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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

पृष्ठ 57, कुल 136 में से

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पृष्ठ 57

मत्स्यपिष्टिका
त्वक्-कण्टकरहित मत्स्य (खण्डों) को वेसवार मिश्रित कर, शिलापिष्ट करते
हैं, जिसे तैल में पाक कर होते हैं। फिर अम्लपदार्थ (चतुर्थांश) वेसवार (उपस्कार-
मसाला मिलाकर, पुनः शिला पर पीसकर, मत्स्यपिष्टिका से (पूर्ववत्) विभिन्न प्रकार
के पदार्थ- वटी, वटक आदि सूपकार (पाचक) की बुद्धि द्वारा निर्माण किए जा सकते
हैं। इसे मत्स्यपिष्टिका कहते हैं॥८-१०१/२॥
अथ मत्स्यपूरणम्
तक्रेण स्विन्नं मत्स्यस्य खण्डं प्रक्षाल्य पेषयेत् ॥ ११ ॥
बीजपूरार्द्रमरिचहिङ्गुसैन्धवजीरकैः ।
संयुक्तं कटुतैलाढ्ये घृते पक्त्वाऽथ चूर्णयेत् ॥ १२ ॥
मत्स्यपूरण
मत्स्य मांस खण्ड सुप्रक्षालित की शिलापिष्ट (पत्थर पर पीस कर लेते हैं, इसमें
बीजपूर- भृष्ट हिंगु-सैन्धव-जीरक का चूर्ण, कटुतैल या घृत में सिद्ध (पाक) करते हैं।
इसे मत्स्यपूरण कहते हैं॥११-१२॥
अथ मत्स्यपुटपाकः
गतत्वक्क्षालितं मत्स्यं कदलीपत्रवेष्टितम् ।
मृदा लिप्तं पुटे पक्वं संस्कृतं दाडिमादिना ॥ १३ ॥
वरो मत्स्यः पुटे पक्वो जीरतण्डुललेपितः ।
तविकायां पुनः पक्त्वा संमिश्रो मरिचादिना ॥ १४ ॥
मत्स्यपुटपाक
मत्स्य खण्ड-सुप्रक्षालित एवं चर्मरहित- कन्दली पत्र आवृत-मृत्तिका लेपित, को
पुटपाक यन्त्र में रखकर (पुटपाक विधि से पाक) करते हैं। तत्पश्चात् दाडिम स्वरस से
संस्कृत करते हैं। इस पुटपाक उत्तम मांस को जीरक तथा तण्डुल के कल्क से लेपित
करके, पुनः लविका (कटपार्क) में पुनः पाक करके, मरिच-शुंठी, हिंगु, सैंधव आने
(चूर्ण) का मिश्रण करके, पाक (सिद्ध) करते हैं॥१३-१४॥
अथ करालमत्स्यः
करालविधिना भृष्टं मुद्गपिष्टेन लेपितम्।
बृहन्मत्स्योदरातखण्डं रन्धयेत्तलनादिना ॥ १५ ॥
सप्तमोत्सवः १०९
मगरल मत्स्य
कराल विधि से भृष्ट बृहत् मत्स्य के उदर-खण्ड के मुद्ग पिष्टी में मिश्रित करके,
तलन-भर्जन-स्वेदन आदि विधियों के अनुसार सिद्ध (पाक) करते हैं- इसे 'मरगल
मत्स्य' पाक कहा जाता है॥१५॥
अथ रोहितः
रोहितोदरखण्डांश्च कासमर्देन मर्दिताः ।
कटुतैलपरिभ्रष्टा हिङ्गुसैन्धवयोजिताः ॥ १६ ॥
शकलं पिष्टसंभूतं रोहितं दधिमर्दितम् ।
वेसवारान्वितं पाच्यं प्रलेहविधिना भृशम् ॥ १७ ॥
रोहित मत्स्य
क. विधि- रोहित (रोहू) मत्स्य (मछली) उदर-खण्डों को कासर्मद (मसालाओं)
मर्दन करके, स्वर्ण तैल में भृष्ट करें तथा हिंगु-सैन्धव मिश्रित करें। इस द्रव्य का
दधि में मर्दित कर (उपस्कार-वेसवार) मिलाकर प्रलेह विधि से पाक कर लेते
हैं॥१६-१७॥
अथ गुणाः
रोहितस्योत्तमं देहं प्रलेहनावलेहितम् ।
सोऽश्नातीह नरः पूर्वजन्मवैनायको ध्रुवम् ॥ १८ ॥
रोहितः प्रवरो मत्स्यो नातिपित्तकरो गुरुः ।
वातहा पुष्टिदो हृद्यः स्निग्धः पथ्यो समीरिणाम् ॥ १९ ॥
गुण
रोहित मांस प्रलेह विधि (अवलेह) से भक्षण करने वाला मनुष्य, अवश्य
ही (पूर्वजन्म का) विनायक स्वरूप होता है, उत्तम रोहित मत्स्य नातिपित्तकर,
गुरु, वातघ्न, पुष्टिकार, हृद्य, स्निग्ध तथा वातज रुग्णों का पथ्य (हितकर)
है॥१८-१९॥
अथ पालाशिमत्स्यः
पालाशिखण्डं तिलतैलयुक्तं विपाचितं सैन्धवकासमर्दैः ।
हिङ्ग्वार्धधात्रीफलचूर्णकीर्णं नवं नवं रोचकमातनोति ॥ २० ॥
क्षे. कु. 8