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क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

पृष्ठ १०४

१०४ क्षेमकुतूहलम्
ये मृगा विहगास्तोयदूरावासप्रचारकाः।
तेऽनभिष्यन्दिनः सर्वे विपरीता अतोऽन्यथा॥२१०॥
जलानूपभवाः सर्वे जलानूपचराश्च ये।
गुरुभक्ष्या गुरुतरं तेषां मांसमुदीरितम्॥२११॥
क. चेष्टावान् पशु-पक्षी का मांस गुण- हृद्य, रुच्य, लघु
ख. देह मध्य मांस गुण- प्राय, गुरु
ग. पक्षी (पंख) हिलाने (पशु-पक्षी) के कारण पक्षी- मांस उत्तम
घ. सर्वप्राणि अण्ड तथा ग्रीवा- गुरु
ङ. अजलीय पशु-पक्षी (निवास-विचरणकर्त्ता)- अनभिष्यन्दी
च. जल के निकटस्थ पशु-पक्षी का मांस- अभिष्यन्दी (पूर्व के विपरीत)
छ. जलीय प्रदेश- अल्प (निम्न) प्रदेशज तथा विचरणकर्त्ता प्राणियों का मांस-
अधिक गुरु (दुष्पाच्य)।
धान्योत्पत्तिप्रचाराणां लघु स्याल्लघुपक्षिणाम्।
ऊरुस्कन्धोदरं मूर्धा पादौ पाणी कटी तथा।
दृष्टित्वग्यकृदन्त्राणि गुरूण्याहुर्यथोत्तरम्॥२१२॥
ग्राम्यं मांसं वनजमथवाऽऽनूपजं वा बिलौकं
श्वेतं पीतं हरितमरुणं पाचितं सूपकारैः।
तल्यं शूल्यं सरसमधुरं स्वेदितं वाटितं वा
यस्य प्रायो यदभिरुचितं स्तूयते तेन तद्धि॥२१३॥
क. धान्योत्पत्तिदेशजश्चापि (विचरक) लघु पक्षी मांस- लघु
ख. प्राणियों के उरु, स्कन्ध, उदर, मूर्धा, पाद, हस्त, कटि, नेत्र, त्वक् (चर्म)
तथा यकृत एवं आन्त्र (का मांस)- उत्तरोत्तर गुरु
ग्राम्यज, वनज वा आनूपज, बिलौक (विलेशय) निवासी, श्वेत-पीत-हरित-अरुणवर्णीय
पशु-पक्षी के मांस को पाक करें। सूपकारों द्वारा विभिन्न प्रकार से तलित, शूल्य पक्व,
सरस, मधुर, स्वेदित या वाटित (वेष्टित) पर सिद्ध मांस- इनमें जो मांस उसकी रुचि
के अनुसार सुग्राह्य अभिलषित है, वह प्रायः उसी (भोक्ता) मांस की प्रशंसा (स्तुति)
करना स्वाभाविक है।।२१२-२१३।।


पृष्ठ १०५

षष्ठोत्सवः १०५
भक्तादिमांसपर्यन्तं सर्वमुक्तं मया भृशम्।
अथ मत्स्यभवा भक्ष्या उच्यन्ते सप्तमोत्सवे॥२१४॥
इति श्रीनरवैद्यमन्मथात्मजक्षेमशर्मविनिर्मिते क्षेमकुतूहले ग्रन्थे
मांसप्रशंसनो नाम षष्ठोत्सवः॥६॥
उपसंहारात्मक रूपरेखा
इस उत्सव (प्रकरण) के अन्तर्गत भक्त (भात) से मांस तक पाक की विधि तथा
गुणों का विवेचन मैंने किया है। आगामी सप्तम उत्सव (प्रकरण) में मत्स्यज भक्ष्य
पदार्थों के पाक (निर्माण) तथा गुणावली प्रस्तुत की जायेगी।।२१४।।
इति हिन्दी व्याख्या सहित क्षेमकुतूहल का षष्ठ उत्सव समाप्त॥

अथसप्तमोत्सवः

(सप्तम् प्रकरण)

अथ मत्स्यमांसप्रकार

मत्स्यखण्डानि संधृष्य क्षालयेत्प्रथमं जले।
ततो वेसनतक्राभ्यां बहुशः क्षालयेत्पुनः ॥ १ ॥

मत्स्य मांस निर्माण

मत्स्य (मछली) का साम्यक सघर्षण तथा खण्डित कर, जल से प्रक्षालन करते हैं, फिर वेसन (चणक्य सूक्ष्म चूर्ण) तथा तक्र (मट्ठा) क साथ बहुशः प्रक्षालन (धोते) करते हैं॥१॥

अथ गन्धनाशनम्

हरिद्राशुण्ठिधान्याककटुतैलैर्विमर्दयेत् ।
पक्षाल्य हिङ्गुना लिम्पेद् गन्धस्तेनोपशाम्यति ॥ २ ॥

मात्स्य गंध निवारण

प्रक्षालित मत्स्य मांस खण्डों को हरिद्रा- शुण्ठी-धान्यक-सर्षप तैल साथ विमर्दन करके, प्रक्षालन तथा हिंगु लेप का आवरण करें- इस क्रिया से मत्स्यगत गंध का शमन (निवारण/दमन) हो जाता है॥२॥

अथ मत्स्योत्तमरन्धनम्

तप्ततैले क्षिपेद्धान्यं कासमर्दं सहिङ्गकम्।
भृष्टं मत्स्यं सलवणं तक्रं क्षिप्त्वा पुनः पचेत् ॥ ३ ॥
अर्धपक्के क्षिपेदाप्रसिद्धचूर्णं सनागरम्।
दग्धं हिङ्गु विनिक्षिप्य साधयेन्मत्स्यमुत्तमम् ॥ ४॥

मत्स्योत्तमरन्थन (मत्स्य पाक विधि)

सुप्रक्षालित, गंधविहीन, खण्डशः (सुसंघर्षित) मत्स्य मांस की, संतप्त तैल में, धान्यक-कासमर्द (मसाला या छोंक), हिंगु भृष्ट के साथ करते (भूनते) हैं। इस मत्स्य को लवण सहित तक्र में पुनः पाक करते हैं, अर्धपक्ववान में, आम्र चूर्ण (अमचूर) शुण्टी चूर्ण मिला कर घृत संतप्त हिंगु डालकर, मत्स्य का पाक (सिद्ध) करते हैं॥३-४॥


सप्तमोत्सवः [पृष्ठ १०७]

अथ मत्स्यप्रलेहः

मांसप्रलेहवत्कार्यः प्रलेहो मत्स्यसंभवः ।
आदौ तैले खरे पक्वं सर्वमन्यद्धि पूर्ववत् ॥ ५॥
वर्णस्य करणे देयं पूर्वोक्तं द्रव्यकं हि यत् ।
उद्धूलनं सुगन्धाय दातव्यं पूर्वमीरितम् ॥ ६॥

मत्स्य प्रलेह

मांस प्रलेह के समान मत्स्य प्रलेह निर्माण विधि है, परन्तु मत्स्य खण्डों को खरपाक तैल में पाक कर लेते हैं (अन्य विधि मांस प्रलेह वत्) मत्स्य प्रलेह के वर्णीकरणार्थ, पूर्वोक्त द्रव्यों (वंकुम तथा रक्तचन्दन) का मिश्रण करते हैं, तथा सुगन्धित बनाने हेतु सुगन्धिद्रव्यों का उद् धूलन (चूर्ण) का संयोग कर देते हैं॥५-६॥

अथ मत्स्यखण्डप्रलेहः

सम्यक्पक्षालितं मत्स्यं वेसवारेण वेष्टितम्।
तत्तैले क्षिपेत्खण्डं हिङ्गुसैन्धवमिश्रितम् ॥ ७ ॥
प्रलेहविधिवत्साध्यो मत्स्यखण्डप्रलेहकः ।

मत्स्य खण्ड प्रलेह

सुपक्षालित मत्स्य मांस खण्ड के वेसकर से आवेष्टित कर, संतप्त तैल मे छोड़ते हैं, हिंगु तथा सैन्धव मिलाकर प्रलेह विधि से पाक करते हैं॥७ १/२॥

अथ मत्स्यपिष्टिका

गतत्वक्कण्टको मत्स्यो वेसवारेण संयुतः ॥ ८ ॥
शिलायां पेषितो भूयः प्रोच्यते मत्स्यपिष्टिका।
तैले विपाचयेत्पश्चाच्चतुर्थांशाम्लसंयुतम् ॥ ९ ॥
वेसवारेण च युतं शिलायां पेषयेत्पुनः ।
अनया पूर्ववत्कार्या मासस्येव प्रकारकाः ॥ १०॥
वटिका वटकाद्याश्च सूपकारधियोचिताः।

