा नीतिः प्रणेतव्या द्विजोत्तम ।
धर्म्यमालक्ष्य पन्थानं विजयेयं कथं महीम् ॥ २ ॥
द्विजश्रेष्ठ! आपत्तिकालमें मुझे कैसी नीतिसे काम लेना चाहिये? धर्मके अनुकूल मार्गपर दृष्टि रखते हुए मैं किस प्रकार इस पृथ्वीपर विजय पा सकता हूँ? ॥ २ ॥

प्रायश्चित्तकथा ह्येषा भक्ष्याभक्ष्यविवर्जिता ।
कौतूहलानुप्रवणा हर्षं जनयतीव मे ॥ ३ ॥
भक्ष्य और अभक्ष्यसे रहित, उपवासस्वरूप प्रायश्चित्तकी यह चर्चा बड़ी उत्सुकता पैदा करनेवाली है। यह मेरे हृदयमें हर्ष-सा उत्पन्न कर रही है ॥ ३ ॥

धर्मचर्या च राज्यं च नित्यमेव विरुध्यते ।
एवं मुह्यति मे चेतश्चिन्तयानस्य नित्यशः ॥ ४ ॥
एक ओर धर्मका आचरण और दूसरी ओर राज्यका पालन—ये दोनों सदा एक दूसरेके विरुद्ध हैं। यह सोचकर मुझे निरन्तर चिन्ता बनी रहती है और मेरे चित्तपर मोह छा रहा है ॥ ४ ॥

वैशम्पायन उवाच

तमुवाच महाराज व्यासो वेदविदां वरः ।
नारदं समभिप्रेक्ष्य सर्वज्ञानां पुरातनम् ॥ ५ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**महाराज! तब वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ व्यासजीने सर्वज्ञ महात्माओंमें सबसे प्राचीन नारदजीकी ओर देखकर युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ५ ॥

श्रोतुमिच्छसि चेद् धर्मं निखिलेन नराधिप ।
प्रैहि भीष्मं महाबाहो वृद्धं कुरुपितामहम् ॥ ६ ॥
‘महाबाहु नरेश्वर! यदि तुम धर्मका पूर्णरूपसे विवेचन सुनना चाहते हो तो कुरुकुलके वृद्ध पितामह भीष्मके पास जाओ ॥ ६ ॥

स ते धर्मरहस्येषु संशयान् मनसि स्थितान् ।
छेत्ता भागीरथीपुत्रः सर्वज्ञः सर्वधर्मवित् ॥ ७ ॥
‘गङ्गापुत्र भीष्म सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता और सर्वज्ञ हैं। वे धर्म-रहस्यके विषयमें तुम्हारे मनमें स्थित हुए सम्पूर्ण संदेहोंका निवारण करेंगे ॥ ७ ॥
जनयामास यं देवी दिव्या त्रिपथगा नदी ।
साक्षाद् ददर्श यो देवान् सर्वानिन्द्रपुरोगमान् ॥ ८ ॥
बृहस्पतिपुरोगांस्तु देवर्षीनसकृत् प्रभुः ।
तोषयित्वोपचारेण राजनीतिमधीतवान् ॥ ९ ॥
‘जिन्हें दिव्य नदी त्रिपथगा गङ्गादेवीने जन्म दिया है, जिन्होंने इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंका साक्षात् दर्शन किया है तथा जिन शक्तिशाली भीष्मने बृहस्पति आदि देवर्षियोंको बारम्बार अपनी सेवाद्वारा संतुष्ट करके राजनीतिका अध्ययन किया है, उनके पास चलो ॥ ८-९ ॥
उशना वेद यच्छास्त्रं यच्च देवगुरुर्द्विजः ।
तच्च सर्वं सव्याख्यं प्राप्तवान् कुरुसत्तमः ॥ १० ॥
‘शुक्राचार्य जिस शास्त्रको जानते हैं तथा देवगुरु विप्रवर बृहस्पतिको जिस शास्त्रका ज्ञान है, वह सम्पूर्ण शास्त्र कुरुश्रेष्ठ भीष्मने व्याख्यासहित प्राप्त किया है ॥ १० ॥
भार्गवाच्च्यवनाच्चापि वेदानङ्गोपबृंहितान् ।
प्रतिपेदे महाबाहुर्वसिष्ठाच्चरितव्रतः ॥ ११ ॥
‘ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करके महाबाहु भीष्मने भृगुवंशी च्यवन तथा महर्षि वसिष्ठसे वेदाङ्गोंसहित वेदोंका अध्ययन किया है ॥ ११ ॥
पितामहसुतं ज्येष्ठं कुमारं दीप्ततेजसम् ।
अध्यात्मगतितत्त्वज्ञमुपाशिक्षत यः पुरा ॥ १२ ॥
‘इन्होंने पूर्वकालमें ब्रह्माजीके ज्येष्ठ पुत्र उद्दीप्त तेजस्वी सनत्कुमारजीसे, जो अध्यात्मगतिके तत्त्वको जाननेवाले हैं, अध्यात्मज्ञानकी शिक्षा पायी थी ॥ १२ ॥
मार्कण्डेयमुखात् कृत्स्नं यतिधर्ममवाप्तवान् ।
रामादस्त्राणि शक्राच्च प्राप्तवान् पुरुषर्षभः ॥ १३ ॥
‘पुरुषप्रवर भीष्मने मार्कण्डेयजीके मुखसे सम्पूर्ण यतिधर्मका ज्ञान प्राप्त किया है और परशुराम तथा इन्द्रसे अस्त्र-शस्त्रोंकी शिक्षा पायी है ॥ १३ ॥
मृत्युरात्मेच्छया यस्य जातस्य मनुजेष्वपि ।
तथानपत्यस्य सतः पुण्यलोका दिवि श्रुताः ॥ १४ ॥
‘मनुष्योंमें उत्पन्न होकर भी इन्होंने मृत्युको अपनी इच्छाके अधीन कर लिया है। संतानहीन होनेपर भी उनको प्राप्त होनेवाले पुण्य-लोक देवलोकमें विख्यात हैं ॥ १४ ॥
यस्य ब्रह्मर्षयः पुण्या नित्यमासन् सभासदः ।

