क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
चतुर्थ से षष्ठ उत्सव: शाक, सूप, दुग्ध-विकार एवं घृत-पक्व व्यंजन
[पृष्ठ ८६]
ख. गुण- मांसवर्धक-वृंहण, वस्त्र, शीतल, तर्पण, गुरु, श्रम, वातहर, स्निग्ध
तथा बलवर्धन। ११०-११३।।
अथ गोधा
गोधामुष्र्णाजलैर्भूयः क्षालितां खण्डशः कृताम्।
स्विन्नां च तोयतक्राभ्यां क्षालितां सूक्ष्मखण्डिताम्॥११४॥
तलयेद्वेसवाराम्लैः प्रलेहो वा विधानतः।
विपाके मधुरा गोधा वातपित्तप्रणाशिनी ॥११५॥
कषाया कटुका प्रोक्ता कफघ्नी बलवर्धिनी।
गोधा
क. विधि- गोधा मांस को उष्ण जल से बहुप्रक्षालित कर खण्ड करते हैं तथा
उबालने है- जल तथा तक्र से पुनः प्रक्षालित कर, वेसवार तथा अम्ल रस
मिलाकर, तलन करें या प्रलेह (पाक विधि अनुसार) का निर्माण कर लेते हैं।
ख. गुण- महार (विपाक), वातपित्तनाशक, कषाय, कटु रस, कफनाशक तथा
बल्य।।११४-११५१/२।।
अथ कच्छपः
तप्ततोये परिक्षिप्त सम्यगानीय कच्छपम् ॥ ११६॥
तन्मांसं कर्पराद्ग्राह्यं खण्डितं स्वल्पखण्डितम्।
पाचितं सार्षपे तैले हिङ्गुसैन्धवसंयुते ॥ ११७॥
वेसवारसमायुक्ते दाडिमेन सहाम्लिते।
कच्छपो बलकृच्छीघ्र वातजिच्छुक्रकारकः ॥ ११८॥
स्निग्धोष्णाः प्रीणनः सद्यो विपाके कटुकः सरः।
कच्छप
क. विधि- कच्छप (कछुए) के मांस को उष्ण जल में डालकर, उसके अस्थि भाग
को पृथक करके मांस निष्कासित कर- छोटे खण्ड बना लेते हैं। इसको हिंगु से
तैल में भृष्ट (छौंककर) करके, सैन्धव, वेसकार चूर्ण मिलाते हैं, फिर दाडिम
रस मिश्रित बनाकर अम्ल बना लेते हैं- इस प्रकार मांस पक्व (सिद्ध) हो
जाता है।
[पृष्ठ ८७]
ख. गुण- बल्य, आशु वातरोगहारी, वृष्य, स्निग्ध, उष्ण, सद्यः प्रसन्नतादायक,
कटुविपाकी तथा सारक।।११६-११८१/२।।
अथ प्रलेहा:
स्थूलानि मांसखण्डानि क्षालितानि च वारिणा ॥ ११९॥
तप्तस्नेहे विनिक्षिप्य दर्व्या संचालयन् पचेत्।
ततस्तत्र विनिक्षिप्य लवणं जलमल्पकम् ॥ १२०॥
पचेत्पटपटाशब्दं तस्मिन्मांसे प्रकुर्वति।
प्रक्षिपेद्दाडिमीनीरं बहु तेन पचेत्पुनः ॥ १२१॥
मांसपिण्डेषु सिद्धेषु देया शुण्ठी सजीरका।
तत उत्तार्य तन्मांसं पृथक्कुर्यात्प्रलेहतः॥ १२२ ॥
प्रलेहं वाससा पूतं स्थापयेदन्यभाजने।
हिङ्गुना घृतयुक्तेन धूप तत्रैव दापयेत् ॥ १२३॥
प्रलेह विधान (गौरीमतानुसारेण)
मांस के स्थूल (बड़े-मोटे) खण्ड (टुकडों) को जल से प्रक्षालित करके, तप्त
स्नेह में दवीं (कलछुल) से चलाकर, पकाते हैं। फिर सैन्धव चूर्ण को अल्प जल
मिलाकर; पटपटा शब्द वक होने तक, इस मांस द्रव्य का पाक करते हैं, पुनः दाडिम
स्वरस डालकर एक बार फिर पकाते हैं। इसके पश्चात् जीरक तथा शुण्ठी चूर्ण मिला
कर, अग्नि से उतारकर, मांस खण्डों को पृथक् कर लेते हैं (अन्य पात्र में स्थानान्तरित)।
तदनन्तर घृत सहिता हिंगु के धूम से सुगन्धित (सुवासित) कर लेते हैं। यह गौरी मत
के अनुसार 'प्रलेह' होता है।।११९-१२३।।
अथ पत्तलप्रलेहः
स एवाल्पामिषस्नेहः साधितः पत्तलः पुनः।
तथैव वाससा पूतो धूपितोऽपि च पत्तलः ॥ १२४॥
पत्तल प्रलेह
अल्प मांस तथा स्नेह डालकर सिद्ध किया (पूर्वोक्त विधिवत्) प्रलेह की
'पत्तल प्रलेह' संज्ञा होती है। इसको सुगन्धित करने की प्रक्रिया चूर्णवत् है
(वस्त्रपूत)।।१२४।।
८८ क्षेमकुतूहलम्
धनञ्जय प्रलेह
मांसकूष्माण्डकदलीशृङ्गवेराणि साधयेत्।
प्रलेहविधिना सम्यक् प्रलेहोऽयं धनञ्जयः ॥ १२५ ॥
धनञ्जय प्रलेह
मांस, कूष्माण्ड, कदली तथा शृंगवेर (आर्द्रक) - मिश्रित करके, प्रलेह विधि
(पूर्ववत्) के अनुसार सिद्ध (पाक) करते हैं- इसकी 'धनञ्जय प्रलेह' नामकरण होता
है।। १२५।।
अथ गौडदेशीयप्रलेहः
हिङ्ग्वार्द्रबीजपूरैर्लालवणैः संभृतेन च।
कुट्टितामिषपिष्टेन तक्रदाडिमबीजतः ॥ १२६ ॥
सोषणावेसवाराभ्यां प्रलेहोगौडदेशजः।
प्रलेहो रुचिरो हृद्यः कफानिलरुजापहः ॥ १२७ ॥
संग्राही पित्तकृत्किञ्चिच्छूलाध्मानगदाञ्जयेत्।
गौडदेशीय प्रलेह
क. विधि- मांस पिष्ट (पीठी) को हिंगु, आर्द्रक, बीजपूर, एला, लवण को दाडिम
एवं तक्र के साथ-कूटकर, उसमें मरिच तथा वेसवार तैयार करते हैं- यह
गौडीदेशीय प्रलेह होता है।
ख. गुण- रुचिकर, हृद्य, अतिपुष्टिकारक, वातपित्तनाशक, बल्य, मन्दाग्निहर
तथा कफनाशक।। १२६-१२७१/२।।
अथ पूरणम्
हिङ्गुधान्यजले मांसं सुन्वित्रं सूक्ष्मकुट्टितम् ॥ १२८ ॥
संयुक्तं हिङ्गुजीरार्द्रबीजपूरैलसैन्धवैः।
घृते तप्ते परिभ्रष्टं धूपितं मांसपूरणम् ॥ १२९ ॥
मांस्य पूरणं रुच्यं हृद्यं पुष्टिकारं परम्।
वातपित्तहरं बल्यं मन्दानिकफनाशनम् ॥ १३० ॥
मण्डकस्य कृतापट्टी पूरणेन प्रपूरिता।
षष्ठोत्सवः ८९
मांसपूरण (प्रपूरण प्रलेह)
क. विधि- हिंगु तथा धान्यक के जल में मांस को सुस्विन्न करके, सूक्ष्म कूटकर,
संतृप्त घृत में ठीक से भृष्ट करते हैं। जीरक, आर्द्रक, बीजपूर रस, एला, सैन्धव
का मिश्रण (भून) करें तथा सुगन्धित बना देते हैं इसका काम 'मांसपूरण' होता है।
ख. गुण- रोचक, हृद्य, अतिपुष्टिकारक, वातपित्तनाशक, बल्य, मन्दाग्निहर तथा
कफनाशक।। १२८-१३०१/२।।
अथ समोसा
वेष्ट्या शृङ्गाटकाकारं सन्धि लिम्पेत्कनिष्ठया ॥ १३१ ॥
घृते भृष्टा समोसेति नाम्ना चष्टे हि सूपकैः।
सुरुच्या वातजिद्बल्या वृष्या पित्तापहा गुरुः ॥ १३२॥
विशेषोऽत्र गुणे योहि मांसभेदाद्विविच्यते।
समोसा
क. विधि- मण्डक (गेहूँ की मैदा) की पट्टिका बनाकर, उसमें पूर्वोक्त पूरण
भरकर, शृंगाटक के आकार में (कनिष्ठिकी ऊँगली से संधि भलीभाँति बन्द कर
देते हैं), तथा घृत में पकाते हैं। इसको सूदक (पाचक) लोग समोसा कहते हैं।
ख. गुण- रुचिकारक-वातनाशक, बल्य, वीर्यवर्धन, पित्तनाशक तथा गरिष्ठ
(गुरु)। इसके विशेष गुणों का विवेचन प्रयुक्त मांस के गुणों के अनुसार होते
हैं।। १३१-१३२१/२।।
अथ पूरणप्रलेहः
मांसपूरणयोगेन लोष्ठाकारं विधाय च ॥ १३३॥
स्विन्नं कृत्तं घृते भृष्टं प्रलेहविधिना पचेत्।
पूरणस्य प्रलेहो यः स ज्ञेयो वातनाशनः ॥ १३४॥
श्लेष्मप्रकारकश्चैव मुखवैरस्यकृद्धरः।
पूरण प्रलेह
क. मांसपूरण के योग से, (मैदा की पट्टिका में मांसपूरण भरकर) लोष्ठाकार (ढेला)
के आकार का बनाकर, स्विन्न (उबाल) लेते हैं, फिर सूक्ष्म काटकर, घृत में
भृष्टकर, प्रलेह की विधि से पाक करते हैं।
९० क्षेमकुतूहलम् षष्ठोत्सवः ९१
ख. गुण- वातनाशक, कफकारक, मुखवैरस्यनाशक तथा गुरु होता है॥१३३- अथ हरितवर्णप्रलेहः
१३४¹/₂॥ मेथिका कासमर्द्दाम्लकल्केन च करालिते।
अथ शुक्लवर्णप्रलेहः घृते मांसं विनिक्षिप्य पचेच्छुक्लप्रलेहवत् ॥ १४१ ॥
घृतवेसनधान्याकहिङ्गुभृद्दधिसंयुते ॥ १३५ ॥ सिद्धं च गालयेद्वस्त्रैः कृत्वा वर्णप्रयोजनम्।
वस्त्रपूतेऽर्धसंपक्के स्विन्नं मांसं विनिक्षिपेत्। ताम्बूलं काष्ठजाङ्गारं देयं हरितहेतुना ॥ १४२ ॥
लवणं हिङ्गु निक्षिप्य शुण्ठीं क्षिप्त्वा सुपाचयेत् ॥ १३६ ॥ हरित वर्ण प्रलेह
एलां क्षिप्त्वाऽवतार्येत पटपूतं च धूपयेत्। मेथिका, कासमर्द (छौंक) अम्लिका कल्क से करालित, घृत में मांस (खण्ड)
शुक्लवर्ण प्रलेह डालकर शुक्ल प्रलेह (पूर्ववत्) पाक करते हैं, पक्व (सिद्ध) हो जाने पर, वस्त्र धौत
घृत, वेसन, धान्यक, हिंगु, दधि मिश्रित कर वस्त्रपूत करते हैं, अर्धपाक जाने करते हैं। ताम्बूल तथा काष्ठमांसाद हरित वर्ण बनाने हेतु मिश्रित कर देते हैं॥१४१-
पर स्विन्न मांस डाल देते हैं सैन्धव, शुण्ठी चूर्ण मिलाकर सुपक्व करते हैं तथा बड़ी १४२॥
इलायची (बृहदैला) का चूर्ण मिश्रित कर वस्त्रपूत (छान) लेते है, तथा सुगन्धित धूप अथ रक्तवर्णप्रलेहः
से सुन्धित कर लेते हैं॥१३५-१३६¹/२॥ रक्तवर्णप्रलेहस्य संसिद्धयर्थं विनिक्षिपेत्।
