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क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

क्षेमकुतूहलम् - चतुर्थोत्सवः (पृष्ठ ३८)

३८ क्षेमकुतूहलम्
से (खण्डित ईर्ष्या से क्रुद्धनायिका के, मुख के समान) प्रसन्न करने वाला; प्रियंगु-
पुन्नाग- लोध्ररजकणों से युक्त हिमार्ड्र वाए, आकाश आच्छादक अपने मार्ग से बहता
रहता है- धूम समूह से आच्छादित काल को हेमन्त ऋतु कहा जाता है।।३-४।।
नीहारानिलसंस्पर्शाद्द्बलवान् मारुतो यतः।
अतो हेमन्तसमये सेव्या शुण्ठ्या हरीतकी ॥ ५॥
तिलतैलेन शिरसो गात्रस्याभ्यङ्गमाचरेत् ।
सेवेतादित्यकिरणान्निर्धूमकहुताशनम् ॥६॥
आच्छादयेच्च कौशेयं प्रावारं चित्रमम्बरम् ।
कार्पासकं नवं सेव्यं गृहं चागुरुधूपितम् ॥ ७ ॥
हेमन्तचर्या
तुषारयुक्त वायु के स्पर्श से वात बलवान हो जाता है, अतः शुण्ठी के साथ हरीत
की सेवन का विधान है; धूम रहित अग्नि का सेवन, तिलतैल का शिर एवं शरीर पर
अभ्यंग, सूर्यताप (किरण) से ऊष्मा लाभ लेते हैं। उपयुक्त वस्त्रों से शरीर का आच्छादन,
धूप आदि सुगंधि नवीन निवास स्थान में वास करना चाहिए।।५-७।।
हेमन्ते कुटुतिक्तोष्णमम्लक्षारघृतं दधि।
गोधूमतिलमापेक्षुविकारान् भक्षेद्वहून ॥ ८ ॥
औदकानूपमांसानि कौलब्रध्रप्रलेहितान्।
हेमन्ते सेवयेन्नित्यमाशु शीतार्तिशान्तये ॥ ९ ॥
हेमन्त आहार
कटु-तिक्त-अम्ल रसयुक्त, उष्ण पदार्थ, क्षार, घृत, दधि, गोधूम तिल, माष
तथा इक्षुविकार (पकवान) का सेवन हितकर है। शीतजन्य कष्ट निवारणार्थ
औदक-आनूपज जन्तु मांस, नदी तट पर सूर्यप्रकाश तथा प्रलेह का सेवन करना
चाहिए।।८-९।।
कस्तूरिकागरुविमिश्रितकुङ्कुमार्ड्र-
देहां निषेव्य रमणीं रतिखेदखिन्नः ।
शेते कृती हिमविशालनिशागमेषु
तारुण्यपीनकुचयोगनिरस्तशीतः ॥ १० ॥


क्षेमकुतूहलम् - चतुर्थोत्सवः (पृष्ठ ३९)

चतुर्थोत्सवः ३९
हेमन्तचर्या
कामदेव से पीड़ित (रतिखेदखिन्नरमणी) तरुणी के कठोर स्तनों के संयोग से
शीतलता को निवारण किया हुआ, विद्वान कस्तूरी तथा अगरु मिश्रित केशर से आर्द्र
शरीर युक्तरमणी के आलिंगन सहित रात्रि को मुखपूर्वक शयन करना चाहिए।।१०।।
अथ शिशिरलक्षणचर्ये
यत्रामृतद्युतिकरव्रजसन्निकाशै-
र्व्योमा दिशश्च विदिशश्च तुषारजालैः ।
रुद्धं नभश्च हिमपीडितवच्च वह्ने-
राशामुपैति तपनः शिशिरः स कालः ॥ ११ ॥
शिशिर ऋतु
क. शिशिर ऋतु लक्षण-चन्द्रमा की किरण समूहों के समान तुषारकाल में
दिशायें, निकासों के कोण व्याप्त होकर, शीत से व्यथित जैसा आकाश अवरुद्ध हो जाता
है; सूर्य उत्तर दिशा (उत्तरायण) में पहुंच जाता है- इस काल को शिशिर ऋतु कहा जाता
है।।११।।
हिमोक्तचर्या शिशिरेऽपि कार्या पथ्या च सेव्या सह पिप्पलीभिः ।
पिष्टान्नकं सूरणशृङ्गवेरमिश्रं सदा संवटिकादिसेव्यम् ॥ १२ ॥
शिशिर ऋतुचर्या
हेमन्त ऋतु के समस्त आचरण पालनीय, हरीतकी-पिप्पली का सेवन, पिष्टान्न,
सूरण, आर्द्रक मिश्रित संवटिका आदि व्यंजनों का प्रयोग हितकर है।।१२।।
वसन्तलक्षणचर्ये
यत्रागस्त्यहरित्प्रवृत्तपवनव्याधूतचूतव्रजा-
रामोदारपरागपुञ्जपिहितं व्योमापि संराजते ।
छिन्नं रेणुचयैरिव स्मरविभोर्यत्रोद्धतैरिच्छतो
जेतुं सर्वजगन्ति स स्मरसखो ज्ञेयो वसन्तोदयः ॥ १३ ॥
वसन्त ऋतु लक्षण
अगस्त्य के पीत वर्ण हो जाने से, प्रवृत्त वायु के झोके से, आम्र के मनोहर पराग

द्वारा आच्छादित आकाश धूलिका आप्र सुशोभित होता है, तथा छिन्न सम्पूर्ण विश्व विजय
की कामना करता है, इस काल को कामदेव का मित्र (स्थिर सखा) वसन्तोदय मानना
चाहिए।।१३।।
तत्र श्लेष्मा बलोपेतो रुणद्धि जठरानलम्।
रोगान् करोति बहुशस्तेन पूर्वं कफं जयेत्॥ १४॥
हरीतकी क्षौद्रयुता च सेव्या श्रमो विधेयश्च बलानुरूपः।
भृङ्गवलीकोकिलनादरम्यरामाः सुरामासहितैर्निषेव्याः॥ १५॥
वसन्तऋतुचर्या
इस काल के बलवान् होने से, जाठराग्नि मन्द होकर, अनेक रोग जनक हो
जाता है, अतः सर्वप्रथम कफ को विजित करें। मधु-हरीतकी का सेवन, बल के
अनुसार श्रम करें, सुन्दर स्त्रियों के साथ भ्रमर तथा कोकिल शब्द-गुंजरित मनोहर
आराम (बगीचे) में विहार करना चाहिए।।१४-१५।।
तीक्ष्णं रूक्षं च कटुकं कषायं तिक्तकं लघु।
सेव्यं पुराणगोधूममुद्गशालियवादिकम् ॥ १६॥
पलं मार्गं च शाशं च लावतित्तिरादिकम्।
सेव्यं सर्वरसोपेतं सुष्ठुपस्करपाचितम् ॥ १७॥
उद्वर्तनं चरेन्नित्यं दिवास्वप्नं तु नाचरेत्।
गुरु स्निग्धं च मधुरं शीतमम्लं च वर्जयेत्॥ १८॥
श्यामां प्रसन्नशशिबिम्बमुखीं विनिद्र-
पङ्केरुहाकृतिदृशं धृतचारुवेषाम्।
आलिङ्ग्य मारुतचयं, परिचुम्ब्य पित्तं,
भुक्त्वा जयेत्कफचयं स्मरमित्रकाले ॥ १९॥
१. तीक्ष्ण-रूक्ष-कटु-कषाय-तिक्त रसयुक्त पदार्थ
२. लघु द्रव्य
३. जीर्ण (पुराण) गोधूम-युद्ध-शालि आदि धान्य
४. कक्कुट, राक्ष, लावा, तित्तिर आदि जीवों के मांसरस-अच्छे उपकरणों में पका
मांस


५. नित्य उद्वर्तन- दिवा निद्रा परित्याग
६. गुरु-स्निग्ध-मधुर-शील अम्ल पदार्थों का परित्याग।
चन्द्रमावत् बिम्ब सदृश मुखयुक्त, अर्धखिले कमल के समान नेत्र, सुन्दर वेश
धारिणी श्यामा स्त्री का आलिंगन करके, वात विकारों को विजित कफ।
भलीभाँति चुम्बन से पित्तविकारों का नाश तथा उपभोग करके विकारों को विजित
करे।।१६-१९।।
ग्रीष्मलक्षणचर्यं
यत्र प्रचण्डतरचण्डकरप्रताप-
संशोषितद्रुमलतातृणवारिपूरः।
उज्जृम्भते पवनवेगविकीर्णरेणु-
च्छन्ना भवन्ति च दिशः स निदाघकालः ॥ २० ॥
ग्रीष्मऋतु
ग्रीष्मऋतुलक्षण- इसकाल में अत्युष्ण सूर्य किरणों के संताप से वृक्ष, लता,
तृणासमूह, जलाशय शुष्क हो जाते हैं, वायु के वेग से विकीर्ण रेणु उड़ती है (आच्छन्न)
तथा दिशाओं का आच्छादन हो जाता है।।२०।।
स्निग्धच्छायां गृहं सेव्यं सेव्या पथ्या गुडान्विता।
सुधौतानि च वस्त्राणि सेव्यान्यातपशान्तये ॥ २१ ॥
ग्रीष्मऋतुचर्या
इस काल में धूप (सूर्यकिरणताप) से रक्षा हेतु स्निग्ध, छायायुक्त गृह मे निवास करे।
गुड़-हरीतकी का सेवन तथा श्वेतवस्त्रों का परिधान हितकर है।।२१।।
आरामभूरूहशिरस्तरविप्रतापा
वाप्यः प्रसन्नकमलाः कमलाकराश्च।
नद्यश्च चन्दनरसो घनसारमिश्रः
सेव्याः स्त्रजो विधुरुश्च निदाघकाले ॥ २२ ॥
भोज्यं शीतं च मधुरं फलं तृष्णाहरं मधु।
स्निग्धं द्रवं रसालादिपानकं शीतलं पिबेत् ॥ २३ ॥