मत्स्यपिष्टिका
त्वक्-कण्टकरहित मत्स्य (खण्डों) को वेसवार मिश्रित कर, शिलापिष्ट करते
हैं, जिसे तैल में पाक कर होते हैं। फिर अम्लपदार्थ (चतुर्थांश) वेसवार (उपस्कार-
मसाला मिलाकर, पुनः शिला पर पीसकर, मत्स्यपिष्टिका से (पूर्ववत्) विभिन्न प्रकार
के पदार्थ- वटी, वटक आदि सूपकार (पाचक) की बुद्धि द्वारा निर्माण किए जा सकते
हैं। इसे मत्स्यपिष्टिका कहते हैं॥८-१०१/२॥
अथ मत्स्यपूरणम्
तक्रेण स्विन्नं मत्स्यस्य खण्डं प्रक्षाल्य पेषयेत् ॥ ११ ॥
बीजपूरार्द्रमरिचहिङ्गुसैन्धवजीरकैः ।
संयुक्तं कटुतैलाढ्ये घृते पक्त्वाऽथ चूर्णयेत् ॥ १२ ॥
मत्स्यपूरण
मत्स्य मांस खण्ड सुप्रक्षालित की शिलापिष्ट (पत्थर पर पीस कर लेते हैं, इसमें
बीजपूर- भृष्ट हिंगु-सैन्धव-जीरक का चूर्ण, कटुतैल या घृत में सिद्ध (पाक) करते हैं।
इसे मत्स्यपूरण कहते हैं॥११-१२॥
अथ मत्स्यपुटपाकः
गतत्वक्क्षालितं मत्स्यं कदलीपत्रवेष्टितम् ।
मृदा लिप्तं पुटे पक्वं संस्कृतं दाडिमादिना ॥ १३ ॥
वरो मत्स्यः पुटे पक्वो जीरतण्डुललेपितः ।
तविकायां पुनः पक्त्वा संमिश्रो मरिचादिना ॥ १४ ॥
मत्स्यपुटपाक
मत्स्य खण्ड-सुप्रक्षालित एवं चर्मरहित- कन्दली पत्र आवृत-मृत्तिका लेपित, को
पुटपाक यन्त्र में रखकर (पुटपाक विधि से पाक) करते हैं। तत्पश्चात् दाडिम स्वरस से
संस्कृत करते हैं। इस पुटपाक उत्तम मांस को जीरक तथा तण्डुल के कल्क से लेपित
करके, पुनः लविका (कटपार्क) में पुनः पाक करके, मरिच-शुंठी, हिंगु, सैंधव आने
(चूर्ण) का मिश्रण करके, पाक (सिद्ध) करते हैं॥१३-१४॥
अथ करालमत्स्यः
करालविधिना भृष्टं मुद्गपिष्टेन लेपितम्।
बृहन्मत्स्योदरातखण्डं रन्धयेत्तलनादिना ॥ १५ ॥
सप्तमोत्सवः १०९
मगरल मत्स्य
कराल विधि से भृष्ट बृहत् मत्स्य के उदर-खण्ड के मुद्ग पिष्टी में मिश्रित करके,
तलन-भर्जन-स्वेदन आदि विधियों के अनुसार सिद्ध (पाक) करते हैं- इसे 'मरगल
मत्स्य' पाक कहा जाता है॥१५॥
अथ रोहितः
रोहितोदरखण्डांश्च कासमर्देन मर्दिताः ।
कटुतैलपरिभ्रष्टा हिङ्गुसैन्धवयोजिताः ॥ १६ ॥
शकलं पिष्टसंभूतं रोहितं दधिमर्दितम् ।
वेसवारान्वितं पाच्यं प्रलेहविधिना भृशम् ॥ १७ ॥
रोहित मत्स्य
क. विधि- रोहित (रोहू) मत्स्य (मछली) उदर-खण्डों को कासर्मद (मसालाओं)
मर्दन करके, स्वर्ण तैल में भृष्ट करें तथा हिंगु-सैन्धव मिश्रित करें। इस द्रव्य का
दधि में मर्दित कर (उपस्कार-वेसवार) मिलाकर प्रलेह विधि से पाक कर लेते
हैं॥१६-१७॥
अथ गुणाः
रोहितस्योत्तमं देहं प्रलेहनावलेहितम् ।
सोऽश्नातीह नरः पूर्वजन्मवैनायको ध्रुवम् ॥ १८ ॥
रोहितः प्रवरो मत्स्यो नातिपित्तकरो गुरुः ।
वातहा पुष्टिदो हृद्यः स्निग्धः पथ्यो समीरिणाम् ॥ १९ ॥
गुण
रोहित मांस प्रलेह विधि (अवलेह) से भक्षण करने वाला मनुष्य, अवश्य
ही (पूर्वजन्म का) विनायक स्वरूप होता है, उत्तम रोहित मत्स्य नातिपित्तकर,
गुरु, वातघ्न, पुष्टिकार, हृद्य, स्निग्ध तथा वातज रुग्णों का पथ्य (हितकर)
है॥१८-१९॥
अथ पालाशिमत्स्यः
पालाशिखण्डं तिलतैलयुक्तं विपाचितं सैन्धवकासमर्दैः ।
हिङ्ग्वार्धधात्रीफलचूर्णकीर्णं नवं नवं रोचकमातनोति ॥ २० ॥
क्षे. कु. 8

११० क्षेमकुतूहलम्
पालाशिशर्बलदा वृष्या वातहा पित्तकृत्सरा।
गुर्वी कफकरा चोष्णा मेदः शुक्रविवर्धिनी ॥ २१ ॥
पलाश मत्स्य
क. विधि- मत्स्य (पलाशी) खण्डों को सैन्धव, कासमर्द (उपस्कार) के साथ,
तिल तैल में पाककरके, हिंगु-आर्द्रक-धात्रीपत्र फल चूर्ण मिश्रित करते हैं। यह
पलाशि मत्स्य (सिद्ध) पाक, नवरोचक होता है।
ख. गुण- यह बल्य, वातघ्न, पित्तजनन, सारक, गुरु, कफकारक, उष्ण, मेदा,
वीर्यवर्धक होती है॥२०-२१॥
अथ पाठीनः
पाठीनः खण्डितः शस्त्रैर्वेसवारसमन्वितः ।
कटुतैले परिभृष्टो हिङ्गुतक्रेण योजितः ॥ २२॥
पाठीनः कफकृद्बल्यो निद्रालुवार्त्तनाशनः ।
मांमाशी वातरक्तस्य कारकः शुक्रधारकः ॥ २३ ॥
पाठीन मत्स्य
क. विधि- पाठीन मत्स्य (मछली विशेष) शस्त्र द्वारा खण्डित, के वेसवार युक्त,
हिंगु-तक्र के साथ, सर्षपतैल पर पक्व करते हैं।
ख. गुण- कफकारक, बल्य तथा वातनाशका पाठीन मांस भोक्ता को वात-रक्त
कारक तथा वीर्यधारी होता हैं॥२२-२३॥
अथ मङ्गुरिका
मङ्गुरी मुण्डरहिता कटुतैले सुभर्जिता।
माणिमन्थनिशायुक्ता हिङ्गुना धूपिता च सा॥ २४॥
मङ्गुरी वातहा पथ्या रुच्या वृष्या बलप्रदा ।
अग्निसञ्जननी हृद्या तद्वदुक्ता च भृङ्गिका ॥ २५ ॥
मङ्गुरिका मत्स्य
क. विधि- मङ्गुरिका (मंगुरिका) मत्स्य का मुण्ड निष्कासित कर, सर्षण तैल में
भृष्ट करके, लवण-हरिद्रा चूर्ण-हिंगु धूपित करते हैं।
ख. गुण- यह विशिष्ट मत्स्य वातनाशक, मध्य, रुचिकर, वृष्य, बल्य, अग्निदीपन
तथा हृद्य होती है। यही सिगी मत्स्य का गुण हैं॥२४-२५॥


सप्तमोत्सवः १११
अथ गुण्डी
पुच्छशीर्षेण रहिता कासमर्दविमर्दिता।
हिङ्गुतैले च संतप्ता गुण्डीमत्स्यस्य खण्डकाः ॥ २६ ॥
गुण्डी वातहरा बल्या वृष्या पथ्याऽग्निवर्धिनी ।
सुरुच्या शुक्रदाऽत्यर्थं किञ्चित्कफकरा सरा ॥ २७ ॥
गुण्डी मत्स्य
क. विधि- मुण्डी मत्स्य को पुच्छ-शीर्ष रहित अवस्था में, कासमदि (मसाला-
वेसवार) मर्दन करते हैं, हिंगु से भृष्ट कर संतप्त तैल में भृष्ट करें- यह गुण्डी
मत्स्य का खण्ड होता है।
ख. गुण- वातनाशक बल्य, वृष्य, पथ्य, अग्निदीपन,, सुरुचिकर, शुक्रप्रद,
अल्पपित्तकर तथा सारक॥२६-२७॥
अथ मत्स्यमण्डकम्
मत्स्यस्य पिष्टिकां कृत्वा पर्णस्थां मण्डलाकृतिम्।
आधारेण समुत्स्विन्ना संयुक्ता धूलनेन तु ॥ २८ ॥
मत्स्यमण्डक
मत्स्य पिष्टी पत्र में रखकर, मण्डलाकृति बनायें तथा आधार काष्ठ पर रखकर
स्वेदन करते है, फिर उद्वूलन चूर्ण मिश्रण करते हैं॥२८॥
अथ मत्स्येण्डरी
कासमर्दीचूर्णेन मत्स्यपिष्टीं नियोजिताम्।
भर्जितां कटुतैलेन कुर्यान्मत्स्येण्डरी च सा ॥ २९ ॥
मत्स्येण्डरी
कासमर्द (वेसवार-मसाला) के साथ मत्स्य (मछली) पिष्टी (पीठी) को सर्षप तैल
में भर्जित करते (भून लेते) है। इस पाक को 'मत्स्येण्डरी' नाम है॥२९॥
अथ सूक्ष्ममत्स्याः
भर्जितास्तिलतैलेन सर्वसंभारसंभृताः।
सूक्ष्ममत्स्याः स्वादुरसा दोषत्रयनिबर्हणाः ॥ ३० ॥
परं सूक्ष्मास्तु ये तेषु सर्वे ते पुंस्त्वनाशनाः ।

[पृष्ठ ११२]

११२ क्षेमकुतूहलम्
सूक्ष्म मत्स्य
क. विधि- सूक्ष्म मत्स्य (छोटी मछलियों) को तिल तेल में भर्जित कर, संभार
(मसाला) आदि मिश्रित करके पाक करते है।
ख. गुण- मधुर रस तथा त्रिदोषनाशक। अतिसूक्ष्म मत्स्य पुंसरण को हानि-
कारक॥३०-१/२॥
अथ मत्स्यसामान्यगुणाः
मत्स्या बलप्रदा वृष्या गुरवः कफपित्तलाः ॥ ३१ ॥
उष्णाभिष्यन्दिनः स्निग्धा बृंहणाः पवनापहाः ।
ह्रदोद्भवा बलकरा न तु स्वल्पजलोद्भवाः ॥ ३२ ॥
हेमन्ते कूपजा मत्स्याः शिशिरे सारसा हिताः ।
मधौ ग्रीष्मे च काले च नदीचौण्ड्यतडागजाः ॥ ३३ ॥
शरत्सु नैर्झराः सर्वे वर्षोत्थाः सर्वदोषदाः ।
विभिन्न प्रकार की मत्स्य के सामान्य गुण-कर्म
मत्स्य (मछलियों) के विभिन्न भेद, जाति एवं उनके पाक (पूर्वोक्त) के विभिन्न
गुण-कर्म तथा आमयिक प्रयोगों का सामान्यतः (साररूप) वर्णन प्रस्तुत है-
क. बल्य, वृष्य, गुरु, कफपित्तकारक, उष्ण, अभिष्यन्दी, स्निग्ध, बृंहण (मांसजनन)
तथा वातनाशक- मत्स्य के सामान्य गुण।
ख. अगाध (गहरे) जल के मत्स्य बलकारक, अल्प (कम गहरे) जलाशय के मत्स्य
गुणवान् नहीं होते।
ग. हेमन्त ऋतु जन्य कूपजल मत्स्य, शिशिर ऋतु जन्य सारस (तालाब) मत्स्य,
वसन्त-ग्रीष्मऋतु जन्य नदी, पौण्ड्य तथा तडाग (तालाब) के मत्स्य तथा
शरदऋतु जन्य नैर्झर (झरने) मत्स्य हितकर।
घ. वर्षाऋतु जन्य सर्वप्रकार के मत्स्य सर्वदोष प्रद॥३१-३३१/२॥
मांसस्य बहुधा प्रोक्ताः प्रकारा रथने बुधैः।
सूपकाधिया कृत्वा मत्स्यस्य च ततोऽधिकाः ॥ ३४ ॥
मांस के विविध प्रकार-
विद्वान (पाक विद्या के ज्ञाताओं) ने मांसपाक (सिद्ध) करने के अनेक रूप


[पृष्ठ ११३]

