महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 405)
राजा वेनके बाहु-मन्थनसे महाराज पृथुका प्राकट्य
'परंतप प्रभो! साथ ही यह प्रतिज्ञा करो कि 'ब्राह्मण मेरे लिये अदण्डनीय होंगे तथा मैं सम्पूर्ण जगत्के वर्णसंकरता और धर्मसंकरतासे बचाऊँगा' ।। १०८ ।।
वैन्यस्ततस्तानुवाच देवानृषिपुरोगमान् ।
ब्राह्मणा मे महाभागा नमस्याः पुरुषर्षभाः ।। १०९ ।।
तब वेनकुमारने उन देवताओं तथा उन अग्रवर्ती ऋषियोंसे कहा—'नरश्रेष्ठ महात्माओ! महाभाग ब्राह्मण मेरे लिये सदा वन्दनीय होंगे' ।। १०९ ।।
एवमस्त्विति वैन्यस्तु तैरुक्तो ब्रह्मवादिभिः ।
पुरोधाश्चाभवत् तस्य शुक्नो ब्रह्ममयो निधिः ।। ११० ।।
उनके ऐसा कहनेपर उन वेदवादी महर्षियोंने उनसे इस प्रकार कहा, 'एवमस्तु'। फिर शुक्राचार्य उनके पुरोहित हुए, जो वैदिक ज्ञानके भण्डार हैं ।। ११० ।।
मन्त्रिणो वालखिल्याश्च सारस्वत्यो गणस्तथा ।
महर्षिर्भगवान् गर्गस्तस्य सांवत्सरोऽभवत् ।। १११ ।।
वालखिल्यगण तथा सरस्वतीतटवर्ती महर्षियोंके समुदायने उनके मन्त्रीका कार्य सँभाला। महर्षि भगवान् गर्ग उनके दरबारके ज्योतिषी हुए ।। १११ ।।
आत्मनाष्टम इत्येव श्रुतिरेषा परा नृषु ।
उत्पन्नौ बन्दिनौ चास्य तत्पूर्वो सूतमागधौ ।। ११२ ।।
मनुष्योंमें यह लोकोक्ति प्रसिद्ध है कि स्वयं राजा पृथु भगवान् विष्णुसे आठवीं पीढ़ीमें थे*। उनके जन्मसे पहले ही सूत और मागध नामक दो बन्दी (स्तुतिपाठक) उत्पन्न हुए थे ।। ११२ ।।
तयोः प्रीतो ददौ राजा पृथुर्वैन्यः प्रतापवान् ।
अनूपदेशं सूताय मगधं मागधाय च ।। ११३ ।।
वेनके पुत्र प्रतापी राजा पृथुने उन दोनोंको प्रसन्न होकर पुरस्कार दिया। सूतको अनूप देश सागरतटवर्ती प्राप्त) और मागधको मगध देश प्रदान किया ।। ११३ ।।
समतां वसुधायाश्च स सम्यगुदपादयत् ।
वैषम्यं हि परं भूमेरासीदिति च नः श्रुतम् ।। ११४ ।।
सुना जाता है कि पृथुके समय यह पृथ्वी बहुत ऊँची-नीची थी। उन्होंने ही इसे भलीभाँति समतल बनाया था ।। ११४ ।।
मन्वन्तरेषु सर्वेषु विषमा जायते मही ।
उज्जहार ततो वैन्यः शिलाजालान् समन्ततः ।। ११५ ।।
धनुष्कोट्या महाराज तेन शैला विवर्धिताः ।
महाराज! सभी मन्वन्तरोंमें यह पृथ्वी ऊँची-नीची हो जाती है; उस समय वेनकुमार पृथुने धनुषकी कोटिद्वारा चारों ओरसे शिलासमूहोंको उखाड़ डाला और उन्हें एक स्थानपर संचित कर दिया; इसीलिये पर्वतोंकी लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई बढ़ गयी ॥ ११५ १/२ ॥
