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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 1022)

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मरे हुए ब्राह्मण-बालकपर तथा गीध एवं गीदड़पर शङ्करजीकी कृपा

सदैव शकुनास्तात मृगाश्चाथ तथा गजाः ।
वसन्ति तव संहृष्टा मनोहर मनोहराः ॥ ११ ॥
‘तात! मनोहर वृक्षराज! तुम्हारी शाखाओंपर सदा ही बहुत-से पक्षी तथा नीचे अनेकानेक मृग एवं हाथी प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं ॥ ११ ॥

तव शाखा महाशाख स्कन्धांश्च विपुलांस्तथा ।
न वै प्रभग्नान् पश्यामि मारुतेन कथंचन ॥ १२ ॥
‘महान् शाखाओंसे सुशोभित वनस्पते! मैं देखता हूँ कि तुम्हारी शाखाओं और मोटे तनोंको वायुदेव भी किसी तरह तोड़ नहीं सके हैं ॥ १२ ॥

किं नु ते पवनस्तात प्रीतिमानथवा सुहृत् ।
त्वां रक्षति सदा येन वनेऽत्र पवनो ध्रुवम् ॥ १३ ॥
‘तात! क्या पवनदेव तुमसे किसी कारणवश विशेष प्रसन्न रहते हैं अथवा वे तुम्हारे सुहृद् हैं, जिससे इस वनमें सदा तुम्हारी निश्चितरूपसे रक्षा करते हैं ॥

भगवान् पवनः स्थानाद् वृक्षानुच्चावचानपि ।
पर्वतानां च शिखराण्याचालयति वेगवान् ॥ १४ ॥
‘भगवान् वायु इतने वेगशाली हैं कि छोटे-बड़े वृक्षोंको कौन कहे, पर्वतोंके शिखरोंको भी अपने स्थानसे हिला देते हैं ॥ १४ ॥

शोषयत्येव पातालं बहन् गन्धवहः शुचिः ।
सरांसि सरितश्चैव सागरांश्च तथैव च ॥ १५ ॥
‘गन्धवाही पवित्र पवन पाताल, सरोवर, सरिताओं और समुद्रोंको भी सुखा सकता है ॥ १५ ॥

संरक्षति त्वां पवनः सखित्वेन न संशयः ।
तस्मात् त्वं बहुशाखोऽपि पर्णवान् पुष्पवानपि ॥ १६ ॥
‘इसमें संदेह नहीं कि वायुदेव तुम्हें अपना मित्र माननेके कारण ही तुम्हारी रक्षा करते हैं; इसीलिये तुम अनेक शाखाओंसे सम्पन्न तथा पत्ते और पुष्पोंसे हरे-भरे हो ॥ १६ ॥

इदं च रमणीयं ते प्रतिभाति वनस्पते ।
यदिमे विहगास्तात रमन्ते मुदितास्त्वयि ॥ १७ ॥
‘तात वनस्पते! तुम्हारे पास यह बड़ा ही रमणीय दृश्य जान पड़ता है कि ये पक्षी तुम्हारी शाखाओंपर बड़े प्रसन्न रहकर रमण कर रहे हैं ॥ १७ ॥

एषां पृथक् समस्तानां श्रूयते मधुरस्वरः ।
पुष्पसम्मोदने काले वाशतां सुमनोहरम् ॥ १८ ॥
‘वसन्त ऋतुमें अत्यन्त मनोरम बोली बोलनेवाले इन पक्षियोंका अलग-अलग तथा सबका एक साथ बड़ा मधुर स्वर सुनायी पड़ता है ॥ १८ ॥

तथेमे गर्जिता नागाः स्वयूथकुलशोभिताः ।

घर्मार्तास्त्वां समासाद्य सुखं विन्दन्ति शाल्मले ।। १९ ।।
‘शाल्मले! अपने यूथकुलसे सुशोभित ये गर्जना करते हुए गजराज धूपसे पीड़ित हो तुम्हारे पास आकर सुख पाते हैं ।। १९ ।।
तथैव मृगजातीभिरन्याभिरभिशोभसे ।
तथा सर्वाधिवासैश्च शोभसे मेरुवद्द्रुम ।। २० ।।
‘वृक्षप्रवर! इसी प्रकार दूसरी-दूसरी जातिके पशु भी तुम्हारी शोभा बढ़ा रहे हैं। तुम सबके निवास-स्थान होनेके कारण मेरुपर्वतके समान सुशोभित होते हो ।। २० ।।
ब्राह्मणैश्च तपःसिद्धैस्तापसैः श्रमणैस्तथा ।
त्रिविष्टपसमं मन्ये तवायतनमेव हि ।। २१ ।।
‘तपस्यासे शुद्ध हुए तापसों, ब्राह्मणों तथा श्रमणोंसे संयुक्त हो तुम्हारा यह स्थान मुझे स्वर्गके समान जान पड़ता है’ ।। २१ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि पवनशाल्मलिसंवादे चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १५४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें वायु और शाल्मलिसंवादके प्रसंगमें एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५४ ।।