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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 558)

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राजा क्षेमदर्शी और कालकवृक्षीय मुनि

तब राजाने मुनिको इस प्रकार उत्तर दिया—'ब्राह्मण! आप जो कुछ कहना चाहें, मुझसे निर्भय होकर कहें। अपने हितकी इच्छा रखनेवाला मैं आपको क्षमा क्यों नहीं करूँगा? विप्रवर! आप जो चाहें, कहिये। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि आप मुझसे जो कोई भी बात कहेंगे, आपकी उस आज्ञाका मैं पालन करूँगा' ।। २१-२२ ।।

मुनिरुवाच

ज्ञात्वा पापानपापांश्च भृत्यतस्ते भयानि च ।
भक्त्या वृत्तिं समाख्यातुं भवतोऽन्तिकमागमम् ।। २३ ।।
**मुनि बोले—**महाराज! आपके कर्मचारियोंमेंसे कौन अपराधी है और कौन निरपराध? इस बातका पता लगाकर तथा आपपर आपके सेवकोंकी ओरसे ही अनेक भय आने वाले हैं, यह जानकर प्रेमपूर्वक राज्यका सारा समाचार बतानेके लिये मैं आपके पास आया था ।। २३ ।।

प्रागेवोक्तस्तु दोषोऽयमाचार्यैर्नृपसेविनाम् ।
अगतीकगतिर्ह्येषा पापा राजोपसेविनाम् ।। २४ ।।
नीतिशास्त्रके आचार्योंने राजसेवकोंके इस दोषका पहलेसे ही वर्णन कर रखा है कि जो राजाकी सेवा करनेवाले लोग हैं, उनके लिये यह पापमयी जीविका अगतिक गति है, अर्थात् जिन्हें कहीं भी सहारा नहीं मिलता, वे राजाके सेवक होते हैं ।। २४ ।।

आशीविषैश्च तस्याहुः संगतं यस्य राजभिः ।
बहुमित्राश्च राजानो बह्वमित्रास्तथैव च ।। २५ ।।
तेभ्यः सर्वेभ्य एवाहुर्भयं राजोपजीविनाम् ।
तथैषां राजतो राजन् मुहूतदेव भीर्भवेत् ।। २६ ।।
जिसका राजाओंके साथ मेल-जोल हो गया, उसकी विषधर सर्पोंके साथ सङ्गति हो गयी, ऐसा नीतिज्ञोंका कथन है। राजाके जहाँ बहुतसे मित्र होते हैं, वहीं उनके अनेक शत्रु भी हुआ करते हैं। राजाके आश्रित होकर जीविका चलानेवालोंको उन सभीसे भय बताया गया है। राजन्! स्वयं राजासे भी उन्हें घड़ी-घड़ीमें खतरा रहता है ।। २५-२६ ।।

नैकान्तेन प्रमादो हि शक्यः कर्तुं महीपतौ ।
न तु प्रमादः कर्तव्यः कथंचिद् भूतिमिच्छता ।। २७ ।।
राजाके पास रहनेवालोंसे कभी कोई प्रमाद हो ही नहीं, यह तो असम्भव है, परंतु जो अपना भला चाहता हो उसे किसी तरह उसके पास जान-बूझकर प्रमाद नहीं करना चाहिये ।। २७ ।।

प्रमादाद्धि स्खलेद् राजा स्खलिते नास्ति जीवितम् ।
अग्निं दीप्तमिवासीदेद् राजानमुपशिक्षितः ।। २८ ।।

यदि सेवकके द्वारा असावधानीके कारण कोई अपराध बन गया तो राजा पहलेके उपकारको भुलाकर कुपित हो उससे द्वेष करने लगता है और जब राजा अपनी मर्यादासे भ्रष्ट हो जाय तो उस सेवकके जीवनकी आशा नहीं रह जाती। जैसे जलती हुई आगके पास मनुष्य सचेत होकर जाता है, उसी प्रकार शिक्षित पुरुषको राजाके पास सावधानीसे रहना चाहिये ॥ २८ ॥

आशीविषमिव क्रुद्धं प्रभुं प्राणधनेश्वरम् ।
यत्नेनोपचरेन्नित्यं नाहमस्मीति मानवः ॥ २९ ॥
राजा प्राण और धन दोनोंका स्वामी है। जब वह कुपित होता है तो विषधर सर्पके समान भयंकर हो जाता है; अतः मनुष्यको चाहिये कि 'मैं जीवित नहीं हूँ' ऐसा मानकर अर्थात् अपनी जानको हथेलीपर लेकर सदा बड़े यत्नसे राजाकी सेवा करे ॥ २९ ॥