अथ पीतवर्णप्रलेहः करमर्दं दाडिमस्य स्थाने शेषं तु पूर्ववत् ॥ १४३ ॥
प्रलेहः पीतवर्णोऽपि कार्यः शुक्लप्रलेहवत् ॥ १३७॥ अरुचौ रुचिदः सद्यो नानावर्णप्रसाधितः।
विशेषोऽत्र हरिद्रायाः संसर्ग कुङ्कुमस्य वा। प्रलेहः कफवातघ्नः किञ्चित्पित्तकरः स्मृतः ॥ १४४॥
तप्तस्नेहे क्षिपेद्धिङ्गुसंयुक्तं कासमर्दनम् ॥ १३८ ॥ रक्तवर्ण प्रलेह
धान्यं च लवणाजाजी धौतं मांसं ततः क्षिपेत्। क. विधि- रक्तवर्ण प्रलेह पाक हेतु, दाडिम के स्थान पर करमर्द डालते हैं।
ततोऽर्धस्फुटिते मांसे दाडिमी बीजसंयुतम् ॥ १३९ ॥ शेषविधान पूर्ववत् (शुक्लवर्ण प्रलेह के समान)।
तक्रं शुण्ठीं विनिक्षिप्य सिद्धे हिंगु विनिक्षिपेत्। ख. गुण- सद्य रुचिकारक, विविध वर्णीय प्रलेह कफ-वातनाशक तथा किंचित
तत उत्तार्य वस्त्रेण गालयेद्धूपयेदपि ॥ १४० ॥ पित्तकारक होता है॥१४३-१४४॥
पीतवर्ण प्रलेह अथ भृष्टमांसम्
यह (पीतवर्ण) प्रलेह, शुक्लवर्ण प्रलेह के समान बनता है; केवल इसमें हरिद्रा अङ्गारकर्पराभ्यां च शूल्यन्त्रे पुरेऽथवा।
या कंकुम (केशर) का चूर्ण मिश्रित कर देते हैं। तप्त तैल में कासमर्द (छौंक या भर्जनं विविधं प्रोक्तं सूपकारविशारदैः ॥ १४५ ॥
मसाला) मिलाने के पश्चात, धान्यक-सैंधव-जीरक-धौत (धुला) मांस डालते हैं। मांस जलेन स्वेदयेत्पूर्वं प्रोतं शूलेऽन्तरन्तरम्।
के अर्ध स्फुटित (आधा खिल जाने पर) अनार बीज, तक्र तथा शुण्ठी डालकर सिद्ध दध्यार्द्रहिङ्गुलवणैर्लिप्ताङ्गारग्निना पचेत् ॥ १४६ ॥
करते हैं, फिर (अन्त में) हिंगु (घृत भृष्ट) मिला देते हैं। फिर अग्नि से उतार कर, तच्छूल्यं तु सुधासुल्यं रुच्यं वह्निप्रदं लघु।
सुगन्धित धूपित करते हैं॥१३७-१४०॥ तदेवाङ्गारपक्वं तु प्रत्तंसं वातनाशनम् ॥ १४७ ॥
९२ | क्षेमकुतूहलम्
धृष्टमांसम्
क. विधि- सूपकार विपादों (पाक शास्त्रियों) ने अंगर आँच तथा कर्पूर (खपरी)
द्वारा शूलयन्त्र (या पुर) में विभिन्न प्रकार की विधियों से मांस भूनने का विधान
किया है। सर्वप्रथम जल में स्वेदन तथा शूल (लोहे की छड़ या शलाका) में कुछ
अन्तर देकर मांस के खण्डों के यूथ (माला जैसे) बना लेते है, उसके बार दधि,
आर्द्रक, हिंगु तथा लवण से लेप करके, इस शूल को अंगार (अग्नि) पर पकाते
हैं। यह शूल्य मांस अमृत के समान हो जाता है।
ख. गुण- रुचिकर, दीपन, तथा लघु। यही मांस अंगार पक्व हो जाने पर उष्ण
होता है तथा वात का नाश करता है॥१४५-१४७॥
अथ यकृद्भृष्टम्
स्विन्नं यकृद्धृते तप्ते दध्नाऽऽलोड्य च भर्जितम्।
मात्रया दधिसिन्थूत्थरामठैलापरिप्लुतम् ॥ १४८ ॥
मरिचार्द्रकसंयुक्तं सुगन्धिद्रव्यवासितम्।
गतद्रवं सुधांतुल्यं परिशुष्कं तदुच्यते ॥ १४९ ॥
परिशुष्कं स्थिरं स्निग्धं रोचनं तर्पणं लघु।
बलमेधाग्निमांसौजः शुक्रवृद्धिकरं परम्॥ १५० ॥
यकृद्भृष्टम्
क. विधि- यकृत (कलेजी/ कलेजा/ जिगर) को स्विन्न करके, दधि में मिलाकर,
शीतल घृत में भृष्ट करते हैं। फिर मात्रानुसार दधि, सैन्धव, हिंगु, एला, मरिच
चूर्ण एवं आर्द्रक को मिश्रित करते हैं, तथा सम्पूर्ण मांस द्रव्य को सुगन्धित कर
लेते हैं। द्रवांश शुष्क हो जाने पर, परिशुष्क यकृत् को प्राप्त करें- इसे सुधा
(अमृत) के समान कहा गया है।
ख. परिशुष्क यकृत् स्थिर, स्निग्ध, रुचिकारक, तृप्तिकर एवं लघु होता है; यह
बल्य, मेध्य, मांस-ओज तथा वीर्यवर्धक (गरम) है॥१४८-१५०॥
अथ तान्दूरम्
अङ्गारपूर्णगर्तायामलग्नमवलम्बितम् ।
विहितं संभृतैर्मासं पक्वं तान्दूरमुच्यते ॥ १५१ ॥
षष्ठोत्सवः | ९३
तान्दूरम्
अग्नि-अंगार से पूर्ण गड्ढे (गर्त) में एकत्रित कर बिना लटकायें हुए।
(अलग्नमग्नविचितम्- दोलायन्त्र के समान) परिपक्व मांस को पकाने की विधि को
'तान्दूरमांस' नाम दिया जाता है। यह तान्दूरी रोटी पकाने की विधि का अन्तरमंद है,
जिसमें रोटी (गेहूँ के रोटी से बनी) के स्थान पर मांस प्रयोग है॥१५१॥
अथ सुस्वादुतान्दूरम्
पचेद्गर्तन्तरिक्षस्थंलम्बि संभारसंभृतम्।
चतुर्दिङ्मण्डलाकारे पार्श्वप्रज्वलितानले ।। १५२॥
विपक्वं सुरभि स्वादु तान्दूरमिति कीर्त्यते।
तन्दूर मांस पाक
एकगर्त का खात (गड्ढे) के मध्य (बीच) में संग्रह (एकत्रित) कर की लटका देते
हैं, तथा चारों ओर मण्डलाकार पार्श्व में प्रज्वलित (जली हुई आँच) अग्नि में पक्व
(पकाते) हैं।
यह गुणों में सुस्वाद, सुगंधित एवं स्वादिष्ट पाक 'तान्दूर मांस' नाम धारण
करता है॥१५२१/२॥
अथ शूलपक्वतान्दूरम्
कोष्ठिकायां ससंभारमलग्नमवलम्बितम् ॥ १५३ ॥
मांस विधाय बाह्याग्निज्वालया स्वेदितं वरम्।
तान्दूरं रुचिदं मांसं मृदु पथ्यतमं स्मृतम् ॥ १५४॥
सद्योहतं नवं स्थूलमन्यथा दोषकारकम्।
शूलपक्व तान्दूर
क. विधि- कोष्ठिका (गर्त की चतुर्मिति-चारदीवारी पर) एकत्रित करके-शूल
(अल्पका) में लिप्त (लगा) तथा लटकाकर, बाह्याग्नि की ज्वला (अग्नि की
लपट) से मांस को भलीभांति स्वेदित करते है- इस पाक की 'शूल पक्व
तान्दूर' नाम दिया जाता है।
ख. गुण- रुचिकारक, मृदु, पथ्यतम (बहुत हितकर। नवीन स्थूल तान्दूर मांस विशेष
लाभप्रद होता है; अन्यथा यह दोषजनक हो जाता है॥१५३-१५४१/२॥
क्षे. कु. 7
९४ क्षेमकुतूहलम्
अथ पुटपाकः
सूक्ष्मंयत्कुट्टितं मांसं संभृतं वेसवारकैः॥ १५५॥
छत्रं पत्रैर्मृदा सर्वं वेष्टितं वर्तुलाकृति।
पचेत्प्रज्वलिते गर्ते कणिक्यान्तितवेष्टितम्॥ १५६॥
पचेदेवं बीजपूरनारङ्गदलवेष्ट्यपि।
पुटपाक
मांस के सूक्ष्म खण्ड-कुट्टित वेसवार के साथ पीसकर-पक्ववृत्त, मृत्तिका से
वर्तुलाकृति में वेष्टित (बटलोही के आकार का गोला) तथा प्रज्वलित गर्त में रखकर,
ऊपर से अग्नि (किरीषआदि से) प्रदान करते हैं- पाकार्थ। इसको बीजपूर तथा नारिकेल
पत्रों से भी अविष्टित (ढकने) करने की विधि हैं, जिससे मांस पाक सम्यक् रूप से
सिद्ध हो जाये॥१५५-१५६¹/₂॥
अथ फलपुटपाकः
पिष्टं साम्लमनाम्लं वा संभृतं कोरिते फले॥ १५७॥
पूर्ववत्पुटितं वह्नौ विपचेत्फलसंज्ञकम्।
पुटपाकेन यन्मांसं पाचितं पाचकं हि तत्॥ १५८॥
सोष्मं तद्गुणवज्ज्ञेयं शीतं शुष्कं तु दुर्जरम्।
फलपुटपाक
क. विधि- मांस पिष्ट को, अम्ल सहित या रहित- चीरकर (फल के मध्य में
अवस्थित कर), पूर्ववत् पुटपाक विधि का अनुसरण करते हैं- यह 'फलपुटपाक'
की क्रिया है (पूर्ववत्)।
ख. गुण- पुटपाक का उष्मा सहित (गर्भ) सेवन करने से गुणवान सिद्ध होता है;
शीतल एवं शुष्क पुटपाक दुर्जर (देर से पचने वाला) मांस व पाक हो जाता
है॥१५७-१५८¹/₂॥
अथ राजिकमांसम्
मांसस्य पिष्टिका कृत्वा वेसवारेण योजिताम्॥ १५९॥
बहुधा क्रियते तस्या वटिकावटकादिकम्।
आम्रचिञ्चीफलाकारं लड्डुकावटकादिकम्॥ १६०॥
षष्ठोत्सवः ९५
शृङ्गाटकफलाकारं यथाबुद्धिप्रकारजम्।
कृत्वाऽपि बहुधाकारं स्वेदितंघृतभर्जितम्॥ १६१॥
वेसवायुते तक्रे क्वथिते च मनोरमे।
निक्षिप्य चालयेद्दुत्तार्थैलादिवासिते॥ १६२॥
एवं तु बहुधा कार्यो मांसमुद्गप्रलेहकः।
प्रलेहो वातजिद्बल्यस्तक्रमांसभवो रसः॥ १६३॥
प्रीणनो व्रणयुक्तानां शुक्रदः क्षीणरेतसाम्।
राजिक मांस
क. विधि- वेसवार मिश्रित मांस पिष्ट से विभिन्न प्रकार के वटक, वटिका, आम्र-
चिंचा फलाकार, लड्डू आकार, शृंगारकाकार तथा स्वेच्छानुसार वटक बनाकर,
स्वेदित करते हैं, फिर घृत में भृष्ट- वेसवार युक्त, तक्र में डालकर, एला से
सुगन्धित काढ़ी (क्वचित) में डाल देते हैं, फिर दवींचालन ((अग्नि से
हटाकर)। इस रीति से मांस तथा मुद्ग के विभिन्न प्रकार के प्रलेह-पुटपाक निर्मित
हो सकते हैं।
ख. गुण- प्रलेह वातनाशक तथा बल्य। तक्र एवं मांस निर्मित रस (शोरकातरी)
व्रणी तथा क्षीण वीर्य पुरुषों के लिए लाभकर है॥१५९-१६३¹/₂॥