पृष्ठ ४२

४२ क्षेमकुतूहलम्
सक्तूनालोडितान् शीतवारिणा शर्करान्वितान्।
भक्षयेच्छीतलं वारि पिबेत्कर्पूरवासितम्॥ २४॥
आराम (बगीचे) के वृक्षों द्वारा सूर्य तप से रहित, कभी में उत्फुल कल, कोमल
वाणी, नदी, कर्पूर मिश्रित मलयागिरि चन्दन रस पुष्प की शीतलमलया चन्द्रमा की किरणों
का सेवन हितकर है।
शीतल भोजन, मधुरफल, तृष्णाहर मधु, स्निग्ध द्रव पदार्थ, श्लेष्म रसाला,
शिखरिणी आदि पानक पान, शर्करा मिश्रित शीतल जल में सत्तू तथा कर्पूर से,
सुगन्धित जलपान लाभदायक है॥२२-२४॥
ग्रीष्मतो निषिद्धाहारविहारा:
त्यजेत् कटुकतिक्तोष्णलवणाम्लविदाहकृत्।
व्यायामं शीधुपानं च भास्करस्य च दीधितिम्॥ २५॥
निषिद्ध आहार-विहार
कटु, तिक्त, लवण-अम्ल रस युक्त आहार, उष्ण, दाहजनक पदार्थ, व्यायाम,
मद्यपान तथा सेवन कर निषेध किया जाता है॥२५॥
वर्षालक्षणचर्ये
यत्रेन्द्रनीलनिभवारिधरैर्निरुद्धाः
काष्टानभश्च विमलाः कुरुते न भानुः।
अम्भःसमीकृतमरुस्थलनिन्र्गाभिः
श्यामैस्तृणैरभिनवैः खलु सा च वर्षा ॥ २६ ॥
वर्षार्ऋतु लक्षण
नीलकान्तमणि के समान मेघों से आच्छादित दिशाओं एवं आकाश को सूर्य स्वच्छ
करने मे असमर्थ रहता है; जल से मरुस्थल एवं पर्वतीय नदियाँ समान हो जाती है; नवीन
श्यामवर्ण मे तृणों की उत्पत्ति हो जाती है- इसे वर्षा ऋतु कहते हैं॥२६॥
सशीकरमरुत्स्पर्शधरणीवाष्ययोगतः ।
सविषाविलतोयैश्च दोषाः चयस्तत्र कोपिनः॥ २७॥
जलकणों से युक्त वायु के स्पर्श तथा पृथ्वी के वाष्प के संयोग, विषयुक्त एवं
अविल (गन्दा) जल दोषों (वात-पित-कफ) का प्रकोप हो जाता है॥२७॥


पृष्ठ ४३

चतुर्थोत्सवः ४३
पथ्या सैन्धवसंयुक्ता सेव्या गेहं समुन्नतं।
शुष्कं प्रकाशवच्चित्रं सर्वतोऽगुरुधूपितम् ॥ २८॥
वर्षार्ऋतुचर्या- आहार-विहार
सैंधव लवण तथा हरीतकी का सेवन, शुष्क-प्रकाश युक्त-चित्रित सर्वत्र अगर
तथा धूप से सुगन्धित उच्च में निवास करना चाहिए॥२८॥
स्निग्धमम्लं सलवणं पलं शालियवादिकम्।
मस्तुसैन्धवसंयुक्तं पञ्चकोलावचूर्णितम् ॥ २९॥
क्वथितं च निषेवेत दिव्यं कौपं जलं पिबेत्।
भवेद्यानैकगमनः शुष्कधूपितवस्त्रवान् ॥ ३० ॥
स्निग्ध-अम्ल-लवण, शालि-भवादि, मस्तु सैन्ध, पंचकोल-चूर्ण मिलकर सेवन,
आकाश-कूप समित जलपान, शुष्क सुगन्धित वस्त्र धारण तथा अनेक गमन (सवारी
से योग्य)॥२९॥
निषिद्ध आहार-विहार
सर-नदी-वापी का जल स्नान, पान वर्जित; दिवाशयन, परिश्रम तथा घर्म (धूप)
सेवन वर्जित॥३०॥
सरोनद्यादिसलिलं स्नानपाने विवर्जयेत्।
दिवास्वप्नं श्रमं घर्मं प्रावृट्काले न सेवयेत् ॥ ३१ ॥
शरत ऋतुचर्या- आहार-विहार
नदी, वर्षाकालीन संचित पित्त शरद मे प्रकुपित; शर्करा सहित हरीतकी सेवन।
कषाय-मधुर-तिक्त रसयुक्त पदार्थ, शीतल जल, पशु मांस, शालि-मुद्ग, शर्करायुक्त
दुग्ध; आमलकी आमलकी-पटोल-गौ दधि-घृत, गुड निर्मित मिष्ठान्न, नदी जल तथा
चन्द्रमा किरणों का सेवन हितकर॥३१॥
अथ शरल्लक्षणचर्ये
यत्रोज्वला जलमुचो विकचेन्दुबिम्ब-
तारं नभो विकचनीरजकैरवाणि।
नाराणि मानसनिभानि सतां विभान्ति
काशानि कीर्तिसदृशानि च सा शरत्स्यात् ॥ ३२ ॥

४४ क्षेमकुतूहलम्
पित्तं प्रावृट्समुत्पन्नं शरत्काले प्रकुप्यति।
तेन शर्करया सार्धं सेवनीया हरीतकी ॥ ३३ ॥
कषायं मधुरं तिक्तं शीतलं जाङ्गलं पलम्।
शालिमुद्गान्नम्अश्नीयात्पिबेद्दुग्धं सशर्करम् ॥ ३४ ॥
धात्री पटोलं गव्याज्यं सर्वभिक्षुविकरजम्।
सेव्यं नदीसरोवारि करजालं च शीतगोः ॥ ३५ ॥
शरत्ऋतु लक्षण
स्निग्ध मेघ, चन्द्रोदय बिम्ब के सामान आकाश, खिले हुए कमल-कुमुदनी युक्त
मानस, सरोवर सदृश जल एवं सज्जनों के यश के समान सुशोभित- शरत् ऋतु में होता
है॥३२-३६॥
तीक्ष्णमम्लं लवणं दधि तैलासवातपम्।
दिवास्वप्नं पुरोवातं शरत्काले विवर्जयेन् ॥ ३६ ॥
शरत ऋतु- निषिद्धाहार-विहार
तीक्ष्ण-अम्ल-लवण, दधि-तैल-मद्य, सूर्य घर्म (धूप), दिन में सोना तथा पूर्वी हवा
सेवन वर्जित॥३६॥
सर्वर्तुप्रान्त्यसप्ताहाद्भाविनो विधिमाचरेत्।
ऋतोर्लक्षणसंयोगादृतुसन्धिर्यतो भवेत् ॥ ३७॥
ऋतुसंधि
सर्व ऋतु में एक सप्ताह पूर्व, आगामी ऋतु के आचरण को प्रारम्भ कर देना
हितकर है; विभिन्न (ऋतुओं के) लक्षणों का संयोग हो जाने पर, इसका काल
(संयोजित) को 'ऋतु सन्धि' संज्ञा दी जाती है॥३७॥
स्थानं मयोक्तमृत्सुसेव्ययोग्यं सर्वस्य द्रव्यस्य गुणागुणाश्च।
ऋतूक्तभोज्यमृतुलक्षणं च त्वथोच्यते प्रत्यहकृत्यकर्म ॥ ३८ ॥
ऋतु तथा ऋतुचर्या- उपसंहार
ऋतुचर्या सम्बन्धी वर्णन किया है, आगे प्रत्यह कर्मों का प्रतिपादन पंचम उत्सव
में निहित है॥३८॥
अथ पञ्चमोत्सवः
(प्रकरण पञ्चम)
अथ दिनचर्या
प्रातःकाले समुत्तिष्ठेत्स्वस्थो रक्षार्थमायुषः।
शरीरशुद्धिं निर्वर्त्य कृतशौचविधिर्नरः ॥ १ ॥
केशपाशे प्रकुर्वीत प्रसाधन्यादिशोधनम्।
मुखस्यालोकनं कुर्याद्दर्पणेन विचक्षणः ॥ २ ॥
दिनचर्या
प्रातोत्थापन-जो व्यक्ति स्वस्थ हो, वह अपनी आयु की रक्षा के उद्देश्य से
प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्त्त में निद्रा को त्याग कर, उठ जाये; वह शौचादि से निवृत्त होकर,
शरीर को शुद्ध करके, केशप्रसाधन आदि से शरीर का शोधव करता है, प्रातःकाल
मुख को दर्पण में अवलोकन करता है, वह दीर्घायु होता है॥१-२॥
दन्तधावनविधिः
ततो हि दन्तनिर्लेखं प्रकुर्याद्विधिना नरः।
क्षीरितिक्तकषायाणां द्वादशाङ्गुलमायतम् ॥ ३ ॥
कनिष्ठाग्रसमस्थौल्यं ख्यातवृक्षस्य शोभनम्।
दन्तधावन
विधिपूर्वक दन्त धावन करना चाहिए (शौचाद्रि कृत्य से निवृत्त होकर)। दुग्धयुक्त,
तिक्त-कषाय रस युक्त वृक्षों की, द्वादशांगुल अथवा कनिष्ठिका अंगुलि के अग्रभाग के
समान मोटी तथ्य सुदनानिर्वेत्वती (दन्तधावन-दातून) कर उपयोगार्थ ग्रहण करते
हैं॥३१/२॥
दन्तकाष्ठग्रहणकाले वनस्पति स्तुतिः
आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च ॥ ४॥
ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च त्वं नो देहि वनस्पते।
क्षे. कु. 4