सप्तमोत्सवः ११३
प्रकार, पाचक (सूपकार) स्वबुद्धि (ज्ञान-अनुभवानुसार) के आधार पर निर्देश किया हैं,
उससे भी अधिक मत्स्य पाकों का उल्लेख किया गया है॥३४॥
ओदनादि हि पयोन्तभोजनं मत्स्यमांसजनितं च यच्छ्रुतम्।
नाद्यभोजनयतेर्विमन्त्रणे तत्कथं खलु मयाऽनुर्णितम् ॥ ३५ ॥
श्रुत भोजनातिरिक्त पाक
भात (ओदन) से पयोन्तभोजन, मत्स्य एवं मांस से निर्मित होने वाले भोजन के
प्रकार, जो कुछ श्रुत (सुना भी-लेखक द्वारा), जो वर्तमान के भोजन सामग्री (प्रकरण)
में समावेश नहीं होते हैं, फिर भी उनका (मैंने) किसी प्रकार वर्णन करने का प्रयास
किया है॥३५॥
मत्स्यमांसभवः पाको मयोक्तः सप्तमोत्सवे।
षड्विधानां तु शाकानां प्रकारस्तदनूच्यते ॥ ३६ ॥
इति श्रीनरवैद्यमन्मथात्मजक्षेमशर्माविनिर्मिते क्षेमकुतूहले ग्रन्थे
मत्स्यमांसप्रशंसनो नाम सप्तमोत्सवः॥७॥
उपसंहारात्मक रूपरेखा
मैने (लेखक ने) सप्तम उत्सव (समापनावन सत्र) में मत्स्य तथा मांस से निर्मित
अनेक प्रकार के पाक (व्यंजनों) का वर्णन कर दिया है, अब आगे अष्टम उत्सव में
षड्विध (छह प्रकार) शाकों के निर्माण विधि के विवरण का विषय प्रतिफल है॥३६॥
इति हिन्दी व्याख्या सहित क्षेमकुतूहल का मांसपाक
वर्णन नामक सप्तम उत्सव समाप्त॥

अथाष्टमोत्सवः
(अष्टम् प्रकरण)
अथ शाकप्रकारः
पत्रं पुष्पं फलं नालं कन्दं मूलं तथैव च।
शाकं षड्विधमुद्दिष्टं गुरुं विद्याद्यथोत्तरम्॥१॥
शाक के भेद
शाक छह प्रकार के होते हैं, जिनके स्रोत सहित नाम इस प्रकार हैं- इन रसों
में उत्तरोत्तर गुरु (गरिष्ठ-विष्टम्भी-दुष्पाच्य) होत हैं-
१. पत्रशाक, २. पुष्पशाक, ३. फलशाक, ४. नालशाक, ५. कन्दशाक,
६. मूलशाक॥१॥
अथातः पत्रशाकस्य सामान्यतलने विधिः।
ततोऽन्येषां च वक्तव्यः प्रलेहादेरपि क्रमः॥२॥
हिङ्गुजीरयुते तैले क्षिपेच्छाकं सुशोभितम्।
लवणं चाम्रचूर्णादि सिद्धे हिङ्गूद्कं क्षिपेत्॥३॥
इत्येवं सर्वशाकानां तलने क्वथने विधिः।
पत्रशाक
इसके बाद पत्रशाक की सामान्य पाक विधि (तलने की क्रिया) वर्णन की
जायेगी; तथा उसके बाद अन्य शाको का पाक की विधि का उल्लेख किया जायेगा,
जिसमे प्रलेहादि समाविष्ट होता है।
शाक का भलीप्रकार प्रक्षालन करते हैं, तथा संतप्त तैल में हिंगु तथा जीरक से
भर्जित कर देते हैं, फिर लवण एवं आम्रचूर्ण (आमचूर) आदि अम्ल पदार्थ मिश्रित कर
देते हैं। यह द्रव्य सिद्ध (पका) हो जाने पर, हिंगूजल डालते हैं। यह समस्त प्रकार के
पत्रशाक का पाक करने की सामान्य विधि (तल-स्विन्न-सिद्ध) होती है॥२-३१/२॥
अथाष्टमोत्सवः १२५
वास्तुकं काकमाची च तण्डुलीयं पुनर्नवा॥४॥
चुञ्चुकं नालिका पाठा पच्यन्तेऽम्लेन तद्बुधैः।
वास्तुक, काकमाची, तण्डलीय, पुनर्नवा, चुञ्चुक, नालिका एवं पाठा- इन
समस्त शाक द्रव्यों के बुद्धिमानों द्वारा अम्लरस के साथ पाक किए जाते हैं।
कासमदों मेथिका, प्रफुन्नाट एवं चणक- इनका शाक अम्ल रहित जल में
मिश्रित कर, विद्वानगण इन द्रव्यों से शाक का भलीप्रकार से पाक करते हैं। इसी प्रकार
वृन्ताक, कूष्माण्ड, पटोल आदि फलों के तलन की विधि का अनुकरण करना
चाहिए॥४१/२॥
कासमर्दी च मेथी च पुन्नाटं चणकोद्भवम्॥५॥
रसार्द्रं त्वम्लरहितं पक्वं सम्यग्विचक्षणैः।
एवं वार्त्ताककूष्माण्डपटोलादिफलेष्वपि॥६॥
तलने विधिरुद्दिष्टो विशेषो यः स उच्यते।
तप्ततैले क्षिपेच्छाकं वास्तुकादिसुखण्डितम्॥७॥
लवणं तोयमल्पं च क्षिप्तं सिद्धेऽर्धमात्रकम्।
सधान्यवेशनं तक्रे गालितं क्वथितं क्षिपेत्॥८॥
ततः शुण्ठीं जीरकं च हिङ्गुं दत्त्वाऽवतारयेत्।
इत्थमेवापरस्यापि वर्णस्य करणे यदि॥९॥
तत्सर्वं स्वेच्छया देयं वर्णकृत्प्रथमं स्मृतम्।
सर्वशाक सामान्यतः विधि
फल शाक के तलने की विशेषता है। वास्तुक आदि शाकों को स्वच्छकर, भली
प्रकार काट लेते हैं, इसे संतप्त तैल में थोड़ाकर, लवण तथा अल्प जल मिला देते
हैं। अर्धपक्व हो जाने पर, धान्यक के साथ, बेसन को तक्र के साथ मिलते हैं तथा पाक
करते हैं। तदनन्तर, शुंठी, जीरक तथा भृष्ट हिंगु मिश्रित कर, अग्नि से उतार लेते हैं।
इसी प्रकार अन्य शाकों को उपर्युक्त विधि से, वर्णकारक इन सभी पदार्थों को
स्वेच्छानुसार छोड़ दिया करते हैं॥५-९१/२॥
एवं यत्कठिनं शाकं कषायं कटुतिक्तकम्॥१०॥
तदुत्स्वेद्याम्बुना पूर्वं तक्रेण तदनन्तरम्।
तप्ततैले विनिक्षिप्य रन्धयेच्च यथेच्छया॥११॥

११६ क्षेमकुतूहलम्
अन्य शाक-विधि
इस प्रकार कठिन, कषाय, कटु एवं तिक्त रस प्रधानशाकों को जल के साथ
स्वेदन (स्वित्र) करके, पुनः तक्र के साथ विदल करते हैं ग्रथा फिर सन्तृप्त तैल में
डालकर स्वेच्छा से शाक का निर्माण (पाक) करते हैं॥१०-११॥
अथ वृन्ताकम्
सर्वासां शाकजातीनां वृन्ताकं शाकनायकम्।
अतः शाकक्रमं त्यक्त्वा प्रथमं नायकं वदेत् ॥ १२॥
भोजनं धिगवृन्ताकं वृन्ताकं धिगवृन्तकम्।
सवृन्तं धिगतैलाढ्यं तैलाढ्यं धिगरामठम् ॥ १३ ॥
फल शाक
वृन्ताक
सर्वप्रकार के शाक जातियों (प्रकार-भेद) में वृन्ताक बैगन/बैंगन) का शाक उत्तम
(श्रेष्ठ) है इसीलिए इसको 'शाकनायक' कहा गया है (सर्वेसां शाकजातीनां वृन्ताकं
शाकनात्रकम्)। इस करण, शाक-क्रम की उपेक्षा करके, सर्वप्रथम फलशाक के रूप में
वृन्ताक के फलशाक पर प्रकाश डालते है।
महत्ता
'वृन्ताक' का व्यंगात्मक वैशिष्ट्य निरूपित है- वृन्ताकरहित भोजन को धिक्कार
हैं (भोजनं धिगवृन्ताकं' आदि), वृन्तरहित वृन्ताक के धिक्कार है; अति तैल रहित
वृन्तयुक्त वृन्ताक को धिक्कार है, अधिक तैल युक्त वृन्तसहित वृन्ताक हिंगु रहित होने
के स्थिति में धिक्कार की श्रेणी में परिगणित होता है- अर्थात् वृन्ताक को 'धिक्कार'
की अवस्था मे ले जाने वाली सभी स्थितियों की बहिर्ष्क्रमण अथवा पूर्ति आवश्यक
है (जिससे वृन्ताक की गुणवत्ता से पूर्णतया स्वाभाविक कोटि में अवस्थित किया जा
सके)॥१२-१३॥
वार्त्ताकं कलितं सुवृन्तसहितं संस्वेदितं काजिके
शुद्धेऽम्ले घृतधान्यकार्द्रक निशासंपर्किनं पाचितम्।
सक्षारं मरिचावचूर्णितमथो तैलेन हिङ्ग्वा लस-
द्वासं दारुमयेऽपि पुंसि कुरुते घ्रातं क्षुधाबोधनम् ॥ १४॥


