क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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११२ क्षेमकुतूहलम्
सूक्ष्म मत्स्य
क. विधि- सूक्ष्म मत्स्य (छोटी मछलियों) को तिल तेल में भर्जित कर, संभार
(मसाला) आदि मिश्रित करके पाक करते है।
ख. गुण- मधुर रस तथा त्रिदोषनाशक। अतिसूक्ष्म मत्स्य पुंसरण को हानि-
कारक॥३०-१/२॥
अथ मत्स्यसामान्यगुणाः
मत्स्या बलप्रदा वृष्या गुरवः कफपित्तलाः ॥ ३१ ॥
उष्णाभिष्यन्दिनः स्निग्धा बृंहणाः पवनापहाः ।
ह्रदोद्भवा बलकरा न तु स्वल्पजलोद्भवाः ॥ ३२ ॥
हेमन्ते कूपजा मत्स्याः शिशिरे सारसा हिताः ।
मधौ ग्रीष्मे च काले च नदीचौण्ड्यतडागजाः ॥ ३३ ॥
शरत्सु नैर्झराः सर्वे वर्षोत्थाः सर्वदोषदाः ।
विभिन्न प्रकार की मत्स्य के सामान्य गुण-कर्म
मत्स्य (मछलियों) के विभिन्न भेद, जाति एवं उनके पाक (पूर्वोक्त) के विभिन्न
गुण-कर्म तथा आमयिक प्रयोगों का सामान्यतः (साररूप) वर्णन प्रस्तुत है-
क. बल्य, वृष्य, गुरु, कफपित्तकारक, उष्ण, अभिष्यन्दी, स्निग्ध, बृंहण (मांसजनन)
तथा वातनाशक- मत्स्य के सामान्य गुण।
ख. अगाध (गहरे) जल के मत्स्य बलकारक, अल्प (कम गहरे) जलाशय के मत्स्य
गुणवान् नहीं होते।
ग. हेमन्त ऋतु जन्य कूपजल मत्स्य, शिशिर ऋतु जन्य सारस (तालाब) मत्स्य,
वसन्त-ग्रीष्मऋतु जन्य नदी, पौण्ड्य तथा तडाग (तालाब) के मत्स्य तथा
शरदऋतु जन्य नैर्झर (झरने) मत्स्य हितकर।
घ. वर्षाऋतु जन्य सर्वप्रकार के मत्स्य सर्वदोष प्रद॥३१-३३१/२॥
मांसस्य बहुधा प्रोक्ताः प्रकारा रथने बुधैः।
सूपकाधिया कृत्वा मत्स्यस्य च ततोऽधिकाः ॥ ३४ ॥
मांस के विविध प्रकार-
विद्वान (पाक विद्या के ज्ञाताओं) ने मांसपाक (सिद्ध) करने के अनेक रूप
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सप्तमोत्सवः ११३
प्रकार, पाचक (सूपकार) स्वबुद्धि (ज्ञान-अनुभवानुसार) के आधार पर निर्देश किया हैं,
उससे भी अधिक मत्स्य पाकों का उल्लेख किया गया है॥३४॥
ओदनादि हि पयोन्तभोजनं मत्स्यमांसजनितं च यच्छ्रुतम्।
नाद्यभोजनयतेर्विमन्त्रणे तत्कथं खलु मयाऽनुर्णितम् ॥ ३५ ॥
श्रुत भोजनातिरिक्त पाक
भात (ओदन) से पयोन्तभोजन, मत्स्य एवं मांस से निर्मित होने वाले भोजन के
प्रकार, जो कुछ श्रुत (सुना भी-लेखक द्वारा), जो वर्तमान के भोजन सामग्री (प्रकरण)
में समावेश नहीं होते हैं, फिर भी उनका (मैंने) किसी प्रकार वर्णन करने का प्रयास
किया है॥३५॥
मत्स्यमांसभवः पाको मयोक्तः सप्तमोत्सवे।
षड्विधानां तु शाकानां प्रकारस्तदनूच्यते ॥ ३६ ॥
इति श्रीनरवैद्यमन्मथात्मजक्षेमशर्माविनिर्मिते क्षेमकुतूहले ग्रन्थे
मत्स्यमांसप्रशंसनो नाम सप्तमोत्सवः॥७॥
उपसंहारात्मक रूपरेखा
मैने (लेखक ने) सप्तम उत्सव (समापनावन सत्र) में मत्स्य तथा मांस से निर्मित
अनेक प्रकार के पाक (व्यंजनों) का वर्णन कर दिया है, अब आगे अष्टम उत्सव में
षड्विध (छह प्रकार) शाकों के निर्माण विधि के विवरण का विषय प्रतिफल है॥३६॥
इति हिन्दी व्याख्या सहित क्षेमकुतूहल का मांसपाक
वर्णन नामक सप्तम उत्सव समाप्त॥