४६ क्षेमकुतूहलम्
इत्यादिस्तततिवाक्येन यद्गृहीतं वनस्पतेः ॥ ५ ॥
प्रयच्छति भृशं कर्तुरायुःश्रीधीयशःस्थितीः ।
दन्त काष्ठ ग्रहण- वनस्पति प्रार्थना (अभिमन्त्रण)
हे वनस्पति ! आप मुझे आयु, वर्ण, यश, प्रजा, पशु, धन, ब्रह्मप्रज्ञा, मेधा
(स्मृति तथा बुद्धि) प्रदान करें। इन स्तुति वाचन से प्राप्त दन्तकाष्ठ (दन्तधावन) करने
वाले व्यक्ति को अधिकतम आयु, लक्ष्मी, बुद्धि, यश तथा स्थामित्व की प्राप्ति होती
है॥४-५१/२॥
वर्णानुसारोण दन्तकाष्ठस्य प्रमाणम्
दशाङ्गुलं क्षत्रियाणां विप्राणां द्वादशाङ्गुलम् ॥ ६ ॥
अष्टाङ्गुलं तु वैश्यानां शूद्राणां तु षडङ्गुलम् ।
दन्तकाष्ठं हि गृह्णीयात् स्त्रीणां तु चतुरङ्गुलम् ॥ ७ ॥
भक्षयेद्दन्तकाष्ठाग्रं दन्तमांसान्यपीडयन् ।
जिह्वानिर्लेखनं कुर्यात् प्राङ्मुखो वा हृदङ्मुखः ॥ ८ ॥
व्रर्ण के अनुसार दन्तकाष्ठ ग्रहण
वर्ण/जाति/लिंग दन्तकाष्ठ प्रमाण
क. ब्राह्मण दश अंगुल (१०)
ख. वैश्य द्वादश अंगुल (१२)
ग. शूद्र षडांगुल (६)
घ. स्त्री चतुरंगुता (४)
इसके पश्चात् दन्तकाष्ठ के अग्रभाग का चर्वण करके, दन्त स्वच्छता करते हैं।
तथा जिह्वानिलेँखन (दन्त काष्ठ से को चीरकर, इसके दो भाग करके) करते है जिससे
जीभ पूर्णतया स्वच्छ हो जायें तथा मल कफ रहित हो जाये॥६-८॥
दन्तकाष्ठस्याभावे दन्तधावनविधिः
अलाभे दन्तकाष्ठस्य निषिद्धदिवसेषु च ।
अपां द्वादशगण्डूषैर्मुखशुद्धिर्विधीयते ॥ ९ ॥
रसनादन्तजा रोगा वैरस्य मलसंभवः ।
न भवन्ति मुखे तेन वैशद्यं लाघव भवेत् ॥ १० ॥
पञ्चमोत्सवः ४७
दन्तकाष्ठ अभाव- दन्तधावन
यदि दन्त काष्ठ न मिल सके, तथा जब मूत धावन निषिद्ध हो, ऐसी स्थिति में
द्वादश गण्डूषो से (बारह कुल्ले करके) मुख की शुद्धि कर लें। दन्तकाष्ट के स्वाद को
ग्रहण करने से, दन्तरोग, मुख विरसता तथा मल संभाव्यता मुख से निवृत्त होती है,
तथा मुख में स्वच्छता तथा लघुता आ जाती है॥९-१०॥
मण्डूषधारणस्य फलम्
ततो गण्डूषकरणं कफकण्डूमलापहम्।
गण्डूष धारण
दन्त काष्ठ (पवन) के पश्चात् कफ, कण्डू तथा मल की निवृत्ति गण्डूष (कुल्ला)
करने से हो जाती है॥१०१/२॥
मुखप्रक्षालनविधिस्तस्य फलञ्च
मुखप्रक्षालनं कार्यं पयसा शीतलेन च ॥ ११ ॥
रक्तपित्तास्यसंशोभनीलिकाव्यङ्गनाशनम् ।
कुर्याद्दृग्पि कदुष्णेन पयसाऽऽस्यविशोधनम् ॥ १२ ॥
कफवातहरं स्निग्धं मुखदोषविनाशनम् ।
औषधं चात्र सेवेत सद्द्वैद्यप्रतिपादितम् ॥ १३ ॥
जातेरोगनिवृत्त्यर्थमाग्नेयं बलवर्धनम् ।
मुख प्रक्षालन विधान
व्यक्ति को शीतल जल (ठंडे पानी) से प्रतिदिन मुखप्रक्षालन (मुँह धोना) चाहिए;
इससे दन्तपित्त रोग, नीलिका नाश होता है, तथा मुख संशोधन होता है। कटूष्ण जल
(कुछ गर्म पानी) से मुखप्रक्षालन कहते हैं। उष्ण जल (गर्म पानी) से मुख प्रक्षालन
करने से, वातनाशक, स्निग्धतादायक तथा मुखदोष नाशक प्रभाव होता है। मुखगत
दोनों के नाशार्थ सद्द्यैद्य द्वारा निर्मित औषधियो का सेवन करते है, आग्नेय औषध
बलवर्धक है॥११-१३१/२॥
ताम्बूलभक्षणविधिस्तस्य फलञ्च
ताम्बूलं भक्षयेत्पश्चाद्विजशेषं तु शोभनम् ॥ १४ ॥
तीक्ष्णोष्णं कफवातघ्नं मुखैशद्याकारकम्।

पृष्ठम् ४८

४८ क्षेमकुतूहलम्
ततोऽधिकारिणः सर्वेष्वधिकारेषु योजिताः॥१५॥
ताम्बूल भक्षण
दन्त` शेष रहे अनावश्यक पदार्थ के निष्कारनार्थ, ताम्बूल (पान) का भक्षण
(चर्वण) करना चाहिए। तीक्ष्ण-उष्ण गुणयुक्त होने से, ताम्बू कफनाशक तथा मुख
स्वच्छता कारक है। तत्पश्चात् समस्त अधिकारियों को उनके अधिकृत कार्यों हेतु नियुक्त
कर देना चाहिए॥१४-१५॥
उद्वर्त्तनाभ्यङ्गयोर्विधिः फलञ्च
ततश्चोद्वर्त्तनाभ्यङ्गं कारयेच्च यथेप्सितम्।
उद्वर्तनं कफहरं मेदःशुक्रविवर्धनम् ॥१६॥
श्रेष्ठं शोणितदं बल्यं कान्तिकृद्दोषनाशनम्।
अभ्यङ्गमाचरेत्तद्यस्तु स जराश्रमवर्जिः॥१७॥
दृष्टिप्रसादपुष्ट्यायुः स्वास्थ्यत्वक्पाददार्ढ्यवान्।
अद्भिः संसिक्तमूलानां तरूणां पल्लवादयः॥१८॥
वर्धन्ते हि तथा नृणां स्नेहसंसिक्तधातवः।
उद्वर्त्तनाभ्यङ्गविधान
उद्वर्तन (उबटन) तथा अभ्यंग (तैल मालिश) स्वेच्छानुसार प्रयोग करे।
उद्वर्तन- कफनाशक, मेधा-शुक्रवर्धक, रक्तवृद्धिकर, बल्य, कान्ति प्रद, दोषों
निवृत्तिकारक।
अभ्यंग- जरा-श्रमहर, नेत्रज्योतिवर्धक, पुष्टिप्रद, आयुष्य, स्वास्थ्यप्रदायक,
चर्म पाद दृढ़ता कारक। जैसे वृक्षों के पत्र (जड़ों का जल सिंचन करने से) बढ़ते हैं,
उसीप्रकार शरीर की धातु बढ़ती है॥१६-१८¹/₂॥
स्नानविधिस्तस्य फलञ्च
ततः स्नानं प्रकुर्वीत सुखोष्णेनैव वारिणा ॥१९॥
तेन गात्राभिषेकस्तु भवत्येव बलावहः।
अत्युष्णोत्तमाङ्गस्य बलहृत्केशचक्षुषाम् ॥२०॥
स्नानस्यानन्तरं सम्यग्वस्त्रेण तनुमर्दनम्।
कान्तिप्रदं शरीरस्य कण्डुत्वग्दोषनाशनम् ॥ २१॥


