महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पत्नीके धर्मयुक्त वचनोंसे नागराजके अभिमान एवं रोषका नाश और उनका ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये उद्यत होना
षष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः
पत्नीके धर्मयुक्त वचनोंसे नागराजके अभिमान एवं रोषका नाश और उनका ब्राह्मणको दर्शन देनेके लिये उद्यत होना
नाग उवाच
अथ ब्राह्मणरूपेण कं तं समनुपश्यसि ।
मानुषं केवलं विप्रं देवं वाथ शुचिस्मिते ॥ १ ॥
नागने पूछा— पवित्र मुसकानवाली देवि! ब्राह्मणरूपमें तुमने किसका दर्शन किया है? वे ब्राह्मण कोई मनुष्य हैं या देवता? ॥ १ ॥
को हि मां मानुषः शक्तो द्रष्टुकामो यशस्विनि ।
संदर्शनरुचिर्वाक्यमाज्ञापूर्वं वदिष्यति ॥ २ ॥
यशस्विनि! भला, कौन मनुष्य मुझे देखनेकी इच्छा कर सकता है और यदि दर्शनकी इच्छा करे भी तो कौन इस तरह मुझे आज्ञा देकर बुला सकता है? ॥ २ ॥
सुरासुरगणानां च देवर्षीणां च भाविनि ।
ननु नागा महावीर्याः सौरसेयास्तरस्विनः ॥ ३ ॥
वन्दनीयाश्च वरदा वयमप्यनुयायिनः ।
मनुष्याणां विशेषेण नावेक्ष्या इति मे मतिः ॥ ४ ॥
भाविनि! सुरसाके वंशज नाग महापराक्रमी और अत्यन्त वेगशाली होते हैं। वे देवताओं, असुरों और देवर्षियोंके लिये भी वन्दनीय हैं। हमलोग भी अपने सेवकको वर देनेवाले हैं। विशेषतः मनुष्योंके लिये हमारा दर्शन सुलभ नहीं है, ऐसी मेरी धारणा है ॥ ३-४ ॥
नागभार्योवाच
आर्जवेन विजानामि नासौ देवोऽनिलाशन ।
एकं तस्मिन् विजानामि भक्तिमानतिरोषण ॥ ५ ॥
नागपत्नी बोली— अत्यन्त क्रोधी स्वभाववाले वायुभोजी नागराज! उन ब्राह्मणकी सरलतासे तो मैं यही समझती हूँ कि वे देवता नहीं हैं। मुझे उनमें एक बहुत बड़ी विशेषता यह जान पड़ी है कि वे आपके भक्त हैं ॥ ५ ॥
स हि कार्यान्तराकाङ्क्षी जलेप्सुः स्तोकको यथा ।
वर्षं वर्षप्रियः पक्षी दर्शनं तव काङ्क्षति ॥ ६ ॥
जैसे वर्षाके जलका प्रेमी प्यासा पपीहा पक्षी पानीके लिये वर्षाकी बाट जोहता रहता है, उसी प्रकार वे ब्राह्मण किसी दूसरे कार्यको सिद्ध करनेकी इच्छासे आपका दर्शन चाहते
हैं ॥ ६ ॥
हित्वा त्वद्दर्शनं किंचिद् विघ्नं न प्रतिपालयेत् ।
तुल्योऽप्यभिजने जातो न कश्चित् पर्युपासते ॥ ७ ॥
वे आपका दर्शन छोड़कर दूसरी किसी वस्तुको विघ्न समझते हैं; अतः वह विघ्न उन्हें नहीं प्राप्त होना चाहिये। उत्तम कुलमें उत्पन्न हुआ आपके समान कोई सद्गृहस्थ अतिथिकी उपेक्षा करके घरमें नहीं बैठता है ॥ ७ ॥
तद्रोषं सहजं त्यक्त्वा त्वमेनं द्रष्टुमर्हसि ।
आशाच्छेदेन तस्याद्य नात्मानं दग्धुमर्हसि ॥ ८ ॥
अतः आप अपने सहज रोषको त्यागकर इन ब्राह्मणदेवताका दर्शन कीजिये। आज इनकी आशा भंग करके अपने-आपको भस्म न कीजिये ॥ ८ ॥
आशया ह्यभिपन्नानामकृत्वाश्रुप्रमार्जनम् ।
राजा वा राजपुत्रो वा भ्रूणहत्यैव युज्यते ॥ ९ ॥
जो आशा लगाकर अपनी शरणमें आये हों, उनके आँसू जो नहीं पोंछता है, वह राजा हो या राजकुमार, उसे भ्रूणहत्याका पाप लगता है ॥ ९ ॥
मौने ज्ञानफलावाप्तिर्दानेन च यशो महत् ।
वाग्मित्वं सत्यवाक्येन परत्र च महीयते ॥ १० ॥
मौन रहनेसे ज्ञानरूपी फलकी प्राप्ति होती है, दान देनेसे महान् यशकी वृद्धि होती है। सत्य बोलनेसे वाणीकी पटुता और परलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है ॥
