महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
मोक्षके साधनका वर्णन
चतुःसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
मोक्षके साधनका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
मोक्षः पितामहेनोक्त उपायान्नानुपायतः ।
तमुपायं यथान्यायं श्रोतुमिच्छामि भारत ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! आपने योग्य उपायसे मोक्षकी प्राप्ति बतायी, अयोग्य उपायसे नहीं। भरतनन्दन! वह यथायोग्य उपाय क्या है? इसे मैं सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
त्वय्यैवैतन्महाप्राज्ञ युक्तं निपुणदर्शनम् ।
येनोपायेन सर्वार्थं नित्यं मृगयसेऽनघ ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**महाप्राज्ञ निष्पाप नरेश! तुम उचित उपायसे ही सदा सम्पूर्ण धर्म आदि पुरुषार्थोंकी खोज किया करते हो। इसलिये तुममें सुने हुए विषयोंकी परीक्षा करनेकी निपुण दृष्टिका होना उचित ही है ॥ २ ॥
करणे घटस्य या बुद्धिर्घटोत्पत्तौ न सा मता ।
एवं धर्माभ्युपायेषु नान्यधर्मेषु कारणम् ॥ ३ ॥
घटके निर्माणकालमें जिस बुद्धिका उपयोग है, वह घटकी उत्पत्ति हो जानेपर आवश्यक नहीं रहती, इसी प्रकार चित्त-शुद्धिके उपायभूत यज्ञादि धर्मोंका लक्ष्य पूरा हो जानेपर मोक्षसाधनरूप शम-दमादि अन्य धर्मोंके लिये वे आवश्यक नहीं रहते ॥ ३ ॥
पूर्वे समुद्रे यः पन्थाः स न गच्छति पश्चिमम् ।
एकः पन्था हि मोक्षस्य तन्मे विस्तरतः शृणु ॥ ४ ॥
देखो, जो मार्ग पूर्व समुद्रकी ओर जाता है, वह पश्चिम समुद्रकी ओर नहीं जा सकता। इसी प्रकार मोक्षका भी एक ही मार्ग है, उसे मैं विस्तारपूर्वक बता रहा हूँ, सुनो ॥ ४ ॥
क्षमया क्रोधमुच्छिन्द्यात् कामं संकल्पवर्जनात् ।
सत्त्वसंसेवनाद् धीरो निद्रां च च्छेत्तुमर्हति ॥ ५ ॥
मुमुक्षु पुरुषको चाहिये कि क्षमासे क्रोधका और संकल्पोंके त्यागसे कामनाओंका उच्छेद कर डाले। धीर पुरुष ज्ञानध्यानादि सात्त्विक गुणोंके सेवनसे निद्राका क्षय करे ॥ ५ ॥
अप्रमादाद् भयं रक्षेत् श्वासं क्षेत्रज्ञशीलनात् ।
इच्छां द्वेषं च कामं च धैर्येण विनिवर्तयेत् ॥ ६ ॥
अप्रमादसे भयको दूर करे, आत्माके चिन्तनसे श्वासकी रक्षा करे अर्थात् प्राणायाम करे और धैर्यके द्वारा इच्छा, द्वेष एवं कामका निवारण करे ।। ६ ।।
भ्रमं सम्मोहमावर्तमभ्यासाद् विनिवर्तयेत् ।
निद्रां च प्रतिभां चैव ज्ञानाभ्यासेन तत्त्ववित् ॥ ७ ॥
तत्तत्ववेत्ता पुरुष शास्त्रके अभ्याससे भ्रम, मोह और संशयका तथा आलस्य और प्रतिभा (नानाविषयिणी बुद्धि)—इन दोनों दोषोंका ज्ञानके अभ्याससे निराकरण करे ।। ७ ।।
उपद्रवांस्तथा रोगान् हितजीर्णमिताशनात् ।
लोभं मोहं च संतोषाद् विषयांस्तत्त्वदर्शनात् ॥ ८ ॥
शारीरिक उपद्रवों तथा रोगोंका हितकर, सुपाच्य और परिमित आहारसे, लोभ और मोहका संतोषसे तथा विषयोंका तात्त्विक दृष्टिसे निवारण करे ।। ८ ।।
अनुक्रोशादधर्मं च जयेद् धर्ममवेक्षया ।
आयत्या च जयेदाशामर्थं संगविवर्जनात् ॥ ९ ॥
अधर्मको दयासे और धर्मको विचारपूर्वक पालन करनेसे जीते। भविष्यका विचार करके आशापर और आसक्तिके त्यागसे अर्थपर विजय प्राप्त करे ।। ९ ।।
अनित्यत्वेन च स्नेहं क्षुधां योगेन पण्डितः ।