दुर्व्याहृताच्छङ्कमानो दुष्कृताद् दुरधिष्ठितात् ।
दुरासिताद् दुर्व्रजितादिङ्गितादङ्गचेष्टितात् ॥ ३० ॥
मुँहसे कोई बुरी बात न निकल जाय, कोई बुरा काम न बन जाय, खड़ा होते, किसी आसनपर बैठते, चलते, संकेत करते तथा किसी अंगके द्वारा कोई चेष्टा करते समय असभ्यता अथवा बेअदबी न हो जाय, इसके लिये सदा सतर्क रहना चाहिये ॥ ३० ॥

देवतेव हि सर्वार्थान् कुर्याद् राजा प्रसादितः ।
वैश्वानर इव क्रुद्धः समूलमपि निर्दहेत् ॥ ३१ ॥
यदि राजाको प्रसन्न कर लिया जाय तो वह देवताकी भाँति सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध कर देता है और यदि कुपित हो जाय तो जलती हुई आगकी भाँति जड़-मूलसहित भस्म कर डालता है ॥ ३१ ॥

इति राजन् यमः प्राह वर्तते च तथैव तत् ।
अथ भूयांसमेवार्थं करिष्यामि पुनः पुनः ॥ ३२ ॥
राजन्! यमराजने जो यह बात कही है, वह ज्यों-की-त्यों ठीक है; फिर भी मैं तो बारंबार आपके महान् अर्थका साधन करूँगा ही ॥ ३२ ॥

ददात्यस्मद्विधोऽमात्यो बुद्धिसहाय्यमापदि ।
वायसस्त्वेष मे राजन् ननु कार्याभिसंहितः ॥ ३३ ॥
मेरे जैसा मन्त्री आपत्तिकालमें बुद्धिद्वारा सहायता देता है। राजन्! मेरा यह कौआ भी आपके कार्यसाधनमें संलग्न था; किंतु मारा गया (सम्भव है मेरी भी वही दशा हो) ॥ ३३ ॥

न च मेऽत्र भवान् गर्ह्यो न च येषां भवान् प्रियः ।
हिताहितांस्तु बुद्धयेथा मा परोक्षमतिर्भवेः ॥ ३४ ॥
परंतु इसके लिये मैं आपकी और आपके प्रेमियोंकी निन्दा नहीं करता। मेरा कहना तो इतना ही है कि आप स्वयं अपने हित और अनहितको पहचानिये। प्रत्येक कार्यको अपनी

आँखोंसे देखिये। दूसरोंकी देख-भालपर विश्वास न कीजिये ॥ ३४ ॥

ये त्वादानपरा एव वसन्ति भवतो गृहे ।
अभूतिकाम भूतानां तादृशैर्मेऽभिसंहितम् ॥ ३५ ॥
जो लोग आपका खजाना लूट रहे हैं और आपके ही घरमें रहते हैं, वे प्रजाकी भलाई चाहनेवाले नहीं हैं। वैसे लोगोंने मेरे साथ वैर बाँध लिया है ॥ ३५ ॥

यो वा भवद्विनाशन राज्यमिच्छत्यनन्तरम् ।
आन्तरैरभिसंधाय राजन् सिद्ध्यति नान्यथा ॥ ३६ ॥
राजन्! जो आपका विनाश करके आपके बाद इस राज्यको अपने हाथमें लेना चाहता है, उसका वह कर्म अन्तःपुरके सेवकोंसे मिलकर कोई षड्यन्त्र करनेसे ही सफल हो सकता है; अन्यथा नहीं (अतः आपको सावधान हो जाना चाहिये) ॥ ३६ ॥

तेषामहं भयाद् राजन् गमिष्याम्यन्यमाश्रमम् ।
तैर्हि मे संधितो बाणः काके निपतितः प्रभो ॥ ३७ ॥
नरेश्वर! मैं उन विरोधियोंके भयसे दूसरे आश्रममें चला जाऊँगा। प्रभो! उन्होंने मेरे लिये ही बाणका संधान किया था; किंतु वह उस कौएपर जा गिरा ॥ ३७ ॥

