क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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खण्डकूष्माण्डकम्
कूष्माण्ड के स्थूल एवं चतुरस्र (चौकोर) खण्ड (टुकड़ों) को दुग्ध में उबाल
(स्वेदित) कर लेते हैं, फिर मसलकर घृत में भून (भर्जित कर लेते हैं तथा शर्करा का
मिश्रण करते हैं। तदनन्तर, मरिच-एला-सुगन्धित चूर्णों से सुगन्धयुक्त सुवासित कर
लेते हैं। इस पाक की 'खण्ड-कूष्माण्डक' नाम दिया गया है॥५३॥
अथ भर्जितसुन्दरी
कूष्माण्डं गुलिकाकारं खण्डितं घृतभर्जितम्।
हिङ्गुसैन्धवचूर्णेन संयुक्तं रुचिकारकम्॥५४॥
भर्जित सुन्दरी
कूष्माण्ड की गुलिकाकार खण्ड (टुकड़ा) बनाकर, घृत में भर्जित (भून) कर,
भृष्ट हिंगु (भुनी हिंग) तथा सैन्धव चूर्ण का मिश्रण कर देते हैं। वह रुचिवर्धक होती
है॥५४॥
अथाम्लकूष्माण्डम्
कूष्माण्डखण्डानि ससैन्धवानि तनूनि संमर्दितपीडितानि।
जम्बीरनीराश्रितशृङ्गवेरैर्भवन्ति वह्नेरपि दीपनानि॥५५॥
अम्लकूष्माण्ड
क. विधि- कूष्माण्ड सूक्ष्म के खण्ड, स्विन्न (उबाले हुए) को सैन्धव लवण
मिश्रित कर, जम्बीर निम्बूक के स्वरस तथा आर्द्रक को संमर्हित-पीड़ित (हाथ
से मसलकर) 'भरता' जैसा तैयार कर लेते हैं। यह 'अम्लकूष्माण्डकम्' होता है।
ख. गुण- यह अग्नि का वर्धन करती है- दीपन है॥५५॥
अथ छेलिका
कूष्माण्डत्वग्भवाः खण्डाः सुस्विन्नाश्चणकान्विताः।
वेसवारयुते तैले तलयेद्वा प्रलेहयेत्॥५६॥
कूष्माण्ड छेलिका
कूष्माण्ड (छिलके) को खण्डित करके (टुकड़े बनाकर) त्र्यणक (चने) के साथ
सुस्विन्न करते (उबालते) हैं, फिर तैल तथा वेसवार (मसाला) सहित तल के हर
(तले)- इसे प्रलेह के समान निर्माण कर लेते हैं। यह 'कूष्मण्ड छेलिका' है॥५६॥
अथाष्टमोत्सवः १२७
अथ राजिका-आसूरी
खण्डं कनिष्ठिकाकारं कौष्माण्डं स्वेदपिण्डितम्।
राजिकादधिसिन्ध्यूथैर्मिश्रितं चासुरी स्मृता॥५७॥
कूष्माण्डराजिका
कूष्माण्ड का कनीष्ठिका अंगुलि के आकार का खण्ड बनाकर, स्विन्न करके
पिण्डी करण (पिंठ जैसा) करते हैं। इसमें राजिका-दधि-सैंधव लवण मिश्रित करते हैं।
यह 'कूष्माण्ड राजिका' है॥५७॥
एवं बहुविधः कार्यः कूष्माण्डो हि विचक्षणैः।
प्रलेहतलनस्वादुक्षारसंधानराजिकाः ॥५८॥
कूष्माण्ड कल्प
इस प्रकार विचक्षण (कल्प-पाक विशेषज्ञ) कूष्माण्ड के विविध प्रकार के पदार्थ
(पाक), यथा प्रलेह तलना, स्वादु, क्षार, संधान एवं राजिका प्रभृति कई प्रकार के
आहार-योग्य द्रव्यों का (निर्माण) किया जा सकता है (बहुविध)॥५८॥
कूष्माण्डं बृंहणं शीतमसृक्पित्तहरं गुरु।
बालं नातिहिमं स्वादु सक्षारं दीपनं लघु॥५९॥
कूष्माण्ड-गुण-कर्म
कूष्माण्ड से सिद्ध (पक्व) विभिन्न द्रव्यों (कल्पों) के तथा कूष्माण्ड फल की
विभिन्न अवस्थाओं के सामान्य गुण-कर्म तथा मुख आमायिक उपयोग निम्नांकित
हैं-
१. बृंहण ┐ ८. कफजनन म.कूष्माण्ड
२. वल्य │ ९. अल्पशीतल ┐
३. शीत (शीतल) │ (सामान्य- १०. स्वादु (स्वादिष्ट) │
४. रक्तपित्तनाशक │ कूष्माण्ड) ११. क्षारीय │ पक्व कूष्माण्ड
५. गुरु (गरिष्ठ) ┘ १२. अग्नि (जठराग्नि) दीपन │
६. पित्तनाशक ┐ १३. लघु (सुपाच्य) ┘
७. शीत ┘ कालकूष्माण्ड