अथ मांसेण्डरी
पिष्टे मांसेण्डरीं स्विन्नां मासूरे पर्णवेष्टिताम्॥ १६४॥
मरिचैः स्नेहलवणैः संस्कुर्याद् धूपयेत्ततः।
मांसस्येण्डरिका प्रोक्ता गुर्वी वृष्याऽनिलापहा॥ १६५॥
विशेषोऽत्र गुणानां यः स ज्ञेयो मांसभेदतः।
मांसेण्डरी
क. विधि- मसूर पिष्ट में मांस पूरण कर, 'मांसेण्डरी' निर्माण करते हैं, जिसको
पत्रावेष्ट कर स्विन्न करते हैं, फिर मरिच चूर्ण, स्नेह तथा लवण मिश्रित कर
पक्व (सिद्ध) करते हैं; तदनन्तर सुगन्धित धूपाचित कर लेते हैं- इस 'मांसेण्डरी'
नाम देते हैं।
ख. गुण- गुरु (विष्टम्भ), कृष्य तथा वातनाशक। विशेष गुण 'मांसेण्डरी' में प्रयुक्त
मांस द्रव्यानुसार होता है॥१६४-१६५¹/₂॥
९६ क्षेमकुतूहलम्
अथ कुट्टितं मांसम्
मांसमस्नायु संगृह्य सूक्ष्मं कृत्वा त कुट्टितम् ॥ १६६ ॥
वेसवारसुगन्धं तत्स्वेदितं पाचितं भवेत् ।
कुट्टितं पाचितं मांसं तन्मांसं लघु दीपनम् ॥ १६७ ॥
तत्रापि जाङ्गलं श्रेष्ठं जाङ्गलेष्वपि पक्षिणाम् ।
कुट्टित मांस
क. विधि- स्नायु रहित मांस के सूक्ष्म खण्डों का कुट्टन (कूटकर) सुगन्धित द्रव्य
मिलाकर स्वेदन कर पकाते हैं। यह 'कुट्टित मांस' कहा जाता है।
ख. गुण- यह लघु, पाचक तथा दीपन होता है। यह जांगल पक्षियों में उत्तम मांस
माना जाता है।।१६६-१६७ १/२ ।।
अथ मधुरमांसपाकः (क्षीरामृतम्)
घृताम्बुस्वेदिते मांसे शुण्ठिचूर्णं विनिक्षिपेत् ॥ १६८ ॥
दुग्धं च शर्करोपेतं पश्चात्सौगन्धिकं न्यसेत् ।
नातिसान्द्रं नातिशुष्कमिदंक्षीरामृतं स्मृतम् ॥ १६९ ॥
क्षीरामृतं बहुरसं न चोष्णं नातिशीतलम् ।
वातपित्तहरं वृष्यं सुस्निग्धमतिकोमलम् ॥ १७० ॥
मधुर मांसपाक (क्षीरामृतम्)
क. विधि- घृत तथा जल के साथ पाक्व मांस, में शुण्ठी चूर्ण डालते हैं, फिर दुग्ध
तथा शर्करा का मिश्रण कर देते हैं, तथा अन्त में सुगन्धित द्रव्य से सुवासित कर
देते हैं। यह पाक, अधिक गाढ़ा (सान्द्र) तथा न अधिक शुष्क (सूखा) होना चाहिए।
ख. गुण- यह बहुरसयुक्त पाक, न अधिक उष्ण एवं न अधिक शीतल, वातपित्त-
नाशक, वृष्य, सुस्निग्ध तथा अतिमृदु।।१६८-१७०।।
अथ मुण्डरन्थनम्
समग्रं विदहेन्मुण्डमग्निना स्थूलहेतिना।
प्रक्षाल्य तप्तपानीयैर्लोमनाशाय घर्षयेत् ॥ १७१ ॥
खण्डयित्वा पचेत्तैले घृते वापस्करान्विते ।
मुण्डामिषं वातहरं स्निग्धं गुरुतरं स्मृतम् ॥ १७२ ॥
षष्ठोत्सवः ९७
पशोर्यस्य हि यन्मुण्डं तन्मांसैकगुणावहम् ।
मुण्डस्य विधिना पाच्यं चरणं तु प्रलेहितम् ॥ १७३ ॥
चरणं वातहृद्बल्यं वृष्यं पित्तहरं गुरु।
मुण्डरन्थन विधान
क. विधि-पशु के सम्पूर्ण मुण्ड के तीव्र अग्नि में दहन करें, तप्त जल में- जल
से प्रक्षालन हेतु- रोगों (बालों) का घर्षण करके उनका निष्कासन कर देते हैं।
तत्पश्चात् मुण्ड के खण्ड करके स्नेह में पाक करते हैं- लवण तथा उपस्कार
मिलाकर, पाक कर लेते हैं। मुण्ड का भलीभाँति पकाते हैं तथा चरण (पैरों) को
प्रलेह की भाँति पकाना चाहिए।
ख. गुण- यह (मुण्ड मांस) वातनाशक, स्निग्ध, गुरु (गरिष्ठ) पशु के गुणानुसार
मुण्ड का भी गुण रहता है। पशु चरण (पक्व) वातनाशक, हृद्य, वृष्य,
पित्तशामक तथा गुरु होता है।।१७१-१७४।।
अथान्त्ररन्थनम्
अन्त्रिकां छिद्रमार्गेण धौतां निर्मलवारिणा ।
शृङ्खलासंज्ञितां कृत्वा स्वेदयेद्धिङ्गुवारिणा ॥ १७४ ॥
कर्तितां वेसवाराम्लैस्तलयेद्वा प्रलेहयेत् ।
अन्त्रिका गुर्विकाऽरूक्षा वातहृच्छ्लेष्मकारिणी ॥ १७५ ॥
निःसारा विरसोद्गारा तद्वज्ज्ञेया तु घण्टिका ॥ १७६ ॥
आन्त्रराधनम्
क. विधि- आन्त्र के छिद्र को स्वच्छ जल से प्रक्षालन करके, श्रृंखलाकार में हिंगु-
जल से स्वेदन करते हैं। तत्पश्चात् काटकर वेसवार तथा वेसवार तथा अम्ल जल
मिलाकर, तेल या प्रलेह बना लेते हैं।
ख. गुण- अन्त्रिका मास गुरु, अरूक्ष (स्निग्ध), वातनाशक, कफवर्धक, क्षार-
रहित, विरस, उद्गार जननी। इसी प्रकार घण्टे का (घाँटी) का भी गुण होता
है।।१७४-१७६।।
अथ राजिकामांसम्
स्विन्नं तक्राम्बुना मांसं घृतभृष्टं सुवासितम् ।
सुचूर्णं सैन्धवोपेतं दधिराजिकया युतम् ॥ १७७ ॥
९८ क्षेमकुतूहलम्
मांसासुरी तु वातघ्नी लघ्वी रुच्या बलप्रदा।
कफघ्नी पित्तला किञ्चित्सर्वाहारम्य पाचनी ॥ १७८ ॥
राजिका मांस
क. विधि- तक्र जल में मांस खण्ड का स्वेदन (उबाले) मांस को घृत में भृष्ट
(भून) कर सुवासित (सुगन्धित द्रव्यों) द्वारा करें, तदनन्तर राजिकाचूर्ण (राई),
सैंधव, वेसवार, दधि मिश्रित करके, राजिका मांस का पाक करते है।
ख. गुण- यह वातनाशक, लघु, रुचिकारक, बलप्रद, कफघ्नी, चिन्नल तथा
किंचित् सर्वाहारी पाचनी है।।१७७-१७८।।
अथ मांसपूरितवार्ताकिम्
वृन्तमुत्तार्य वार्त्ताकं कोरितं पूरयेद्दृढम्।
कुट्टिताख्येन मांसेन पूरितं पूरणेन वा ॥ १७९ ॥
ततस्तेनैव वृन्तेन तच्छिद्रं मुद्रितं पुनः।
सन्धिं कणिक्यया लिप्य प्रलेहविधिना पचेत् ॥ १८० ॥
मांसवृन्ताकसंभूतः प्रलेहो वातनाशनः।
रुचिपुष्टिकरश्चैव बल्यो वृष्यो रुजापहः ॥ १८१ ॥
क. विधि- वृन्ताक (बैंगन) के वृत्त तथा कोरित (गूदा) का निष्कासन कर, उत्तम
कुट्टित मांस-पुटपाक पक्व वेसवार युक्त की दृढतापूर्वकपूरित करते हैं अथवा
मृंगु-धान्यक के जल में स्वेदन किए मांस को, सूक्ष्म कुट्टित कर, हिंगु-जीरक,
आर्द्रक, निम्बू, एला, सैन्धव मिलाकर, संतृप्त घृत में भृष्ट करें तथा सुगन्धित
मांस से पूरित करते हैं।
ख. गुण- मांस वृन्ताक प्रलेह ग्राह्य, रुचिकर पुष्टिदा, बल्य, वृष्य तथा
रोगनाशक।।१७९-१८१।।
अथ पक्षिमांसप्रकारः
त्वक्पक्षरहितं मांसं स्विन्नं तक्रेण वा जले।
अथवा पुटपाकेन स्वेदितं वाऽथ दार्विके ॥ १८२ ॥
शलकास्थं पचेदग्नौ दधिसैन्धवहिङ्गुभिः।
संस्कृतं मरिचैलाभिरेतत्पक्वत मं स्मृतम् ॥ १८३ ॥
अथवा स्वेदितं मांसं पाचितं वैसवारिकम्।
षष्ठोत्सवः ९९
घृते द्रवे वा विरले प्रलेहविधिवत्पचेत् ॥ १८४॥
पक्षिमांस
क. विधि- पक्षियों के चर्म-पक्ष निष्कासित कर, तक्र या जल में स्वेदन करके,
काष्ठ या लौह शलका पर रख (लगा) कर, सैन्धव एवं हिंगु के साथ मरिच-
एला का चूर्ण डालकर पाक करते हैं। इस भलीभाँति पक्व मांस की पथ्यतम
मानते हैं अथवा स्विन्न (उबले) मांस को वेसवार मिश्रित कर, घृत या द्रव मे
पृथक्-पृथक् प्रलेह का पाक किया जाता है।।१८२-१८४।।
अथ महाबलपाकः
कृत्वा पक्षविहीनं तद्बीजपूरार्द्रसैन्धवैः।
लवङ्गैलायुतं पेष्यं लोष्टीकृत्य सुस्वेदितम् ॥ १८५ ॥
ततः कृतं शलाकास्थं भृष्टकं स्यान्माबलम्।
महाबलपाक (महाबलभूरिपाक)
क. विधि- पक्ष विहीन पक्षी में, बीजपूर स्वरस, आर्द्रक सैन्धव चूर्ण के साथ,
लवंग-एला-चूर्ण मिश्रित करके- जोष्ठीकृत (सिल पर घीस लेते हैं) तथा फिर
गोलक बनाकर, स्वेदन किया जाता है। तदन्तर काटकर शलाका पर रख
(लगा) कर, अग्निभृष्ट कर लेते हैं- इसी को महाबल या महाबलभूरिक पाक
कहा जाता है।।१८५१/२।।
अथ बलभूतिपाकः
त्वक्पक्षरहितं स्विन्नं गुम्फितं चान्तरान्तरम् ॥ १८६ ॥
शलाकायां च संपाच्यं भृष्टोपस्करसंयुतम्।
शूल्यं सर्वोत्तमं मांसं लघु रुच्यमपित्तलम् ॥ १८७ ॥
कफवातहरं श्रेष्ठं सर्वपाकोत्तमोत्तमम्।
बलभूतिपाक (महाबलभूरिपाक)
क. त्वक् (चमड़ी) तथा पक्ष (पंख) रहित पक्षी-मांस (के छोटे-टुकड़ों की) को
स्विन्न करके, शलाका में ग्रथित। गुण्ठित (माला की तरह बाँधकर) करके पकाते
हैं, फिर उपस्कर (वेसवार) सैंधवसहित, भृष्टकर (भून लेते) हैं।
ख. यह भृष्ट शल्य मांस सर्वोत्तम माना जाता है। लघु, रुचिकारक, पित्तनाशक,
१०० क्षेमकुतूहलम्
कफ-वातनाशक के रूप में श्रेष्ठ, तथा सर्वपाकों में उत्तमतम श्रेणी का
है।। १८४-१८७१/२।।
अथानूपजम्