अथाष्टमोत्सवः ११७
शाकपाक : विविध प्रकार
वृन्ताक (फल) को सवृन्त (भेंटी सहित-फलवृन्त के साथ) काटकर, कांजिक
एवं शुद्ध अम्लपदार्थ से स्वेदित करके, घृत-धान्यक-आर्द्रव-हरिद्रा का चूर्ण मिश्रित
करके पाक करते हैं, फिर भृष्टहिंगु (भुनी हींग) सुगन्धित कर तैल में डालते हैं। इस
रीति से पक्व (सिद्ध) वृन्ताक शाक की केवल गन्ध (घ्रातं क्षुधाबोधनम्) से काष्ठ-
निर्मित पुरुष (दारुमयेऽपि पुंसि) को भी भूख लग जाती है (क्षुधाबोधनम्)॥१४॥
वृन्ताकखण्डा यदि तेऽत्र संवृतस्तैलप्लुता हिङ्गुरसेन युक्ताः।
मरीचधूलीपरिधूसराङ्गा भवन्ति पुण्योदयराजपुंसाम् ॥ १५ ॥
वृन्ताक फल खण्डों को तैल में हिंगु रस में भृष्ट (भूनकर), मरिच चूर्ण मिश्रित
कर पक्व (सिद्ध) किया शाक, पुण्यवान् राजाओं को भाग्य से प्राप्त करता है॥१५॥
हरितं त्वामवार्ताकं कटुतैले सरामठे।
सिद्धं मरिचसंबद्धं कोष्णमेतद्रुचिप्रदम् ॥ १६ ॥
हरित वर्णिय वृन्ताक को हिंगु में भृष्ट कर, सर्षप तैल में पाक (सिद्ध) कर लेते
हैं, फिर मरिच चूर्ण का मिश्रण करते हैं। इस विधि से पक्व वृन्ताक शाक, कोष्ण
(अल्पगर्म) शाक रुचिकारक (रुचिप्रदम्) प्रभाव करता है॥१६॥
वार्त्ताककर्तला लिप्ताः शुण्ठीधान्यकजीरकैः।
घृते भृष्टाः समरिचा हिङ्ग्धूपेन धूपिताः ॥ १७॥
वृन्ताक फल खण्डों को शुण्ठी-धान्यक-मीरक से (पूर्ण रूप में) लेपन करके,
घृत में भृष्ट करके मरिच चूर्ण मिश्रित करते हैं, फिर हिंगु धूम से सुगन्धित करें। वह
शाक रुचिवर्धन करता है॥१७॥
सवृन्तवृन्ताकतूरीयखण्डं सरामठं तप्तघृते सुपाचितम्।
ससैन्धवं चुक्रकसाकसंयुतं सगोलिकं पूर्वजपुण्यदापितम् ॥ १८ ॥
सवृन्त वृन्ताक के सु (तुरीय) खण्डो को, हिंगु युक्त संतृप्त घृत में पक्व, सैन्धन
एवं चुक्रशाक से युक्त शाक की उपलब्धि, पूर्वजन्म के पुण्यकर्म का द्योतक है। (अर्थात्
पूर्वसुकर्मों के फलस्वरूप वृन्ताक का इस प्रकार का समतल होता है)॥१८॥
वृन्ताकं वृन्तसहितं कृत्तं बाहिकसंयुतम्।
पक्वमाघ्रियुतं स्वाज्ये ललिजिह्वान्तरे स्थितम् ॥ १९ ॥

११८ क्षेमकुतूहलम्
सवृन्त वृन्ताक खण्ड, हिंगु तथा आम्रपूर्ण (पक्वा) युक्त, घृत में पक्व शाक की
जिह्वा मे स्थिति होती है (अर्थात् सुन्दर-सौभाग्यवनती जिह्वा को इस प्रकार का शाक
रसास्वादन हेतु उपलब्ध (प्राप्त) होता है।।१९।।
प्रभृष्टतण्डुलसमीकृतनालिकेर-
पिष्टैः सहैव मरिचेन समेलकेन।
वार्त्ताकमुत्तमघृतैरनुपाचितं यत्
सिन्धूदरानलमिवानलमातनोति ॥ २०॥
प्रभृष्ट तण्डुल (भून तण्डुल चूर्ण), नारिकेल पिष्टी, मरिच चूर्ण- मिश्रण का घृत
मे पक्व वृन्ताक शाक का सेवन, समुद्रगत अस्थि (वाडवाग्नि) के समान पावकाग्नि
का दीपन करती है॥२०॥
स्विन्नार्धवृन्तवृन्ताकं कर्पूरण विपाचितम्।
जीराज्यवेसवारार्थ्यमाप्तवर्गैः सहाशितम् ॥ २१॥
अर्धवन्त सहित स्वेदन किया वृन्ताक का शाक, कर्पूर के साथ पक्व, जीरक-
घृत-वेसवार मिश्रित करके बनाते हैं। यह शाक आप्त जन (आत्मीय बन्धु बांधनों) के
साथ खाद्य योग्य है॥२१॥
वृन्ताकं फलमादृतं सुकलितं शस्त्रेण तद्वारिणि
क्षिप्तं तैलविपाचितं नवदलं जम्बीरनीरान्वितम्।
हिङ्ग्वार्द्रेण सुवासितं बहुरसं सिन्धूत्थसंथूलितं
भोक्त्रा केन न निन्दितं बहुगुणं सौधं जलं दुर्लभम् ॥ २२॥
अति रसयुक्त वृन्ताक शाक सिद्ध विधान
आदर के पात्र (सम्मतित) वृन्ताक फल को शस्त्र (चाकू-छूरी आदि) से सुकलित
(काटकर) जल में प्लावित करें, तथा उसका तैल में पक्व करें। फिर जम्बीर नीर।
जम्बीरी नींबू का स्वरस) में, हिंगु-आर्द्रक से सुगन्धित करके, सैंधव चूर्ण डालते हैं।
इस प्रकार वृन्ताक के सरस शाक भक्षण करने वाला कौन ऐसा है, जो अतिगुणवान्
दुर्लभ के अमृत के जल को भी स्वय देता है अर्थात् भोक्ता अमृज जल को भी निन्दित
मान लेता है॥२२॥
अकृत्तवृन्तं वृन्ताकं चतुर्धार्धस्य खण्डितम्।
वेसवारोषणाहिङ्गतक्रक्वाथेन पाचितम् ॥ २३॥
अथाष्टमोत्सवः ११९
अङ्गारपक्वं वार्त्ताकं क्षोदितं घृतयोजितम्।
सैन्धवभृष्टबाहीके धूपितं स्याद्भटित्रिकम् ॥ २४॥
त्वग्वन्तगतवृन्ताक पुटपाकेन पाचितम्।
सैन्धवेनाज्यहिङ्गुभ्यां मिश्रितं रुचिकारकम् ॥ २५॥
क. अवृत्तवृत्तं वृन्ताक शाकम्-वृन्त सहित (बिना काटे डंगल या मेंटी) वृन्ताक के
अर्धभाग के चार खण्ड, वेसवार (मसाला) सहित, हिंगु तथा तक्र क्वाथ के
साथ पाक किया जाता है।
ख. अङ्गारपाचित-भटित्रिक वृन्ताक शाकम्- अग्नि ज्वला (अंगार) पकाये
वृन्ताक (बैगन) को मसलकर (क्षोदित) कर घृत का मिश्रण करते है, फिर
सैन्धव तथा हिंगु डालकर सुगन्धित बना लेते हैं। इस प्रकार के पक्व शाक को
'भटित्रिक' संज्ञा दी गयी है।
ग. त्वग्वृन्त सहित वृन्ताक शाकम्- वृन्ताक (फल) के वृन्त (डंगल) तथा त्वक्
(छिलका) रहित फलकी पुटपाक विधि से पक्व शाक में, सैंधव घृत-हिंगु (भुनी
हुई) मिश्रित कर देते हैं।
यह वृन्ताक (विशिष्ट) का शाक रुचि का वर्धन करता है॥२४-२५॥
सुस्विन्नवृन्ताकफलं भृशाग्निना
संक्षोदितं तन्तु न नालवर्जितम्।
सुवासितं राजिकसैन्धवान्वितं
विमर्द्य दध्ना परिवेष्टितं ध्रुवम्॥ २६॥
स्वेदित वृन्ताक- वृन्ताक फल तीव्र अग्नि (अंगार) से सुस्वेदित करके, फल
का मर्दन (शोधित) करके (नालरहित)- वृन्ताक शाक (बैगन का भरता-भर्ता)-
सुगन्धित, राजिका-सैन्धव युक्त, दही मर्दन करके, परिवेष्टित किया हुआ शाक बनाते
हैं। विशेषतया अवश्य हो रुचि संजनन देता है॥२६॥
निर्धूमानलपाचितमानं वार्त्ताकमुज्झितं बीजैः।
आर्द्रकनिम्बुकसैन्धवस्नेहैरालोडितं रुचिं धत्ते॥ २७॥
वृन्ताक (फल बीज) निष्कासित बीज रहित वृन्ताक शाक को निर्धूम अग्नि मे
पक्व, आर्द्रक-निम्बूक-सैन्धव-घृत मिश्रित कहते है। यह शाक रुचि वर्धक होता
है॥२७॥

१२० क्षेमकुतूहलम्
वृन्ताकं स्वादतिक्तोष्णं कटुपाके च पित्तलम्।
रुच्यं वाताहरं हृद्यं दीपनं शुक्रलं लघु ॥ २८ ॥
कृष्ण वृन्ताक फल शाक
स्वादु, तिक्त, उष्ण, कटुपाकी, पित्तकारक रोचक (रुचिवर्धन), वातनाशक,
हृद्य, दीपन, शुक्रल एवं लघु॥२८॥
अपरं श्वेतवार्ताकं कुक्कुटाण्डोपमं फलम्।
कृष्णाद्धीनगुणंकिंचिदर्शसां नाशनं परम्॥ २९ ॥
श्वेत वृन्ताक फल शाक
अपर श्वेत वृन्ताक फल (कुक्कुटोपम-मुर्गी के अंडे के समान रंग कुछ कम
काला), अल्प गुणवान् तथा अर्शनाशक॥२९॥
वह्नेर्दीप्तिकरं परं रुचिकरं गुल्मापहं पाचनं
प्लीहानं च शिरोरुजं विजयते जीर्णज्वरं कामलाम्।
हन्याद्धातकफामरोगनिचयं मूत्रग्रहं साश्मरीं
वृन्ताको मृदुवह्निना सुपचितः पुंभिः सदा सेव्यते ॥ ३० ॥
मन्दाग्नि पक्व वृन्ताक शाक
मन्द (हल्की) अग्नि में पक्व वृन्ताक शाक, अग्निदीपन, रुचिकर, गुल्माघ्न,
पाचक, प्लीहा-शिरःशूल-जीर्णज्वर-कामला-कफ-आमरोग-मूत्रग्रह-अश्मरी, विशेषतया
पुरुषों द्वारा भक्षण योग्य (हितकर)॥३०॥
दलितं तलितं सरामठं नवबिम्बीफलमात्तसैन्धवम्।
मरिचोद्भवचूर्णसंयुतं घृतपाकेन करोति रोचनम् ॥ ३१ ॥
विम्बफल शाक
बिम्बी फल (कुन्दुरु) के फल को कर्तन (खण्ड) कर (दलित), हिंगु के साथ तल
कर (तलित), सैंधव तथा मरिच चूर्ण डालकर-घृत के साथ पक्व शाक तैयार करते हैं।
यह रुचिवर्धन होता है॥३१॥
बिम्बीफलं सकलमेव घृते निधाय
तप्ते ससैन्धवमिदं मुहुरुत्क्षिपेच्च।
अथाष्टमोत्सवः १२१
सोपस्करं कथितमत्र निधाय तक्रं
वाघारयेदति च दीपनमेव वह्नेः ॥ ३२ ॥
विम्बीफल शाक
सम्पूर्ण विम्बी फल (शाक बनाने हेतु) संतृप्त घृत में डाल देते हैं, फिर सैंधव
मिलाकर चलाते हैं, तथा बाद में उपस्कार (मसाला रहित) युक्त तक्र डालकर, छौंक
(वाघारयेदति-वघार) लगा देते हैं। यह शाक अग्निदीपन करता है॥३२॥
बिम्बीफलार्धकलितं हिङ्गुसैन्धवमिश्रितम्।
प्रलेहविधिना पाच्यं परिवृत्य छमत्कृतम् ॥ ३३ ॥
विम्बी प्रलेह
विम्बी फलार्ध (आधे-आधे टुकड़ों) को हिंगु-सैंधव मिलाकर, दर्वीचालन करते
हुये (क्षमकृत-छौंककर), प्रलेह विधि के अनुसार पाक करते हैं॥३३॥
अङ्गारभर्जितं बिम्बीफलं संक्षोदितं करैः।
दधिहिङ्गुघृते न्यस्तं सक्षारं रुचिकारकम् ॥ ३४ ॥
अङ्गारभर्जित विम्बी फलशाक
विम्बी फलों को अग्नि ज्वाल (अंगारों) पर अर्जित (भूनकर), हाथों से मसल
देते हैं (संशोधित करे), फिर दधि-भृष्ट हिंगु-घृत-लवण शाक में मिश्रित कर देते हैं।
यह विम्बी का भर्तृ (भरता/रूपी शाक सक्षार तथा भोजन में रुचिकर होता है॥३४॥
तिर्यग्वा खण्डितं चार्धस्विन्नं बिम्बीफलं भृशम्।
दधिराजिकया युक्तं सैन्धवेनानुमिश्रितम् ॥ ३५ ॥
विम्बी रायता
विम्बी फलों को तिर्यक खण्डित (तिरछा काटकर, अर्धस्वेदन (अर्धपक्व)
करके, दधि, राजिका तथा सैंधव मिश्रित करते हैं। इस तरह रायता का निर्माण होता
है॥३५॥
बिम्बीफलं स्वादु शीतं रक्तपित्तप्रणाशनम्।
स्तम्भनं लेखनं चातिविबन्धाध्मानकारकम् ॥ ३६ ॥
विम्बी फल स्वादु, शीत, रक्तपित्त शामक, स्तम्भन, लेखन, निबन्ध तथा
आध्मानकार होता है॥३६॥

