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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 60

अथाष्टमोत्सवः
(अष्टम् प्रकरण)
अथ शाकप्रकारः
पत्रं पुष्पं फलं नालं कन्दं मूलं तथैव च।
शाकं षड्विधमुद्दिष्टं गुरुं विद्याद्यथोत्तरम्॥१॥
शाक के भेद
शाक छह प्रकार के होते हैं, जिनके स्रोत सहित नाम इस प्रकार हैं- इन रसों
में उत्तरोत्तर गुरु (गरिष्ठ-विष्टम्भी-दुष्पाच्य) होत हैं-
१. पत्रशाक, २. पुष्पशाक, ३. फलशाक, ४. नालशाक, ५. कन्दशाक,
६. मूलशाक॥१॥
अथातः पत्रशाकस्य सामान्यतलने विधिः।
ततोऽन्येषां च वक्तव्यः प्रलेहादेरपि क्रमः॥२॥
हिङ्गुजीरयुते तैले क्षिपेच्छाकं सुशोभितम्।
लवणं चाम्रचूर्णादि सिद्धे हिङ्गूद्कं क्षिपेत्॥३॥
इत्येवं सर्वशाकानां तलने क्वथने विधिः।
पत्रशाक
इसके बाद पत्रशाक की सामान्य पाक विधि (तलने की क्रिया) वर्णन की
जायेगी; तथा उसके बाद अन्य शाको का पाक की विधि का उल्लेख किया जायेगा,
जिसमे प्रलेहादि समाविष्ट होता है।
शाक का भलीप्रकार प्रक्षालन करते हैं, तथा संतप्त तैल में हिंगु तथा जीरक से
भर्जित कर देते हैं, फिर लवण एवं आम्रचूर्ण (आमचूर) आदि अम्ल पदार्थ मिश्रित कर
देते हैं। यह द्रव्य सिद्ध (पका) हो जाने पर, हिंगूजल डालते हैं। यह समस्त प्रकार के
पत्रशाक का पाक करने की सामान्य विधि (तल-स्विन्न-सिद्ध) होती है॥२-३१/२॥
अथाष्टमोत्सवः १२५
वास्तुकं काकमाची च तण्डुलीयं पुनर्नवा॥४॥
चुञ्चुकं नालिका पाठा पच्यन्तेऽम्लेन तद्बुधैः।
वास्तुक, काकमाची, तण्डलीय, पुनर्नवा, चुञ्चुक, नालिका एवं पाठा- इन
समस्त शाक द्रव्यों के बुद्धिमानों द्वारा अम्लरस के साथ पाक किए जाते हैं।
कासमदों मेथिका, प्रफुन्नाट एवं चणक- इनका शाक अम्ल रहित जल में
मिश्रित कर, विद्वानगण इन द्रव्यों से शाक का भलीप्रकार से पाक करते हैं। इसी प्रकार
वृन्ताक, कूष्माण्ड, पटोल आदि फलों के तलन की विधि का अनुकरण करना
चाहिए॥४१/२॥
कासमर्दी च मेथी च पुन्नाटं चणकोद्भवम्॥५॥
रसार्द्रं त्वम्लरहितं पक्वं सम्यग्विचक्षणैः।
एवं वार्त्ताककूष्माण्डपटोलादिफलेष्वपि॥६॥
तलने विधिरुद्दिष्टो विशेषो यः स उच्यते।
तप्ततैले क्षिपेच्छाकं वास्तुकादिसुखण्डितम्॥७॥
लवणं तोयमल्पं च क्षिप्तं सिद्धेऽर्धमात्रकम्।
सधान्यवेशनं तक्रे गालितं क्वथितं क्षिपेत्॥८॥
ततः शुण्ठीं जीरकं च हिङ्गुं दत्त्वाऽवतारयेत्।
इत्थमेवापरस्यापि वर्णस्य करणे यदि॥९॥
तत्सर्वं स्वेच्छया देयं वर्णकृत्प्रथमं स्मृतम्।
सर्वशाक सामान्यतः विधि
फल शाक के तलने की विशेषता है। वास्तुक आदि शाकों को स्वच्छकर, भली
प्रकार काट लेते हैं, इसे संतप्त तैल में थोड़ाकर, लवण तथा अल्प जल मिला देते
हैं। अर्धपक्व हो जाने पर, धान्यक के साथ, बेसन को तक्र के साथ मिलते हैं तथा पाक
करते हैं। तदनन्तर, शुंठी, जीरक तथा भृष्ट हिंगु मिश्रित कर, अग्नि से उतार लेते हैं।
इसी प्रकार अन्य शाकों को उपर्युक्त विधि से, वर्णकारक इन सभी पदार्थों को
स्वेच्छानुसार छोड़ दिया करते हैं॥५-९१/२॥
एवं यत्कठिनं शाकं कषायं कटुतिक्तकम्॥१०॥
तदुत्स्वेद्याम्बुना पूर्वं तक्रेण तदनन्तरम्।
तप्ततैले विनिक्षिप्य रन्धयेच्च यथेच्छया॥११॥