क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२० क्षेमकुतूहलम्
वृन्ताकं स्वादतिक्तोष्णं कटुपाके च पित्तलम्।
रुच्यं वाताहरं हृद्यं दीपनं शुक्रलं लघु ॥ २८ ॥
कृष्ण वृन्ताक फल शाक
स्वादु, तिक्त, उष्ण, कटुपाकी, पित्तकारक रोचक (रुचिवर्धन), वातनाशक,
हृद्य, दीपन, शुक्रल एवं लघु॥२८॥
अपरं श्वेतवार्ताकं कुक्कुटाण्डोपमं फलम्।
कृष्णाद्धीनगुणंकिंचिदर्शसां नाशनं परम्॥ २९ ॥
श्वेत वृन्ताक फल शाक
अपर श्वेत वृन्ताक फल (कुक्कुटोपम-मुर्गी के अंडे के समान रंग कुछ कम
काला), अल्प गुणवान् तथा अर्शनाशक॥२९॥
वह्नेर्दीप्तिकरं परं रुचिकरं गुल्मापहं पाचनं
प्लीहानं च शिरोरुजं विजयते जीर्णज्वरं कामलाम्।
हन्याद्धातकफामरोगनिचयं मूत्रग्रहं साश्मरीं
वृन्ताको मृदुवह्निना सुपचितः पुंभिः सदा सेव्यते ॥ ३० ॥
मन्दाग्नि पक्व वृन्ताक शाक
मन्द (हल्की) अग्नि में पक्व वृन्ताक शाक, अग्निदीपन, रुचिकर, गुल्माघ्न,
पाचक, प्लीहा-शिरःशूल-जीर्णज्वर-कामला-कफ-आमरोग-मूत्रग्रह-अश्मरी, विशेषतया
पुरुषों द्वारा भक्षण योग्य (हितकर)॥३०॥
दलितं तलितं सरामठं नवबिम्बीफलमात्तसैन्धवम्।
मरिचोद्भवचूर्णसंयुतं घृतपाकेन करोति रोचनम् ॥ ३१ ॥
विम्बफल शाक
बिम्बी फल (कुन्दुरु) के फल को कर्तन (खण्ड) कर (दलित), हिंगु के साथ तल
कर (तलित), सैंधव तथा मरिच चूर्ण डालकर-घृत के साथ पक्व शाक तैयार करते हैं।
यह रुचिवर्धन होता है॥३१॥
बिम्बीफलं सकलमेव घृते निधाय
तप्ते ससैन्धवमिदं मुहुरुत्क्षिपेच्च।
अथाष्टमोत्सवः १२१
सोपस्करं कथितमत्र निधाय तक्रं
वाघारयेदति च दीपनमेव वह्नेः ॥ ३२ ॥
विम्बीफल शाक
सम्पूर्ण विम्बी फल (शाक बनाने हेतु) संतृप्त घृत में डाल देते हैं, फिर सैंधव
मिलाकर चलाते हैं, तथा बाद में उपस्कार (मसाला रहित) युक्त तक्र डालकर, छौंक
(वाघारयेदति-वघार) लगा देते हैं। यह शाक अग्निदीपन करता है॥३२॥
बिम्बीफलार्धकलितं हिङ्गुसैन्धवमिश्रितम्।
प्रलेहविधिना पाच्यं परिवृत्य छमत्कृतम् ॥ ३३ ॥
विम्बी प्रलेह
विम्बी फलार्ध (आधे-आधे टुकड़ों) को हिंगु-सैंधव मिलाकर, दर्वीचालन करते
हुये (क्षमकृत-छौंककर), प्रलेह विधि के अनुसार पाक करते हैं॥३३॥
अङ्गारभर्जितं बिम्बीफलं संक्षोदितं करैः।
दधिहिङ्गुघृते न्यस्तं सक्षारं रुचिकारकम् ॥ ३४ ॥
अङ्गारभर्जित विम्बी फलशाक
विम्बी फलों को अग्नि ज्वाल (अंगारों) पर अर्जित (भूनकर), हाथों से मसल
देते हैं (संशोधित करे), फिर दधि-भृष्ट हिंगु-घृत-लवण शाक में मिश्रित कर देते हैं।
यह विम्बी का भर्तृ (भरता/रूपी शाक सक्षार तथा भोजन में रुचिकर होता है॥३४॥
तिर्यग्वा खण्डितं चार्धस्विन्नं बिम्बीफलं भृशम्।
दधिराजिकया युक्तं सैन्धवेनानुमिश्रितम् ॥ ३५ ॥
विम्बी रायता
विम्बी फलों को तिर्यक खण्डित (तिरछा काटकर, अर्धस्वेदन (अर्धपक्व)
करके, दधि, राजिका तथा सैंधव मिश्रित करते हैं। इस तरह रायता का निर्माण होता
है॥३५॥
बिम्बीफलं स्वादु शीतं रक्तपित्तप्रणाशनम्।
स्तम्भनं लेखनं चातिविबन्धाध्मानकारकम् ॥ ३६ ॥
विम्बी फल स्वादु, शीत, रक्तपित्त शामक, स्तम्भन, लेखन, निबन्ध तथा
आध्मानकार होता है॥३६॥