क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ क्षेमकुतूहलम्
अथ शिम्बी
नैष्पावकं सुदलितं नवबीजकोशं
तप्तेन हिङ्गुजकणेन ससैन्धवेन।
प्रभ्रष्टकल्पतिलतैलकृतप्रबोधं
मान्द्यं हरेच्च जठरान्तरवर्तिवह्नेः॥ ३७॥
बिम्बी फल गुण-कर्म (सामान्य)
१. स्वादु (मधुर) २. शीत (शीतल)
३. रक्तपित्तशामक ४. स्तम्भक
५. लेखन ६. अति विबन्ध्यकारी
७. आध्मानकर
शिम्बी शीता गुरुर्बल्या श्लेष्मा वातपित्तजित्।
कोलशिम्बी समीरघ्नी गुर्व्युष्णा कफपित्तकृत्॥ ३८॥
क. शाक विधि-शिम्ब (भटवांस) के नवीनबीज कोश (डोडी) कटकर, हिंगु कण
तथा सैंधव संतप्त तैल में प्रभृष्ट (भूनकर) शाक सा बीज निकालकर) का
निर्माण करते हैं।
ख. गुण-कर्म-यह जठर (उदर) के अन्तरवर्ति (अन्दर रहने वाली) अग्नि मांद्य
नाशक हैं।
कोलशिम्बी (सुअर सेम) वातनाशक, गुरु (गरिष्ठ), उष्ण तथा पित्तजनन होती
है॥३८॥
अथ तोरी (तोरई)
निःशेषिताखिलसिरावलिकृत्तखण्डं
दण्डाहतं च मृदुपाकमवाप्यते हि।
हिङ्ग्वम्लतैललवणैः परिपाचितं च
कोशातकीफलमिदं मरिचेन रुच्यम्॥ ३९॥
कोशातकी (तोरई)
कोशातकीफल की सिराओं को निष्कासित करके, काटकर खण्ड बनायें तथा
दण्डाहत (डंडे से कुचलें) करें। यह मृदुपाक हो जायेगा। तदनन्तर हिंगु, अम्ल पदार्थ,
अथाष्टमोत्सवः १२३
तैल, लवण के साथ पाक करते है, फिर मरिच चूर्ण मिला देते हैं। यह कोशातकी शाक
रोचक (रुचिवर्धक) गुण करता है॥३९॥
राजकोशातकी शीता ज्वरघ्नी कफवातला।
महाकोशातकी तद्वत्सिद्धाऽनिलपित्तहा॥ ४०॥
राजकोशातकी
१. शीत २. ज्वरघ्न
३. कफवातकारक ४. पूर्व (कोशतकी के प्रसंग) में वर्णित विधि से पक्व
शाक अर्श, वातरोग तथा पित्तनाशक होता है।
अथ चवेडा (चचिण्डा)
ऊर्ध्वं विधिना कृत्तं बृहत्पाटोलकं फलम्।
हिङ्गुना पाचितं तप्ते घृते सुरुचिकारकम्॥ ४१॥
चचिण्ड-चिचिण्डशाक
चचिण्ड (चचेंडा) फल की सिरा निष्कासित कर (पूर्वोक्त विधि से) कर्तन करते
हैं, फिर हिंगु से पाचित (छौंक) कर, संंतृप्त घृत में शाक कर पाक कर लेते हैं। यह
शाक सुरुचिकारक होता है।
चचेण्डं कर्तलाकारं कृत्तमाज्ये छमत्कृतम्।
प्रलेहाविधिना राद्धं रुच्यं लवणमिश्रितम्॥ ४२॥
चचिण्ड-शाक प्रलेह
चचेण्डफल कर्तन कर, घृत में भौंक कर (छमत्कृतम्) तथा लवण मिलाकर,
प्रलेह निर्माण करते हैं। यह शाक रुचि प्रदायक होता है॥४२॥
श्वेतराजिकया शुभ्रं बृहत्पाटोलक फलम्।
पित्तघ्नं वातहृद्वल्यं रुच्यं पथ्यं हि देहिनाम्॥ ४३॥
चचिण्डफल-वृन्ताक
श्वेत राजिका मिश्रित कर, चिचिण्ड (बृहत्पटोलक) के शाक का (पूर्वोक्त विधि/
सेपाक करते हैं। इसके गुण-कर्म इस प्रकार है-१. पित्तनाशक, २. वात हत, ३.
बल्य, ४. रुच्य या ५. पथ्यकारक (मनुष्यों के लिए हितकारक)॥४३॥