१२२ क्षेमकुतूहलम्
अथ शिम्बी
नैष्पावकं सुदलितं नवबीजकोशं
तप्तेन हिङ्गुजकणेन ससैन्धवेन।
प्रभ्रष्टकल्पतिलतैलकृतप्रबोधं
मान्द्यं हरेच्च जठरान्तरवर्तिवह्नेः॥ ३७॥
बिम्बी फल गुण-कर्म (सामान्य)
१. स्वादु (मधुर) २. शीत (शीतल)
३. रक्तपित्तशामक ४. स्तम्भक
५. लेखन ६. अति विबन्ध्यकारी
७. आध्मानकर
शिम्बी शीता गुरुर्बल्या श्लेष्मा वातपित्तजित्।
कोलशिम्बी समीरघ्नी गुर्व्युष्णा कफपित्तकृत्॥ ३८॥
क. शाक विधि-शिम्ब (भटवांस) के नवीनबीज कोश (डोडी) कटकर, हिंगु कण
तथा सैंधव संतप्त तैल में प्रभृष्ट (भूनकर) शाक सा बीज निकालकर) का
निर्माण करते हैं।
ख. गुण-कर्म-यह जठर (उदर) के अन्तरवर्ति (अन्दर रहने वाली) अग्नि मांद्य
नाशक हैं।
कोलशिम्बी (सुअर सेम) वातनाशक, गुरु (गरिष्ठ), उष्ण तथा पित्तजनन होती
है॥३८॥
अथ तोरी (तोरई)
निःशेषिताखिलसिरावलिकृत्तखण्डं
दण्डाहतं च मृदुपाकमवाप्यते हि।
हिङ्ग्वम्लतैललवणैः परिपाचितं च
कोशातकीफलमिदं मरिचेन रुच्यम्॥ ३९॥
कोशातकी (तोरई)
कोशातकीफल की सिराओं को निष्कासित करके, काटकर खण्ड बनायें तथा
दण्डाहत (डंडे से कुचलें) करें। यह मृदुपाक हो जायेगा। तदनन्तर हिंगु, अम्ल पदार्थ,
अथाष्टमोत्सवः १२३
तैल, लवण के साथ पाक करते है, फिर मरिच चूर्ण मिला देते हैं। यह कोशातकी शाक
रोचक (रुचिवर्धक) गुण करता है॥३९॥
राजकोशातकी शीता ज्वरघ्नी कफवातला।
महाकोशातकी तद्वत्सिद्धाऽनिलपित्तहा॥ ४०॥
राजकोशातकी
१. शीत २. ज्वरघ्न
३. कफवातकारक ४. पूर्व (कोशतकी के प्रसंग) में वर्णित विधि से पक्व
शाक अर्श, वातरोग तथा पित्तनाशक होता है।
अथ चवेडा (चचिण्डा)
ऊर्ध्वं विधिना कृत्तं बृहत्पाटोलकं फलम्।
हिङ्गुना पाचितं तप्ते घृते सुरुचिकारकम्॥ ४१॥
चचिण्ड-चिचिण्डशाक
चचिण्ड (चचेंडा) फल की सिरा निष्कासित कर (पूर्वोक्त विधि से) कर्तन करते
हैं, फिर हिंगु से पाचित (छौंक) कर, संंतृप्त घृत में शाक कर पाक कर लेते हैं। यह
शाक सुरुचिकारक होता है।
चचेण्डं कर्तलाकारं कृत्तमाज्ये छमत्कृतम्।
प्रलेहाविधिना राद्धं रुच्यं लवणमिश्रितम्॥ ४२॥
चचिण्ड-शाक प्रलेह
चचेण्डफल कर्तन कर, घृत में भौंक कर (छमत्कृतम्) तथा लवण मिलाकर,
प्रलेह निर्माण करते हैं। यह शाक रुचि प्रदायक होता है॥४२॥
श्वेतराजिकया शुभ्रं बृहत्पाटोलक फलम्।
पित्तघ्नं वातहृद्वल्यं रुच्यं पथ्यं हि देहिनाम्॥ ४३॥
चचिण्डफल-वृन्ताक
श्वेत राजिका मिश्रित कर, चिचिण्ड (बृहत्पटोलक) के शाक का (पूर्वोक्त विधि/
सेपाक करते हैं। इसके गुण-कर्म इस प्रकार है-१. पित्तनाशक, २. वात हत, ३.
बल्य, ४. रुच्य या ५. पथ्यकारक (मनुष्यों के लिए हितकारक)॥४३॥

printed letters:
It looks like: अलललोबोश्व or अललाबोध्वं or अललाब्वोर्ध्वं?
Wait! Look at the curve of the 3rd letter:
It's ल with ो?
Wait, let's look at the letters one by one:
1: अ
2: ल
3: ल
4: बो
5: श्व (Wait, look at श्व: is there a loop? It looks like श्व or ध्व? In अश्मरिभेदकम् , look at श्म: श has a loop. In विबन्धकृत् , look at न्ध. In सपिण्डम् , etc.)
Wait, look at the top of char 5: there is NO repha? No, there is nothing above the headline except maybe a tiny mark? Wait, there is no repha, wait, is there an anusvara?
Wait, look at the word: फलं has an anusvara. Does char 5 have an anusvara? No!
Wait, look at char 5: it has a headline, a loop on the left, a loop on the right... wait, it's श्व? No, wait!
Could it be अलललोबोश्व?
Wait, let's transcribe it as faithfully as possible to

१२६ क्षेमकुतूहलम्
खण्डकूष्माण्डकम्
कूष्माण्ड के स्थूल एवं चतुरस्र (चौकोर) खण्ड (टुकड़ों) को दुग्ध में उबाल
(स्वेदित) कर लेते हैं, फिर मसलकर घृत में भून (भर्जित कर लेते हैं तथा शर्करा का
मिश्रण करते हैं। तदनन्तर, मरिच-एला-सुगन्धित चूर्णों से सुगन्धयुक्त सुवासित कर
लेते हैं। इस पाक की 'खण्ड-कूष्माण्डक' नाम दिया गया है॥५३॥
अथ भर्जितसुन्दरी
कूष्माण्डं गुलिकाकारं खण्डितं घृतभर्जितम्।
हिङ्गुसैन्धवचूर्णेन संयुक्तं रुचिकारकम्॥५४॥
भर्जित सुन्दरी
कूष्माण्ड की गुलिकाकार खण्ड (टुकड़ा) बनाकर, घृत में भर्जित (भून) कर,
भृष्ट हिंगु (भुनी हिंग) तथा सैन्धव चूर्ण का मिश्रण कर देते हैं। वह रुचिवर्धक होती
है॥५४॥
अथाम्लकूष्माण्डम्
कूष्माण्डखण्डानि ससैन्धवानि तनूनि संमर्दितपीडितानि।
जम्बीरनीराश्रितशृङ्गवेरैर्भवन्ति वह्नेरपि दीपनानि॥५५॥
अम्लकूष्माण्ड
क. विधि- कूष्माण्ड सूक्ष्म के खण्ड, स्विन्न (उबाले हुए) को सैन्धव लवण
मिश्रित कर, जम्बीर निम्बूक के स्वरस तथा आर्द्रक को संमर्हित-पीड़ित (हाथ
से मसलकर) 'भरता' जैसा तैयार कर लेते हैं। यह 'अम्लकूष्माण्डकम्' होता है।
ख. गुण- यह अग्नि का वर्धन करती है- दीपन है॥५५॥
अथ छेलिका
कूष्माण्डत्वग्भवाः खण्डाः सुस्विन्नाश्चणकान्विताः।
वेसवारयुते तैले तलयेद्वा प्रलेहयेत्॥५६॥
कूष्माण्ड छेलिका
कूष्माण्ड (छिलके) को खण्डित करके (टुकड़े बनाकर) त्र्यणक (चने) के साथ
सुस्विन्न करते (उबालते) हैं, फिर तैल तथा वेसवार (मसाला) सहित तल के हर
(तले)- इसे प्रलेह के समान निर्माण कर लेते हैं। यह 'कूष्मण्ड छेलिका' है॥५६॥
अथाष्टमोत्सवः १२७
अथ राजिका-आसूरी
खण्डं कनिष्ठिकाकारं कौष्माण्डं स्वेदपिण्डितम्।
राजिकादधिसिन्ध्यूथैर्मिश्रितं चासुरी स्मृता॥५७॥
कूष्माण्डराजिका
कूष्माण्ड का कनीष्ठिका अंगुलि के आकार का खण्ड बनाकर, स्विन्न करके
पिण्डी करण (पिंठ जैसा) करते हैं। इसमें राजिका-दधि-सैंधव लवण मिश्रित करते हैं।
यह 'कूष्माण्ड राजिका' है॥५७॥
एवं बहुविधः कार्यः कूष्माण्डो हि विचक्षणैः।
प्रलेहतलनस्वादुक्षारसंधानराजिकाः ॥५८॥
कूष्माण्ड कल्प
इस प्रकार विचक्षण (कल्प-पाक विशेषज्ञ) कूष्माण्ड के विविध प्रकार के पदार्थ
(पाक), यथा प्रलेह तलना, स्वादु, क्षार, संधान एवं राजिका प्रभृति कई प्रकार के
आहार-योग्य द्रव्यों का (निर्माण) किया जा सकता है (बहुविध)॥५८॥
कूष्माण्डं बृंहणं शीतमसृक्पित्तहरं गुरु।
बालं नातिहिमं स्वादु सक्षारं दीपनं लघु॥५९॥
कूष्माण्ड-गुण-कर्म
कूष्माण्ड से सिद्ध (पक्व) विभिन्न द्रव्यों (कल्पों) के तथा कूष्माण्ड फल की
विभिन्न अवस्थाओं के सामान्य गुण-कर्म तथा मुख आमायिक उपयोग निम्नांकित
हैं-
१. बृंहण ┐ ८. कफजनन म.कूष्माण्ड
२. वल्य │ ९. अल्पशीतल ┐
३. शीत (शीतल) │ (सामान्य- १०. स्वादु (स्वादिष्ट) │
४. रक्तपित्तनाशक │ कूष्माण्ड) ११. क्षारीय │ पक्व कूष्माण्ड
५. गुरु (गरिष्ठ) ┘ १२. अग्नि (जठराग्नि) दीपन │
६. पित्तनाशक ┐ १३. लघु (सुपाच्य) ┘
७. शीत ┘ कालकूष्माण्ड