यस्य नाविदितं किंचिज्ज्ञानयज्ञेषु विद्यते ॥ १५ ॥
'पुण्यात्मा ब्रह्मर्षि सदा उनके सभासद रहे हैं। ज्ञानयज्ञमें कोई भी ऐसी बात नहीं है, जिसका उन्हें ज्ञान न हो ॥ १५ ॥

स ते वक्ष्यति धर्मज्ञः सूक्ष्मधर्मार्थतत्त्ववित् ।
तमभ्येहि पुरा प्राणान् स विमुञ्चति धर्मवित् ॥ १६ ॥
'सूक्ष्म धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले वे धर्मवेत्ता भीष्म तुम्हें धर्मका उपदेश देंगे। वे धर्मज्ञ महात्मा अपने प्राणोंका परित्याग करें, इसके पहले ही तुम इनके पास चलो' ॥ १६ ॥

एवमुक्तस्तु कौन्तेयो दीर्घप्रज्ञो महामतिः ।
उवाच वदतां श्रेष्ठं व्यासं सत्यवतीसुतम् ॥ १७ ॥
उनके ऐसा कहनेपर परम बुद्धिमान् दूरदर्शी कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने वक्ताओंमें श्रेष्ठ सत्यवतीनन्दन व्यासजीसे कहा ॥ १७ ॥

युधिष्ठिर उवाच

वैशसं सुमहत् कृत्वा ज्ञातीनां रोमहर्षणम् ।
आगस्कृत् सर्वलोकस्य पृथिवीनाशकारकः ॥ १८ ॥
घातयित्वा तमेवाजौ छलेनाजिह्मयोधिनम् ।
उपसम्प्रष्टुमर्हामि तमहं केन हेतुना ॥ १९ ॥
युधिष्ठिर बोले—मुने! मैं अपने भाई-बन्धुओंका यह महान् एवं रोमाञ्चकारी संहार करके सम्पूर्ण लोकोंका अपराधी बन गया हूँ। मैंने इस सम्पूर्ण भूमण्डलका विनाश किया है। भीष्मजी सरलतापूर्वक युद्ध करनेवाले थे तो भी मैंने युद्धमें उन्हें छलसे मरवा डाला। अब फिर उन्हींसे मैं अपनी शङ्काओंको पूछूँ, क्या इसके योग्य मैं रह गया हूँ? अब मैं किस हेतुसे उन्हें मुँह दिखा सकता हूँ? ॥ १८-१९ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततस्तं नृपतिश्रेष्ठं चातुर्वर्ण्यहितेप्सया ।
पुनराह महाबाहुर्यदुश्रेष्ठो महामतिः ॥ २० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तब परम बुद्धिमान् महाबाहु यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णने चारों वर्णोंके हितकी इच्छासे नृपतिशिरोमणि युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा ॥ २० ॥

