क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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१२८ क्षेमकुतूहलम्
अथ टेण्टी
बालं टेण्टीफलमविकलं स्विन्नमीषच्च तोये
स्नेहे हिङ्गुप्रणयिनि ततो वेसवारेण सिद्धम्।
गव्यं तक्रं क्वथितनिहितं साधितं रामठेन
स्वादन्स्वादन्निभृतममृतं निन्दितं भोक्तृभिश्च ॥ ६० ॥
टण्टिका पुष्टिका वश्या रुच्या वह्निप्रदा लघुः।
हन्ति पित्तकफार्शांसि कृमिगुल्मविषामयान् ॥ ६१ ॥
टेण्टी-करीरफल
क. विधि- अविकल (बिना काटे हुए) बाल टेण्टी (करीर-करीण) फलों को जल
में स्विन्न करते (उबालते हैं, तथा सन्तप्त स्नेह (घृतं/तैल) में हिंगु तथा वेसवार
(मसालों) के साथ पाक करते हैं (छौंककर); फिर गव्य-गाय के तक्र (मट्ठे)
को हिंगु (रामठ)-सिद्ध डाल देते हैं।
ख. गुण-कर्मः- इस रीति से सिद्ध (पक्व) टेण्टीफल के पाक को स्वादपूर्वक
(निश्चिन्तता) खाने वाले भोक्ता को, अमृत की भी निन्दनीय (अमृतं निन्दितं
भोक्तृभिश्च) प्रतीत होगा।
१. पुष्टिका २. वृष्य ३. रुच्य
४. वह्निपदा ५. लघु ६. पित्तघा
७. कफहर ८. अर्शौघा ९. कृमिरोगहर
१०. गुल्मरोगनाशक ११. विषजनित विकृति (विषामय) निवृत्तिकर।
अथ कण्टकारीफलम्
तोयाल्पस्विन्नबृहतीफलमल्पखण्डं
दण्डाहतं चिरविपाचितमाज्यमध्ये।
चूर्णेन सैन्धवभवेन विमिश्रतं च
वह्निं प्रबोधयति कासनिवारणं हि ॥ ६२ ॥
कण्टकारी फल
क. विधि- अल्प (थोड़े) पानी में बृहतीफल (बड़ी कटेली) स्विन्न करके (उबाल
कर) खण्ड कर ले; तथा तप्त घृत में (दण्डाहत) दर्वी या कड़ही से चलाकर
पकाते हैं; फिर सैंधव का चूर्ण मिश्रित कर देते हैं।
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अथाष्टमोत्सवः १२१
ख. गुण- १. पाचकाग्नि प्रबोधक (अग्निदीपन)
२. कास निवारक (कास रोगहर)
कण्टकारीफलं तिक्तं कटुकं दीपनं लघु।
रूक्षोष्णं श्वासकासघ्नं ज्वरानिलकफापहम् ॥ ६३ ॥
कण्टकारी के सिद्ध (पक्व) फल के गुण-कर्म-आमयिक उपयोग-
१. तिक्त-कटु रस २. पाचकाग्नि वर्धक (दीपन)
३. लघु (सुपाच्य) ४. रुक्ष
५. उष्ण ६. वातघ्न
७. कफहर ८. कास-श्वास-वृद्धि-ज्वर नाशक॥६३॥
अथामलकफलम्
अङ्गारपाकपचितानि फलानि धात्र्या
आज्येन जीरलवणेन विमिश्रितानि।
बाह्लीकधूपपरधूपितसौरभाणि
संधुक्षयन्ति जठरानलमुद्धतानि ॥ ६४ ॥
आमलक फल
क. विधि-आमलक (धात्री-आँवले) के फलों को अंगार पर पाक करके (हाथों से)
मसलकर (पिष्टी-पिट्ठी); घृत-हिंगु-लवण का चूर्ण से धूम देकर सुवासित
(सुगन्धित) कर लेते हैं। यह पदार्थ (धात्री-फलों से निर्मित) जठरानल संधुक्षण
(पाचकाग्णी दीपन) करता है॥६४॥
प्रोक्तं धात्रीफलं वृष्यं विशेषाद्रक्तपित्तजित्।
त्रिदोषशमनं पथ्यं ज्वरघ्नं च रसायनम् ॥ ६५ ॥
ख. गुण-कर्म-
१. वृष्य २. रक्तपित शामक ३. त्रिदोषनाशक
४. पथ्य (हितकर) ५. ज्वरघ्न ६. रसायन॥६५॥
अथ कारवेल्लीफलम्
कारवेल्लीफलं भूयात्कवले कवले मम।
बहिर्मरकतश्या ममन्तेविद्रुमसंनिभम् ॥ ६६ ॥