स्वेद्यमानूपजं मांसं लुञ्चितं भजितं मनाक् ॥ १८८ ॥
क्षालितं वारिणाऽत्यर्थं वेसवारेण संयुतम्।
रन्धितं बहुधा भुक्तौ स्वेदितं वारिणा भृशम् ॥ १८९ ॥
सुस्विन्नं खण्डितं सर्वमङ्गाद्वेऽस्थिविवर्जितम्।
तप्तमाज्ये सबालीके बेसवारसमन्विते ॥ १९० ॥
भर्जितं पाचितं तोयैः पूर्ववत्स्वेदसंभवैः ।
प्रलेहतलने वाथ शूले वा बहुधा पचेत् ॥ १९१ ॥
आनूपं बलकृन्मांसं स्निग्धं गुरुतरं स्मृतम्।
धान्याङ्कुरचरा येऽत्र तेषां मांसं लघुत्तमम् ॥ १९२ ॥
विपाचितास्तिन्तिरित्तिरिवर्त्तिकाद्याः कपिञ्जला लावकपोतकाश्च।
एकैकशो द्रव्यचयानुयोगान्मण्डूकाकरूपा कथिता सुधानाम् ॥ १९३ ॥
उदकस्थलजातानां विधिरुक्तस्तु रन्धने।
पक्षिणो यस्य यन्मांसं तन्मांसं तद्गुणावहम् ॥ १९४॥
आनूपदेशजपक्षी मांस
क. विधि- आनूप (निम्न) देशज पक्षी के चर्म-पक्ष निष्कासित मांस की अल्प भृष्ट
कर, जलप्रक्षालन-स्वेदन करते हैं, फिर उपस्कार (वेसवार-लवण सहित)
मिश्रित कर, शुष्क पाक करते हैं, पुनः जल में स्वेदन करके, समस्त अंगों से
अस्थियाँ निकालकर, संतप्त घृत में (हिंगु सहित) उपस्कार के साथ) भूनते हैं,
तथा स्वेदन जल (पूर्व में अवशिष्ट) में पाक करते हैं। इसको प्रलेह के समान,
तलकर शूल पर कई प्रकार से पाक करके, निर्माण किया जा सकता है।
ख. गुण- आनूप देशज पक्षी का मांस बल्य, स्निग्ध एवं गुरुतर। धान्यांकुर चर
पक्षी का मधुर, सुपाकी तथा उत्तम। तित्तिर, वर्तिक, वर्तिक, कपिञ्जल, लावक,
कपोतक आदि पक्षियों के मांस से- अनेक द्रव्यों के संयोग से- अमृत के
मण्डूक के समान। माना गया है (अर्थात् अमृत के समान गुणकारी)।
जल तथा थल के निवासी पक्षियों के मांस की विधि उपरोक्त है, जिस पक्षी के
षष्ठोत्सवः १०१
जो मांस के गुण होते हैं, उसीप्रकार के उसके कल्पों (पाको) के गुण उसी के
समान होंगे।।१८४-१९४।।
अथ तित्तिरिः
तित्तिरिर्वर्णदो ग्राही हिक्कादोषत्रयापहः।
श्वासकासहरः कृष्णस्तस्माद्गौरोऽधिको गुणैः ॥ १९५॥
तित्तर-तिक्किरि
तित्तिर का मांस वर्णदायक, ग्राही, हिक्का-श्वास-त्रिदोष-कास नाशके। कृष्णतित्तिर
की अपेक्षा श्वेत तित्तिर का मांस अधिक गुणवान् ॥१९५॥
अथ वर्तीरः
वर्तीरोऽग्निकरः शीतो ज्वरदोषत्रयापहः।
सुरुच्यः शुक्रदो बल्यस्ततोऽल्पा वर्तिका स्मृता ॥ १९६ ॥
वर्तीर
वर्तिर (वर्तीर-बटेर) के मांस के गुण- यह हृद्य, शीतल, स्निग्ध, अग्निदीपन,
शीतल; ज्वर-त्रिदोषनाशक, रुचिकारक, वृष्य तथा बल्य होता है। वर्तिका (स्त्री बटेर)
के मांस के गुण अल्प होते हैं।।१९६।।
अथ लावकः
लावो हृद्यो हिमः स्निग्धो ग्राही वह्निप्रदीपनः।
पांसुलः श्लेष्मलस्तेषा मुष्णीवीर्योऽनिलापहः ॥ १९७॥
गौरकः कफवातघ्नो रूक्षो वह्निप्रदः परम्।
पौण्ड्रकः पित्तकृत्किञ्चिल्लघु श्लेष्मश्रमापहः ॥ १९८ ॥
दर्भरो रक्तपित्तघ्नो हृदामयहरो हि सः।
शीतलो रुचिकृद्वृष्यः पथ्यदः शीघ्रपाचनः ॥ १९९ ॥
लावक
लावक (लावा) के मांस के गुण- यह हृद्य, शीतल, स्निग्ध, ग्राही, दीपन,
पांसुल तथा कफकारक होता है। इन पक्षियों का मांस उष्णवीर्य होने से वातनाशक होता
है। गौरवर्णीय लावा का मांस कफवातनाशक, रूक्ष, उत्तम अग्निवर्धन है। पौण्ड्र देशज
लावा का मांस पित्तवर्धक, किंचित् लघु, कफघ्न, श्रमहर होता है। दर्भर लावा (मांस)
पृष्ठ १०२
रक्तपित्तनाशक, हृद्रोगनाशक, शीतल, रुचिकारक, उत्तम पथ्य (हितकर) तथा लघु
(शीघ्रपाकी) होता है॥१९७-१९९॥
अथ कपोतः
कपोतको गुरुः स्निग्धो रक्तपित्तानिलापहः।
संग्राही शुक्रलः शीतः सुस्वादूरुचिकारकः॥२००॥
कपोत
कपोत के मांस का गुण- गुरु, स्निग्ध, रक्तपित्त, वातनाशक, संग्राही, वृष्य,
शीतल, स्नायु एवं रुचिकारक होता है॥२००॥
अथ मयूरः
मायूरं पाचितं मांसं घृते स्वोपस्करान्विते।
ईषल्लवणसंयुक्तं मरिचैलासमान्वितम्॥२०१॥
मायूरं मुष्णं काषायं कफानिलहरं गुरुः।
वर्षाकाले न तत्सेव्यं दुष्टकीटाहिभक्षणात्॥२०२॥
मयूर
क. विधि- मयूर का मांस उपस्कार (मसाला) आदि के साथ घृत में पाक करते हैं;
इसमें अल्पलवण, मरिच, एला चूर्ण मिश्रित करते हैं।
ख. गुणः- उष्ण, कषाय, कफ, वातनाशक, तथा गुरु (दुष्पच) होता है। वर्षाकल
में मयूर का मांस निषिद्ध है, क्योंकि इस समय दुष्ट कीटों, सर्पों का भक्षण करने
के कारण मयूर- मांस दूषित हो जाया करता है॥२०१-२०२॥
अथ हिताहितम्
सद्योहतं भवेन्मांसं व्याधिहारि सदाऽमृतम्।
वयःस्थमकृशं सात्मयमन्यथा परिवर्जयेत्॥२०३॥
वृद्धानां दोषलं मांसं बालानां बलदं गुरु।
च्युतगर्भा गुरुर्योषिद्गर्भो गर्भवती तथा॥२०४॥
स्वयं मृतमबल्यं स्यादातीसारकरं गुरु।
विषामृतानां मांसं तु दोषत्रयरुगावहमू॥२०५॥
विहङ्गेषु पुमाञ्छेष्ठः श्रेष्ठा स्त्री पशुयोनिषु।
पृष्ठ १०३
पश्चिमाधों लघुः पुंसां स्त्रीणां पूर्वार्धमादिशेत्॥२०६॥
तुल्यजातिस्वल्पदेहा महादेहेषु पूजिताः।
अल्पदेहेषु शस्यन्ते ये स्युर्विपिनचारिणः॥२०७॥
हिताहित
हितकर तथा अहितकर मांस का विवेचन (वर्णन) किया जा रहा है।
क. सद्यभृत पशु-पक्षी का मांस रोगनाशक एवं अमृत के समान प्रभावकारी होता है,
आयुष्य तथा शारीरिक दौर्बल्यहर तथा सात्म्य होता है।
ख. इसके विपरीत (बिम्ब से मृत पशु-पक्षी का मांस) हानिकर होने से, परित्याग
होता है।
ग. सामान्यतः पशु-पक्षी मांस, दोषोत्पादक, अत्यन्त बलदायक एवं गुरु दुष्पाचक
होता है।
घ. च्युतगर्भा (गिरे हुए गर्भ) वाले/ वाली मादा, (स्त्री जाति) के। की पशु-पक्षी का
मांस गुरु (कठिनाई से पाचक होता है। इसी प्रकार (गर्भवती) मादा का मांस मृद
होता है।
ङ. स्वयं मृत पशु-पक्षी का मांस दुर्बल, अतिसारकारक एवं गुरु हुआ करता है।
च. विषाक्तप्रभाव से मृत पशु-पक्षी त्रिदोषजनक तथा रोग जनक होता है।
छ. पक्षी मांस श्रेष्ठ तथा पशु योनि में मादा का मांस उत्तम माना जाता है।
ज. स्त्रियों के अग्रभाग तथा पुरुषों में पृष्ठभाग (पशु-पक्षी) ग्रहणीय होता है तथा
लघु (पुरुषमांस) माना गया है।
झ. स्थूल शरीर के पशु-पक्षी की तुलना में, सूक्ष्म (छोटे) शरीर के पशु-पक्षी का
मांस गुणों में होता है। अल्पदेह वाले (पशु-पक्षी) की अपेक्षा विपिन (वनो मे)
विचरण करने वाले का मांस श्रेष्ठ हुआ करता है॥२०३-२०७॥
चेष्टावता परं मांसं हृद्यं रुच्यं लघु स्मृतम्।
देहमध्यं गुरु प्रायः सर्वेषां प्राणिनां मतम्॥२०८॥
पक्षक्षेपपाद्विहङ्गानां तदेव वरमुच्यते।
गुरूम्प्यण्डानि सर्वेषां गुर्वी ग्रीवा च पक्षिणाम्॥२०९॥
पृष्ठ १०४
१०४ क्षेमकुतूहलम्
ये मृगा विहगास्तोयदूरावासप्रचारकाः।
तेऽनभिष्यन्दिनः सर्वे विपरीता अतोऽन्यथा॥२१०॥
जलानूपभवाः सर्वे जलानूपचराश्च ये।
गुरुभक्ष्या गुरुतरं तेषां मांसमुदीरितम्॥२११॥
क. चेष्टावान् पशु-पक्षी का मांस गुण- हृद्य, रुच्य, लघु
ख. देह मध्य मांस गुण- प्राय, गुरु
ग. पक्षी (पंख) हिलाने (पशु-पक्षी) के कारण पक्षी- मांस उत्तम
घ. सर्वप्राणि अण्ड तथा ग्रीवा- गुरु
ङ. अजलीय पशु-पक्षी (निवास-विचरणकर्त्ता)- अनभिष्यन्दी
च. जल के निकटस्थ पशु-पक्षी का मांस- अभिष्यन्दी (पूर्व के विपरीत)
छ. जलीय प्रदेश- अल्प (निम्न) प्रदेशज तथा विचरणकर्त्ता प्राणियों का मांस-
अधिक गुरु (दुष्पाच्य)।
धान्योत्पत्तिप्रचाराणां लघु स्याल्लघुपक्षिणाम्।
ऊरुस्कन्धोदरं मूर्धा पादौ पाणी कटी तथा।
दृष्टित्वग्यकृदन्त्राणि गुरूण्याहुर्यथोत्तरम्॥२१२॥
ग्राम्यं मांसं वनजमथवाऽऽनूपजं वा बिलौकं
श्वेतं पीतं हरितमरुणं पाचितं सूपकारैः।
तल्यं शूल्यं सरसमधुरं स्वेदितं वाटितं वा
यस्य प्रायो यदभिरुचितं स्तूयते तेन तद्धि॥२१३॥
क. धान्योत्पत्तिदेशजश्चापि (विचरक) लघु पक्षी मांस- लघु