वासुदेव उवाच

नेदानीमतिनिबन्धं शोके त्वं कर्तुमर्हसि ।
यदाह भगवान् व्यासस्तत् कुरुष्व नृपोत्तम ॥ २१ ॥

**भगवान् श्रीकृष्ण बोले—**नृपश्रेष्ठ! अब आप अत्यन्त हठपूर्वक शोकको ही पकड़े न रहें। भगवान् व्यास जो आज्ञा देते हैं, वही करें॥ २१॥
ब्राह्मणास्त्वां महाबाहो भ्रातरश्च महौजसः।
पर्जन्यमिव घर्मान्ते नाथमाना उपासते॥ २२॥
महाबाहो! जैसे वर्षाकालमें लोग मेघकी ओर टकटकी लगाये देखते हैं—उससे जलकी याचना करते हैं, उसी प्रकार ये सारे ब्राह्मण और आपके ये महातेजस्वी भाई आपसे धैर्य धारण करनेकी प्रार्थना करते हुए आपके पास बैठे हैं॥ २२॥
हतशिष्टाश्च राजानः कृत्स्नं चैव समागतम्।
चातुर्वर्ण्यं महाराज राष्ट्रं ते कुरुजाङ्गलम्॥ २३॥
महाराज! मरनेसे बचे हुए राजालोग और चारों वर्णोंकी प्रजाओंसे युक्त यह सारा कुरुजाङ्गल देश इस समय आपकी सेवामें उपस्थित है॥ २३॥
प्रियार्थमपि चैतेषां ब्राह्मणानां महात्मनाम्।
नियोगादस्य च गुरोर्व्यासस्यामिततेजसः॥ २४॥
सुहृदामस्मदादीनां द्रौपद्याश्च परंतप।
कुरु प्रियममित्रघ्न लोकस्य च हितं कुरु॥ २५॥
शत्रुओंको मारने और संताप देनेवाले नरेश! इन महामना ब्राह्मणोंका प्रिय करनेके लिये भी आपको इनकी बात मान लेनी चाहिये। आप अमित तेजस्वी गुरुदेव व्यासकी आज्ञासे हम सुहृदोंका और द्रौपदीका प्रिय कीजिये तथा सम्पूर्ण जगत्‌के हितसाधनमें लग जाइये॥ २४-२५॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तः स कृष्णेन राजा राजीवलोचनः।
हितार्थं सर्वलोकस्य समुत्तस्थौ महामनाः॥ २६॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर कमलनयन महामनस्वी राजा युधिष्ठिर सम्पूर्ण जगत्‌के हितके लिये उठ खड़े हुए॥ २६॥
सोऽनुनीतो नरव्याघ्र विष्टरश्रवसा स्वयम्।
द्वैपायनेन च तथा देवस्थानेन जिष्णुना॥ २७॥
एतैश्चान्यैश्च बहुभिरनुनीतो युधिष्ठिरः।
व्यजहान्मानसं दुःखं संतापं च महायशाः॥ २८॥
पुरुषसिंह! साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण, द्वैपायन व्यास, देवस्थान, अर्जुन तथा अन्य बहुत-से लोगोंके समझाने-बुझाने पर महायशस्वी युधिष्ठिरने मानसिक दुःख और संतापको त्याग दिया॥ २७-२८॥
श्रुतवाक्यः श्रुतनिधिः श्रुतश्रव्यविशारदः।

व्यवस्य मनसः शान्तिमगच्छत् पाण्डुनन्दनः ॥ २९ ॥
पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने श्रेष्ठ पुरुषोंके उपदेशको सुना था। वेद-शास्त्रोंके ज्ञानकी तो वे निधि ही थे। सुने हुए शास्त्रों तथा सुनने योग्य नीतिग्रन्थोंके विचारमें भी वे कुशल थे। उन्होंने अपने कर्तव्यका निश्चय करके मनमें पूर्ण शान्ति पा ली थी ॥ २९ ॥

स तैः परिवृतो राजा नक्षत्रैरिव चन्द्रमाः ।
धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य स्वपुरं प्रविवेश ह ॥ ३० ॥
नक्षत्रोंसे घिरे हुए चन्द्रमाके समान राजा युधिष्ठिर वहाँ आये हुए सब लोगोंसे घिरकर धृतराष्ट्रको आगे करके अपनी राजधानी हस्तिनापुरको चल दिये ॥ ३० ॥