पृष्ठ १२८

१२८ क्षेमकुतूहलम्
अथ टेण्टी
बालं टेण्टीफलमविकलं स्विन्नमीषच्च तोये
स्नेहे हिङ्गुप्रणयिनि ततो वेसवारेण सिद्धम्।
गव्यं तक्रं क्वथितनिहितं साधितं रामठेन
स्वादन्स्वादन्निभृतममृतं निन्दितं भोक्तृभिश्च ॥ ६० ॥
टण्टिका पुष्टिका वश्या रुच्या वह्निप्रदा लघुः।
हन्ति पित्तकफार्शांसि कृमिगुल्मविषामयान् ॥ ६१ ॥
टेण्टी-करीरफल
क. विधि- अविकल (बिना काटे हुए) बाल टेण्टी (करीर-करीण) फलों को जल
में स्विन्न करते (उबालते हैं, तथा सन्तप्त स्नेह (घृतं/तैल) में हिंगु तथा वेसवार
(मसालों) के साथ पाक करते हैं (छौंककर); फिर गव्य-गाय के तक्र (मट्ठे)
को हिंगु (रामठ)-सिद्ध डाल देते हैं।
ख. गुण-कर्मः- इस रीति से सिद्ध (पक्व) टेण्टीफल के पाक को स्वादपूर्वक
(निश्चिन्तता) खाने वाले भोक्ता को, अमृत की भी निन्दनीय (अमृतं निन्दितं
भोक्तृभिश्च) प्रतीत होगा।
१. पुष्टिका २. वृष्य ३. रुच्य
४. वह्निपदा ५. लघु ६. पित्तघा
७. कफहर ८. अर्शौघा ९. कृमिरोगहर
१०. गुल्मरोगनाशक ११. विषजनित विकृति (विषामय) निवृत्तिकर।
अथ कण्टकारीफलम्
तोयाल्पस्विन्नबृहतीफलमल्पखण्डं
दण्डाहतं चिरविपाचितमाज्यमध्ये।
चूर्णेन सैन्धवभवेन विमिश्रतं च
वह्निं प्रबोधयति कासनिवारणं हि ॥ ६२ ॥
कण्टकारी फल
क. विधि- अल्प (थोड़े) पानी में बृहतीफल (बड़ी कटेली) स्विन्न करके (उबाल
कर) खण्ड कर ले; तथा तप्त घृत में (दण्डाहत) दर्वी या कड़ही से चलाकर
पकाते हैं; फिर सैंधव का चूर्ण मिश्रित कर देते हैं।


पृष्ठ १२९

अथाष्टमोत्सवः १२१
ख. गुण- १. पाचकाग्नि प्रबोधक (अग्निदीपन)
२. कास निवारक (कास रोगहर)
कण्टकारीफलं तिक्तं कटुकं दीपनं लघु।
रूक्षोष्णं श्वासकासघ्नं ज्वरानिलकफापहम् ॥ ६३ ॥
कण्टकारी के सिद्ध (पक्व) फल के गुण-कर्म-आमयिक उपयोग-
१. तिक्त-कटु रस २. पाचकाग्नि वर्धक (दीपन)
३. लघु (सुपाच्य) ४. रुक्ष
५. उष्ण ६. वातघ्न
७. कफहर ८. कास-श्वास-वृद्धि-ज्वर नाशक॥६३॥
अथामलकफलम्
अङ्गारपाकपचितानि फलानि धात्र्या
आज्येन जीरलवणेन विमिश्रितानि।
बाह्लीकधूपपरधूपितसौरभाणि
संधुक्षयन्ति जठरानलमुद्धतानि ॥ ६४ ॥
आमलक फल
क. विधि-आमलक (धात्री-आँवले) के फलों को अंगार पर पाक करके (हाथों से)
मसलकर (पिष्टी-पिट्ठी); घृत-हिंगु-लवण का चूर्ण से धूम देकर सुवासित
(सुगन्धित) कर लेते हैं। यह पदार्थ (धात्री-फलों से निर्मित) जठरानल संधुक्षण
(पाचकाग्णी दीपन) करता है॥६४॥
प्रोक्तं धात्रीफलं वृष्यं विशेषाद्रक्तपित्तजित्।
त्रिदोषशमनं पथ्यं ज्वरघ्नं च रसायनम् ॥ ६५ ॥
ख. गुण-कर्म-
१. वृष्य २. रक्तपित शामक ३. त्रिदोषनाशक
४. पथ्य (हितकर) ५. ज्वरघ्न ६. रसायन॥६५॥
अथ कारवेल्लीफलम्
कारवेल्लीफलं भूयात्कवले कवले मम।
बहिर्मरकतश्या ममन्तेविद्रुमसंनिभम् ॥ ६६ ॥

१३० क्षेमकुतूहलम्
कारवेल्लीफल
कारवेल्ली (करेला) का फल बाह्य स्वरूप में मरकत मणि के समान श्यामवर्ण,
आभ्यन्तर प्रवाल जैसा रक्तवर्ण फल, यह भोक्ता की कामना है, यह उसके प्रत्येक ग्रास
में रहे॥६६॥
कारवेल्लीफलं तक्रे स्वेदितं हिङ्गुमर्दितम्।
भर्जितं नवनीतेन सैन्धवेन समन्वितम् ॥ ६७॥
अथ कर्कोटकफलम्
विदलितमुखमीषत्कारवेलं कठोरं
पुलकितमिव तैले साधितं रामठेन।
चरितमरिचचूर्णं सैन्धवेनातिपूर्णं
पुलकितरसनाग्रं लोलतामातनोति ॥ ६८॥
१. विधि- कारवेल्लक फल को तक्र में स्वेदित (उबाल) कर, हिंगु मर्दित करके,
नवनीत के साथ भर्जित कर (भून) लेते हैं, फिर सैंधव मिश्रित करते हैं- यह
शाक निर्माण की रीति है।
२. कठोर प्रकार के कारवेल्लक का मुख काट (दलित) कर, हिंगु मिलाकर (भृष्ट)
संतप्त तैल में सिद्ध (पाक) करके सैंधव एवं मरिच चूर्ण मिलाकर शाक-
विधि को पूर्ण करते हैं। इस रीति से निर्मित शाक का आहार करने से जिह्वा
का अग्रभाग-चंचल प्रकार का-और लोलुप हो जाता है (जिह्वा लौल्य के
वशीभूत)॥६७-६८॥
कारवेल्लीफलं भेदि लघु तिक्तं च शीतलम्।
पित्तास्रकामलापाण्डुकफमेदः कृमीञ्जयेत्॥६९॥
ख. गुण-कर्म- १. भेदन (सारक-रेचक) २. लघु (सुपाच्य)
३. तिक्त ४. शीतल
५. रक्तपित्त-कामला-पाण्डु-मेदरोग-कृमिरोग
६. कफजनित विकार
अथ कर्कोटकफलम्
ईषद्विभिन्नमरिचैः परिपूर्णगर्भं
तैलेन राद्धमथ सैन्धवजातयोगम्।
अथाष्टमोत्सवः १३१
बाह्लीकयुक्तपयसा विहिताभिषेकं
कर्कोटकीफलमिदं रुचिकृन्नराणाम् ॥ ७० ॥
कर्कोटक फल
क. विधि- कर्कोटकी (कर्कोटक) फल के मुख का अल्प विदारण करके, उसके अन्दर
मरिच चूर्ण-सैंधव का पूरण करें तथा तप्त तैल में-अल्प पाक (सिद्ध) करते हैं,
तदनन्तर हिंगु युक्त जल मिलाकर पकाते हैं फिर अग्नि से हटा लें॥७०॥
फलं कार्कोटकं कुष्ठकिलासारुचिनाशनम्।
भेद्यं रुचिकरं वृष्यं कटु पाके च दीपनम् ॥ ७१ ॥
ख. गुण-कर्म- १. अरुचिहर २. भेदन
३. रुचिकर ४. वृष्य
५. दीपन ६. कटुविपाकी
अथ हरितचणकरन्थनम्
सुहरितहरिमन्थः क्षोदक्षुण्णो नखाग्रैः
प्रथममुदकसिक्तो वेसवारेण सिद्धः।
लवणमरिचसङ्गात्तैलहिङ्गुप्रसङ्गा-
च्छिखर्यति हि भोक्तुर्जाठरं मन्दवह्निम् ॥ ७२ ॥
हरितचणक-हरिमन्थ
क. विधि- हरिमन्थ (हरा चना) को फलों को ऊँगली (नख) से अग्रभाग को
विदीर्ण कर, बीजों का निष्क्रमण करें तथा कुचलें (क्षोदक्षुण्णो नखाग्रै)। जल से
प्रक्षालनोपरान्त तेल से हिंगु (भृष्टकर) पाक करते हैं, फिर लवण-मरिच का चूर्ण
मिश्रित कर देते हैं।
ख. गुण- हरिमन्थ शाक खाने से पाचकाग्नि (जो मन्द हो गयी हो) को तीव्र हो
जाती है॥७२॥
छोलाविधानकफलं परिगृह्य शुद्धं
तप्ते घृते सपचितं क्वथितोष्णाभ्याम्।
संसाधितं सुरभितं शुचिरामठेन
जिह्वातले विशति नर्तति च प्रकामम् ॥ ७३ ॥

[पृष्ठ १३२]