स विष्णुना च देवेन शक्रेण विबुधैः सह ॥ ११६ ॥
ऋषिभिश्च प्रजापालैर्ब्राह्मणैश्चाभिषेचितः ।
भगवान् विष्णु, देवताओंसहित इन्द्र, ऋषिसमूह, प्रजापतिगण तथा ब्राह्मणोंने पृथुका राजाके पदपर अभिषेक किया ॥ ११६ १/२ ॥
तं साक्षात् पृथिवी भेजे रत्नान्यादाय पाण्डव ॥ ११७ ॥
सागरः सरितां भर्ता हिमवांश्चाचलोत्तमः ।
शक्रश्च धनमक्षय्यं प्रादात् तस्मै युधिष्ठिर ॥ ११८ ॥
पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर! उस समय साक्षात् पृथिवी देवी रत्नोंकी भेंट लेकर उनकी सेवामें उपस्थित हुई थी। सरिताओंके स्वामी समुद्र, पर्वतोंमें श्रेष्ठ हिमवान् तथा देवराज इन्द्रने अक्षय धन समर्पित किया ॥ ११७-११८ ॥
रुक्मं चापि महामेरुः स्वयं कनकपर्वतः ।
यक्षराक्षसभर्ता च भगवान् नरवाहनः ॥ ११९ ॥
धर्मे चार्थे च कामे च समर्थं प्रददौ धनम् ।
सुवर्णमय पर्वत महामेरुने स्वयं आकर उन्हें सुवर्णकी राशि भेंट की। मनुष्योंपर सवारी करनेवाले यक्षराक्षसराज भगवान् कुबेरने भी उन्हें इतना धन दिया, जो उनके धर्म, अर्थ और कामका निर्वाह करनेके लिये पर्याप्त हो ॥ ११९ १/२ ॥
हया रथाश्च नागाश्च कोटिशः पुरुषास्तथा ॥ १२० ॥
प्रादुर्बभूवुर्वैन्यस्य चिन्तनादेव पाण्डव ।
पाण्डुनन्दन! वेनपुत्र पृथुके चिन्तन करते ही उनकी सेवामें घोड़े, रथ, हाथी और करोड़ों मनुष्य प्रकट हो गये ॥ १२० १/२ ॥
न जरा न च दुर्भिक्षं नाधयो व्याधयस्तथा ॥ १२१ ॥
सरीसृपेभ्यः स्तेनेभ्यो न चान्योन्यात् कदाचन ।
भयमुत्पद्यते तत्र तस्य राज्ञोऽभिरक्षणात् ॥ १२२ ॥
उनके राज्यमें किसीको बुढ़ापा, दुर्भिक्ष तथा आधि-व्याधिका कष्ट नहीं था। राजाकी ओरसे रक्षाकी समुचित व्यवस्था होनेके कारण वहाँ कभी किसीको सर्पों, चोरों तथा आपसके लोगोंसे भय नहीं प्राप्त होता था ॥
आपस्तस्तम्भिरे चास्य समुद्रमभियास्यतः ।
पर्वताश्च ददुर्मार्गं ध्वजभङ्गश्च नाभवत् ॥ १२३ ॥
जिस समय वे समुद्रमें होकर चलते थे, उस समय उसका जल स्थिर हो जाता था। पर्वत उन्हें रास्ता दे देते थे, उनके रथकी ध्वजा कभी टूटी नहीं ॥ १२३ ॥
तेनेयं पृथिवी दुग्धा सस्यानि दश सप्त च ।
यक्षराक्षसनागैश्चापीप्सितं यस्य यस्य यत् ॥ १२४ ॥
उन्होंने इस पृथ्वीसे सत्रह प्रकारके धान्योंका दोहन किया था, यक्षों, राक्षसों और नागोंमेंसे जिसको जो वस्तु अभीष्ट थी, वह उन्होंने पृथ्वीसे दुह ली थी ॥ १२४ ॥
तेन धर्मोत्तरश्चायं कृतो लोको महात्मना ।