पृष्ठम् ४९

पञ्चमोत्सवः ४९
स्नान विधान
स्नान सुखोष्ण (कटूष्ण-हल्का गर्म) जल से करना चाहिए; यह बलवर्धक होता
है। अत्युष्णजल (बहुत गर्म पानी) से स्नान केश तथा नेत्र ज्योति नाशक है। स्नानोपरान्त
वस्त्र से भलीभाँति मर्दन (तदनुमर्दमम्), शरीर कान्ति दायक, कण्डू तथा चर्मरोग
नाशक है॥१९-२१॥
ऋतुक्रमेण वस्त्रधारणविधिस्तस्य फलञ्च
शीतकाले तु कौशेयं काषायं घर्मवासरे।
वर्षासु श्वेतवस्त्रं स्यादेवं वस्त्राणि धारयेत्॥२२॥
कौशेयं चित्रवस्त्रं वा रक्तवस्त्रं तथैव च।
वातश्लेष्महरं नृणां शीतकाले प्रधारयेत्॥२३॥
मेध्यं सुशीतं पित्तघ्नं काषायं वस्त्रमुच्यते।
तद्धारयेद् धमकाले कषायं वस्त्रं च धारयेत्॥ २५॥
ऋतु अनुसार, वस्त्रधारण
क. शीतऋतु : कौशेय (ऊर्जा-रे-शामी-गर्म कपड़े)
ख. ग्रीष्मऋतु : कषाय वस्त्र- बुद्धिवर्धक
ग. वर्षाकरण : श्वेतपत्र- सुखदायक, शीत-घर्म निवारक (न उष्ण-न शीतल-
सभी ऋतुओं में धारण योग्य)
घ. शीतकाल : कौशेय, भिन्न वस्त्र- एकवर्ण के वस्त्र कफ-वात नाशक॥२२-
२५॥
चन्दनादिलेपनविधिस्तस्य गुणाः
गन्धेनोद्वर्तनं चादौ ततो लेपं प्रकारयेत्।
कुङ्कुमं चन्दनं चैव कृष्णागुरुविमिश्रितम्॥ २६ ॥
उष्णाभावभिदं श्रेष्ठं शीतकाले तु शोभनम्।
चन्दनं चाम्बुना युक्तं कर्पूरेण विमिश्रितम् ॥२७॥
सुगन्धं च सशीलं च घर्मकाले सुशोभनम्।
चन्दनं घृसृणोपेतं मृगनाभिसमायुतम् ॥ २८ ॥
न चोष्णं न च वा शीतं वर्षाकाले प्रशस्यते।

५० क्षेमकुतूहलम्
लेपन विधान
क. गन्ध से शरीर, को निर्भलीकरण; तदनन्तर, कृतवागुरु- केशर-चन्दन का
लेपन- उष्ण तथा श्रेष्ठ (शीतकाल में हितकर)।
ख. जल के साथ घर्षण-कर्पूर मिश्रित लेपन : शीतल एवं सुगन्धित (ग्रीष्मकाल में
हितकर)
ग. केशर- कस्तूरी युक्त चन्दन- न उष्ण- न शीत (वर्षा काल में हितकर)॥२६-
२८१/२॥
सन्ध्योपासनविधान
कुलाचारं तु कुर्वीत सन्ध्योपासनमादितः॥२९॥
सूर्योपास्तिं ततः कुर्यादिष्टदेवस्य चार्चनम्।
दत्त्वा दानं च विप्रेभ्यो गृह्णीयात्तेभ्य आशिषः॥३०॥
सन्ध्योपासन विधान
सर्वप्रथम (तदनन्तर) सन्ध्योपासन तथा कुलपचार (योगाभ्यास, प्राणायाम, सूर्य
नमस्कार आदि उपयुक्त यौगिक क्रियायें), इष्टदेव पूजन तथा ब्राह्मणों को देकर, उनके
आशीर्वाद को प्राप्त करना चाहिए॥२९-३०॥
केशानां निचये कुर्यात्कस्तूर्याद्यनुलेपनम्।
सुपुष्पाणि सुगन्धीनि नित्यं शीर्षे प्रधारयेत्॥३१॥
क्लेदायाससमुद्भूतस्वेददुर्गन्धनाशनम् ।
चक्षुष्यं दाहशमनं सौमनस्यं च जायते॥३२॥
केशप्रसाधनादि विधान
केशों को संवारने के पश्चात्, कस्तूरी-केशर-चन्दन आदि का अनुलेपन, सुगन्धित
पुष्पों की शिर पर धारण करें, जिससे परिश्रमजन्य क्लेद, त्रिदज दुर्गन्ध, नेत्ररोगनाशक,
दाहशामक तथा सौममस्य जनन (मानसिक आह्लादकर) होता है॥३१-३२॥
पुष्पधारणस्य नियमाः
तीक्ष्णाग्रक्लूमकैतक्याः कोमलं धारयेद्दलम्।
जातीपुष्पं च नैवालं सेवन्तीं कुटजं तथा॥३३॥
पाटलं च बृहत्पुष्पं बकुलं चम्पकं तथा।
पञ्चमोत्सवः ५१
श्रीखण्डं चैव गौलालं कस्तूर्या सह धारयेत्॥३४॥
मन्दारं मरुवं चैव कुमुदं नीलमुत्पलम्।
रक्तोत्पलं पूतिपुष्पं कर्पूरैः सह धारयेत्॥३५॥
पुष्पधारण विधान
क. तीक्ष्णाग्र केतकी कोमल दल, जाती पुष्प, नैवाल, सेवन्ती, कुरज, पाटला,
बृहत्पुष्प, बकुल, चम्पक, मलयगिरि चन्दन तथा तरुणी, कस्तूरी के साथ
धारण करते हैं।
ख. मन्दार, मरुद, कुमुद, नीलकमल, रक्तकमल, पूतिपुष्प- इनको कर्पूर भी साथ
धारण करते हैं। अरूपतावस्था में छोटी बेल का पुष्प धारण किया जाता है।
ग. स्नान के पश्चात् जाती (मालिका), बेल पुष्प, तथा अभ्यंग के समय केतकी पुष्प
तथा उत्पल पुष्प सदैव धारण करते हैं। पराग युक्त जाती, कुद, नेपाल, चन्दन,
बिल्व तथा मल्लिका- इनका पुष्प शिर पर धारण करना चाहिए॥३३-३७॥
पुष्पाणां गुणाः
अस्नातैर्मल्लिका धार्या सुस्नातैर्जातिबिल्वजम्।
अभ्यङ्गे केतकी धार्या धार्यं चोत्पलं सदा॥३६॥
जातीं कुन्दं च नैवालं श्रीखण्डं बिल्वमल्लिके।
मकरन्दे संयुक्तं शिरसा धारयेन्नरः॥३७॥
सर्वाण्येतानि तुल्यानि रसतो वीर्यतस्तथा।
त्रिदोषशमनीयानि सर्वकाले प्रधारयेत्॥३८॥
कैतकं बाकुलं पुष्पं श्रीखण्डं शतपत्रकम्।
गौलालं चम्पकं पुष्पं वातश्लेष्महरं परम्॥३९॥
उष्णवीर्यं च तत्प्रोक्तं शीतकाले प्रधारयेत्।
पुष्पों का गुण
यह समस्त पुष्प (उपरोक्त) रस-वीर्य मे समान है, त्रिदोषनाशक है, इसलिए
इनको सदैव धारण करें। केतकी, वकुल, चन्दन कमल, तरुणी तथा चम्पक पुष्प वात-
कफ नाशक (श्रेष्ठतम) एवं उष्ण वीर्य है। अतः इन पुष्पों को शीतकाल में धारण
करें॥३६-३९१/२॥

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"मन्दार-मरुव-दामनक-पाटला - सुगन्धित अवस्था (पर्यन्त) ॥४२-४५१/२॥"
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"मन्दार-मकव-दम्लक-

५४ क्षेमकुतूहलम्
५. सुगन्धित पाटला पुष्प- ज्वर, मूर्च्छा, तृष्णाहार, आयुष्य तथा दाहशामक।
ऋतुक्रमेण पुष्पधारणविधिः
हेमन्ते शिशिरे चैव शतपत्रं तु शोभनाम्।
वसन्ते केतकी धार्या घर्मे नैपाल मालती ॥५३॥
प्रावृट्सु पाटलं धार्यं चम्पकं शरदि स्मृतम्।
विभिन्न ऋतुओं में पुष्पधारण
१. हेमन्त तथा शिशिर - कमल पुष्प
२. वसन्त - केतकी पुष्प
३. ग्रीष्म - नैपाल-जातीपुष्प
४. वर्षा - पाटला पुष्प
५. शरद् - चम्पक पुष्प
आभूषणधारणविधिस्तस्य फलञ्च
भूषणैर्भूषयेदङ्गं यथाविभवसारतः ॥५४॥
शुचि सौभाग्यसन्तोषदायकं काञ्चनं स्मृतम्।
रत्नानां भूषणानां च धारणं ग्रहतुष्टिकृत् ॥५५॥
आभूषण धारण
स्वधन सम्पत्ति के अनुकूल आभूषणों से अंगों का विभूषण करना चाहिए।
कांचन (स्वर्ण) आभूषण पवित्र (शुचि), सौभाग्य एवं सन्तोषदायक होता है। रत्नों का
आभूषण धारण से ग्रहों की तुष्टि प्राप्त होती है॥५४-५५॥
धार्मिककार्यविधिस्तस्य फलञ्च
धर्मसंग्रहणं कार्यं दीनदानोपवासकैः।
स्वबन्धुपिट्देवानां ब्राह्मणानां च तर्पणम् ॥५६॥
कार्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं पापहरं परम्।
धार्मिक कृत्य विधान
क. दरिद्रों को दान
ख. उपवास-व्रत द्वारा धर्मसंग्रह (उपजीवन)
पञ्चमोत्सवः ५५
ग. बन्धु-बान्धव, पितृ, देवता, ब्राह्मणों का तर्पण : यश, आयु वर्धक, स्वर्गप्रदानकर्ता,
पाप नाशक (परम्)॥५६१/२॥
भोजनकालिकविधिः
ततो भोजनवेलायां कृताचारः सहात्मवान् ॥५७॥
देवान् पितॄन् समभ्यर्च्य कुर्यान्मङ्गलवीक्षणम्।
भोजन कालिक विधान
कृताचार उपरान्त संयमी व्यक्ति रुदात्तारों से युक्त, भोजन के समय देव-पितृ
पूजन कर, व्यक्ति को मांगलिक वस्तुओं का अवलोकन करना चाहिए॥५७१/२॥
अष्टौ मंगलवस्तूनि
लोकेऽस्मिन्मङ्गलान्यष्टौ ब्रह्मणौ गौर्हुताशनः ॥५८॥
हिरण्यं सर्पिरादित्य आर्यो राजा तथाऽष्टमः।
एतानि सततं पश्येन्नमस्येदर्चयेत्तथा ॥५९॥
अष्टमाङ्गलिक पदार्थ
१. ब्राह्मण ५. घृत
२. गौ ६. सूर्य
३. अग्नि ७. आर्य
४. स्वर्ण ८. राज्ञ (राजा)
इन समस्त- अष्टमंगलदायक वस्तुओं का दर्शन तथा नमस्कार करना
चाहिए॥५८-५९॥
प्रदक्षिणायाः फलम्
प्रदक्षिणं सदा नित्यमायुर्वर्धनमुत्तमम्।
प्रदक्षिण
प्रतिदिन प्रदक्षिणा करना आयुवर्धक तथा अति उत्तम होती है॥५९१/२॥
भोजनविधिः
पलीविहितशृङ्गारं प्राप्य भोजनमण्डपम्॥६०॥