१३२ | क्षेमकुतूहलम्
हरितेन भृतं क्वापि निर्माणाम्छोलकं क्वचित्।
कथ्यते स्थौल्यकफकृत्किंचिद्वातकरं सरम्॥७४॥
छोला विधानफल
त्वक रहित (शुद्ध) चणक (चना)- जिसे आजकल 'छोला' आदि नामों से
जानते हैं- को संतृप्त घृत में पाक करें; शुण्ठी तथा मरिच चूर्ण की- हिंगु से सुगन्धित
कर मिला देते हैं।
यह विशिष्ट चणक (छोला) जिह्वा तल पर प्रवेश करते ही या चेष्ट नाचने लगता
हैं (जिह्वातले विशति नर्तति)- जिह्वा को स्वाद से प्रिय बना देता है (कटु-तिक्त आदि
रसों के चखने पर)।
पाकान्तर-यह छोला हरा या शुष्क चने (पानी में भिगोकर) का निर्माण किया
जाता है।
मुखगुण-स्थूलता वृद्धिकर, कफवर्धन, अल्पवात कारक तथा सर।।७३-
७४।।
अथ कार्पासफलम्
फलमथ दलशाकं स्वेदितं मुष्टिपिष्टं
क्वथिततिलजतैले हिङ्गुना लब्धवासम्।
वणफलवपत्र स्वादुतां संदधानं
भवति रुचिदमुच्चैरम्लचूर्णेन सार्धम्॥७५॥
कार्पासफल
क. विधि- कार्पास (कपास) के फलों तथा पत्रों को जल में स्विन्न (उबालकर)
करके, मुष्टि (मुट्ठी) से पीस (मसल) लेते हैं; तदनन्तर तिल के तैल में पाक
करके, हिंगु से सुगन्धित करते हैं; फिर आम्रचूर्ण (अमचूर) मिला देते हैं। यह
कार्पास फल सिद्ध हो जाता है॥७५॥
कर्पासफलमत्युष्णं कषायं मधुरं गुरु।
वातश्लेष्महरं रुच्यं विशेषेणस्थिवर्जितम्॥७६॥
ख. गुण- शाक स्वादु होते हुए भी (भोजन) में रुचि को भलीप्रकार वृद्धि करता
हैं। इसके गुण-कर्म रोगोपयोग निम्नांकित है-


[पृष्ठ १३३]

अथाष्टमोत्सवः | १३३
१. उष्ण | २. कषाय | शाक में प्रायः सभी गुण विद्यमान
३. मधुर रस | ४. गुरु | हैं, जो अस्थि-वृद्धिकृत करके पाक
५. वात-कफ नाशक | ६. रुचिकर | करते हैं (विशेषेण्यस्थिविर्णीतम्)।
अथ करीरफलम्
फलं करीरस्य हि बीजवर्जितं
संस्थापितं सोदकभाजने तु।
सुचिक्कणे चाष्टदिनं सुसंस्थितं
वृन्ताकरीत्या सुधिया विपाचितम्॥७७॥
करीरफल
क. विधि- करीर फल (बीज निष्क्रमित) को जल-परिपूर्ण स्निग्ध पात्र में अष्ट
दिनावधि तक रखने के पश्चात्, वृन्ताक शाक वत पाक करना चाहिए- यह
बुद्धिमान (सुधिया) व्यक्ति का कार्य है।
करीरं कटुकं ग्राहि फलमुष्णं रुचिप्रदम्।
कफपित्तदरं किंचित्कषायं वातहृद्धरम्॥७८॥
ख. गुण- १. कटुरस-अल्प कषाय | २. ग्राही
३. उष्ण | ४. रुचिकारक
५. कफपित्त वर्धन | ६. वातरोग हर (परम्)
अथ कपिकच्छू फलम्
कोमलं रोमरहितं स्विन्नमाज्ये विपाचितम्।
सोपस्करे सबाल्हीके सिन्धुजेन समन्वितम्॥७९॥
क. विधि- कोमल रहित फल (फली) को (जल में) स्विन्न करके, हिंगु तथा
उपस्कर (मसाला) मिलाकर घृत में पाक करते हैं, तथा सैंधव चूर्ण का मिश्रण
कर देते हैं- यह शाक का निर्माण हो गया है।।७९।।
कपिकच्छूफलं वृष्यं मधुरं बृंहणं गुरु।
स्निग्धं शीतानिलहरं दुष्टव्रणविनाशनम्॥८०॥
ख. गुण- १. वृष्य | २. मधुर
३. वल्य | ४. गुरु (गरिष्ठ)

[Page 134]

५. स्निग्ध ६. शीत
७. वातरोग नाशक ८. दुष्ट व्रणहर॥८०॥
अथ विषाणीफलम्
द्विखण्डं खण्डितं बालं फलं विषाणसंज्ञकम्।
तप्ते हिङ्गुयुते स्वाज्ये भर्जितं सैन्धवान्वित्॥८१॥
विषाणं शीतलं बल्यं पित्तघ्नं रुचिकारकम्।
पाके लघूतरं प्रोक्तं विशेषाद्विषनाशनम्॥८२॥
विषाण (विषाणी) फल
क. विधि- बालविषाणी (सिंघाड़ा) का द्विखण्ड खण्डित (दो-टुकड़ों में) करके,
हिंगु भृष्ट संतप्त घृत में, सैंधव मिलायें। इस रीति से शाक निर्माण हो गया है।
ख. गुण- १. शीतल २. वल्य
३. पित्तशामक ४. रुचिकारक
५. लघूपाकी (अत्यन्त) ६. विषनाशक (विशेषतः)
अथोदुम्बरफलम्
फलमौदुम्बरं बालमम्लतक्रेण स्वेदितम्।
वेसवारभृते स्वाज्ये पाचितं सैन्धवान्वितम्॥८३॥
शीतं कषायमधुरं रक्तपित्तप्रणाशनम्।
मूत्रकृच्छ्रहरं सम्यग्विबन्धामानकारकम्॥८४॥
उदुम्बर फल
क. विधि- उदुम्बर (गूलर) को अम्ल तक्र में स्वेदन (उबाल) कर, वेसवार
(मसाला) के साथ, घृत में पाक करके, सैन्धव चूर्ण मिश्रित कर देते हैं। इस
प्रकार उदुम्बर फल शाक का निर्माण हो जाता है।
ख. गुण-
१. शीत २. कषाय ३. मधुर रस ┐
४. रक्तपित्त शामक ५. मूत्रकृच्छ निवारक (सम्यक् रूपेण) ├ कारक
६. विबन्ध ७. आध्मान ┘


[Page 135]

अथाष्टमोत्सवः
अथार्द्रकचर्चम्
नापक्वं नातिपक्वं च खण्डितं त्वग्विवर्जितम्।
वेसवारघृतक्षारैः सिद्धं पित्ताग्निवर्धनम्॥८५॥
आर्द्रक चर्चर्
क. विधि- अर्धपक्व (नापक्वं नातिएकवं) खण्डित, त्वक (विवर्जित-छिलका) निकालकर।
वेसवार (मसाला), लवण, घृत के साथ पाक करके, सिद्ध कर लेते है।
ख. गुण- पित्त वर्धक तथा पाचकाग्नि संजनन (वर्धक)॥८५॥
अथ कर्कटीफलम्
त्वग्बीजरहिता प्रौढा गुलिकाकारखण्डिता।
तलिता सुघृते तप्ते कर्कटी वा प्रलेहिता॥८६॥
विपाण्डुखण्डं घृतदुग्धराद्धं विभावितं वल्लिशर्कराभ्याम्।
कृतैलवासं च कटूष्णमेतत्प्रतिक्षणं रोचकमादधाति॥८७॥
कर्कटी फल
क. विधि-
i) कर्कटी (ककड़ी)- त्वक् (छिलका) बीज रहित, गुलिका के आकार का खण्ड
(टुकड़ा) बनाते हैं, इसको घृत में पाक कर लेते हैं। यह कर्कटी फलशाक सिद्ध
हो गया है। इसे संतृप्त घृत में तलन द्वारा अथवा प्रलेह बनाते हैं।
ii) अपक्व कर्कटो खण्डों को दुग्ध में विभावित करके, घृत में संतप्त करते हैं, मरिच
चूर्ण तथा शर्करा मिश्रित कर सुगन्धित बना लेते हैं। एला चूर्ण भी मिलते हैं। यह
कटु सव उष्ण है। भोक्ता को प्रतिक्षण रोचक लगने लगती है॥८६-८७॥
कर्कटी शीतला रूक्षा ग्राहिणी मधुरा गुरुः।
रुच्या पित्तहरा पक्वा पाकोष्णा पित्तकृत्सरा॥८८॥
ख. गुण-
१. शीतल २. रूक्ष
३. ग्राही ४. मधुर
५. गुरु (मरिष्ठ) ६. रुच्य
६. पित्तहरा ८. उष्णपाकी
९. पित्तसंजनन १०. सरा (रेचक)

१३६ क्षेमकुतूहलम्
अथ शमीफलम्
शमीफलं कोमलबीजसंयुक्तं तप्तोदकस्वेदितमेव केवलम्।
प्रलेहयोगे विधिना विपाचितं सराजिकं वा दधिसैन्धवान्वितम् ॥ ८९ ॥
शमी फल
क. विधि- शमी (छेंकुर) के फलों को कोमल, बीजरहित को संतप्त जल में केवल
स्वेदन (उबाल) करते हैं। इसकी प्रलेह विधि से पक्व (सिद्ध) कर, राजिका चूर्ण
या दधि सैन्धव लवण का मिश्रण कर देते हैं।
शमीफलं लघु स्वादु कुष्ठार्शःकफहत्सरम्।
सुरुच्यं पित्तलं रूक्षं मेध्यं केशविनाशनम् ॥ ९० ॥
ख. गुण- १. सुपाच्य २. लघु
३. स्वादु ४. कुष्ठ-अर्शनाशक
५. कफजन्य विकार नाशक ६. सर
७. रुचिकर ८. पित्तवर्द्धक
९. रूक्ष १०. मेध्य
११. केशविनाशनम्
अथ भैरण्डम्
भैरण्डं कोमलं ग्राह्यं फलं तक्रेण स्वेदितम्।
पाचितं कटुतैलेन हिङ्ग्वार्थं प्रतापितम् ॥ ९१ ॥
कफानिलहरं वृष्यं रूक्षमुष्णं च पित्तलम्।
अग्निसंजननं रुच्यं गुरु पाकेऽतिपिच्छिलम् ॥ ९२ ॥
भैरण्ड फल
क. विधि-कोमल (भैरण्ड) फलों को तक्र में स्वेदित करें, हिंगु से भृष्ट कर सर्षप
तैल में पाक कर लेते हैं- इस रीति से भैरण्ड फल शाक सिद्ध हो जाता है।
ख. गुण- १. कफ नाशक २. वातज
३. वीर्यवर्धक ४. रूक्ष
५. उष्ण ६. पित्तसंजनन
७. पाचकाग्निवर्धन ८. रुच्य
९. गुरु (दुष्पाच्य) १०. अतिपिच्छिल