छद्मकामैरकामस्य गमितो यमसादनम् ।
दृष्टं ह्येतन्मया राजंस्तपोदीर्घेन चक्षुषा ॥ ३८ ॥
मैं कोई कामना लेकर यहाँ नहीं आया था तो भी छल-कपटकी इच्छा रखनेवाले षड्यन्त्रकारियोंने मेरे कौएको मारकर यमलोक पहुँचा दिया। राजन्! तपस्याके द्वारा प्राप्त हुई दूरदर्शिनी दृष्टिसे मैंने यह सब देखा है ॥

बहुनक्रझषग्राहां तिमिङ्गिलगणैर्युताम् ।
काकेन बालिशेनेमां यामतार्षमहं नदीम् ॥ ३९ ॥
यह राजनीति एक नदीके समान है। राजकीय पुरुष उसमें मगर, मत्स्य, तिमिङ्गल-समूहों और ग्राहोंके समान हैं। बेचारे कौएके द्वारा मैं किसी तरह इस नदीसे पार हो सका हूँ ॥ ३९ ॥

स्थाण्वश्मकण्टकवतीं सिंहव्याघ्रसमाकुलाम् ।
दुरासदां दुष्प्रसहां गुहां हैमवतीमिव ॥ ४० ॥
जैसे हिमालयकी कन्दरामें ठूँठ, पत्थर और काँटे होते हैं, उसके भीतर सिंह और व्याघ्रोंका भी निवास होता है तथा इन्हीं सब कारणोंसे उसमें प्रवेश पाना या रहना अत्यन्त कठिन एवं दुःसह हो जाता है, उसी प्रकार दुष्ट अधिकारियोंके कारण इस राज्यमें किसी भले मनुष्यका रहना मुश्किल है ॥ ४० ॥

अग्निना तामसं दुर्गं नौभिराप्यं च गम्यते ।
राजदुर्गावतरणे नोपायं पण्डिता विदुः ॥ ४१ ॥

अन्धकारमय दुर्गको अग्निके प्रकाशसे तथा जल-दुर्गको नौकाओंद्धारा पार किया जा सकता है; परंतु राजारूपी दुर्गसे पार होनेके लिये विद्वान् पुरुष भी कोई उपाय नहीं जानते हैं ।। ४१ ।।

गहनं भवतो राज्यमन्धकारं तमोऽन्वितम् ।
नेह विश्वसितुं शक्यं भवतापि कुतो मया ।। ४२ ।।
आपका यह राज्य गहन अन्धकारसे आच्छन्न और दुःखसे परिपूर्ण है। आप स्वयं भी इस राज्यपर विश्वास नहीं कर सकते; फिर मैं कैसे करूँगा ।। ४२ ।।

अतो नायं शुभो वासस्तुल्ये सदसती इह ।
वधो ह्येवात्र सुकृते दुष्कृते न च संशयः ।। ४३ ।।
अतः यहाँ रहनेमें किसीका कल्याण नहीं है। यहाँ भले-बुरे सब एक समान हैं। इस राज्यमें बुराई करनेवाले और भलाई करनेवालेका भी वध हो सकता है, इसमें संशय नहीं है ।। ४३ ।।

न्यायतो दुष्कृते घातः सुकृते न कथंचन ।
नेह युक्तं स्थिरं स्थातुं जवेनैवाव्रजेद् बुधः ।। ४४ ।।
न्यायकी बात तो यह है कि बुराई करनेवालेको ही मारा जाय और पुण्य—श्रेष्ठ कर्म करनेवालेको किसी तरह भी कोई कष्ट न होने पावे, परंतु यहाँ ऐसा नहीं होता; अतः इस राज्यमें स्थिरभावसे निवास करना किसीके लिये भी उचित नहीं है। विद्वान् पुरुषको यहाँसे अति शीघ्र हट जाना चाहिये ।। ४४ ।।

सीता नाम नदी राजन् प्लवो यस्यां निमज्जति ।
तथोपमामिमां मन्ये वागुरां सर्वघातिनीम् ।। ४५ ।।
राजन्! सीता नामसे प्रसिद्ध एक नदी है, जिसमें नाव भी डूब जाती है, वैसी ही यहाँकी राजनीति भी है (इसमें मेरे जैसे सहायकोंके भी डूब जानेकी आशङ्का है)। मैं तो इसे समस्त प्राणियोंका विनाश करनेवाली फाँसी ही समझता हूँ ।। ४५ ।।