रंजिताश्च प्रजाः सर्वास्तेन राजेति शब्द्यते ॥ १२५ ॥
उन महात्माने सम्पूर्ण जगत्में धर्मकी प्रधानता स्थापित कर दी थी। उन्होंने समस्त प्रजाओंका रंजन किया था; इसलिये वे ‘राजा’ कहलाते थे ॥ १२५ ॥
ब्राह्मणानां क्षतत्राणात् ततः क्षत्रिय उच्यते ।
प्रथिता धर्मतश्चेयं पृथिवी बहुभिः स्मृता ॥ १२६ ॥
ब्राह्मणोंको क्षतिसे बचानेके कारण वे क्षत्रिय कहे जाने लगे। उन्होंने धर्मके द्वारा इस भूमिको प्रथित किया—इसकी ख्याति बढ़ायी; इसलिये बहुसंख्यक मनुष्योंद्वारा यह ‘पृथ्वी’ कहलायी ॥ १२६ ॥
स्थापनं चाकरोद् विष्णुः स्वयमेव सनातनः ।
नातिवर्तिष्यते कश्चिद् राजंस्त्वामिति भारत ॥ १२७ ॥
भरतनन्दन! स्वयं सनातन भगवान् विष्णुने उनके लिये यह मर्यादा स्थापित की कि ‘राजन्! कोई भी तुम्हारी आज्ञाका उल्लंघन नहीं कर सकेगा’ ॥ १२७ ॥
तपसा भगवान् विष्णुराविवेश च भूमिपम् ।
देववन्नरदेवानां नमते यं जगन्नृपम् ॥ १२८ ॥
राजा पृथुकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् विष्णुने स्वयं उनके भीतर प्रवेश किया था। समस्त नरेशोंमेंसे राजा पृथुको ही यह सारा जगत् देवताके समान मस्तक झुकाता था ॥ १२८ ॥
दण्डनीत्या च सततं रक्षितव्यं नरेश्वर ।
नाधर्षयेत् तथा कश्चिच्चारनिष्पन्ददर्शनात् ॥ १२९ ॥
नरेश्वर! इसलिये तुम्हें गुप्तचर नियुक्त करके राज्यकी अवस्थापर दृष्टिपात करते हुए सदा दण्डनीतिके द्वारा सम्पूर्ण राष्ट्रकी रक्षा करनी चाहिये, जिससे कोई इसपर आक्रमण करनेका साहस न कर सके ॥ १२९ ॥
शुभं हि कर्म राजेन्द्र शुभत्वायोपकल्पते ।
आत्मना कारणैश्चैव समस्येह महीक्षितः ॥ १३० ॥
को हेतुर्यद् वशे तिष्ठेल्लोको दैवादृते गुणात् ।
राजेन्द्र! चित्त और क्रियाद्वारा समभाव रखनेवाले राजाका किया हुआ शुभ कर्म प्रजाके भलेके लिये ही होता है। उसके दैवी गुणके सिवा और क्या कारण हो सकता है, जिससे सारा देश उस एक ही व्यक्तिके अधीन रहे? ॥ १३० १/२ ॥
विष्णोर्ललाटात् कमलं सौवर्णमभवत् तदा ॥ १३१ ॥
श्रीः सम्भूता यतो देवी पत्नी धर्मस्य धीमतः ।
उस समय भगवान् विष्णुके ललाटसे एक सुवर्णमय कमल प्रकट हुआ, जिससे बुद्धिमान् धर्मकी पत्नी श्रीदेवीका प्रादुर्भाव हुआ ॥ १३१ १/२ ॥
श्रियः सकाशादर्थश्च जातो धर्मेण पाण्डव ॥ १३२ ॥
अथ धर्मस्तथैवार्थः श्रीश्च राज्ये प्रतिष्ठिता ।
पाण्डुनन्दन! धर्मके द्वारा श्रीदेवीसे अर्थकी उत्पत्ति हुई। तदनन्तर धर्म, अर्थ और श्री—तीनों ही राज्यमें प्रतिष्ठित हुए ॥ १३२ १/२ ॥