प्रविविक्षुः स धर्मज्ञः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
अर्चयामास देवांश्च ब्राह्मणांश्च सहस्रशः ॥ ३१ ॥
ततो नवं रथं शुभ्रं कम्बलाजिनसंवृतम् ।
युक्तं षोडशभिर्गोभिः पाण्डुरैः शुभलक्षणैः ॥ ३२ ॥
मन्त्रैरभ्यर्चितं पुण्यैः स्तूयमानश्च बन्दिभिः ।
आरुरोह यथा देवः सोमोऽमृतमयं रथम् ॥ ३३ ॥
नगरमें प्रवेश करते समय धर्मज्ञ कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने देवताओं तथा सहस्रों ब्राह्मणोंका पूजन किया। तदनन्तर कम्बल और मृगचर्मसे ढके हुए एक नूतन उज्ज्वल रथपर जिसकी पवित्र मन्त्रोंद्वारा पूजा की गयी थी तथा जिसमें शुभ लक्षणसम्पन्न सोलह सफेद बैल जुते हुए थे, वे बन्दीजनोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए उसी प्रकार सवार हुए, जैसे चन्द्रदेव अपने अमृतमय रथपर आरूढ़ होते हैं ॥ ३१-३३ ॥

जग्राह रश्मीन् कौन्तेयो भीमो भीमपराक्रमः ।
अर्जुनः पाण्डुरं छत्रं धारयामास भानुमत् ॥ ३४ ॥
भयानक पराक्रमी कुन्तीपुत्र भीमसेनने उन बैलोंकी रास सँभाली। अर्जुनने तेजस्वी श्वेत छत्र धारण किया ॥

ध्रियमाणं च तच्छत्रं पाण्डुरं रथमूर्धनि ।
शुशुभे तारकाकीर्णं सितमभ्रमिवाम्बरे ॥ ३५ ॥
रथके ऊपर तना हुआ वह श्वेत छत्र आकाशमें तारिकाओंसे व्याप्त श्वेत बादलके समान शोभा पाता था ॥

चामरव्यजने त्वस्य वीरौ जगृहतुस्तदा ।
चन्द्ररश्मिप्रभे शुभ्रे माद्रीपुत्रावलंकृते ॥ ३६ ॥
उस समय माद्रीके वीर पुत्र नकुल और सहदेवने चन्द्रमाकी किरणोंके समान चमकीले रत्नभूषित श्वेत चँवर और व्यजन हाथोंमें ले लिये ॥ ३६ ॥