कारुण्येनात्मनो मानं तृष्णां च परितोषतः ॥ १० ॥
विद्वान् पुरुष वस्तुओंकी अनित्यताका चिन्तन करके स्नेहको, योगाभ्यासके द्वारा क्षुधाको, करुणाके द्वारा अपने अभिमानको और संतोषसे तृष्णाको जीते ।। १० ।।
उत्थानेन जयेत् तन्द्रीं वितर्कं निश्चयाज्जयेत् ।
मौनेन बहुभाष्यं च शौर्येण च भयं त्यजेत् ॥ ११ ॥
आलस्यको उद्योगसे और विपरीत तर्कको शास्त्रके प्रति दृढ़ विश्वाससे जीते, मौनावलम्बनद्वारा बहुत बोलनेकी आदतको और शूरवीरताके द्वारा भयको त्याग दे ।। ११ ।।
यच्छेद् वाङ्मनसी बुद्ध्या तां यच्छेज्ज्ञानचक्षुषा ।
ज्ञानमात्मावबोधेन यच्छेदात्मानमात्मना ॥ १२ ॥
तदेतदुपशान्तेन बोद्धव्यं शुचिकर्मणा ।
मन और वाणीको अर्थात् मनसहित समस्त इन्द्रियोंको बुद्धिद्वारा वशमें करे, बुद्धिका विवेकरूप नेत्रद्वारा शमन करे, फिर आत्मज्ञानद्वारा विवेकज्ञानका शमन करे और आत्माको परमात्मामें विलीन कर दे। इस प्रकार पवित्र आचार-विचारसे युक्त साधकको सब ओरसे उपरत होकर शान्तभावसे परमात्माका साक्षात्कार करना चाहिये ।। १२ १/२ ।।
योगदोषान् समुच्छिद्य पञ्च यान् कवयो विदुः ॥ १३ ॥
कामं क्रोधं च लोभं च भयं स्वप्नं च पञ्चमम् ।
परित्यज्य निषेवेत यतवाग् योगसाधनान् ॥ १४ ॥
काम, क्रोध, लोभ, भय और निद्रा—ये ही योगसम्बन्धी वे पाँच दोष हैं, जिनको विद्वान् पुरुष जानते हैं। इनका मूलोच्छेद कर देना चाहिये तथा इनका परित्याग करके वाणीको संयममें रखते हुए योगसाधनोंका सेवन करना चाहिये ।। १३-१४ ।।
ध्यानमध्ययनं दानं सत्यं ह्रीरार्जवं क्षमा ।
शौचमाहारतः शुद्धिरिन्द्रियाणां च संयमः ।। १५ ।।
एतैर्विवर्धते तेजः पाप्मानमुपहन्ति च ।
सिध्यन्ति चास्य संकल्पा विज्ञानं च प्रवर्तते ।। १६ ।।
ध्यान, अध्ययन, दान, सत्य, लज्जा, सरलता, क्षमा, बाहर-भीतरकी पवित्रता, आहारशुद्धि और इन्द्रियोंका संयम—ये ही योगके साधन हैं। इन सबके द्वारा साधकका तेज बढ़ता है। वह अपने पापोंका नाश कर डालता है। उसके संकल्प सिद्ध होने लगते हैं और हृदयमें विज्ञानका आविर्भाव हो जाता है ।। १५-१६ ।।
धूतपापः स तेजस्वी लघ्वाहारो जितेन्द्रियः ।
कामक्रोधौ वशे कृत्वा निनीषेद् ब्रह्मणः पदम् ।। १७ ।।
इस प्रकार जब पाप धुल जायँ और साधक तेजस्वी, मिताहारी और जितेन्द्रिय हो जाय, तब वह काम और क्रोधको अपने अधीन करके अपने-आपको ब्रह्मपदमें प्रतिष्ठित करनेकी इच्छा करे ।। १७ ।।
अमूढत्वमसंगित्वं कामक्रोधविवर्जनम् ।
अदैन्यमनुदीर्णत्वमनुद्वेगो व्यवस्थितिः ।। १८ ।।
एष मार्गो हि मोक्षस्य प्रसन्नो विमलः शुचिः ।
तथा वाक्कायमनसां नियमः कामतोऽन्यथा ।। १९ ।।
मूढता और आसक्तिका अभाव, काम और क्रोधका त्याग एवं दीनता, उद्दण्डता तथा उद्वेगसे रहित होना और चित्तकी स्थिरता एवं निष्कामभावसे मन, वाणी और इन्द्रियोंका संयम—यह मोक्षका स्वच्छ, निर्मल एवं पवित्र मार्ग है ।। १८-१९ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि योगाचारानुवर्णनं नाम चतुःसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २७४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें योगसम्बन्धी आचारका वर्णन नामक दो सौ चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २७४ ।।