महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
चातुराश्रम्यमुक्तं ते राजधर्मास्तथैव च ।
षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः
जपयज्ञके विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न, उसके उत्तरमें जप और ध्यानकी महिमा और उसका फल
युधिष्ठिर उवाच
चातुराश्रम्यमुक्तं ते राजधर्मास्तथैव च ।
नानाश्रयाश्च बहव इतिहासाः पृथग्विधाः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! आपने चार आश्रमों तथा राजधर्मोंका वर्णन किया एवं अनेकानेक विषयोंसे सम्बन्ध रखनेवाले बहुत-से भिन्न-भिन्न इतिहास भी सुनाये ॥ १ ॥
श्रुतास्त्वत्तः कथाश्चैव धर्मयुक्ता महामते ।
संदेहोऽस्ति तु कश्चिन्मे तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ २ ॥
महामते! मैंने आपके मुखसे अनेक धर्मयुक्त कथाएँ सुनी हैं; फिर भी मेरे मनमें एक संदेह रह गया है, उसे आप मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ २ ॥
जापकानां फलावाप्तिं श्रोतुमिच्छामि भारत ।
किंफलं जपतामुक्तं क्व वा तिष्ठन्ति जापकाः ॥ ३ ॥
भरतनन्दन! अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि जप करनेवालोंको फलकी प्राप्ति कैसे होती है? जापकोंके जपका फल क्या बताया गया है अथवा जप करनेवाले पुरुष किन लोकोंमें स्थान पाते हैं? ॥ ३ ॥
जप्यस्य च विधिं कृत्स्नं वक्तुमर्हसि मेऽनघ ।
जापका इति किञ्चैतत् सांख्ययोगक्रियाविधिः ॥ ४ ॥
अनघ! आप मुझे जपकी सम्पूर्ण विधि भी बताइये। 'जापक' इस पदसे क्या तात्पर्य है? क्या यह सांख्ययोग, ध्यानयोग अथवा क्रियायोगका अनुष्ठान है? ॥ ४ ॥
किं यज्ञविधिरेवैष किमेतज्जप्यमुच्यते ।
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व सर्वज्ञो ह्यसि मे मतः ॥ ५ ॥
अथवा यह जप भी कोई यज्ञकी ही विधि है? जिसका जप किया जाता है, वह क्या वस्तु है? आप यह सारी बातें मुझे बताइये; क्योंकि आप मेरी मान्यताके अनुसार सर्वज्ञ हैं ॥ ५ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
यमस्य यत् पुरावृत्तं कालस्य ब्राह्मणस्य च ॥ ६ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! इस विषयमें विद्वान् पुरुष उस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, जो पूर्वकालमें यम, काल और ब्राह्मणके बीचमें घटित हुआ था॥ ६॥
सांख्ययोगौ तु यायुक्तौ मुनिभिर्मोक्षदर्शिभिः।
संन्यास एव वेदान्ते वर्तते जपनं प्रति॥ ७॥
मोक्षदर्शी मुनियोंने जो सांख्य और योगका वर्णन किया है, उनमेंसे वेदान्त (सांख्य)-में तो जपका संन्यास (त्याग) ही बताया गया है॥ ७॥
वेदवादाश्च निर्वृत्ताः शान्ता ब्रह्मण्यवस्थिताः।
सांख्ययोगौ तु यायुक्तौ मुनिभिः समदर्शिभिः॥ ८॥
मार्गौ तावप्युभावेतौ संश्रितौ न च संश्रितौ।
उपनिषदोंके वाक्य निवृत्ति (परमानन्द), शान्ति तथा ब्रह्मनिष्ठताका बोध करानेवाले हैं (अतः वहाँ जपकी अपेक्षा नहीं है)। समदर्शी मुनियोंने जो सांख्य और योग बताये हैं, वे दोनों मार्ग चित्तशुद्धिके द्वारा ज्ञानप्राप्तिमें उपकारक होनेसे जपका आश्रय लेते हैं, नहीं भी लेते हैं॥ ८ १/२॥
यथा संश्रूयते राजन् कारणं चात्र वक्ष्यते॥ ९॥
मनःसमाधिरत्रापि तथेन्द्रियजयः स्मृतः।
राजन्! यहाँ जैसा कारण सुना जाता है, वैसा आगे बताया जायगा। सांख्य और योग—इन दोनों मार्गोंमें भी मनोनिग्रह और इन्द्रियसंयम आवश्यक माने गये हैं॥ ९ १/२॥
सत्यमग्निपरीचारो विविक्तानां च सेवनम्॥ १०॥
ध्यानं तपो दमः क्षान्तिरनसूया मिताशनम्।
विषयप्रतिसंहारो मितजल्पस्तथा शमः॥ ११॥
एष प्रवर्तको यज्ञो निवर्तकमथो शृणु।
यथा निवर्तते कर्म जपतो ब्रह्मचारिणः॥ १२॥
सत्य, अग्निहोत्र, एकान्तसेवन, ध्यान तपस्या, दम, क्षमा, अनसूया, मिताहार, विषयोंका संकोच, मितभाषण तथा शम—यह प्रवर्तक यज्ञ है। अब निवर्तक यज्ञका वर्णन सुनो; जिसके अनुसार जप करनेवाले ब्रह्मचारी साधकके सारे कर्म निवृत्त हो जाते हैं (अर्थात् उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है)॥ १०-१२॥