ख. प्राणियों के उरु, स्कन्ध, उदर, मूर्धा, पाद, हस्त, कटि, नेत्र, त्वक् (चर्म)
तथा यकृत एवं आन्त्र (का मांस)- उत्तरोत्तर गुरु
ग्राम्यज, वनज वा आनूपज, बिलौक (विलेशय) निवासी, श्वेत-पीत-हरित-अरुणवर्णीय
पशु-पक्षी के मांस को पाक करें। सूपकारों द्वारा विभिन्न प्रकार से तलित, शूल्य पक्व,
सरस, मधुर, स्वेदित या वाटित (वेष्टित) पर सिद्ध मांस- इनमें जो मांस उसकी रुचि
के अनुसार सुग्राह्य अभिलषित है, वह प्रायः उसी (भोक्ता) मांस की प्रशंसा (स्तुति)
करना स्वाभाविक है।।२१२-२१३।।
पृष्ठ १०५
षष्ठोत्सवः १०५
भक्तादिमांसपर्यन्तं सर्वमुक्तं मया भृशम्।
अथ मत्स्यभवा भक्ष्या उच्यन्ते सप्तमोत्सवे॥२१४॥
इति श्रीनरवैद्यमन्मथात्मजक्षेमशर्मविनिर्मिते क्षेमकुतूहले ग्रन्थे
मांसप्रशंसनो नाम षष्ठोत्सवः॥६॥
उपसंहारात्मक रूपरेखा
इस उत्सव (प्रकरण) के अन्तर्गत भक्त (भात) से मांस तक पाक की विधि तथा
गुणों का विवेचन मैंने किया है। आगामी सप्तम उत्सव (प्रकरण) में मत्स्यज भक्ष्य
पदार्थों के पाक (निर्माण) तथा गुणावली प्रस्तुत की जायेगी।।२१४।।
इति हिन्दी व्याख्या सहित क्षेमकुतूहल का षष्ठ उत्सव समाप्त॥
अथसप्तमोत्सवः
(सप्तम् प्रकरण)
अथ मत्स्यमांसप्रकार
मत्स्यखण्डानि संधृष्य क्षालयेत्प्रथमं जले।
ततो वेसनतक्राभ्यां बहुशः क्षालयेत्पुनः ॥ १ ॥
मत्स्य मांस निर्माण
मत्स्य (मछली) का साम्यक सघर्षण तथा खण्डित कर, जल से प्रक्षालन करते हैं, फिर वेसन (चणक्य सूक्ष्म चूर्ण) तथा तक्र (मट्ठा) क साथ बहुशः प्रक्षालन (धोते) करते हैं॥१॥
अथ गन्धनाशनम्
हरिद्राशुण्ठिधान्याककटुतैलैर्विमर्दयेत् ।
पक्षाल्य हिङ्गुना लिम्पेद् गन्धस्तेनोपशाम्यति ॥ २ ॥
मात्स्य गंध निवारण
प्रक्षालित मत्स्य मांस खण्डों को हरिद्रा- शुण्ठी-धान्यक-सर्षप तैल साथ विमर्दन करके, प्रक्षालन तथा हिंगु लेप का आवरण करें- इस क्रिया से मत्स्यगत गंध का शमन (निवारण/दमन) हो जाता है॥२॥
अथ मत्स्योत्तमरन्धनम्
तप्ततैले क्षिपेद्धान्यं कासमर्दं सहिङ्गकम्।
भृष्टं मत्स्यं सलवणं तक्रं क्षिप्त्वा पुनः पचेत् ॥ ३ ॥
अर्धपक्के क्षिपेदाप्रसिद्धचूर्णं सनागरम्।
दग्धं हिङ्गु विनिक्षिप्य साधयेन्मत्स्यमुत्तमम् ॥ ४॥
मत्स्योत्तमरन्थन (मत्स्य पाक विधि)
सुप्रक्षालित, गंधविहीन, खण्डशः (सुसंघर्षित) मत्स्य मांस की, संतप्त तैल में, धान्यक-कासमर्द (मसाला या छोंक), हिंगु भृष्ट के साथ करते (भूनते) हैं। इस मत्स्य को लवण सहित तक्र में पुनः पाक करते हैं, अर्धपक्ववान में, आम्र चूर्ण (अमचूर) शुण्टी चूर्ण मिला कर घृत संतप्त हिंगु डालकर, मत्स्य का पाक (सिद्ध) करते हैं॥३-४॥
सप्तमोत्सवः [पृष्ठ १०७]
अथ मत्स्यप्रलेहः
मांसप्रलेहवत्कार्यः प्रलेहो मत्स्यसंभवः ।
आदौ तैले खरे पक्वं सर्वमन्यद्धि पूर्ववत् ॥ ५॥
वर्णस्य करणे देयं पूर्वोक्तं द्रव्यकं हि यत् ।
उद्धूलनं सुगन्धाय दातव्यं पूर्वमीरितम् ॥ ६॥
मत्स्य प्रलेह
मांस प्रलेह के समान मत्स्य प्रलेह निर्माण विधि है, परन्तु मत्स्य खण्डों को खरपाक तैल में पाक कर लेते हैं (अन्य विधि मांस प्रलेह वत्) मत्स्य प्रलेह के वर्णीकरणार्थ, पूर्वोक्त द्रव्यों (वंकुम तथा रक्तचन्दन) का मिश्रण करते हैं, तथा सुगन्धित बनाने हेतु सुगन्धिद्रव्यों का उद् धूलन (चूर्ण) का संयोग कर देते हैं॥५-६॥
अथ मत्स्यखण्डप्रलेहः
सम्यक्पक्षालितं मत्स्यं वेसवारेण वेष्टितम्।
तत्तैले क्षिपेत्खण्डं हिङ्गुसैन्धवमिश्रितम् ॥ ७ ॥
प्रलेहविधिवत्साध्यो मत्स्यखण्डप्रलेहकः ।
मत्स्य खण्ड प्रलेह
सुपक्षालित मत्स्य मांस खण्ड के वेसकर से आवेष्टित कर, संतप्त तैल मे छोड़ते हैं, हिंगु तथा सैन्धव मिलाकर प्रलेह विधि से पाक करते हैं॥७ १/२॥
अथ मत्स्यपिष्टिका
गतत्वक्कण्टको मत्स्यो वेसवारेण संयुतः ॥ ८ ॥
शिलायां पेषितो भूयः प्रोच्यते मत्स्यपिष्टिका।
तैले विपाचयेत्पश्चाच्चतुर्थांशाम्लसंयुतम् ॥ ९ ॥
वेसवारेण च युतं शिलायां पेषयेत्पुनः ।
अनया पूर्ववत्कार्या मासस्येव प्रकारकाः ॥ १०॥
वटिका वटकाद्याश्च सूपकारधियोचिताः।
मत्स्यपिष्टिका
त्वक्-कण्टकरहित मत्स्य (खण्डों) को वेसवार मिश्रित कर, शिलापिष्ट करते
हैं, जिसे तैल में पाक कर होते हैं। फिर अम्लपदार्थ (चतुर्थांश) वेसवार (उपस्कार-
मसाला मिलाकर, पुनः शिला पर पीसकर, मत्स्यपिष्टिका से (पूर्ववत्) विभिन्न प्रकार
के पदार्थ- वटी, वटक आदि सूपकार (पाचक) की बुद्धि द्वारा निर्माण किए जा सकते
हैं। इसे मत्स्यपिष्टिका कहते हैं॥८-१०१/२॥
अथ मत्स्यपूरणम्
तक्रेण स्विन्नं मत्स्यस्य खण्डं प्रक्षाल्य पेषयेत् ॥ ११ ॥
बीजपूरार्द्रमरिचहिङ्गुसैन्धवजीरकैः ।
संयुक्तं कटुतैलाढ्ये घृते पक्त्वाऽथ चूर्णयेत् ॥ १२ ॥
मत्स्यपूरण
मत्स्य मांस खण्ड सुप्रक्षालित की शिलापिष्ट (पत्थर पर पीस कर लेते हैं, इसमें
बीजपूर- भृष्ट हिंगु-सैन्धव-जीरक का चूर्ण, कटुतैल या घृत में सिद्ध (पाक) करते हैं।
इसे मत्स्यपूरण कहते हैं॥११-१२॥
अथ मत्स्यपुटपाकः
गतत्वक्क्षालितं मत्स्यं कदलीपत्रवेष्टितम् ।
मृदा लिप्तं पुटे पक्वं संस्कृतं दाडिमादिना ॥ १३ ॥
वरो मत्स्यः पुटे पक्वो जीरतण्डुललेपितः ।
तविकायां पुनः पक्त्वा संमिश्रो मरिचादिना ॥ १४ ॥
मत्स्यपुटपाक
मत्स्य खण्ड-सुप्रक्षालित एवं चर्मरहित- कन्दली पत्र आवृत-मृत्तिका लेपित, को
पुटपाक यन्त्र में रखकर (पुटपाक विधि से पाक) करते हैं। तत्पश्चात् दाडिम स्वरस से
संस्कृत करते हैं। इस पुटपाक उत्तम मांस को जीरक तथा तण्डुल के कल्क से लेपित
करके, पुनः लविका (कटपार्क) में पुनः पाक करके, मरिच-शुंठी, हिंगु, सैंधव आने
(चूर्ण) का मिश्रण करके, पाक (सिद्ध) करते हैं॥१३-१४॥
अथ करालमत्स्यः
करालविधिना भृष्टं मुद्गपिष्टेन लेपितम्।
बृहन्मत्स्योदरातखण्डं रन्धयेत्तलनादिना ॥ १५ ॥
सप्तमोत्सवः १०९
मगरल मत्स्य
कराल विधि से भृष्ट बृहत् मत्स्य के उदर-खण्ड के मुद्ग पिष्टी में मिश्रित करके,
तलन-भर्जन-स्वेदन आदि विधियों के अनुसार सिद्ध (पाक) करते हैं- इसे 'मरगल
मत्स्य' पाक कहा जाता है॥१५॥
अथ रोहितः
रोहितोदरखण्डांश्च कासमर्देन मर्दिताः ।
कटुतैलपरिभ्रष्टा हिङ्गुसैन्धवयोजिताः ॥ १६ ॥
शकलं पिष्टसंभूतं रोहितं दधिमर्दितम् ।
वेसवारान्वितं पाच्यं प्रलेहविधिना भृशम् ॥ १७ ॥
रोहित मत्स्य
क. विधि- रोहित (रोहू) मत्स्य (मछली) उदर-खण्डों को कासर्मद (मसालाओं)
मर्दन करके, स्वर्ण तैल में भृष्ट करें तथा हिंगु-सैन्धव मिश्रित करें। इस द्रव्य का
दधि में मर्दित कर (उपस्कार-वेसवार) मिलाकर प्रलेह विधि से पाक कर लेते
हैं॥१६-१७॥
अथ गुणाः
रोहितस्योत्तमं देहं प्रलेहनावलेहितम् ।
सोऽश्नातीह नरः पूर्वजन्मवैनायको ध्रुवम् ॥ १८ ॥
रोहितः प्रवरो मत्स्यो नातिपित्तकरो गुरुः ।
वातहा पुष्टिदो हृद्यः स्निग्धः पथ्यो समीरिणाम् ॥ १९ ॥
गुण
रोहित मांस प्रलेह विधि (अवलेह) से भक्षण करने वाला मनुष्य, अवश्य
ही (पूर्वजन्म का) विनायक स्वरूप होता है, उत्तम रोहित मत्स्य नातिपित्तकर,
गुरु, वातघ्न, पुष्टिकार, हृद्य, स्निग्ध तथा वातज रुग्णों का पथ्य (हितकर)
है॥१८-१९॥
अथ पालाशिमत्स्यः
पालाशिखण्डं तिलतैलयुक्तं विपाचितं सैन्धवकासमर्दैः ।
हिङ्ग्वार्धधात्रीफलचूर्णकीर्णं नवं नवं रोचकमातनोति ॥ २० ॥
क्षे. कु. 8
११० क्षेमकुतूहलम्
पालाशिशर्बलदा वृष्या वातहा पित्तकृत्सरा।
गुर्वी कफकरा चोष्णा मेदः शुक्रविवर्धिनी ॥ २१ ॥
पलाश मत्स्य
क. विधि- मत्स्य (पलाशी) खण्डों को सैन्धव, कासमर्द (उपस्कार) के साथ,
तिल तैल में पाककरके, हिंगु-आर्द्रक-धात्रीपत्र फल चूर्ण मिश्रित करते हैं। यह
पलाशि मत्स्य (सिद्ध) पाक, नवरोचक होता है।