भूप्रदानेन च गतिं लभत्याश्रमसम्मिताम् ।
न्याय्यस्यार्थस्य सम्प्राप्तिं कृत्वा फलमुपाश्नुते ॥ ११ ॥
भूदान करनेसे मनुष्य आश्रम-धर्मके पालनके समान उत्तम गति पाता है। न्यायपूर्वक धनका उपार्जन करके पुरुष श्रेष्ठ फलका भागी होता है ॥ ११ ॥
अभिप्रेतामसंश्लिष्टां कृत्वा चात्महितां क्रियाम् ।
न याति निरयं कश्चिदिति धर्मविदो विदुः ॥ १२ ॥
अपनी रुचिके अनुकूल कर्म भी यदि पापके सम्पर्कसे रहित और अपने लिये हितकर हो तो उसे करके कोई भी नरकमें नहीं पड़ता है। ऐसा धर्मज्ञ पुरुष जानते हैं ॥ १२ ॥
नाग उवाच
अभिमानैर्न मानो मे जातिदोषेण वै महान् ।
रोषः संकल्पजः साध्वि दग्धो वागग्निना त्वया ॥ १३ ॥
**नागने कहा—**साध्वि! मुझमें अहंकारके कारण अभिमान नहीं है; अपितु जाति-दोषके कारण महान् रोष भरा हुआ है। मेरे उस संकल्पजनित रोषको अब तुमने अपनी वाणीरूप अग्निसे जलाकर भस्म कर दिया ॥ १३ ॥
न च रोषादहं साध्वि पश्येयमधिकं तमः ।
तस्य वक्तव्यतां यान्ति विशेषेण भुजङ्गमाः ॥ १४ ॥
पतिव्रते! मैं रोषसे बढ़कर मोहमें डालनेवाला दूसरा कोई दोष नहीं देखता और क्रोधके लिये सर्प ही अधिक बदनाम हैं ॥ १४ ॥
रोषस्य हि वशं गत्वा दशग्रीवः प्रतापवान् ।
तथा शक्रप्रतिस्पर्धी हतो रामेण संयुगे ॥ १५ ॥
इन्द्रसे भी टक्कर लेनेवाला प्रतापी दशानन रावण रोषके ही अधीन होकर युद्धमें श्रीरामचन्द्रजीके हाथसे मारा गया ॥ १५ ॥
अन्तःपुरगतं वत्सं श्रुत्वा रामेण निर्हृतम् ।
धर्षणारोषसंविग्नाः कार्तवीर्यसुता हताः ॥ १६ ॥
‘होमधेनुके बछड़ेका अपहरण करके उसे राजाके अन्तःपुरमें रख दिया गया है’ ऐसा सुनकर परशुरामजीने तिरस्कारजनक रोषसे भरे हुए कार्तवीर्य-पुत्रोंको मार डाला ॥ १६ ॥
जामदग्न्येन रामेण सहस्रनयनोपमः ।
संयुगे निहतो रोषात् कार्तवीर्यो महाबलः ॥ १७ ॥
महाबली राजा कार्तवीर्य अर्जुन इन्द्रके समान पराक्रमी था; परंतु रोषके ही कारण जमदग्निनन्दन परशुरामके द्वारा युद्धमें मारा गया ॥ १७ ॥
तदेष तपसां शत्रुः श्रेयसां विनिपातकः ।
निगृहीतो मया रोषः श्रुत्वैवं वचनं तव ॥ १८ ॥
इसलिये आज तुम्हारी बात सुनकर ही तपस्याके शत्रु और कल्याणमार्गसे भ्रष्ट करनेवाले इस क्रोधको मैंने काबूमें कर लिया है ॥ १८ ॥
आत्मानं च विशेषेण प्रशंसाम्यनपायिनी ।
यस्य मे त्वं विशालाक्षि भार्या गुणसमन्विता ॥ १९ ॥
विशाललोचने! मैं अपनी एवं अपने सौभाग्यकी विशेषरूपसे प्रशंसा करता हूँ, जिसे तुम-जैसी सद्गुणवती तथा कभी विलग न होनेवाली पत्नी प्राप्त हुई है ॥ १९ ॥
एष तत्रैव गच्छामि यत्र तिष्ठत्यसौ द्विजः ।
सर्वथा चोक्तवान् वाक्यं स कृतार्थः प्रयास्यति ॥ २० ॥
यह लो, अब मैं वहीं जाता हूँ, जहाँ वे ब्राह्मण देवता विराजमान हैं। वे जो कहेंगे वही करूँगा। वे सर्वथा कृतार्थ होकर यहाँसे जायेंगे ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि उञ्छवृत्त्युपाख्याने
षष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३६० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें उञ्छवृत्तिका
उपाख्यानविषयक तीन सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६० ॥
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