सुकृतस्य क्षयाच्चैव स्वर्लोकादेत्य मेदिनीम् ॥ १३३ ॥
पार्थिवो जायते तात दण्डनीतिविशारदः ।
तात! पुण्यका क्षय होनेपर मनुष्य स्वर्गलोकसे पृथिवीपर आता और दण्डनीतिविशारद राजाके रूपमें जन्म लेता है ॥ १३३ १/२ ॥
महत्त्वेन च संयुक्तो वैष्णवेन नरो भुवि ॥ १३४ ॥
बुद्ध्या भवति संयुक्तो माहात्म्यं चाधिगच्छति ।
वह मनुष्य इस भूतलपर भगवान् विष्णुकी महत्तासे युक्त तथा बुद्धिसम्पन्न हो विशेष माहात्म्य प्राप्त कर लेता है ॥ १३४ १/२ ॥
स्थापितं च ततो देवैर्न कश्चिदतिवर्तते ।
तिष्ठत्येकस्य च वशे तं चेदं न विधीयते ॥ १३५ ॥
तदनन्तर उसे देवताओंद्वारा राजाके पदपर स्थापित हुआ मानकर कोई भी उसकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं करता। यह सारा जगत् उस एक ही व्यक्तिके वशमें स्थित रहता है, उसके ऊपर यह जगत् अपना शासन नहीं चला सकता ॥ १३५ ॥
शुभं हि कर्म राजेन्द्र शुभत्वायोपकल्पते ।
तुल्यस्यैकस्य यस्यायं लोको वचसि तिष्ठते ॥ १३६ ॥
राजेन्द्र! शुभ कर्मका परिणाम शुभ ही होता है, कभी तो अन्य मनुष्योंके समान होनेपर भी एक-मात्र राजाकी आज्ञामें यह सारा जगत् स्थित रहता है ॥ १३६ ॥
योऽस्य वै मुखमद्राक्षीत् सौम्यं सोऽस्य वशानुगः ।
सुभगं चार्थवन्तं च रूपवन्तं च पश्यति ॥ १३७ ॥
जिसने राजाका सौम्य मुख देख लिया, वह उसके अधीन हो गया। प्रत्येक मनुष्य राजाको सौभाग्यशाली, धनवान् और रूपवान् देखता है ॥ १३७ ॥
महत्त्वात् तस्य दण्डस्य नीतिर्विस्पष्टलक्षणा ।
नयचारश्च विपुलॊ येन सर्वमिदं ततम् ॥ १३८ ॥
पूर्वोक्त दण्डकी महत्तासे ही स्पष्ट लक्षणोंवाली नीति तथा न्यायोचित आचारका अधिक प्रचार होता है, जिससे यह सारा जगत् व्याप्त है ॥ १३८ ॥
आगमश्च पुराणानां महर्षीणां च सम्भवः ।
तीर्थवंशश्च वंशश्च नक्षत्राणां युधिष्ठिर ॥ १३९ ॥
सकलं चातुराश्रम्यं चातुर्होत्रं तथैव च ।
चातुर्वर्ण्यं तथैवात्र चातुर्विद्यं च कीर्तितम् ॥ १४० ॥
युधिष्ठिर! पुराणशास्त्र, महर्षियोंकी उत्पत्ति, तीर्थ-समूह, नक्षत्रसमुदाय, ब्रह्मचर्य आदि चार आश्रम, होता आदि चार प्रकारके ऋत्विजोंसे सम्पन्न होनेवाले यज्ञकर्म, चारों वर्ण और चारों विद्याओंका पूर्वोक्त नीतिशास्त्रमें प्रतिपादन किया गया है ॥ १३९-१४० ॥
इतिहासाश्च वेदाश्च न्यायः कृत्स्नश्च वर्णितः ।
तपो ज्ञानमहिंसा च सत्यासत्येन यः परः ॥ १४१ ॥
वृद्धोपसेवा दानं च शौचमुत्थानमेव च ।
