क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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अन्य शाक-विधि
इस प्रकार कठिन, कषाय, कटु एवं तिक्त रस प्रधानशाकों को जल के साथ
स्वेदन (स्वित्र) करके, पुनः तक्र के साथ विदल करते हैं ग्रथा फिर सन्तृप्त तैल में
डालकर स्वेच्छा से शाक का निर्माण (पाक) करते हैं॥१०-११॥
अथ वृन्ताकम्
सर्वासां शाकजातीनां वृन्ताकं शाकनायकम्।
अतः शाकक्रमं त्यक्त्वा प्रथमं नायकं वदेत् ॥ १२॥
भोजनं धिगवृन्ताकं वृन्ताकं धिगवृन्तकम्।
सवृन्तं धिगतैलाढ्यं तैलाढ्यं धिगरामठम् ॥ १३ ॥
फल शाक
वृन्ताक
सर्वप्रकार के शाक जातियों (प्रकार-भेद) में वृन्ताक बैगन/बैंगन) का शाक उत्तम
(श्रेष्ठ) है इसीलिए इसको 'शाकनायक' कहा गया है (सर्वेसां शाकजातीनां वृन्ताकं
शाकनात्रकम्)। इस करण, शाक-क्रम की उपेक्षा करके, सर्वप्रथम फलशाक के रूप में
वृन्ताक के फलशाक पर प्रकाश डालते है।
महत्ता
'वृन्ताक' का व्यंगात्मक वैशिष्ट्य निरूपित है- वृन्ताकरहित भोजन को धिक्कार
हैं (भोजनं धिगवृन्ताकं' आदि), वृन्तरहित वृन्ताक के धिक्कार है; अति तैल रहित
वृन्तयुक्त वृन्ताक को धिक्कार है, अधिक तैल युक्त वृन्तसहित वृन्ताक हिंगु रहित होने
के स्थिति में धिक्कार की श्रेणी में परिगणित होता है- अर्थात् वृन्ताक को 'धिक्कार'
की अवस्था मे ले जाने वाली सभी स्थितियों की बहिर्ष्क्रमण अथवा पूर्ति आवश्यक
है (जिससे वृन्ताक की गुणवत्ता से पूर्णतया स्वाभाविक कोटि में अवस्थित किया जा
सके)॥१२-१३॥
वार्त्ताकं कलितं सुवृन्तसहितं संस्वेदितं काजिके
शुद्धेऽम्ले घृतधान्यकार्द्रक निशासंपर्किनं पाचितम्।
सक्षारं मरिचावचूर्णितमथो तैलेन हिङ्ग्वा लस-
द्वासं दारुमयेऽपि पुंसि कुरुते घ्रातं क्षुधाबोधनम् ॥ १४॥
अथाष्टमोत्सवः ११७
शाकपाक : विविध प्रकार
वृन्ताक (फल) को सवृन्त (भेंटी सहित-फलवृन्त के साथ) काटकर, कांजिक
एवं शुद्ध अम्लपदार्थ से स्वेदित करके, घृत-धान्यक-आर्द्रव-हरिद्रा का चूर्ण मिश्रित
करके पाक करते हैं, फिर भृष्टहिंगु (भुनी हींग) सुगन्धित कर तैल में डालते हैं। इस
रीति से पक्व (सिद्ध) वृन्ताक शाक की केवल गन्ध (घ्रातं क्षुधाबोधनम्) से काष्ठ-
निर्मित पुरुष (दारुमयेऽपि पुंसि) को भी भूख लग जाती है (क्षुधाबोधनम्)॥१४॥
वृन्ताकखण्डा यदि तेऽत्र संवृतस्तैलप्लुता हिङ्गुरसेन युक्ताः।
मरीचधूलीपरिधूसराङ्गा भवन्ति पुण्योदयराजपुंसाम् ॥ १५ ॥
वृन्ताक फल खण्डों को तैल में हिंगु रस में भृष्ट (भूनकर), मरिच चूर्ण मिश्रित
कर पक्व (सिद्ध) किया शाक, पुण्यवान् राजाओं को भाग्य से प्राप्त करता है॥१५॥
हरितं त्वामवार्ताकं कटुतैले सरामठे।
सिद्धं मरिचसंबद्धं कोष्णमेतद्रुचिप्रदम् ॥ १६ ॥
हरित वर्णिय वृन्ताक को हिंगु में भृष्ट कर, सर्षप तैल में पाक (सिद्ध) कर लेते
हैं, फिर मरिच चूर्ण का मिश्रण करते हैं। इस विधि से पक्व वृन्ताक शाक, कोष्ण
(अल्पगर्म) शाक रुचिकारक (रुचिप्रदम्) प्रभाव करता है॥१६॥
वार्त्ताककर्तला लिप्ताः शुण्ठीधान्यकजीरकैः।
घृते भृष्टाः समरिचा हिङ्ग्धूपेन धूपिताः ॥ १७॥
वृन्ताक फल खण्डों को शुण्ठी-धान्यक-मीरक से (पूर्ण रूप में) लेपन करके,
घृत में भृष्ट करके मरिच चूर्ण मिश्रित करते हैं, फिर हिंगु धूम से सुगन्धित करें। वह
शाक रुचिवर्धन करता है॥१७॥
सवृन्तवृन्ताकतूरीयखण्डं सरामठं तप्तघृते सुपाचितम्।
ससैन्धवं चुक्रकसाकसंयुतं सगोलिकं पूर्वजपुण्यदापितम् ॥ १८ ॥
सवृन्त वृन्ताक के सु (तुरीय) खण्डो को, हिंगु युक्त संतृप्त घृत में पक्व, सैन्धन
एवं चुक्रशाक से युक्त शाक की उपलब्धि, पूर्वजन्म के पुण्यकर्म का द्योतक है। (अर्थात्
पूर्वसुकर्मों के फलस्वरूप वृन्ताक का इस प्रकार का समतल होता है)॥१८॥
वृन्ताकं वृन्तसहितं कृत्तं बाहिकसंयुतम्।
पक्वमाघ्रियुतं स्वाज्ये ललिजिह्वान्तरे स्थितम् ॥ १९ ॥