क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
पृष्ठ 58, कुल 136 में से
संदर्भ में पढ़ें११० क्षेमकुतूहलम्
पालाशिशर्बलदा वृष्या वातहा पित्तकृत्सरा।
गुर्वी कफकरा चोष्णा मेदः शुक्रविवर्धिनी ॥ २१ ॥
पलाश मत्स्य
क. विधि- मत्स्य (पलाशी) खण्डों को सैन्धव, कासमर्द (उपस्कार) के साथ,
तिल तैल में पाककरके, हिंगु-आर्द्रक-धात्रीपत्र फल चूर्ण मिश्रित करते हैं। यह
पलाशि मत्स्य (सिद्ध) पाक, नवरोचक होता है।
ख. गुण- यह बल्य, वातघ्न, पित्तजनन, सारक, गुरु, कफकारक, उष्ण, मेदा,
वीर्यवर्धक होती है॥२०-२१॥
अथ पाठीनः
पाठीनः खण्डितः शस्त्रैर्वेसवारसमन्वितः ।
कटुतैले परिभृष्टो हिङ्गुतक्रेण योजितः ॥ २२॥
पाठीनः कफकृद्बल्यो निद्रालुवार्त्तनाशनः ।
मांमाशी वातरक्तस्य कारकः शुक्रधारकः ॥ २३ ॥
पाठीन मत्स्य
क. विधि- पाठीन मत्स्य (मछली विशेष) शस्त्र द्वारा खण्डित, के वेसवार युक्त,
हिंगु-तक्र के साथ, सर्षपतैल पर पक्व करते हैं।
ख. गुण- कफकारक, बल्य तथा वातनाशका पाठीन मांस भोक्ता को वात-रक्त
कारक तथा वीर्यधारी होता हैं॥२२-२३॥
अथ मङ्गुरिका
मङ्गुरी मुण्डरहिता कटुतैले सुभर्जिता।
माणिमन्थनिशायुक्ता हिङ्गुना धूपिता च सा॥ २४॥
मङ्गुरी वातहा पथ्या रुच्या वृष्या बलप्रदा ।
अग्निसञ्जननी हृद्या तद्वदुक्ता च भृङ्गिका ॥ २५ ॥
मङ्गुरिका मत्स्य
क. विधि- मङ्गुरिका (मंगुरिका) मत्स्य का मुण्ड निष्कासित कर, सर्षण तैल में
भृष्ट करके, लवण-हरिद्रा चूर्ण-हिंगु धूपित करते हैं।
ख. गुण- यह विशिष्ट मत्स्य वातनाशक, मध्य, रुचिकर, वृष्य, बल्य, अग्निदीपन
तथा हृद्य होती है। यही सिगी मत्स्य का गुण हैं॥२४-२५॥
सप्तमोत्सवः १११
अथ गुण्डी
पुच्छशीर्षेण रहिता कासमर्दविमर्दिता।
हिङ्गुतैले च संतप्ता गुण्डीमत्स्यस्य खण्डकाः ॥ २६ ॥
गुण्डी वातहरा बल्या वृष्या पथ्याऽग्निवर्धिनी ।
सुरुच्या शुक्रदाऽत्यर्थं किञ्चित्कफकरा सरा ॥ २७ ॥
गुण्डी मत्स्य
क. विधि- मुण्डी मत्स्य को पुच्छ-शीर्ष रहित अवस्था में, कासमदि (मसाला-
वेसवार) मर्दन करते हैं, हिंगु से भृष्ट कर संतप्त तैल में भृष्ट करें- यह गुण्डी
मत्स्य का खण्ड होता है।
ख. गुण- वातनाशक बल्य, वृष्य, पथ्य, अग्निदीपन,, सुरुचिकर, शुक्रप्रद,
अल्पपित्तकर तथा सारक॥२६-२७॥
अथ मत्स्यमण्डकम्
मत्स्यस्य पिष्टिकां कृत्वा पर्णस्थां मण्डलाकृतिम्।
आधारेण समुत्स्विन्ना संयुक्ता धूलनेन तु ॥ २८ ॥
मत्स्यमण्डक
मत्स्य पिष्टी पत्र में रखकर, मण्डलाकृति बनायें तथा आधार काष्ठ पर रखकर
स्वेदन करते है, फिर उद्वूलन चूर्ण मिश्रण करते हैं॥२८॥
अथ मत्स्येण्डरी
कासमर्दीचूर्णेन मत्स्यपिष्टीं नियोजिताम्।
भर्जितां कटुतैलेन कुर्यान्मत्स्येण्डरी च सा ॥ २९ ॥
मत्स्येण्डरी
कासमर्द (वेसवार-मसाला) के साथ मत्स्य (मछली) पिष्टी (पीठी) को सर्षप तैल
में भर्जित करते (भून लेते) है। इस पाक को 'मत्स्येण्डरी' नाम है॥२९॥
अथ सूक्ष्ममत्स्याः
भर्जितास्तिलतैलेन सर्वसंभारसंभृताः।
सूक्ष्ममत्स्याः स्वादुरसा दोषत्रयनिबर्हणाः ॥ ३० ॥
परं सूक्ष्मास्तु ये तेषु सर्वे ते पुंस्त्वनाशनाः ।