ख. गुण- यह बल्य, वातघ्न, पित्तजनन, सारक, गुरु, कफकारक, उष्ण, मेदा,
वीर्यवर्धक होती है॥२०-२१॥
अथ पाठीनः
पाठीनः खण्डितः शस्त्रैर्वेसवारसमन्वितः ।
कटुतैले परिभृष्टो हिङ्गुतक्रेण योजितः ॥ २२॥
पाठीनः कफकृद्बल्यो निद्रालुवार्त्तनाशनः ।
मांमाशी वातरक्तस्य कारकः शुक्रधारकः ॥ २३ ॥
पाठीन मत्स्य
क. विधि- पाठीन मत्स्य (मछली विशेष) शस्त्र द्वारा खण्डित, के वेसवार युक्त,
हिंगु-तक्र के साथ, सर्षपतैल पर पक्व करते हैं।
ख. गुण- कफकारक, बल्य तथा वातनाशका पाठीन मांस भोक्ता को वात-रक्त
कारक तथा वीर्यधारी होता हैं॥२२-२३॥
अथ मङ्गुरिका
मङ्गुरी मुण्डरहिता कटुतैले सुभर्जिता।
माणिमन्थनिशायुक्ता हिङ्गुना धूपिता च सा॥ २४॥
मङ्गुरी वातहा पथ्या रुच्या वृष्या बलप्रदा ।
अग्निसञ्जननी हृद्या तद्वदुक्ता च भृङ्गिका ॥ २५ ॥
मङ्गुरिका मत्स्य
क. विधि- मङ्गुरिका (मंगुरिका) मत्स्य का मुण्ड निष्कासित कर, सर्षण तैल में
भृष्ट करके, लवण-हरिद्रा चूर्ण-हिंगु धूपित करते हैं।
ख. गुण- यह विशिष्ट मत्स्य वातनाशक, मध्य, रुचिकर, वृष्य, बल्य, अग्निदीपन
तथा हृद्य होती है। यही सिगी मत्स्य का गुण हैं॥२४-२५॥
सप्तमोत्सवः १११
अथ गुण्डी
पुच्छशीर्षेण रहिता कासमर्दविमर्दिता।
हिङ्गुतैले च संतप्ता गुण्डीमत्स्यस्य खण्डकाः ॥ २६ ॥
गुण्डी वातहरा बल्या वृष्या पथ्याऽग्निवर्धिनी ।
सुरुच्या शुक्रदाऽत्यर्थं किञ्चित्कफकरा सरा ॥ २७ ॥
गुण्डी मत्स्य
क. विधि- मुण्डी मत्स्य को पुच्छ-शीर्ष रहित अवस्था में, कासमदि (मसाला-
वेसवार) मर्दन करते हैं, हिंगु से भृष्ट कर संतप्त तैल में भृष्ट करें- यह गुण्डी
मत्स्य का खण्ड होता है।
ख. गुण- वातनाशक बल्य, वृष्य, पथ्य, अग्निदीपन,, सुरुचिकर, शुक्रप्रद,
अल्पपित्तकर तथा सारक॥२६-२७॥
अथ मत्स्यमण्डकम्
मत्स्यस्य पिष्टिकां कृत्वा पर्णस्थां मण्डलाकृतिम्।
आधारेण समुत्स्विन्ना संयुक्ता धूलनेन तु ॥ २८ ॥
मत्स्यमण्डक
मत्स्य पिष्टी पत्र में रखकर, मण्डलाकृति बनायें तथा आधार काष्ठ पर रखकर
स्वेदन करते है, फिर उद्वूलन चूर्ण मिश्रण करते हैं॥२८॥
अथ मत्स्येण्डरी
कासमर्दीचूर्णेन मत्स्यपिष्टीं नियोजिताम्।
भर्जितां कटुतैलेन कुर्यान्मत्स्येण्डरी च सा ॥ २९ ॥
मत्स्येण्डरी
कासमर्द (वेसवार-मसाला) के साथ मत्स्य (मछली) पिष्टी (पीठी) को सर्षप तैल
में भर्जित करते (भून लेते) है। इस पाक को 'मत्स्येण्डरी' नाम है॥२९॥
अथ सूक्ष्ममत्स्याः
भर्जितास्तिलतैलेन सर्वसंभारसंभृताः।
सूक्ष्ममत्स्याः स्वादुरसा दोषत्रयनिबर्हणाः ॥ ३० ॥
परं सूक्ष्मास्तु ये तेषु सर्वे ते पुंस्त्वनाशनाः ।
[पृष्ठ ११२]
११२ क्षेमकुतूहलम्
सूक्ष्म मत्स्य
क. विधि- सूक्ष्म मत्स्य (छोटी मछलियों) को तिल तेल में भर्जित कर, संभार
(मसाला) आदि मिश्रित करके पाक करते है।
ख. गुण- मधुर रस तथा त्रिदोषनाशक। अतिसूक्ष्म मत्स्य पुंसरण को हानि-
कारक॥३०-१/२॥
अथ मत्स्यसामान्यगुणाः
मत्स्या बलप्रदा वृष्या गुरवः कफपित्तलाः ॥ ३१ ॥
उष्णाभिष्यन्दिनः स्निग्धा बृंहणाः पवनापहाः ।
ह्रदोद्भवा बलकरा न तु स्वल्पजलोद्भवाः ॥ ३२ ॥
हेमन्ते कूपजा मत्स्याः शिशिरे सारसा हिताः ।
मधौ ग्रीष्मे च काले च नदीचौण्ड्यतडागजाः ॥ ३३ ॥
शरत्सु नैर्झराः सर्वे वर्षोत्थाः सर्वदोषदाः ।
विभिन्न प्रकार की मत्स्य के सामान्य गुण-कर्म
मत्स्य (मछलियों) के विभिन्न भेद, जाति एवं उनके पाक (पूर्वोक्त) के विभिन्न
गुण-कर्म तथा आमयिक प्रयोगों का सामान्यतः (साररूप) वर्णन प्रस्तुत है-
क. बल्य, वृष्य, गुरु, कफपित्तकारक, उष्ण, अभिष्यन्दी, स्निग्ध, बृंहण (मांसजनन)
तथा वातनाशक- मत्स्य के सामान्य गुण।
ख. अगाध (गहरे) जल के मत्स्य बलकारक, अल्प (कम गहरे) जलाशय के मत्स्य
गुणवान् नहीं होते।
ग. हेमन्त ऋतु जन्य कूपजल मत्स्य, शिशिर ऋतु जन्य सारस (तालाब) मत्स्य,
वसन्त-ग्रीष्मऋतु जन्य नदी, पौण्ड्य तथा तडाग (तालाब) के मत्स्य तथा
शरदऋतु जन्य नैर्झर (झरने) मत्स्य हितकर।
घ. वर्षाऋतु जन्य सर्वप्रकार के मत्स्य सर्वदोष प्रद॥३१-३३१/२॥
मांसस्य बहुधा प्रोक्ताः प्रकारा रथने बुधैः।
सूपकाधिया कृत्वा मत्स्यस्य च ततोऽधिकाः ॥ ३४ ॥
मांस के विविध प्रकार-
विद्वान (पाक विद्या के ज्ञाताओं) ने मांसपाक (सिद्ध) करने के अनेक रूप
[पृष्ठ ११३]
सप्तमोत्सवः ११३
प्रकार, पाचक (सूपकार) स्वबुद्धि (ज्ञान-अनुभवानुसार) के आधार पर निर्देश किया हैं,
उससे भी अधिक मत्स्य पाकों का उल्लेख किया गया है॥३४॥
ओदनादि हि पयोन्तभोजनं मत्स्यमांसजनितं च यच्छ्रुतम्।
नाद्यभोजनयतेर्विमन्त्रणे तत्कथं खलु मयाऽनुर्णितम् ॥ ३५ ॥
श्रुत भोजनातिरिक्त पाक
भात (ओदन) से पयोन्तभोजन, मत्स्य एवं मांस से निर्मित होने वाले भोजन के
प्रकार, जो कुछ श्रुत (सुना भी-लेखक द्वारा), जो वर्तमान के भोजन सामग्री (प्रकरण)
में समावेश नहीं होते हैं, फिर भी उनका (मैंने) किसी प्रकार वर्णन करने का प्रयास
किया है॥३५॥
मत्स्यमांसभवः पाको मयोक्तः सप्तमोत्सवे।
षड्विधानां तु शाकानां प्रकारस्तदनूच्यते ॥ ३६ ॥
इति श्रीनरवैद्यमन्मथात्मजक्षेमशर्माविनिर्मिते क्षेमकुतूहले ग्रन्थे
मत्स्यमांसप्रशंसनो नाम सप्तमोत्सवः॥७॥
उपसंहारात्मक रूपरेखा
मैने (लेखक ने) सप्तम उत्सव (समापनावन सत्र) में मत्स्य तथा मांस से निर्मित
अनेक प्रकार के पाक (व्यंजनों) का वर्णन कर दिया है, अब आगे अष्टम उत्सव में
षड्विध (छह प्रकार) शाकों के निर्माण विधि के विवरण का विषय प्रतिफल है॥३६॥
इति हिन्दी व्याख्या सहित क्षेमकुतूहल का मांसपाक
वर्णन नामक सप्तम उत्सव समाप्त॥
अथाष्टमोत्सवः
(अष्टम् प्रकरण)
अथ शाकप्रकारः
पत्रं पुष्पं फलं नालं कन्दं मूलं तथैव च।
शाकं षड्विधमुद्दिष्टं गुरुं विद्याद्यथोत्तरम्॥१॥
शाक के भेद
शाक छह प्रकार के होते हैं, जिनके स्रोत सहित नाम इस प्रकार हैं- इन रसों
में उत्तरोत्तर गुरु (गरिष्ठ-विष्टम्भी-दुष्पाच्य) होत हैं-
१. पत्रशाक, २. पुष्पशाक, ३. फलशाक, ४. नालशाक, ५. कन्दशाक,
६. मूलशाक॥१॥
अथातः पत्रशाकस्य सामान्यतलने विधिः।
ततोऽन्येषां च वक्तव्यः प्रलेहादेरपि क्रमः॥२॥
हिङ्गुजीरयुते तैले क्षिपेच्छाकं सुशोभितम्।
लवणं चाम्रचूर्णादि सिद्धे हिङ्गूद्कं क्षिपेत्॥३॥
इत्येवं सर्वशाकानां तलने क्वथने विधिः।
पत्रशाक
इसके बाद पत्रशाक की सामान्य पाक विधि (तलने की क्रिया) वर्णन की
जायेगी; तथा उसके बाद अन्य शाको का पाक की विधि का उल्लेख किया जायेगा,
जिसमे प्रलेहादि समाविष्ट होता है।
शाक का भलीप्रकार प्रक्षालन करते हैं, तथा संतप्त तैल में हिंगु तथा जीरक से
भर्जित कर देते हैं, फिर लवण एवं आम्रचूर्ण (आमचूर) आदि अम्ल पदार्थ मिश्रित कर
देते हैं। यह द्रव्य सिद्ध (पका) हो जाने पर, हिंगूजल डालते हैं। यह समस्त प्रकार के
पत्रशाक का पाक करने की सामान्य विधि (तल-स्विन्न-सिद्ध) होती है॥२-३१/२॥
अथाष्टमोत्सवः १२५
वास्तुकं काकमाची च तण्डुलीयं पुनर्नवा॥४॥
चुञ्चुकं नालिका पाठा पच्यन्तेऽम्लेन तद्बुधैः।
वास्तुक, काकमाची, तण्डलीय, पुनर्नवा, चुञ्चुक, नालिका एवं पाठा- इन
समस्त शाक द्रव्यों के बुद्धिमानों द्वारा अम्लरस के साथ पाक किए जाते हैं।
कासमदों मेथिका, प्रफुन्नाट एवं चणक- इनका शाक अम्ल रहित जल में
मिश्रित कर, विद्वानगण इन द्रव्यों से शाक का भलीप्रकार से पाक करते हैं। इसी प्रकार
वृन्ताक, कूष्माण्ड, पटोल आदि फलों के तलन की विधि का अनुकरण करना
चाहिए॥४१/२॥
कासमर्दी च मेथी च पुन्नाटं चणकोद्भवम्॥५॥
रसार्द्रं त्वम्लरहितं पक्वं सम्यग्विचक्षणैः।
एवं वार्त्ताककूष्माण्डपटोलादिफलेष्वपि॥६॥
तलने विधिरुद्दिष्टो विशेषो यः स उच्यते।