ते पञ्च रथमास्थाय भ्रातरः समलंकृताः ।
भूतानीव समस्तानि राजन् ददृशिरे तदा ॥ ३७ ॥

राजन्! वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हुए वे पाँचों भाई रथपर बैठकर मूर्तिमान् पाँच महाभूतोंके समान दिखायी देते थे ॥ ३७ ॥
आस्थाय तु रथं शुभ्रं युक्तमश्वैर्मनोजवैः ।
अन्वयात् पृष्ठतो राजन् युयुत्सुः पाण्डवाग्रजम् ॥ ३८ ॥
नरेश्वर! मनके समान वेगशाली घोड़ोंसे जुते हुए शुभ्र रथपर आरूढ़ हो युयुत्सु ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिरके पीछे-पीछे चले ॥ ३८ ॥
रथं हेममयं शुभ्रं शैब्यसुग्रीवयोजितम् ।
सह सात्यकिना कृष्णः समास्थायान्वयात् कुरून् ॥ ३९ ॥
शैब्य और सुग्रीव नामक घोड़ोंसे जुते हुए सुन्दर सुवर्णमय रथपर आरूढ़ हो सात्यकिसहित श्रीकृष्ण भी कौरवोंके पीछे-पीछे गये ॥ ३९ ॥
नरयानेन तु ज्येष्ठः पिता पार्थस्य भारत ।
अग्रतो धर्मराजस्य गान्धारीसहितो ययौ ॥ ४० ॥
भरतनन्दन! कुन्तीपुत्र धर्मराज युधिष्ठिरके ज्येष्ठ पिता (ताऊ) गान्धारीसहित पालकीमें बैठकर उनके आगे-आगे जा रहे थे ॥ ४० ॥
कुरुस्त्रियश्च ताः सर्वाः कुन्ती कृष्णा तथैव च ।
यानैरुच्चावचैर्जग्मुर्विदुरेण पुरस्कृताः ॥ ४१ ॥
इन सबके पीछे कुन्ती और द्रौपदी आदि कुरुकुलकी वे सभी स्त्रियाँ यथायोग्य भिन्न-भिन्न सवारियोंपर चढ़कर चल रही थीं। इनके पीछे विदुरजी थे, जो इन सबकी देखभाल करते थे ॥ ४१ ॥
ततो रथाश्च बहुला नागाश्चाश्वसमलंकृताः ।
पादाताश्च हयाश्चैव पृष्ठतः समनुव्रजन् ॥ ४२ ॥
तदनन्तर इन सबके पीछे हाथी और घोड़ोंसे विभूषित बहुतसे रथी, पैदल और घुड़सवार सैनिक चल रहे थे ॥ ४२ ॥
ततो वैतालिकैः सूतैर्मागधैश्च सुभाषितैः ।
स्तूयमानो ययौ राजा नगरं नागसाह्वयम् ॥ ४३ ॥
इस प्रकार वैतालिकों, सूतों और मागधोंद्वारा सुन्दर वाणीमें अपनी स्तुति सुनते हुए राजा युधिष्ठिरने हस्तिनापुर नगरमें प्रवेश किया ॥ ४३ ॥
तत् प्रयाणं महाबाहोर्बभूवाप्रतिमं भुवि ।
आकुलाकुलमुत्कृष्टं हृष्टपुष्टजनाकुलम् ॥ ४४ ॥
महाबाहु युधिष्ठिरकी यह सामूहिक यात्रा (जुलूस) इस भूतलपर अनुपम थी। उसमें हृष्ट-पुष्ट मनुष्य भरे हुए थे। भीड़-पर-भीड़ बढ़ती चली जाती थी और बड़े जोरसे जयघोष एवं कोलाहल हो रहा था ॥ ४४ ॥
अभियाने तु पार्थस्य नरैर्नगरवासिभिः ।

नगरं राजमार्गाश्च यथावत्समलङ्कृताः ॥ ४५ ॥
राजा युधिष्ठिरकी इस यात्राके समय नगरनिवासी मनुष्योंने समूचे नगर तथा वहाँकी सड़कोंको अच्छी तरहसे सजा दिया था ॥ ४५ ॥
पाण्डुरेण च माल्येन पताकाभिश्च मेदिनी ।
संस्कृतो राजमार्गोऽभूद्धूपनैश्च प्रधूपितः ॥ ४६ ॥
सफेद मालाओं तथा पताकाओंसे नगरभूमिकी अद्भुत शोभा हो रही थी। राजमार्गको झाड़-बुहारकर वहाँ छिड़काव किया गया था और धूपोंकी सुगन्ध फैलायी गयी थी ॥ ४६ ॥
अथ चूर्णैश्च गन्धानां नानापुष्पप्रियङ्गुभिः ।
माल्यदामभिरासक्तै राजवेश्माभिसंवृतम् ॥ ४७ ॥
राजमहलके आस-पास चारों ओर सुगन्धित चूर्ण बिखेरे गये थे, नाना प्रकारके फूलों, बेलों और पुष्पहारोंकी बन्दनवारोंसे उसे अच्छी तरह सुसज्जित किया गया था ॥ ४७ ॥
कुम्भाश्च नगरद्वारि वारिपूर्णा नवा दृढाः ।
सिताः सुमनसो गौराः स्थापितास्तत्र तत्र ह ॥ ४८ ॥
नगरके द्वारपर जलसे भरे हुए नूतन एवं सुदृढ़ कलश रखे गये थे और जगह-जगह सफेद फूलोंके गुच्छे रख दिये गये थे ॥ ४८ ॥
तथा स्वलंकृतद्वारं नगरं पाण्डुनन्दनः ।
स्तूयमानः शुभैर्वाक्यैः प्रविवेश सुहृद्वृतः ॥ ४९ ॥
अपने सुहृदोंसे घिरे हुए पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने इस प्रकार सजे सजाये द्वारवाले नगर—हस्तिनापुरमें प्रवेश किया। उस समय सुन्दर वचनोंद्वारा उनकी स्तुति की जा रही थी ॥ ४९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि युधिष्ठिरप्रवेशे
सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें युधिष्ठिरका
नगरप्रवेशविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