क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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सवृन्त वृन्ताक खण्ड, हिंगु तथा आम्रपूर्ण (पक्वा) युक्त, घृत में पक्व शाक की
जिह्वा मे स्थिति होती है (अर्थात् सुन्दर-सौभाग्यवनती जिह्वा को इस प्रकार का शाक
रसास्वादन हेतु उपलब्ध (प्राप्त) होता है।।१९।।
प्रभृष्टतण्डुलसमीकृतनालिकेर-
पिष्टैः सहैव मरिचेन समेलकेन।
वार्त्ताकमुत्तमघृतैरनुपाचितं यत्
सिन्धूदरानलमिवानलमातनोति ॥ २०॥
प्रभृष्ट तण्डुल (भून तण्डुल चूर्ण), नारिकेल पिष्टी, मरिच चूर्ण- मिश्रण का घृत
मे पक्व वृन्ताक शाक का सेवन, समुद्रगत अस्थि (वाडवाग्नि) के समान पावकाग्नि
का दीपन करती है॥२०॥
स्विन्नार्धवृन्तवृन्ताकं कर्पूरण विपाचितम्।
जीराज्यवेसवारार्थ्यमाप्तवर्गैः सहाशितम् ॥ २१॥
अर्धवन्त सहित स्वेदन किया वृन्ताक का शाक, कर्पूर के साथ पक्व, जीरक-
घृत-वेसवार मिश्रित करके बनाते हैं। यह शाक आप्त जन (आत्मीय बन्धु बांधनों) के
साथ खाद्य योग्य है॥२१॥
वृन्ताकं फलमादृतं सुकलितं शस्त्रेण तद्वारिणि
क्षिप्तं तैलविपाचितं नवदलं जम्बीरनीरान्वितम्।
हिङ्ग्वार्द्रेण सुवासितं बहुरसं सिन्धूत्थसंथूलितं
भोक्त्रा केन न निन्दितं बहुगुणं सौधं जलं दुर्लभम् ॥ २२॥
अति रसयुक्त वृन्ताक शाक सिद्ध विधान
आदर के पात्र (सम्मतित) वृन्ताक फल को शस्त्र (चाकू-छूरी आदि) से सुकलित
(काटकर) जल में प्लावित करें, तथा उसका तैल में पक्व करें। फिर जम्बीर नीर।
जम्बीरी नींबू का स्वरस) में, हिंगु-आर्द्रक से सुगन्धित करके, सैंधव चूर्ण डालते हैं।
इस प्रकार वृन्ताक के सरस शाक भक्षण करने वाला कौन ऐसा है, जो अतिगुणवान्
दुर्लभ के अमृत के जल को भी स्वय देता है अर्थात् भोक्ता अमृज जल को भी निन्दित
मान लेता है॥२२॥
अकृत्तवृन्तं वृन्ताकं चतुर्धार्धस्य खण्डितम्।
वेसवारोषणाहिङ्गतक्रक्वाथेन पाचितम् ॥ २३॥
अथाष्टमोत्सवः ११९
अङ्गारपक्वं वार्त्ताकं क्षोदितं घृतयोजितम्।
सैन्धवभृष्टबाहीके धूपितं स्याद्भटित्रिकम् ॥ २४॥
त्वग्वन्तगतवृन्ताक पुटपाकेन पाचितम्।
सैन्धवेनाज्यहिङ्गुभ्यां मिश्रितं रुचिकारकम् ॥ २५॥
क. अवृत्तवृत्तं वृन्ताक शाकम्-वृन्त सहित (बिना काटे डंगल या मेंटी) वृन्ताक के
अर्धभाग के चार खण्ड, वेसवार (मसाला) सहित, हिंगु तथा तक्र क्वाथ के
साथ पाक किया जाता है।
ख. अङ्गारपाचित-भटित्रिक वृन्ताक शाकम्- अग्नि ज्वला (अंगार) पकाये
वृन्ताक (बैगन) को मसलकर (क्षोदित) कर घृत का मिश्रण करते है, फिर
सैन्धव तथा हिंगु डालकर सुगन्धित बना लेते हैं। इस प्रकार के पक्व शाक को
'भटित्रिक' संज्ञा दी गयी है।
ग. त्वग्वृन्त सहित वृन्ताक शाकम्- वृन्ताक (फल) के वृन्त (डंगल) तथा त्वक्
(छिलका) रहित फलकी पुटपाक विधि से पक्व शाक में, सैंधव घृत-हिंगु (भुनी
हुई) मिश्रित कर देते हैं।
यह वृन्ताक (विशिष्ट) का शाक रुचि का वर्धन करता है॥२४-२५॥
सुस्विन्नवृन्ताकफलं भृशाग्निना
संक्षोदितं तन्तु न नालवर्जितम्।
सुवासितं राजिकसैन्धवान्वितं
विमर्द्य दध्ना परिवेष्टितं ध्रुवम्॥ २६॥
स्वेदित वृन्ताक- वृन्ताक फल तीव्र अग्नि (अंगार) से सुस्वेदित करके, फल
का मर्दन (शोधित) करके (नालरहित)- वृन्ताक शाक (बैगन का भरता-भर्ता)-
सुगन्धित, राजिका-सैन्धव युक्त, दही मर्दन करके, परिवेष्टित किया हुआ शाक बनाते
हैं। विशेषतया अवश्य हो रुचि संजनन देता है॥२६॥
निर्धूमानलपाचितमानं वार्त्ताकमुज्झितं बीजैः।
आर्द्रकनिम्बुकसैन्धवस्नेहैरालोडितं रुचिं धत्ते॥ २७॥
वृन्ताक (फल बीज) निष्कासित बीज रहित वृन्ताक शाक को निर्धूम अग्नि मे
पक्व, आर्द्रक-निम्बूक-सैन्धव-घृत मिश्रित कहते है। यह शाक रुचि वर्धक होता
है॥२७॥