अथाष्टमोत्सवः १३७
अथ कुटजफलम्
सलिलपरिचितं मुखैकृशानोरथ मथितेन विपाचितं सुतैले।
सुलवणसहितं सहिगुवासं रुचिजनकं गिरिमल्लिकाफलं स्यात् ॥ ९३ ॥
कौटजं सुलघु स्वादु मृदु ग्राहि च शीतलम्।
ज्वरहृद्रोगपित्तासृगुदावर्ताक्ष्यशूलजित् ॥ ९४ ॥
कुटज फल
क. विधि- कुटज (कुड़ा-कोरैया) को अग्नि तप्त जल में स्वेदित (उबालकर) संतप्त
तैल में पाक करते हैं। फिर सैंधव मिश्रित कर, हिंगु धूम से पाचित-सुवासित कर
लेते हैं। यह कुटजफल शाक सिद्ध हो गया-यह रुचिकारक होता है।
ख. गुण- १. सुलघु २. स्वादु
३. मृदु ४. ग्राहि
५. शीतल ६. ज्वर
७. हृद्रोग ८. क्षत
९. अर्श १०. शूल (रोगनाशक ६-१०)
अथ कदलीफलम्
सहिङ्गुकाज्ये हि कृताधिवासं
मोचाफलं सैन्धवसारशालि।
एलामरीचप्रतिवर्धयोगा-
त्रिहन्ति मान्द्यं जठरानलस्य ॥ ९५ ॥
कादल्यं मधुरं शीतं फलं विष्टम्भि पित्तजित्।
स्निग्धं गुरुतरं दाहक्षतक्षयसमीरजित् ॥ ९६ ॥
कदली फल
क. विधि-फल (मोचाफल) त्वक (छिलका) रहित, कर्तन (काट) कर, हिंगु (भृष्ट)
आज्य (घृत) में पाक करते हैं, फिर सैंधव-एला-मरिच चूर्ण मिलाकर, शाक सिद्ध
करते हैं। यह पाचनकाग्नि को तीव्र करता (निहन्तिमान्द्य जठरान लस्य)।
ख. गुण- १. मधुर २. शीत
३. विष्टम्भि ४. पित्तजित्

१३८ क्षेमकुतूहलम्
५. स्निग्ध ६. गुरुतर
७. दाह ८. क्षत
९. समीर (वातजन्य रोग नाशक (७-९)
अथ राजमाषादिफलम्
राजमाषमकुष्ठादिफलं बीजविवर्जितम्।
पक्वं घृतेऽथ पत्रं च सर्वोपस्करसंयुतम्॥९७॥
राजमाषं सुहृद्यं च कफपित्तहरं परम्।
आध्मानवातकृद्ग्राहि तत्पत्रं तद्गुणावहम्॥९८॥
राजमाष तथा अन्य फल
क. राजमाष लोहा तथा मकुष्ठ (मोठे-वनमुद्गोकि फल-बीज बहिष्कृत- समस्त
उपस्कर (मसाले जैसे नमक हिंग सहित) डालकर, घृत में पाक करते हैं। यही विधि
(इनके) का शाक में अनुसरण की जाती है (सर्वोपस्कार संयुक्तम्)।
ख. गुण- १. हृद्य २. कफपित्त सुनिवारण
३. आध्मान ४. वातजरोगकर
५. ग्राही ६. पत्रशाक (समान गुण)
अथैरण्डफलम्
तक्रे संस्वेदितं पूर्वं बालमैरण्डजं बालमैरण्डजं फलम्।
पाचितं तिलजे तैले सर्वोपस्करसंयुतम्॥९९॥
ऐरण्डं वातजिद्बल्यं कषायं वातनाशनम्।
आमवातहरं स्निग्धं रुच्यमुष्ण तु पाचकम्॥१००॥
एरण्ड फल
क. विधि- बाल एरण्ड फलों का तक्र में स्वेदन (उबाल कर), जीरक के साथ,
घृत में लवण एवं आर्द्रक युक्त वेसवार (मसाला) मिलाकर पाक करते हैं तिल
के तैल का प्रयोग)।
ख. गुण- १. वातघ्न २. बल्य
३. कषाय रस ४. वातजित
५. आमवातनाशक ६. स्निग्ध


अथाष्टमोत्सवः १३१
७. रुचिकारक ८. उष्णवीर्य
९. पाचक
अथ कोहड
कोहडं क्षीरसंस्विन्नं घृते पक्वं सजीरके।
लवणार्द्रकसंयुक्तं वेसवारेण वेष्टितम्॥१०१॥
पित्तघ्नं मधुरं शीतं रक्तपित्तविनाशनम्।
विष्टम्भजननं हृद्यं सुरुच्यं कफदं सरम्॥१०२॥
कोहड़ फल
क. विधि- फलों को दुग्ध में स्विन्न करें (उबालें); फिर जीरक के साथ घृत में
लवण-आर्द्रक युक्त वेसवार (मसाले) के साथ पाक करते हैं- इस रीति से शाक
सिद्ध हो गया (कोहड़-मथुआ) फलों को निर्मित)।
ख. गुण- १. पित्तघ्ना २. मधुरविपाकी
३. शीतवीर्य ४. मलावरोधक विष्टम्भजनन
५. हृद्य ६. सुरुच्य
७. कफ जनन ८. क्षर (मुखविरेचक)
फलशाकाधिकार समाप्त।
अथ पत्रशाकम्
अथ वास्तुकम्
कृतयवसविवेचम्लानवास्तूंकशाकं
क्वथितमिलिततक्रं तैलहिङ्गुप्रसक्तम्।
लवणमरिचयुक्तं स्पृष्टराद्धं सफेनं
चपलयति रसज्ञां वीक्षणादेव पुंसाम्॥१०३॥
वास्तूकं पाचनं रुच्यं लघु शुक्रबलप्रदम्।
सरं प्लीहार्शः पित्तासृक्कृमिदोषत्रयापहम्॥१०४॥
क. विधि- म्लान (मुरझाये) वास्तुक (बथुआ) के क्षुपो (कृतपवस विवेचम्लान-
घासों-वितो आदि में उत्पन्न होने से) या पत्रों को, तक्र में स्विन्न (उबालकर),
तैल-हिंगु में प्रसक्त करके, लवण-मरिच-चूर्ण के साथ (फेन सहित) पाक करते

१४० क्षेमकुतूहलम्
है। (भलीभाँति पकाकर)। यह वास्तुक शाक अवलोकन मात्र से पुरुषों की जिह्वा
को चंचल वसाने की विशिष्ट प्रभाव युक्त होता है (चपलपति रसज्ञां वीक्षणादेव
पुसोम)॥१०३-१०४॥
ख. गुण-
१. पाचन
२. रुच्य
३. लघु
४. शुक्रवर्धन
५. बल्य
६. क्षर
७. प्लीहावृद्धि
८. अर्श
९. रक्तपित
१०. कृमिरोग
११. त्रिदोष हर (रोगनाशक-७-११)
अथ चौराई
आलोलितं नविनकोमलतण्डुलीय-
मुद्बाष्षितं सलिलकाञ्जिकमेलके च।
पिण्डीकृतं लवणतैलविपाच्यमेत-
न्मन्दाग्निमङ्कुरयति घृतहिङ्गुवासम्॥ १०५॥
तण्डुलीय
क. विधि- चौलाई (तण्डुलीयक) के कोमल शाकक्षुप (नवीन) को कर्त्तन कर, जल
मिश्रित कांजिक में स्वेदन (वाष्पित) करके, जल निष्कासित कर लेते है- पिण्डो
रूप में बना लेते हैं। इसे घृत तथा हिंगु-लवण के सुगन्धित रूप में पक्व कर लेते
हैं।
ख. गुण- यह (तुण्डलीयक) शाक अभिमांद्य नाशक होता है॥१०५॥
कतिपयकरमर्दकैरुपेतं
नवदलकोमलतण्डुलीयशाकम्।
तैलरसपरिपाकहिङ्गुसङ्गं
लवणविपाचितमग्निमान्द्याथि॥ १०६॥
करमर्दकयुक्त तण्डुलीय शाक
किंचित करमर्द (करौंदा) सहित नवीन पत्र (नवदल कोमल) युक्त तण्डुलीय को
स्वच्छ करके, हिंगु (भृष्ट) के साथ तैल के साथ पकाकर, सैंधव चूर्ण का (यथोचित)
मिश्रण करते हैं यह शाक मन्दाग्नि नाशक होता है॥१०६॥


अथाष्टमोत्सवः १४१
तण्डुलीयो लघुः शीतो रूक्षः पित्तकफास्रजित्।
सृष्टमूत्रमलो रुच्य दीपनो रक्तपित्तहा॥१०७॥
तण्डुलीय शाक (मुफ्त) के गुण-कर्म इस प्रकार है-
१. शीतवीर्य
२. रूक्ष
३. पित्तजन्य व्याधि
४. कफजनित रोग
५. रक्तजविकार (नाशक ३-४)
६. मलमूत्र सृष्टिकार
७. रुचिसंवर्धक
८. अग्निदीपन
९. रक्तपित्तशामक
अथ कसोंदी
पत्राधिका प्रथमकोमलकासमर्दी
दालीगलद्विमलतण्डुलपिष्टलिप्ता।
सिद्धा घृतेन मरिचैरवचूर्णिता च
जायेत साऽपि रुचिसंजननी जनानाम्॥१०८॥
कासमर्दी लघुः स्वादुः कासदोषविनाशिनी।
ग्राहिणी रक्तपित्तार्शोविषदोषहरा स्मृता॥ १०९॥
क. विधि- कासमर्द (कसोंदी) के पत्राधिका क्षुप से प्रथम को मल कासमर्दी (पत्र
द्रव्य) को चणक दाली भिष्टी तथा अमल एण्डुल (चावल) की पिष्ट (पिट्ठी) में
लिप्त करके, मरिच चूर्ण मिश्रित कर, घृत में पाक करते हैं। इस रीति से पक्व
शाक व्यक्तियों की आहारभक्षण में रुचि की वृद्धि करता है।
ख. गुण-
१. लघु (सुपाच्य)
२. कासघ्न
३. ग्राही
४. रक्तपित्त
५. अर्श
६. विषजन्य दोष (नाशक ४-६)
अथ देवदालीशाकम्
देवदालीदलं तक्रे स्वेदितं खण्डितं भृशम्।
वेसवारयुते स्वाज्ये भर्जितं हिङ्गुना दृढम्॥११०॥
देवदाजी सरा तिक्ता ह्याम्लपित्तविनाशिनी।
कुष्ठघ्नी कामलाशोथविषघ्नी च रसायनी॥१११॥
क्षे. कु. 10

व्याजैर्हसन्त्येषा हि पोयिका ॥ ११४ ॥"
Wait, after 'रालन', there is a character: is it a question mark '?' or a poorly printed 'ं'?
Look at it: it has a curved top and a dot below! It really is a question mark '?' or an anusvara with a flourish!
Wait, in line 32 of Hindi:
"पोथिका तण्डुल ग्रहण व्याज से इस प्रकार हसते हुए कहती हैं कि..."
"आलन" (or आलनं) means mixing/thickening with rice flour (आलन/आलवन).
The question mark might be a typographical query by the editor/proofreader! Often in Chowkhamba/Khemraj editions, when a reading is doubtful, they insert a '?'!
Wait, let's look at the character: it has the exact shape of '?'. Yes, it's a '?'!

Let's check line 40:
"घनाम्रतक्रपाचिता सुपोयिकाऽऽज्यभर्जिता ॥ ११६॥"
Wait, is it "घनाम्लतक्रपाचिता"?
In line 40:
"घनाम्रतक्रपाचिता" or "घनाम्लतक्रपाचिता"?
Look at the character after 'ना':
It is 'म्ल'! 'म' with 'ल' subscript!
Notice the Hindi in line 44: "घन अम्ल तक्र