मधुप्रपातो हि भवान् भोजनं विषसंयुक्तम् ।
असतामिव ते भावो वर्तते न सतामिव ।। ४६ ।।
आप शहदके छत्तेसे युक्त पेड़की उस ऊँची डालीके समान हैं, जहाँसे नीचे गिरनेका ही भय है। आप विष मिलाये हुए भोजनके तुल्य हैं, आपका भाव असज्जनोंके समान है, सज्जनोंके तुल्य नहीं है ।। ४६ ।।

आशीविषैः परिवृतः कूपस्त्वमसि पार्थिव ।
दुर्गतीर्था बृहत्कूला कारीरा वेत्रसंयुता ।। ४७ ।।
नदी मधुरपानीया यथा राजंस्तथा भवान् ।

भूपाल! आप विषैले सर्पोंसे घिरे हुए कुएँके समान हैं, राजन्! आपकी अवस्था उस मीठे जलवाली नदीके समान हो गयी है, जिसके घाटक पहुँचना कठिन है, जिसके दोनों किनारे बहुत ऊँचे हों और वहाँ करीलके झाड़ तथा बेंतकी वल्लरियाँ सब ओर छा रही हों ।। ४७ ½ ।।

श्वगृध्रगोमायुयुतो राजहंससमो ह्यसि ॥ ४८ ॥
यथाऽऽश्रित्य महावृक्षं कक्षः संवर्धते महान् ।
ततस्तं संवृणोत्येव तमतीत्य च वर्धते ॥ ४९ ॥
तेनैवोग्रेन्धनेनैवं दावो दहति दारुणः।
तथोपमा ह्यमात्यास्ते राजंस्तान् परिशोधय ॥ ५० ॥
जैसे कुत्तों, गीधों और गीदड़ोंसे घिरा हुआ राजहंस बैठा हो, उसी तरह दुष्ट कर्मचारियोंसे आप घिरे हुए हैं। जैसे लताओंका विशाल समूह किसी महान् वृक्षका आश्रय लेकर बढ़ता है, फिर धीरे-धीरे उस वृक्षको लपेट लेता है और उसका अतिक्रमण करके उससे भी ऊँचेतक फैल जाता है, फिर वही सूखकर भयानक ईंधन बन जाता है, तब दारुण दावानल उसी ईंधनके सहारे उस विशाल वृक्षको भी जला डालता है, राजन्! आपके मन्त्री भी उन्हीं सूखी लताओंके समान हो गये हैं अर्थात् आपके ही आश्रयसे बढ़कर आपके विनाशका कारण बन रहे हैं। अतः आप उनका शोधन कीजिये ॥ ४८—५० ॥

त्वया चैव कृता राजन् भवता परिपालिताः ।
भवन्तमभिसंधाय जिघांसन्ति भवत्प्रियम् ॥ ५१ ॥
नरेश्वर! आपने ही जिन्हें मन्त्री बनाया और आपने जिनका पालन किया, वे आपसे ही कपटभाव रखकर आपके ही हितका विनाश करना चाहते हैं ।। ५१ ।।

उषितं शङ्कमानेन प्रमादं परिरक्षता ।
अन्तःसर्प इवागारे वीरपत्नया इवालये ॥ ५२ ॥
शीलं जिज्ञासमानेन राजंश्च सहजीविनः ।
मैं राजाके साथ रहनेवाले अधिकारियोंका शील-स्वभाव जानना चाहता था, इसलिये सदा सशङ्क रहकर बड़ी सावधानीके साथ यहाँ रहा हूँ। ठीक उसी तरह, जैसे कोई साँपवाले मकानमें रहता हो अथवा किसी शूरवीरकी पत्नीके घरमें घुस गया हो ।। ५२ ½ ।।

कच्चिज्जितेन्द्रियो राजा कच्चिदस्यान्तरा जिताः ॥ ५३ ॥
कच्चिदेषां प्रियो राजा कच्चिद् राज्ञः प्रिया प्रजाः ।
विजिज्ञासुरिह प्राप्तस्तवाहं राजसत्तम ॥ ५४ ॥
क्या इस देशके राजा जितेन्द्रिय हैं? क्या इनके अंदर रहनेवाले सेवक इनके वशमें हैं? क्या यहाँकी प्रजाओंका राजापर प्रेम है? और राजा भी क्या अपनी प्रजाओंपर प्रेम रखते हैं? नृपश्रेष्ठ! इन्हीं सब बातोंको जाननेकी इच्छासे मैं आपके यहाँ आया था ।। ५३-५४ ।।