५६ क्षेमकुतूहलम्
तथा चाग्निबलं वीक्ष्य कुर्याद्भोजनकं नरः।
एक एव न भुञ्जीत यदीच्छेत्तित्द्धिमात्मनः॥६१॥
द्वित्रिभिर्बहुभिः सार्धं भोजनं तु दिवानिशम्।
ततश्चाभीष्टसिद्धिः स्यादिष्टकामं तु संपदः॥६२॥
भोजन विधान
अपनी पत्नी- आभूषण एवं वस्त्रादि धारण करने से सुसज्जित- से युक्त
भोजनालय में पहुँचकर, अपनी जाठराग्नि से बल का अनुभव करके भोजन व्यक्ति
को करना चाहिए। स्वकल्याणकारी व्यक्ति को एकाकी (अकेले) भोजन नहीं
करना चाहिए। दिवा-रात्रि (दोनों समत्त) तीन या बहुतों के साथ भोजन करना चाहिए।
इससे अभीष्ट की सिद्धि होती है तथा अभिलाषा के अनुरूप धन की प्राप्ति होती
है॥६०-६२॥
ताम्बूलभक्षणगुणाः
ताम्बूलं भक्षयेत्पश्चाद्दत्वा विप्राय शोभनम्।
मनसो हर्षदं श्रेष्ठं रतिदं मदकारकम्॥६३॥
मुखरोगकृमिहरं ताम्बूलं रुचिकारकम्।
ताम्बूल भक्षण के गुण
राजा को चाहिए, पहले ब्राह्मण को दान देवें तथा फिर पान (ताम्बूल) का भक्षण
(चर्वण) करें। यह हर्षदायक, अभीष्टकारी, को रतिद (कामोत्तेजक), मदकारक (नशीला),
मुखराग एवं कृमि कर तथा रुचिकारक होता है॥६३१/२॥
भोजनान्तरं कर्माणि
दिवास्वप्नं न कुर्वीत संयतो हि कफावहम्॥६४॥
दिवा स्त्रीगमनं नृणामायुःक्षयकरं भवेत्।
धर्मशास्त्राणि सततं पुराणश्रवणं तथा ॥६५॥
कारयेद्विधिना सम्यगात्मतत्त्वविवेचनम्।
भोजनान्तर कर्म (कर्तव्य)
भोजन के पश्चात् दिन में शयन नहीं करना चाहिए, क्योंकि दिवा निद्रा कफवर्धक
है। दिन में स्त्री मैथुन से पुरुष की आयु क्षय होती है। धर्मशास्त्र एवं पुराणों का अध्ययन


पञ्चमोत्सवः ५७
निरन्तर करते रहना चाहिए, तथा विधिपूर्वक (सम्यक् रूपेण); आत्म तत्त्व का विवेचन
करते रहना चाहिए॥६४-६५१/२॥
अथ सद्वृत्तम्
सुखार्थाः सर्वभूतानाः मताः सर्वाः प्रवृत्तयः॥६६॥
सुखं च न विना धर्म तस्माद्धर्मपरो भवेत्।
हिंसास्तेयान्यताकामं पैशुन्यं परुषानृतम्॥६७॥
दुर्गेष्ट्यहितचिन्ता च परद्रव्यस्य चिन्तनम्।
पापकर्मेति दशधा कायवाङ्मानसैस्त्यजेत्॥६८॥
सद्वृत्त
समस्त प्राणियों की सर्वप्रवृत्ति सुखार्थ (सुख के लिए) होती हैं, सुख धर्म के
बिना नहीं मिल सकता, इसलिए व्यक्ति को धर्म कार्य में तसर रहना चाहिए।
हिंसा- अस्तेय (चोरी)- यथाकाम (मनमाना कार्य), पैशुन्य, कठोरवाचक,
असत्यवादन, दुर्जन संगति अन्य के अहित की चिन्ता, दूसरे का धन (परद्रव्य) की
चिन्ता (योजना बनाना)- इस प्रकार के पापों को शरीर, वाणी तथा मन से विरत
(त्याग) कर देना चाहिए॥६६-६८॥
अवृत्तिव्याधिशोकार्ताननुवर्तेत शक्तितः।
भक्त्या सेवेत मित्रिणि, नसेवेताहिताज्ञान्॥६९॥
अवृत्ति व्यवसाय वृति रहित- (धनहीन), रोगी तथा शोक पीड़ितों को विशक्ति-
समाथ्य्र के अनुसार व्यक्ति द्वारा सहायता व्यक्ति द्वारा जानी चाहिए। मित्र संगति
शक्तिपूर्वक तथा हानिकारक पुरुषों के संग का परित्याग कर देना चाहिए॥६९॥
आत्मवत्सततं पश्येत्सर्वजन्त्वापिपिलिकम्।
उपकारप्रधानः स्यादपकारपरेऽप्यरौ ॥७०॥
पिपीलिका (चींटी) से सर्व जन्तुओं (हस्ति तक) को आत्मवत् (अपने सभाव)
देर बना समझाना चाहिए। हानिकारक शत्रुओं में भी उपकार की भावना करनी
चाहिए॥७०॥
काले हितं मितं ब्रूयान्नाहितं तु कदाचन।
हिताभिलाषी सुमुखो भवेच्च करुणो मृदुः॥७१॥

५८ क्षेमकुतूहलम्
नैकः सुखी न सर्वत्र विश्वब्धो न च शङ्कितः ।
उचित समय पर हितकर वचन तथा सीमित (मित) भाषी, अहित की बाते कभी
भी न बोले अहितकांक्षी सुमुख, दयालु, कोमल स्वभाव युक्त होते हैं; अकेला-सर्वत्र-
विश्वब्ध तथा सशंकित सुखी नहीं हो पाता।।७१^१/२।।
न कञ्चिदात्मनः शत्रुं नात्मानं कस्यचिद्रिपुम् ।।७२।।
प्रकाशयेन्नापमानं न च निःस्नेहतां व्रजेत् ।
निज शत्रु को तथा किसी का शत्रु अपने को घोषित (प्रकाशित) नहीं करना चाहिए।
किसी का अपमान नहीं करें तथा निस्नेहता (द्वेष/वैर) नहीं रखना चाहिए।।७२^१/२।।
न पीडयेदिन्द्रियाणि नात्यर्थं लालयेद्बुधः ।।७३।।
परस्पराविरुद्धो यस्त्रिवर्गस्तं समाचरेत् ।
हस्त, वाद, मुख आदि इन्द्रियों को पीड़ित न करे या न अधिक लालन
(आराम) देवें। पस्पर अविरोधी त्रिवर्ग (धर्म-अर्थ-काम) का सम्पादन-अनुसरण करना
चाहिए।।७३^१/२।।
अनुयायात्प्रतिदिनं सर्वधर्मेषु मध्यमाम् ।।७४।।
कृत्तरोमनखश्मश्रुः शुद्धवेशधरो भवेत् ।
समस्त धर्मों का प्रतिदिन समान भाव से आचरण करना चाहिए। बाल-नख, रोम
का प्रतिदिन कर्तन करायें तथा शुद्ध वेश धारण करना चाहिए।।७४^१/२।।
चैत्यपूज्यध्वजाशस्तच्छायाभस्मत्तुपाशुचीन् ।।७५।।
नाक्रामेच्छर्करालोष्ठबलिस्रानभुवोऽपि च ।
नदीं तरेन्न बाहुभ्यां नाभिस्र्कन्धमभिब्रजेत् ।।७६।।
सन्दिग्धनावं वृक्षं च नारोहेद्दुष्टयानकम् ।
चैत्य, पूज्य, ध्वजा, अपवित्र छाया, भस्म, अपवित्र वस्तु, शर्करा, लोष्ठ, वति
स्थान पर पृथ्वी के ऊपर से नहीं लांघना/ चलना चाहिए। दोनों भुजाओं से नदी को न
तैरें, अग्निकंधे पर लेकर चलना, सन्दिग्ध नाव, वृक्ष तथा दुष्ट यान का प्रयोग (सेवन
उपयोग) न करे।।७५-७६^१/२।।
नासंवृतमुखः कुर्यात् क्षुतं हास्यं विजृम्भणम् ।।७७।।