सर्वभूतानुकम्पा च सर्वमत्रोपवर्णितम् ॥ १४२ ॥
इतिहास, वेद, न्याय—इन सबका उसमें पूरा-पूरा वर्णन है। तप, ज्ञान, अहिंसाका तथा जो सत्य, असत्यसे परे है उसका और वृद्धजनोंकी सेवा, दान, शौच, उत्थान तथा समस्त प्राणियोंपर दया आदि सभी विषयोंका उस ग्रन्थमें वर्णन है ॥ १४१-१४२ ॥
भुवि चाधोगतं यच्च तच्च सर्वं समर्पितम् ।
तस्मिन् पैतामहे शास्त्रे पाण्डवैतन्न संशयः ॥ १४३ ॥
पाण्डुनन्दन! अधिक क्या कहा जाय? जो कुछ इस पृथ्वीपर है और जो इसके नीचे है, उस सबका ब्रह्माजीके पूर्वोक्त शास्त्रमें समावेश किया गया है, इसमें संशय नहीं है ॥ १४३ ॥
ततो जगति राजेन्द्र सततं शब्दितं बुधैः ।
देवाश्च नरदेवाश्च तुल्या इति विशाम्पते ॥ १४४ ॥
राजेन्द्र! प्रजानाथ! तबसे जगत्में विद्वानोंने सदाके लिये यह घोषणा कर दी है कि 'देव और नरदेव (राजा) दोनों समान हैं' ॥ १४४ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं महत्त्वं प्रति राजसु ।
कार्त्स्न्येन भरतश्रेष्ठ किमन्यदिह वर्तते ॥ १४५ ॥
भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार राजाओंका जो कुछ महत्त्व है, वह सब मैंने सम्पूर्ण रूपसे तुम्हें बता दिया। अब इस विषयमें तुम्हारे लिये और क्या जानना शेष रह गया है? ॥ १४५ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सूत्राध्याये एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सूत्राध्यायविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५९ ॥
* शत्रुपर चढ़ाई करनेके चार अवसर ये हैं—(१) अपने मित्रोंकी वृद्धि। (२) अपने कोशका भरपूर संग्रह। (३) शत्रुके मित्रोंका नाश। (४) शत्रुके कोशकी हानि।
* पहला शत्रु राजा, दूसरा मित्र राजा, तीसरा शत्रु का मित्र राजा, चौथा मित्रका मित्र राजा, पाँचवाँ शत्रुके मित्रका मित्र राजा, छठा अपने पृष्ठभागकी रक्षाके लिये स्वयं उपस्थित हुआ राजा, सातवाँ शत्रु की सहायता एवं पृष्ठपोषणके लिये स्वयं उपस्थित राजा, आठवाँ अपने पक्षमें बुलानेपर आया हुआ राजा, नवाँ शत्रुपक्षमें बुलानेपर आया हुआ राजा, दसवाँ स्वयं विजयाभिलाषी नरेश, ग्यारहवाँ अपने और शत्रु दोनोंकी ओरसे मध्यस्थ राजा, बारहवाँ सबसे अधिक शक्तिशाली एवं उदासीन राजा—ये द्वादश राजमण्डल कहे गये हैं।
१-विष्णु, २-विरजा, ३-कीर्तिमान्, ४-कर्दम, ५-अनङ्ग, ६-अतिबल, ७-वेन, ८-पृथु। इस प्रकार गणना करनेपर राजा पृथु भगवान् विष्णुसे आठवीं पीढ़ीमें ज्ञात होते हैं।