तस्य मे रोचते राजन् क्षुधितस्येव भोजनम् ।

अमात्या मे न रोचन्ते वितृष्णस्य यथोदकम् ।। ५५ ।।
जैसे भूखेको भोजन अच्छा लगता है, उसी प्रकार आपका दर्शन मुझे बड़ा प्रिय लगता है; परंतु जैसे प्यास न रहनेपर पानी अच्छा नहीं लगता, उसी प्रकार आपके ये मन्त्री मुझे अच्छे नहीं जान पड़ते हैं ।। ५५ ।।
भवतोऽर्थकृदित्येवं मयि दोषो हि तैः कृतः ।
विद्यते कारणं नान्यदिति मे नात्र संशयः ।। ५६ ।।
मैं आपकी भलाई करनेवाला हूँ, यही इन मन्त्रियोंने मुझमें बड़ा भारी दोष पाया है और इसीलिये ये मुझसे द्वेष रखने लगे हैं। इसके सिवा दूसरा कोई इनके रोषका कारण नहीं है। मुझे अपने इस कथनकी सत्यतामें कोई संदेह नहीं है ।। ५६ ।।
न हि तेषामहं दृग्धस्तत्तेषां दोषदर्शनम् ।
अरेर्हि दुर्हृदाद् भयं भग्नपुच्छादिवोरगात् ।। ५७ ।।
यद्यपि मैं इन लोगोंसे द्रोह नहीं करता तो भी मेरे प्रति इन लोगोंकी दोष-दृष्टि हो गयी है। जिसकी पूँछ दबा दी गयी हो, उस सर्पके समान दुष्ट हृदयवाले शत्रुसे सदा डरते रहना चाहिये (इसलिये अब मैं यहाँ रहना नहीं चाहता) ।। ५७ ।।

राजोवाच

भूयसा परिहारेण सत्कारेण च भूयसा ।
पूजितो ब्राह्मणश्रेष्ठ भूयो वस गृहे मम ।। ५८ ।।
**राजाने कहा—**विप्रवर! आपपर आनेवाले भय अथवा संकटका विशेषरूपसे निवारण करते हुए मैं आपको बड़े आदर-सत्कारके साथ अपने यहाँ रखूँगा। आप मेरे द्वारा सम्मानित हो बहुत कालतक मेरे महलमें निवास कीजिये ।। ५८ ।।
ये त्वां ब्राह्मण नेच्छन्ति ते न वत्स्यन्ति मे गृहे ।
भवतैव हि तज्ज्ञेयं यत्तदेषामनन्तरम् ।। ५९ ।।
ब्रह्मन्! जो आपको मेरे यहाँ नहीं रहने देना चाहते हैं, वे स्वयं ही मेरे घरमें नहीं रहने पायेंगे अब इन विरोधियोंका दमन करनेके लिये जो आवश्यक कर्त्तव्य हो, उसे आप स्वयं ही सोचिये और समझिये ।। ५९ ।।
यथा स्यात् सुधृतो दण्डो यथा च सुकृतं कृतम् ।
तथा समीक्ष्य भगवन् श्रेयसे विनियुङ्क्ष्व माम् ।। ६० ।।
भगवन्! जिस तरह राजदण्डको मैं अच्छी तरह धारण कर सकूँ और मेरे द्वारा अच्छे ही कार्य होते रहें, वह सब सोचकर आप मुझे कल्याणके मार्गपर लगाइये ।। ६० ।।

मुनिरुवाच

अदर्शयन्निमं दोषमेकैकं दुर्बलीकुरु ।
ततः कारणमाज्ञाय पुरुषं पुरुषं जहि ।। ६१ ।।

मुनिने कहा—राजन्! पहले तो कौएको मारनेका जो अपराध है, इसे प्रकट किये बिना ही एक-एक मन्त्रीको उसका अधिकार छीनकर दुर्बल कर दीजिये। उसके बाद अपराधके कारणका पूरा-पूरा पता लगाकर क्रमशः एक-एक व्यक्तिका वध कर डालिये ॥ ६१ ॥