पञ्चमोत्प्लवः ५९
अङ्गानि लोडयेन्नैव नासीतोत्कटुकश्चिरम् ।
नोर्ध्वजानुश्चिरं तिष्ठेन्नक्तं सेवेत न द्रुमम् ।।७८।।
तथा चत्वरचैत्यं च चतुष्पथसुरालयान् ।
शून्याटवीं शून्यगृहं श्मशानानानि दिवाऽपि च ।।७९।।
सुवथ, हास्य तथा (जृम्भा के समय मुख को न संवृत (फेला कर); अंगों को
अधिक न मोड़े (लोडयेत्); विषमासन पर न बैठें, जंघा के सहारे बहुत देर तक खड़ा
न हो।
रात्रि में वृक्ष, चत्वर, चैत्य, चतुष्पक्ष, देवालय के पास न रहें। एकान्त जंगल
(वन), एकान्तगृह तथा श्मसान में दिन में भी नहीं रहना चाहिए।।७७-७९।।
त्यजेदुष्णातपरजस्तुषारपरुषानिलान् ।
कु(कू) लच्छायान्नृपद्वेषिवालदंष्ट्रिविषाणिनः ।।८०।।
दुष्टातप, अतिधर्म, वर्षा एवं रूक्षता युक्त वायु का सेवन नहीं करना चाहिए।
नदी तट की छाया में राजा से द्वेष, बालदंष्ट्री, विषाण (सींग) वाले पशुओं का त्याग
कर देना चाहिए।।८०।।
सन्ध्यासु भोजनं स्वप्नं मैथुनाध्ययने त्यजेत् ।
गात्रवक्त्रनखैर्वाद्यं हस्तकेशावधूननम् ।।८१।।
प्रातःकाल भोजन, शयन, मैथुन तथा अध्ययन वर्जित है। शरीर, नख मुख से
ध्वनि न निकाले तथा हाथ से बालों को फटकाना (हस्तकेशावधूननम्) अनुचित है।
मद्यातिसक्तिं विश्रम्भं स्वातन्त्र्यं स्त्रीषु च त्यजेत् ।
शास्त्रं नृत्यं च गीतं च वाक्यं सेवेद्विचक्षणोत् ।।८२।।
१. अति मद्यपान का अभ्यास न करें
२. स्त्रियों का विश्वास तथा स्वतन्त्रता का त्याग
३. शास्त्र, मीत, नृत्य गीत, विद्वानो के शास्त्रीय वाक्यो (उपदेशो) का सेवन करना
हितकर।।८२।।
अत्यर्थं व्यसनं त्याज्यं कायवाग्रेतसां दमः ।
स्वार्थबुद्धिः परार्थेषु पर्याप्तमिति सद्ब्रतम् ।।८३।।

Left Page (p. 60):

६० क्षेमकुतूहलम्
अति व्यसन का परित्याग। शरीर, वाजी तथा वीर्य को वशीभूत, दूसरों (अन्य)
के अकार में पर्यन्त स्वार्थ बुद्धि (अन्य उपकार में ही अपना स्वार्थ) समझना आदि
सद्वृत्त के नियमान्तर्गत है॥८३॥
रात्रिचर्या
निशि स्वस्थमनास्तिष्ठेन्मौनी दण्डी सहायवान्।
एवं दिनानि मे यान्तु चिन्तयेदिति सर्वदा ॥८४॥
दुःखभाङ् न भवेत्येवं नित्यं सन्निहितस्मृतिः ।
एवं कृत्स्नं दिनं नीत्वा रात्रिं यामार्धिकावधिम् ॥८५॥
रात्रि चर्या
रात्रि (निशि) में स्वस्थ मन होकर। मौन धारण से, दण्डधारण करके, सहायक
के साथ ठहर कर, सदैव विचार करे कि हमारे दिन इसी प्रकार व्यतीत होते रहें। यह
निरन्तर स्मरण रखने से व्यक्ति को दुःख नहीं होता। इस प्रकार दूसरे (अगले) दिन की
चिन्ता न करके, एक प्रहर से अधिक रात्रि को व्यतीत करना चाहिए।।८४-८५।।
व्यवायस्य विधिः निषिद्धविधिश्च
दिवासन्ध्यं वर्जयित्वा सदा पर्वदिनानि च।
रात्रौ व्यवायं कुर्वीत योषिता निजया सह ॥८६॥
कुचैलां च कुशीलां च विधवां च पर स्त्रियम्।
नारीं नीचकुलोद्भूतां त्यजेत्सम्यग्विचक्षणः ॥८७॥
वयोधिकां स्त्रियं गत्वा तरुणः स्थविरायते ।
वृद्धोऽपि तरुणीं गत्वा यौवनत्वमवाप्नुयात् ॥८८॥
ऋतुकाले तु सुरतमवश्यं कारयेद्बुधः ।
स्त्रीनिःश्वासहतो ना हि दुर्भाग्यत्वमवाप्नुयात् ॥८९॥
व्यवाय (मैथुन) विधि
दिन, सायंकाल तथा पर्व दिवसों को छोड़कर, सदैव रात्रि को अपनी पत्नी के
साथ संभोग करना चाहिए। विद्वान व्यक्ति मलिन वस्त्रधारिणी, दुःश्चरित्रा, विधवा, पर
स्त्री तथा नीच कुल में उत्पन्न स्त्री को मैथुन हेतु त्याग कर दे।
अपने से अधिक आयु की स्त्री से संभोग न करें, अन्यथा युवा व्यक्ति वृद्ध हो


Right Page (p. 61):

पञ्चमोत्सवः ६१
जाता है। वृद्ध व्यक्ति युवती से मैथुन करने से व्यक्ति युवावस्था को प्राप्त करता है।
बुद्धिमान ऋतुकाल में (रजोनिवृत्ति के पश्चात) मैथुन करना चाहिए। अन्यथा स्त्री के
निःश्वास से आहत मनुष्य दुर्भाग्य शाली हो जाता है।।८६-८९।।
ऋते वै षोडषा दूर्ध्वन्तथाऽतिक्रान्तसप्ततेः।
स्त्रियं कामयमानस्य जायते हि बलक्षयः ॥९०॥
षोडश (सोलह) वर्ष के पूर्व तथा सत्तर वर्ष के बाद स्त्री से मैथुन करने वाले
व्यक्ति के बल का क्षय हो जाता है।।९०।।
ऋतुक्रमेण व्यवायस्य नियमाः
त्र्यहाद्वसन्तशरदोः पक्षाद्वृष्टिनिदाघयोः ।
प्रकामं तु निषेवेत मैथुनं शिशिरागमे ॥ ९१ ॥
शीते रात्रौ, दिवा ग्रीष्मे, प्रावृट्सु घनगर्जिते ।
वसन्ते च दिवा रात्रौ शरत्सु सरसः स्मरः ॥ ९२ ॥
ऋतुभेदानुसार मैथुन
१. वसन्त एवं शरद ऋतु : तीन-तीन दिन में
२. वर्षा एवं ग्रीष्म ऋतु : १५ दिन में संभोग करना उचित है।
३. शिशिर एवं हेमन्त ऋतु : स्वेच्छानुसार
ख. शीतकाल-रात्रि, ग्रीष्मकाल दिन तथा वर्षा में मेघ गर्जन होने पर तथा वसन्तकाल
दिन तथा शरद काल में रात्रि में कामदेव सरस (उद्दीप्त) रहा करता है- संभोग
हेतु उपयुक्त समय होता है।।९१-९२।।
स्वास्थ्याय विशेषकर्तव्यानि
वामशायी द्विभुञ्जानो षण्मूत्री द्विपरीषकः ।
स्वल्पमैथुनकारी च शतं वर्षाणि जीवति ॥ ९३ ॥
स्वास्थ्य रक्षक-वर्धक उपाय
१. वामशायी (बाँयी करवट सोना)
२. दिन-रात में दो बार भोजन (द्विभुंजान)
३. स्वल्प मैथुनकारी (संभोग कम से कम)
क्षे. कु. 5

६२ क्षेमकुतूहलम्

४. षण्मूत्री (छह बार मूत्र त्यागी)
५. द्विपुरीषक (दो बार मल त्याग)
इन नियमों का पालन करने वाला व्यक्ति सौ वर्ष (शतं वर्षाणि जीवति) जीवित
रहता है॥९३॥
उपसंहारः
दिनचर्या समाप्तऽथ भोक्ता च परिवेषकः।
पानीयं भोजनं चाथ रन्धनस्योच्यते विधिः॥९४॥
इति श्रीनरवैद्यमन्मथात्मजक्षेमशर्माविनिर्मिते क्षेमकुतूहले ग्रन्थे
दिनचर्याप्रशंसनो नाम पञ्चमोत्सवः॥५॥
उपसंहार
दिनचर्या पूर्ण हो गयी, अब भोक्ता, परिवेषक, मान योग जल, भोजन तथा
भोज्यविधि आगामी उत्सव (षष्ठ) के वर्ण्य विषय है॥९४॥
इति हिन्दी व्याख्या सहित क्षेमकुतूहल का दिनचर्या वर्णन नामक
पांचवाँ उत्सव समाप्त॥