तप्ततैले क्षिपेच्छाकं वास्तुकादिसुखण्डितम्॥७॥
लवणं तोयमल्पं च क्षिप्तं सिद्धेऽर्धमात्रकम्।
सधान्यवेशनं तक्रे गालितं क्वथितं क्षिपेत्॥८॥
ततः शुण्ठीं जीरकं च हिङ्गुं दत्त्वाऽवतारयेत्।
इत्थमेवापरस्यापि वर्णस्य करणे यदि॥९॥
तत्सर्वं स्वेच्छया देयं वर्णकृत्प्रथमं स्मृतम्।
सर्वशाक सामान्यतः विधि
फल शाक के तलने की विशेषता है। वास्तुक आदि शाकों को स्वच्छकर, भली
प्रकार काट लेते हैं, इसे संतप्त तैल में थोड़ाकर, लवण तथा अल्प जल मिला देते
हैं। अर्धपक्व हो जाने पर, धान्यक के साथ, बेसन को तक्र के साथ मिलते हैं तथा पाक
करते हैं। तदनन्तर, शुंठी, जीरक तथा भृष्ट हिंगु मिश्रित कर, अग्नि से उतार लेते हैं।
इसी प्रकार अन्य शाकों को उपर्युक्त विधि से, वर्णकारक इन सभी पदार्थों को
स्वेच्छानुसार छोड़ दिया करते हैं॥५-९१/२॥
एवं यत्कठिनं शाकं कषायं कटुतिक्तकम्॥१०॥
तदुत्स्वेद्याम्बुना पूर्वं तक्रेण तदनन्तरम्।
तप्ततैले विनिक्षिप्य रन्धयेच्च यथेच्छया॥११॥
११६ क्षेमकुतूहलम्
अन्य शाक-विधि
इस प्रकार कठिन, कषाय, कटु एवं तिक्त रस प्रधानशाकों को जल के साथ
स्वेदन (स्वित्र) करके, पुनः तक्र के साथ विदल करते हैं ग्रथा फिर सन्तृप्त तैल में
डालकर स्वेच्छा से शाक का निर्माण (पाक) करते हैं॥१०-११॥
अथ वृन्ताकम्
सर्वासां शाकजातीनां वृन्ताकं शाकनायकम्।
अतः शाकक्रमं त्यक्त्वा प्रथमं नायकं वदेत् ॥ १२॥
भोजनं धिगवृन्ताकं वृन्ताकं धिगवृन्तकम्।
सवृन्तं धिगतैलाढ्यं तैलाढ्यं धिगरामठम् ॥ १३ ॥
फल शाक
वृन्ताक
सर्वप्रकार के शाक जातियों (प्रकार-भेद) में वृन्ताक बैगन/बैंगन) का शाक उत्तम
(श्रेष्ठ) है इसीलिए इसको 'शाकनायक' कहा गया है (सर्वेसां शाकजातीनां वृन्ताकं
शाकनात्रकम्)। इस करण, शाक-क्रम की उपेक्षा करके, सर्वप्रथम फलशाक के रूप में
वृन्ताक के फलशाक पर प्रकाश डालते है।
महत्ता
'वृन्ताक' का व्यंगात्मक वैशिष्ट्य निरूपित है- वृन्ताकरहित भोजन को धिक्कार
हैं (भोजनं धिगवृन्ताकं' आदि), वृन्तरहित वृन्ताक के धिक्कार है; अति तैल रहित
वृन्तयुक्त वृन्ताक को धिक्कार है, अधिक तैल युक्त वृन्तसहित वृन्ताक हिंगु रहित होने
के स्थिति में धिक्कार की श्रेणी में परिगणित होता है- अर्थात् वृन्ताक को 'धिक्कार'
की अवस्था मे ले जाने वाली सभी स्थितियों की बहिर्ष्क्रमण अथवा पूर्ति आवश्यक
है (जिससे वृन्ताक की गुणवत्ता से पूर्णतया स्वाभाविक कोटि में अवस्थित किया जा
सके)॥१२-१३॥
वार्त्ताकं कलितं सुवृन्तसहितं संस्वेदितं काजिके
शुद्धेऽम्ले घृतधान्यकार्द्रक निशासंपर्किनं पाचितम्।
सक्षारं मरिचावचूर्णितमथो तैलेन हिङ्ग्वा लस-
द्वासं दारुमयेऽपि पुंसि कुरुते घ्रातं क्षुधाबोधनम् ॥ १४॥
अथाष्टमोत्सवः ११७
शाकपाक : विविध प्रकार
वृन्ताक (फल) को सवृन्त (भेंटी सहित-फलवृन्त के साथ) काटकर, कांजिक
एवं शुद्ध अम्लपदार्थ से स्वेदित करके, घृत-धान्यक-आर्द्रव-हरिद्रा का चूर्ण मिश्रित
करके पाक करते हैं, फिर भृष्टहिंगु (भुनी हींग) सुगन्धित कर तैल में डालते हैं। इस
रीति से पक्व (सिद्ध) वृन्ताक शाक की केवल गन्ध (घ्रातं क्षुधाबोधनम्) से काष्ठ-
निर्मित पुरुष (दारुमयेऽपि पुंसि) को भी भूख लग जाती है (क्षुधाबोधनम्)॥१४॥
वृन्ताकखण्डा यदि तेऽत्र संवृतस्तैलप्लुता हिङ्गुरसेन युक्ताः।
मरीचधूलीपरिधूसराङ्गा भवन्ति पुण्योदयराजपुंसाम् ॥ १५ ॥
वृन्ताक फल खण्डों को तैल में हिंगु रस में भृष्ट (भूनकर), मरिच चूर्ण मिश्रित
कर पक्व (सिद्ध) किया शाक, पुण्यवान् राजाओं को भाग्य से प्राप्त करता है॥१५॥
हरितं त्वामवार्ताकं कटुतैले सरामठे।
सिद्धं मरिचसंबद्धं कोष्णमेतद्रुचिप्रदम् ॥ १६ ॥
हरित वर्णिय वृन्ताक को हिंगु में भृष्ट कर, सर्षप तैल में पाक (सिद्ध) कर लेते
हैं, फिर मरिच चूर्ण का मिश्रण करते हैं। इस विधि से पक्व वृन्ताक शाक, कोष्ण
(अल्पगर्म) शाक रुचिकारक (रुचिप्रदम्) प्रभाव करता है॥१६॥
वार्त्ताककर्तला लिप्ताः शुण्ठीधान्यकजीरकैः।
घृते भृष्टाः समरिचा हिङ्ग्धूपेन धूपिताः ॥ १७॥
वृन्ताक फल खण्डों को शुण्ठी-धान्यक-मीरक से (पूर्ण रूप में) लेपन करके,
घृत में भृष्ट करके मरिच चूर्ण मिश्रित करते हैं, फिर हिंगु धूम से सुगन्धित करें। वह
शाक रुचिवर्धन करता है॥१७॥
सवृन्तवृन्ताकतूरीयखण्डं सरामठं तप्तघृते सुपाचितम्।
ससैन्धवं चुक्रकसाकसंयुतं सगोलिकं पूर्वजपुण्यदापितम् ॥ १८ ॥
सवृन्त वृन्ताक के सु (तुरीय) खण्डो को, हिंगु युक्त संतृप्त घृत में पक्व, सैन्धन
एवं चुक्रशाक से युक्त शाक की उपलब्धि, पूर्वजन्म के पुण्यकर्म का द्योतक है। (अर्थात्
पूर्वसुकर्मों के फलस्वरूप वृन्ताक का इस प्रकार का समतल होता है)॥१८॥
वृन्ताकं वृन्तसहितं कृत्तं बाहिकसंयुतम्।
पक्वमाघ्रियुतं स्वाज्ये ललिजिह्वान्तरे स्थितम् ॥ १९ ॥
११८ क्षेमकुतूहलम्
सवृन्त वृन्ताक खण्ड, हिंगु तथा आम्रपूर्ण (पक्वा) युक्त, घृत में पक्व शाक की
जिह्वा मे स्थिति होती है (अर्थात् सुन्दर-सौभाग्यवनती जिह्वा को इस प्रकार का शाक
रसास्वादन हेतु उपलब्ध (प्राप्त) होता है।।१९।।
प्रभृष्टतण्डुलसमीकृतनालिकेर-
पिष्टैः सहैव मरिचेन समेलकेन।
वार्त्ताकमुत्तमघृतैरनुपाचितं यत्
सिन्धूदरानलमिवानलमातनोति ॥ २०॥
प्रभृष्ट तण्डुल (भून तण्डुल चूर्ण), नारिकेल पिष्टी, मरिच चूर्ण- मिश्रण का घृत
मे पक्व वृन्ताक शाक का सेवन, समुद्रगत अस्थि (वाडवाग्नि) के समान पावकाग्नि
का दीपन करती है॥२०॥
स्विन्नार्धवृन्तवृन्ताकं कर्पूरण विपाचितम्।
जीराज्यवेसवारार्थ्यमाप्तवर्गैः सहाशितम् ॥ २१॥
अर्धवन्त सहित स्वेदन किया वृन्ताक का शाक, कर्पूर के साथ पक्व, जीरक-
घृत-वेसवार मिश्रित करके बनाते हैं। यह शाक आप्त जन (आत्मीय बन्धु बांधनों) के
साथ खाद्य योग्य है॥२१॥
वृन्ताकं फलमादृतं सुकलितं शस्त्रेण तद्वारिणि
क्षिप्तं तैलविपाचितं नवदलं जम्बीरनीरान्वितम्।
हिङ्ग्वार्द्रेण सुवासितं बहुरसं सिन्धूत्थसंथूलितं
भोक्त्रा केन न निन्दितं बहुगुणं सौधं जलं दुर्लभम् ॥ २२॥
अति रसयुक्त वृन्ताक शाक सिद्ध विधान
आदर के पात्र (सम्मतित) वृन्ताक फल को शस्त्र (चाकू-छूरी आदि) से सुकलित
(काटकर) जल में प्लावित करें, तथा उसका तैल में पक्व करें। फिर जम्बीर नीर।
जम्बीरी नींबू का स्वरस) में, हिंगु-आर्द्रक से सुगन्धित करके, सैंधव चूर्ण डालते हैं।
इस प्रकार वृन्ताक के सरस शाक भक्षण करने वाला कौन ऐसा है, जो अतिगुणवान्
दुर्लभ के अमृत के जल को भी स्वय देता है अर्थात् भोक्ता अमृज जल को भी निन्दित
मान लेता है॥२२॥
अकृत्तवृन्तं वृन्ताकं चतुर्धार्धस्य खण्डितम्।
वेसवारोषणाहिङ्गतक्रक्वाथेन पाचितम् ॥ २३॥
अथाष्टमोत्सवः ११९
अङ्गारपक्वं वार्त्ताकं क्षोदितं घृतयोजितम्।
सैन्धवभृष्टबाहीके धूपितं स्याद्भटित्रिकम् ॥ २४॥
त्वग्वन्तगतवृन्ताक पुटपाकेन पाचितम्।
सैन्धवेनाज्यहिङ्गुभ्यां मिश्रितं रुचिकारकम् ॥ २५॥
क. अवृत्तवृत्तं वृन्ताक शाकम्-वृन्त सहित (बिना काटे डंगल या मेंटी) वृन्ताक के
अर्धभाग के चार खण्ड, वेसवार (मसाला) सहित, हिंगु तथा तक्र क्वाथ के
साथ पाक किया जाता है।
ख. अङ्गारपाचित-भटित्रिक वृन्ताक शाकम्- अग्नि ज्वला (अंगार) पकाये
वृन्ताक (बैगन) को मसलकर (क्षोदित) कर घृत का मिश्रण करते है, फिर
सैन्धव तथा हिंगु डालकर सुगन्धित बना लेते हैं। इस प्रकार के पक्व शाक को
'भटित्रिक' संज्ञा दी गयी है।
ग. त्वग्वृन्त सहित वृन्ताक शाकम्- वृन्ताक (फल) के वृन्त (डंगल) तथा त्वक्
(छिलका) रहित फलकी पुटपाक विधि से पक्व शाक में, सैंधव घृत-हिंगु (भुनी
हुई) मिश्रित कर देते हैं।