एकदोषा हि बहवो मृद्नीयुरपि कण्टकान् ।
मन्त्रभेदभयाद् राजंस्तस्मादेतद् ब्रवीमि ते ॥ ६२ ॥
नरेश्वर! जब बहुत-से लोगोंपर एक ही तरहका दोष लगाया जाता है तो वे सब मिलकर एक हो जाते हैं और उस दशामें वे बड़े-बड़े कण्टकोंको भी मसल डालते हैं, अतः यह गुप्त विचार दूसरोंपर प्रकट न हो जाय, इसी भयसे मैं तुम्हें इस प्रकार एक-एक करके विरोधियोंके वधकी सलाह दे रहा हूँ ॥ ६२ ॥

वयं तु ब्राह्मणा नाम मृदुदण्डाः कृपालवः ।
स्वस्ति चेच्छाम भवतः परेषां च यथाऽऽत्मनः ॥ ६३ ॥
महाराज! हमलोग ब्राह्मण हैं। हमारा दण्ड भी बहुत कोमल होता है। हम स्वभावसे ही दयालु होते हैं; अतः अपने ही समान आपका और दूसरोंका भी भला चाहते हैं ॥ ६३ ॥

राजन्नात्मानमाचक्षे सम्बन्धी भवतो ह्यहम् ।
मुनिः कालकवृक्षीय इत्येवमभिसंज्ञितः ॥ ६४ ॥
राजन्! अब मैं आपको अपना परिचय देता हूँ। मैं आपका सम्बन्धी हूँ। मेरा नाम है कालकवृक्षीय मुनि ॥

पितुः सखा च भवतः सम्मतः सत्यसङ्गरः ।
व्यापन्ने भवतो राज्ये राजन् पितरि संस्थिते ॥ ६५ ॥
सर्वकामान् परित्यज्य तपस्तप्तं तदा मया ।
स्नेहात् त्वां तु ब्रवीम्येतन्मा भूयो विभ्रमेदिति ॥ ६६ ॥
मैं आपके पिताका आदरणीय एव सत्यप्रतिज्ञ मित्र हूँ। नरेश्वर! आपके पिताके स्वर्गवास हो जानेके पश्चात् जब आपके राज्यपर भारी संकट आ गया था, तब अपनी समस्त कामनाओंका परित्याग करके मैंने (आपके हितके लिये) तपस्या की थी। आपके प्रति स्नेह होनेके कारण मैं फिर यहाँ आया हूँ और आपको ये सब बातें इसलिये बता रहा हूँ कि आप फिर किसीके चक्करमें न पड़ जायँ ॥ ६५-६६ ॥

उभे दृष्ट्वा दुःखसुखे राज्यं प्राप्य यदृच्छया ।
राज्येनामात्यसंस्थेन कथं राजन् प्रमाद्यसि ॥ ६७ ॥
महाराज! आपने सुख और दुःख दोनों देखे हैं। यह राज्य आपको दैवेच्छासे प्राप्त हुआ है तो भी आप इसे केवल मन्त्रियोंपर छोड़कर क्यों भूल कर रहे हैं? ॥

ततो राजकुले नान्दी संजज्ञे भूयसा पुनः ।
पुरोहितकुले चैव सम्प्राप्ते ब्राह्मणर्षभे ॥ ६८ ॥

तदनन्तर पुरोहितके कुलमें उत्पन्न विप्रवर कालकवृक्षीय मुनिके पुनः आ जानेसे राजपरिवारमें मंगलपाठ एवं आनन्दोत्सव होने लगा ।। ६८ ।।

एकच्छत्रां महीं कृत्वा कौसल्याय यशस्विने ।
मुनिः कालकवृक्षीय ईजे क्रतुभिरुत्तमैः ।। ६९ ।।
कालकवृक्षीय मुनिने अपने बुद्धिबलसे यशस्वी कोसलनरेशको भूमण्डलका एकच्छत्र सम्राट् बनाकर अनेक उत्तम यज्ञोंद्वारा यजन किया ।। ६९ ।।

हितं तद्वचनं श्रुत्वा कौसल्योऽप्यजयन्महीम् ।
तथा च कृतवान् राजा यथोक्तं तेन भारत ।। ७० ।।
भारत! कोसलराजने भी पुरोहितका हितकारी वचन सुना और उन्होंने जैसा कहा, वैसा ही किया। इससे उन्होंने समस्त भूमण्डलपर विजय प्राप्त कर ली ।। ७० ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि अमात्यपरीक्षायां कालकवृक्षीयोपाख्याने द्वयशीतितमोऽध्यायः ।। ८२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें मन्त्रियोंकी परीक्षाके प्रसङ्गमें कालकवृक्षीय मुनिका उपाख्यानविषयक बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८२ ।।