अथ षष्ठोत्सवः
(षष्ठ प्रकरण)
'भोक्तुः स्वरूपम
अथ भोजनप्रकारस्तत्र भोक्ता
स्नातः सुधौतमृदुसुन्दरशुक्लवासा-
स्तत्कालधौतचरणः प्रियपुत्रमित्रैः।
स्त्रग्वी प्रसन्नहृदयो रसपाकवेद्यां
भोक्ता प्रविश्य हितसात्म्यसमानवैद्यैः ॥१॥
भोक्ता का स्वरूप तथा भोजन ग्रहण
भोक्ता को शुद्ध स्नात, सुन्दर वस्त्र धारण (मृदु- मुधौत-शुक्लवास) किए हुए,
धौत करण (पैर धुले), माला धारी, प्रसन्न हृदय, प्रिय पुत्र मित्रों के एक साथ महानस
में जाकर हितकर तथा सात्म्य भोजन (ग्रहण) करना चाहिए॥१॥
अथासनम्
भोक्तुरासनम्
मृदुतूलमये स्थूले चारुवस्त्रावगुण्ठिते।
आसने प्राङ्मुखो भोक्तोपविशेद्वाऽप्युदङ्मुखः॥२॥
भोक्ता का आसन
सुन्दर वस्त्रधारी, मृदु, स्थूल, मोटे (स्थूल) आसन पर भोक्ता को पूर्वामुख
आसन ग्रहण करना चाहिए॥२॥
अथ भोजनपात्राणि
तिष्ठन्ति यत्र नवकाञ्चननिर्मितानि
श्रेणीकृतानि परितस्तु कचोलकानि।
राकाशशाङ्कनवमण्डलभास्वरं यत्
क्षोणीभृतां रजतनिर्मितपात्रकं स्यात्॥३॥

६४ क्षेमकुतूहलम्
अर्धार्धप्रतिमादर्शि कांस्यमादर्शवच्छुचि।
कांस्यं बुद्धिप्रदं भव्यं पालाशं रुचिकृद्वरम्॥४॥
भोजन पात्र
भोजनालय में नव स्वर्ण निर्मित, पंक्तिबद्ध कचोलक (आलमारी) स्थित होता है
वहाँ राजा का पाव रात्रि- चन्द्रमा के नवीन बिम्ब के समस्त रजत पात्र तथा आः
प्रतिमादर्शी (शीशे) के समय स्वच्छ भास्य पात्र रखा हो। कांस्यपात्र बुद्धिप्रद एवं भव्य
(सुन्दर) निर्मित पालाश (पत्तल) रुचिकृत् (श्रेष्ठ) है॥३-४॥
अथाचमनोदकम्
(भोजनकाले पेयजलम्)
उषितं पटसंपूतं सौवर्णे भाजने स्थितम्।
सव्यभागे जलं भोक्तुः स्थापितं चन्द्रवासितम्॥५॥
भोजन पात्र
जल उष्ण करके, वस्त्रपूर्ति पश्चात् स्वर्ण पत्र में स्थित, कर्पूर से सुगंधित जल
भोक्ता के दक्षिण पार्श्व में स्थित हो॥५॥
ऋतुकमेण जलस्य गुणः
हेमन्ते शिशिरे चैव सरोजं वातडागजम्।
सुशीतं रक्तपित्तघ्नं तृष्णादाहरुजापहम्॥६॥
वसन्तग्रीष्मयोः कौपं वाप्यं नैर्झरमेव च।
सक्षारं पित्तलं कौपं दोषघ्नं चारु नैर्झरम्॥७॥
प्रावृट्सु कौपं दिव्यं वा क्वथितं चैन्द्रसंभवम्।
कौपं वातहरं प्रोक्तं दिव्यं दोषत्रयापहम्॥८॥
शरत्प्रसन्नमुदयादगस्त्यस्याखिलं हितम्।
तत्तोयं गुणवज्ज्ञेयं बल्यं दोषत्रयापहम्॥९॥
ऋतु के अनुसार जल
क. हेमन्त तथा शिशिर ऋतु : सरोज या तडागज जल : शीतल रक्तपित्तनाशक
तृष्णा-दाह-संग हर
ख. वसन्त तथा ग्रीष्म ऋतु : कौप्य, कप्य, नैर्झर जल : क्षारयुक्त, पित्तकर, कूप
षष्ठोत्सवः ६५
जल दोषनाशक एवं
नैर्झर जल स्वच्छ-
सुन्दर
ग. वर्षा : कूपज, दिव्य जल या : दोषनाशक; कूपज
उष्ण किया, जल वातनाशक; दिव्य जल
(अकाश का जल) त्रिदोषहर।
घ. शरद ऋतु : उदय (अगस्त तारा के : सर्वप्रकार हितकर,
पश्चात्) स्वच्छ जल गुणवान्, बल
त्रिदोषहर।
स्थालीपात्रे परिवेशस्य नियमाः
पुरस्ताद्विमलं पात्रं सुविस्तीर्णं मनोरम्।
स्थापितं पीठके शुभ्रे नाभिदेशसमुन्नते॥१०॥
तत्र भक्तं परिन्यस्तं मध्यभागे सुसंयतम्।
सूपः सर्पिः पलं शाकं पिष्टमन्नं तु मत्स्यकम्॥११॥
स्थापयेद्दक्षिणे पार्श्वे भुञ्जानस्य यथाक्रमम्।
प्रलेहाद्या द्रवाः सर्वे पानीयं पानकं पयः॥१२॥
चोष्यं सन्धानकं लेह्यं सव्ये पार्श्वे प्रदापयेत्।
सर्वं इक्षुविकाराश्च पक्वान्नं पायसं दधि॥१३॥
पुरतः स्थापयेद्भोक्तुर्दयोः पङ्क्त्योश्च मध्यतः।
एवं विज्ञाय मतिमान् परिवेशप्रकल्पनम्।
ततोऽर्हो भवति प्राज्ञः सम्यक् परिवेषितुम्॥१४॥
स्थाली पात्र परिवेषनम्
भोक्ता के सम्मुख भक्ति नाभि तक उच्च, श्वेत पीठिका, मनोहर, बड़ा तथा स्वच्छ
पात्र रखना चाहिए। स्थाली (थाली) के मध्य भाग में ससंयुत भक्त तथा क्रम से सूप
(दाल), घृत, बल (मांस), शाक तथा मत्स्यादि दक्षिण पार्श्व मे परोसकर रखना
चाहिए। प्रलेह आदि पदार्थ, द्रव पदार्थ, पानीय जल, दुग्ध, चोष्य, संधानक तथा
लेह्य, सव्य पदार्थ। समस्त गुड निर्मित पदार्थ, पकवान, पायस, दधि-भोक्ता के दोनों
पंक्ति के मध्य भाग मे स्थित करते है। इस प्रकार परिवेषक मतिमान् सुज्ञात परिवेषन
(परोसने की) कला से युक्त होना चाहिए॥१०-१४॥

६६ क्षेमकुतूहलम्
अथ परिवेषकलक्षणम्
स्नातश्चन्दनचर्चितः सुवसनः स्रग्वी प्रसन्नाननः
स्पृष्टात्मा सुभगः प्रसन्नहृदयः श्रीकान्तपूजारतः।
स्वामिस्नेहपरः सुपाकनिपुणः प्रौढो वदान्यः शुचि-
र्विप्रो वा परिवेषकः सुकुलश्चान्योऽपि वा भूपतेः ॥ १५ ॥
योग्य परिवेषक
स्नात, चन्दन आलेषित, स्वस्थ वस्त्र धारित, पुष्पमाला धारण कश्यं, प्रसन्न
गुण, स्वस्थ आत्मा, सुन्दर, प्रसन्न हृदय, विष्णुपुजा रत, स्वामी सेवा परापण, सुपाक
में चतुर, युवा, दासी, पवित्र ब्राह्मण, सुकुल में उत्पन्न, अन्य (उपरोक्त गुणों से युक्त)
सत्पात्र व्यक्ति राजा का परिवेषक (खाना परोसने वाला) होना चाहिए॥१५॥
स्नाता विशुद्धवसना नवधूपिताङ्गी
कर्पूरसौरभमुखी नयनाभिरामा ।
बिम्बाधरा शिरसि बद्धसुगन्धिपुष्पा
मन्दस्मितमता क्षितिभृतां परिवेषिका स्यात् ॥ १६ ॥
श्रेष्ठा परिवेषिका
स्नाता, स्वच्छ वस्त्रधारिणी, नवीन धूप से सुगन्धित शरीर, कर्पूर से सुगन्धित
मुखवाली, सुन्दर नेत्र, पकव बिम्बी फल, शिर के बालों में सुगन्धित पुष्प (बद्ध
सुगन्धित पुष्पा), मुस्कान (मन्दस्मिता) से युक्त-स्त्री परिवेषिका (खाना परोसने वाली)
होना चाहिए॥१६॥
अथ भक्तम्
भोजनस्य प्रकाराः
भक्तादेः पत्रशाकादेरन्नानां मत्स्यमांसयोः।
क्षीरादेर्गोधूमादेश्च प्रकारा एवमादयः ॥ १७ ॥
वक्ष्यन्ते तत्र भक्तस्य रन्धने विधिरुच्यते।
भोजन के प्रकार-
भक्त रूप आदि, पत्र-फल-कन्द-शाक आदि, मांस, मत्स्य, दुध आदि, गोधूम
आदि अनेक प्रकार के भोजन अनेक प्रकार है॥१७१/२॥