यह वृन्ताक (विशिष्ट) का शाक रुचि का वर्धन करता है॥२४-२५॥
सुस्विन्नवृन्ताकफलं भृशाग्निना
संक्षोदितं तन्तु न नालवर्जितम्।
सुवासितं राजिकसैन्धवान्वितं
विमर्द्य दध्ना परिवेष्टितं ध्रुवम्॥ २६॥
स्वेदित वृन्ताक- वृन्ताक फल तीव्र अग्नि (अंगार) से सुस्वेदित करके, फल
का मर्दन (शोधित) करके (नालरहित)- वृन्ताक शाक (बैगन का भरता-भर्ता)-
सुगन्धित, राजिका-सैन्धव युक्त, दही मर्दन करके, परिवेष्टित किया हुआ शाक बनाते
हैं। विशेषतया अवश्य हो रुचि संजनन देता है॥२६॥
निर्धूमानलपाचितमानं वार्त्ताकमुज्झितं बीजैः।
आर्द्रकनिम्बुकसैन्धवस्नेहैरालोडितं रुचिं धत्ते॥ २७॥
वृन्ताक (फल बीज) निष्कासित बीज रहित वृन्ताक शाक को निर्धूम अग्नि मे
पक्व, आर्द्रक-निम्बूक-सैन्धव-घृत मिश्रित कहते है। यह शाक रुचि वर्धक होता
है॥२७॥
१२० क्षेमकुतूहलम्
वृन्ताकं स्वादतिक्तोष्णं कटुपाके च पित्तलम्।
रुच्यं वाताहरं हृद्यं दीपनं शुक्रलं लघु ॥ २८ ॥
कृष्ण वृन्ताक फल शाक
स्वादु, तिक्त, उष्ण, कटुपाकी, पित्तकारक रोचक (रुचिवर्धन), वातनाशक,
हृद्य, दीपन, शुक्रल एवं लघु॥२८॥
अपरं श्वेतवार्ताकं कुक्कुटाण्डोपमं फलम्।
कृष्णाद्धीनगुणंकिंचिदर्शसां नाशनं परम्॥ २९ ॥
श्वेत वृन्ताक फल शाक
अपर श्वेत वृन्ताक फल (कुक्कुटोपम-मुर्गी के अंडे के समान रंग कुछ कम
काला), अल्प गुणवान् तथा अर्शनाशक॥२९॥
वह्नेर्दीप्तिकरं परं रुचिकरं गुल्मापहं पाचनं
प्लीहानं च शिरोरुजं विजयते जीर्णज्वरं कामलाम्।
हन्याद्धातकफामरोगनिचयं मूत्रग्रहं साश्मरीं
वृन्ताको मृदुवह्निना सुपचितः पुंभिः सदा सेव्यते ॥ ३० ॥
मन्दाग्नि पक्व वृन्ताक शाक
मन्द (हल्की) अग्नि में पक्व वृन्ताक शाक, अग्निदीपन, रुचिकर, गुल्माघ्न,
पाचक, प्लीहा-शिरःशूल-जीर्णज्वर-कामला-कफ-आमरोग-मूत्रग्रह-अश्मरी, विशेषतया
पुरुषों द्वारा भक्षण योग्य (हितकर)॥३०॥
दलितं तलितं सरामठं नवबिम्बीफलमात्तसैन्धवम्।
मरिचोद्भवचूर्णसंयुतं घृतपाकेन करोति रोचनम् ॥ ३१ ॥
विम्बफल शाक
बिम्बी फल (कुन्दुरु) के फल को कर्तन (खण्ड) कर (दलित), हिंगु के साथ तल
कर (तलित), सैंधव तथा मरिच चूर्ण डालकर-घृत के साथ पक्व शाक तैयार करते हैं।
यह रुचिवर्धन होता है॥३१॥
बिम्बीफलं सकलमेव घृते निधाय
तप्ते ससैन्धवमिदं मुहुरुत्क्षिपेच्च।
अथाष्टमोत्सवः १२१
सोपस्करं कथितमत्र निधाय तक्रं
वाघारयेदति च दीपनमेव वह्नेः ॥ ३२ ॥
विम्बीफल शाक
सम्पूर्ण विम्बी फल (शाक बनाने हेतु) संतृप्त घृत में डाल देते हैं, फिर सैंधव
मिलाकर चलाते हैं, तथा बाद में उपस्कार (मसाला रहित) युक्त तक्र डालकर, छौंक
(वाघारयेदति-वघार) लगा देते हैं। यह शाक अग्निदीपन करता है॥३२॥
बिम्बीफलार्धकलितं हिङ्गुसैन्धवमिश्रितम्।
प्रलेहविधिना पाच्यं परिवृत्य छमत्कृतम् ॥ ३३ ॥
विम्बी प्रलेह
विम्बी फलार्ध (आधे-आधे टुकड़ों) को हिंगु-सैंधव मिलाकर, दर्वीचालन करते
हुये (क्षमकृत-छौंककर), प्रलेह विधि के अनुसार पाक करते हैं॥३३॥
अङ्गारभर्जितं बिम्बीफलं संक्षोदितं करैः।
दधिहिङ्गुघृते न्यस्तं सक्षारं रुचिकारकम् ॥ ३४ ॥
अङ्गारभर्जित विम्बी फलशाक
विम्बी फलों को अग्नि ज्वाल (अंगारों) पर अर्जित (भूनकर), हाथों से मसल
देते हैं (संशोधित करे), फिर दधि-भृष्ट हिंगु-घृत-लवण शाक में मिश्रित कर देते हैं।
यह विम्बी का भर्तृ (भरता/रूपी शाक सक्षार तथा भोजन में रुचिकर होता है॥३४॥
तिर्यग्वा खण्डितं चार्धस्विन्नं बिम्बीफलं भृशम्।
दधिराजिकया युक्तं सैन्धवेनानुमिश्रितम् ॥ ३५ ॥
विम्बी रायता
विम्बी फलों को तिर्यक खण्डित (तिरछा काटकर, अर्धस्वेदन (अर्धपक्व)
करके, दधि, राजिका तथा सैंधव मिश्रित करते हैं। इस तरह रायता का निर्माण होता
है॥३५॥
बिम्बीफलं स्वादु शीतं रक्तपित्तप्रणाशनम्।
स्तम्भनं लेखनं चातिविबन्धाध्मानकारकम् ॥ ३६ ॥
विम्बी फल स्वादु, शीत, रक्तपित्त शामक, स्तम्भन, लेखन, निबन्ध तथा
आध्मानकार होता है॥३६॥
१२२ क्षेमकुतूहलम्
अथ शिम्बी
नैष्पावकं सुदलितं नवबीजकोशं
तप्तेन हिङ्गुजकणेन ससैन्धवेन।
प्रभ्रष्टकल्पतिलतैलकृतप्रबोधं
मान्द्यं हरेच्च जठरान्तरवर्तिवह्नेः॥ ३७॥
बिम्बी फल गुण-कर्म (सामान्य)
१. स्वादु (मधुर) २. शीत (शीतल)
३. रक्तपित्तशामक ४. स्तम्भक
५. लेखन ६. अति विबन्ध्यकारी
७. आध्मानकर
शिम्बी शीता गुरुर्बल्या श्लेष्मा वातपित्तजित्।
कोलशिम्बी समीरघ्नी गुर्व्युष्णा कफपित्तकृत्॥ ३८॥
क. शाक विधि-शिम्ब (भटवांस) के नवीनबीज कोश (डोडी) कटकर, हिंगु कण
तथा सैंधव संतप्त तैल में प्रभृष्ट (भूनकर) शाक सा बीज निकालकर) का
निर्माण करते हैं।
ख. गुण-कर्म-यह जठर (उदर) के अन्तरवर्ति (अन्दर रहने वाली) अग्नि मांद्य
नाशक हैं।
कोलशिम्बी (सुअर सेम) वातनाशक, गुरु (गरिष्ठ), उष्ण तथा पित्तजनन होती
है॥३८॥
अथ तोरी (तोरई)
निःशेषिताखिलसिरावलिकृत्तखण्डं
दण्डाहतं च मृदुपाकमवाप्यते हि।
हिङ्ग्वम्लतैललवणैः परिपाचितं च
कोशातकीफलमिदं मरिचेन रुच्यम्॥ ३९॥
कोशातकी (तोरई)
कोशातकीफल की सिराओं को निष्कासित करके, काटकर खण्ड बनायें तथा
दण्डाहत (डंडे से कुचलें) करें। यह मृदुपाक हो जायेगा। तदनन्तर हिंगु, अम्ल पदार्थ,
अथाष्टमोत्सवः १२३
तैल, लवण के साथ पाक करते है, फिर मरिच चूर्ण मिला देते हैं। यह कोशातकी शाक
रोचक (रुचिवर्धक) गुण करता है॥३९॥
राजकोशातकी शीता ज्वरघ्नी कफवातला।
महाकोशातकी तद्वत्सिद्धाऽनिलपित्तहा॥ ४०॥
राजकोशातकी
१. शीत २. ज्वरघ्न
३. कफवातकारक ४. पूर्व (कोशतकी के प्रसंग) में वर्णित विधि से पक्व
शाक अर्श, वातरोग तथा पित्तनाशक होता है।
अथ चवेडा (चचिण्डा)
ऊर्ध्वं विधिना कृत्तं बृहत्पाटोलकं फलम्।
हिङ्गुना पाचितं तप्ते घृते सुरुचिकारकम्॥ ४१॥
चचिण्ड-चिचिण्डशाक
चचिण्ड (चचेंडा) फल की सिरा निष्कासित कर (पूर्वोक्त विधि से) कर्तन करते
हैं, फिर हिंगु से पाचित (छौंक) कर, संंतृप्त घृत में शाक कर पाक कर लेते हैं। यह
शाक सुरुचिकारक होता है।
चचेण्डं कर्तलाकारं कृत्तमाज्ये छमत्कृतम्।
प्रलेहाविधिना राद्धं रुच्यं लवणमिश्रितम्॥ ४२॥
चचिण्ड-शाक प्रलेह
चचेण्डफल कर्तन कर, घृत में भौंक कर (छमत्कृतम्) तथा लवण मिलाकर,
प्रलेह निर्माण करते हैं। यह शाक रुचि प्रदायक होता है॥४२॥
श्वेतराजिकया शुभ्रं बृहत्पाटोलक फलम्।
पित्तघ्नं वातहृद्वल्यं रुच्यं पथ्यं हि देहिनाम्॥ ४३॥
चचिण्डफल-वृन्ताक
श्वेत राजिका मिश्रित कर, चिचिण्ड (बृहत्पटोलक) के शाक का (पूर्वोक्त विधि/
सेपाक करते हैं। इसके गुण-कर्म इस प्रकार है-१. पित्तनाशक, २. वात हत, ३.
बल्य, ४. रुच्य या ५. पथ्यकारक (मनुष्यों के लिए हितकारक)॥४३॥
printed letters:
It looks like: अलललोबोश्व or अललाबोध्वं or अललाब्वोर्ध्वं?
Wait! Look at the curve of the 3rd letter:
It's ल with ो?
Wait, let's look at the letters one by one:
1: अ
2: ल
3: ल
4: बो
5: श्व (Wait, look at श्व: is there a loop? It looks like श्व or ध्व? In अश्मरिभेदकम् , look at श्म: श has a loop. In विबन्धकृत् , look at न्ध. In सपिण्डम् , etc.)
Wait, look at the top of char 5: there is NO repha? No, there is nothing above the headline except maybe a tiny mark? Wait, there is no repha, wait, is there an anusvara?
Wait, look at the word: फलं has an anusvara. Does char 5 have an anusvara? No!
Wait, look at char 5: it has a headline, a loop on the left, a loop on the right... wait, it's श्व? No, wait!
Could it be अलललोबोश्व?
Wait, let's transcribe it as faithfully as possible to