एतत् सर्वमशेषेण यथोक्तं परिवर्तयेत्।
निवृत्तं मार्गमासाद्य व्यक्ताव्यक्तमनाश्रयम्॥ १३॥
इन मनोनिग्रह आदि पूर्वोक्त सभी साधनोंका निष्कामभावसे अनुष्ठान करके उन्हें प्रवृत्तिके विपरीत निवृत्तिमार्गमें बदल डाले। निवृत्तिमार्ग तीन तरहका है—व्यक्त, अव्यक्त और अनाश्रय, उस मार्गका आश्रय लेकर स्थिरचित्त हो जाय॥ १३॥
कुशोच्चयनिषण्णः सन् कुशहस्तः कुशैः शिखी।
कुशैः परिवृतस्तस्मिन् मध्ये छन्नः कुशैस्तथा ॥ १४ ॥
निवृत्तिमार्गपर पहुँचनेकी विधि यह है—जपकर्ताको कुशासनपर बैठना चाहिये। उसे अपने हाथमें भी कुश रखना चाहिये। शिखामें भी कुश बाँध लेना चाहिये, वह कुशोंसे घिरकर बैठे और मध्यभागमें भी कुशोंसे आच्छादित रहे ॥ १४ ॥
विषयेभ्यो नमस्कुर्याद् विषयान्न च भावयेत् ।
साम्यमुत्पाद्य मनसा मनस्येव मनो दधत् ॥ १५ ॥
विषयोंको दूरसे ही नमस्कार करे और कभी उनका अपने मनमें चिन्तन न करे। मनसे समताकी भावना करके मनका मनमें ही लय करे ॥ १५ ॥
तद् धिया ध्यायति ब्रह्म जपन् वै संहिताम् हिताम् ।
संन्यस्यत्यथवा तां वै समाधौ पर्यवस्थितः ॥ १६ ॥
फिर बुद्धिके द्वारा परब्रह्म परमात्माका ध्यान करे तथा सर्व-हितकारिणी वेदसंहिताका एवं प्रणव और गायत्री मन्त्रका जप करे। फिर समाधिमें स्थित होनेपर उस संहिता एवं गायत्री मन्त्र आदिके जपको भी त्याग दे ॥
ध्यानमुत्पादयत्यत्र संहिताबलसंश्रयात् ।
शुद्धात्मा तपसा दान्तो निवृत्तद्वेषकामवान् ॥ १७ ॥
अरागमोहो निर्द्वन्द्वो न शोचति न सज्जते ।
न कर्ता कारणानां च न कार्याणामिति स्थितिः ॥ १८ ॥
संहिताके जपसे जो बल प्राप्त होता है, उसका आश्रय लेकर साधक अपने ध्यानको सिद्ध कर लेता है। वह शुद्धचित्त होकर तपके द्वारा मन और इन्द्रियोंको जीत लेता है तथा द्वेष और कामनासे रहित एवं आसक्ति और मोहसे रहित हुआ शीत और उष्ण आदि समस्त द्वन्द्वोंसे अतीत हो जाता है। अतः वह न तो कभी शोक करता है और न कहीं भी आसक्त होता है। वह कर्मोंका कारण और कार्यका कर्ता नहीं होता (अर्थात् अपनेमें कर्तापनका अभिमान नहीं लाता) ॥
न चाहङ्कारयोगेन मनः प्रस्थापयेत् क्वचित् ।
न चार्थग्रहणे युक्तो नावमानी न चाक्रियः ॥ १९ ॥
वह अहंकारसे मुक्त होकर कहीं भी अपने मनको नहीं लगाता है। वह न तो स्वार्थ-साधनमें संलग्न होता है, न किसीका अपमान करता है और न अकर्मण्य होकर ही बैठता है ॥ १९ ॥
ध्यानक्रियापरो युक्तो ध्यानवान् ध्याननिश्चयः ।
ध्याने समाधिमुत्पाद्य तदपि त्यजति क्रमात् ॥ २० ॥
वह ध्यानरूप क्रियामें ही नित्य तत्पर रहता है, ध्याननिष्ठ हो ध्यानके द्वारा ही तत्त्वका निश्चय कर लेता है, ध्यानमें समाधिस्थ होकर क्रमशः ध्यानरूप क्रियाका भी त्याग कर देता है ॥ २० ॥
स वै तस्यामवस्थायां सर्वत्यागकृतः सुखम् ।
निरिच्छस्त्यजति प्राणान् ब्राह्मीं संविशते तनुम् ॥ २१ ॥
वह उस अवस्थामें स्थित हुआ योगी निस्संदेह सर्वत्यागरूप निर्बीज समाधिसे प्राप्त होनेवाले दिव्य परमानन्दका अनुभव करता है। वह योगजनित अणिमा आदि सिद्धियोंकी भी इच्छा न रखकर सर्वथा निष्काम हो प्राणोंका परित्याग कर देता है और विशुद्ध परब्रह्म परमात्माके स्वरूपमें प्रवेश कर जाता है ॥ २१ ॥
अथवा नेच्छते तत्र ब्रह्मकायनिषेवणम् ।
उत्क्रामति च मार्गस्थो नैव क्वचन जायते ॥ २२ ॥
अथवा यदि वह परब्रह्मका सायुज्य नहीं प्राप्त करना चाहता तो देवयानमार्गपर स्थित हो ऊपरके लोकोंमें गमन करता है, अर्थात् परब्रह्म परमात्माके परम धाममें चला जाता है। पुनः इस संसारमें कहीं जन्म नहीं लेता ॥
आत्मबुद्ध्या समास्थाय शान्तीभूतो निरामयः ।
अमृतं विरजः शुद्धमात्मानं प्रतिपद्यते ॥ २३ ॥
आत्मस्वरूपका बोध हो जानेसे वह रजोगुणसे रहित निर्मल शान्तस्वरूप योगी अमृतस्वरूप विशुद्ध आत्माको प्राप्त होता है ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि जापकोपाख्याने
षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें जापकका उपाख्यानविषयक एक सौ छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९६ ॥