षष्ठोत्सवः ६७
भक्तनिर्माणविधिः
वारिणा बहुशः शालितण्डुलान् क्षालितान् बहून् ॥ १८ ॥
तक्रे संसिच्य तान् तप्ते स्थाल्ल्याम्भसि विनिक्षिपेत् ।
ततः पयो घृतं क्षिप्त्वा स्विन्नानास्त्रावयेदिमान् ॥ १९ ॥
राजाहं तद्भवेद्भक्तं गन्धवर्णरसान्वितम् ।
एवं हि धान्यजातीनां रन्धनस्य त्वयं क्रमः॥ २०॥
भक्तपाक
शालि तण्डुल (धान के चावलों) को भलीप्रकार धोकर, तक्र से सिंचन कर, इन
चावलों को भोजन पाक पात्र (उष्ण जल से परिपूर्ण) मे छोड़ें तथा इसके बाद दुग्ध,
घी डालकर, सब चावलों को पकानें। यह गन्ध, वर्ण, रस से युक्त राजा के योग्य
भोजन तैयार हो जाता है। यही विधि धान्यवर्ग के अन्य पदार्थों को पाक करने की यही
विधि अनुसरण योग्य है॥१८-२०॥
स्वेदं शालेयमन्नं शशिकरनिकरोज्ज्वलं सिद्धसारं
भ्राग्यद्वाष्पाच्छलेन त्रिदशपुरसुधायैयमाधुर्यतत्वत् ।
अन्योन्यं नैव लग्न परिमलभरिताङ्गरवेदीविभागं
स प्राप्नोति प्रसन्नः प्रमथपरिवृढो यस्य पुंसः सदा स्यात् ॥ २१ ॥
ग्राह्य भक्त का सुन्दर स्वरूप
चन्द्र किरण सम उज्ज्वल, सुपरिपक्व, वाष्प भ्रायी, स्वर्ग-अमृत समान मधुर
रस युक्त, परस्पर विभिन्न प्रकार की सुगन्धों से युक्त स्वर्गमयी अमृत के मधुर रस युक्त,
अंगार सदृश विभक्त, शालि अन्य तण्डुलों से भक्त (भात) जिसको प्राप्त होता है, वह
सर्वाधिक प्रसन्न रहता है॥२१॥
भक्तस्य गुणाः
भक्तं वह्निकरं पथ्यं तर्पणं मूत्रलं लघु।
सधौतं स्त्रावितं चोष्णं विशदं गुणवन्मत्तम् ॥ २२ ॥
रन्धनस्य प्रकारोक्तो भक्तस्य च गुणोत्तमः।
यस्य धान्यस्य यद्भक्तं तस्य तद्गुणमावहेत् ॥ २३ ॥

६८ क्षेमकुतूहलम्
भक्त के गुण- १. अग्निदीपक, २. पथ्य, ३. तृप्तिकर, ४. मूत्रवर्धक,
५. लघु, ६. सुधौत श्रावित पथ्य, ७. विशद, ८. गुणवान् । जिस धान्य का भक्त
(भात) बनाया जाता है, उसके गुण उसी प्रकार के होते हैं। यहाँ भात (भक्त) पाक का
प्रकार तथा उसका उत्तम गुण बताया गया है॥२२-२३॥
अथ सूपः
तां कण्डितां दधिविमर्दितमुद्गदालिं
संसाधितां लवणगन्धसमायुता च।
ते भुजते कुमुदहासकराधमूर्धा
येषां सदा हृदयाचारुगृहं निष्षण्णः ॥ २४ ॥
सूप (दालि-दाल)
कण्डिता, सुपक्व, लवण तथा सुगन्धित वेसवर, दधि से विमर्दित मुद्ग की दाल
का वह ही भोजन करते हैं, जिनके हृदयरूपी सुन्दर गृह में विकसित कुमुद की भाँति
अर्धचन्द्र को शिरोधार्य किए भगवान शंकर (शिव) निवास करते हैं॥२४॥
अथ मुद्गकुलमाषाः
अर्ध विकसितं स्विन्नाः कुल्माषा मुद्गमाषजाः ।
सैन्धवेन सबाह्लीकाःस्वात्रस्य तु गुणावहाः ॥ २५ ॥
मुद्गसूपो लघुर्ग्राही कफपित्तहरो हिमः ।
स्वादुर्नेत्र्योऽनिलहरः कुल्माषः शुक्रवर्धनः ॥ २६ ॥
मुद्ग-कुल्माष
मुद्ग (मूँग) तथा माष (उरद) आधाखिला हुआ परिपक्व कुल्माषा- की दाल,
सेंन्धा एवं केशर युक्त खाद्य पदार्थ से अन्न के गुणों में वृद्धि होती है।
क. मुद्ग (मूँग) की दाल लघु ग्राही, कफपित्तनाशक तथा शीतल होती है।
ख. माष (उरद) की दाल स्वादु, यक्षुष्य, वातनाशक तथा कफवर्धक होती है॥२५-२६॥
अथ माषः
माषसूपोऽथ कुल्माषः स्निग्धो वृष्योऽनिलापहः ।
उष्णः संतर्पणो बल्यः सुस्वादूरुचिकारकः ॥ २७॥
षष्ठोत्सवः ६९
माषसूप-कुल्माष
माषसूप (उरद की दाल) तक्षा कुल्माष की दाल स्निग्ध, वीर्यवर्धक, वातनाशक,
उष्ण, तृप्तिकर बल्य, स्वादु एवं रुचिकारक होती है॥२७॥
अथ घृतम्
करीषवह्निना तप्तं क्षीरं तदुषितं दधि।
तज्जमाज्यं न तत्त्वाजं नवीननवनीतजम् ॥ २८ ॥
घृत (सर्पि)
करीषाग्नि (उपलों की आग) के पकाये हुए दुग्ध से निर्मित दधि का घृत का
नवीन नवनीत (मक्खन) से निष्कासित आज घृत (बकरी के घी) के समान गुणवान
नहीं कहा जा सकता॥२८॥
मञ्जिष्ठावारिरुचिसारि तनूष्मधारि
सौरभ्यचारि रुचिकारि विलोमहारि।
भुङ्क्ते नरः स खलु सर्पिरिदं नवीनं
यः पार्वतीचरणमौलिमिलोलमौलिः ॥ २९ ॥
विशिष्ट घृत
मंजिष्ठा जल (वारि) के समान आकृति युक्त तन्द्र (पतला), सुगन्धित, रुचि-
कर तथा विलोमवातनाशक, इस नवीन घृत को वही व्यक्ति सेवन करता है, जो
देवी पार्वती के चरणों को (कमलों) को स्वहृदय में अपने शिर पर धारण करता
है॥२९॥
अथ सामान्यं घृतम्
घृतं रसायनं स्वादु पित्तानिलविषापहम् ।
आयुष्यं बृंहणं शीतं पापालक्ष्मीविनाशकम् ॥ ३० ॥
सामान्य घृत
१. रसायन, २. स्वादु, ३. पित्त वात हर, ४. विषघा, ५. आयुष्य, ६. बल्य,
७. शीतल, ८. पाप-दरिद्रा विनाशक।
ये घृत के सामान्य गुण-प्रभाव होते हैं॥३०॥

७० क्षेमकुतूहलम्
अथ गव्यं घृतम्
गव्यमग्निकरं सर्पिः कफपित्तानिलापहम्।
चक्षुष्यं बृंहणं शीतं विपाके मधुरं स्मृतम्॥३१॥
गव्य (गौ) घृत
१. जाठराग्निवर्धक, २. कफपित्तनाशक, ३. वात शामक, ४. चक्षुष्य, ५. बल्य,
शीतल, ७. मधुर-विपाकी। ये गौघृत (गाय के घी) के सामान्य गुण होते हैं॥३१॥
अथ माहिषं घृतम्
माहिषं मधुरं पाके रक्तपित्तानिलापहम्।
सुशीतं बृंहणं वृष्यं चक्षुष्यं रुचिकारकम्॥३२॥
माहिष (भैंस) का घृत (घी)
१. घृत पाक में मधुर, २. रक्तपित्तहर, ३. वातनाशक, ४. शीतल, ५. बल्य,
६. चक्षुष्य, ७. रुचिकर॥३२॥
अथाजं घृतम्
आज्यमाजं हि चक्षुष्यं दीपनं बलवर्धनम्।
श्वासे कासे क्षये पथ्यं लघु गव्याद्गुणावहम्॥३३॥
आज (बकरा की) घृत (घी)
१. चक्षुष्य, २. अग्निदीपन, ३. बल्य, ४. श्वासवर्धक, ५. कासहर (पथ्य),
६. क्षयनाशक (पथ्य)।
ये गोघृत के समान गुणवान्, गौघृत से भी अधिक गुणयुक्त होता है॥३३॥
अथान्नदृग्दोषपरिहारकश्लोकाः
अन्नं ब्रह्मा रसो विष्णुर्भोक्ता चैव महेश्वरः।
ध्यात्वा नारायणं देवमन्नदोषैर्न बाध्यते॥३४॥
या दृष्टिः सर्वलोकेषु दृष्ट्या च स्वभावतः।
आत्मदृग्दोषनाशाय संस्मरेन्नारदं मुनिम्॥३५॥
अन्नगत दृष्टि-दोष दूरी करण
अन्न में दृष्टि-दोष निवारणार्थ मन्त्र (श्लोक) इस प्रकार है-
षष्ठोत्सवः ७१
अन्न ब्रह्मा है, विष्णु है तथा शंकर भोक्त है। नारायण देवता का ध्यान करने
से अन्न को दृष्टिदोष दूषित नही करते। जो दृष्टि सभी संसार में है, जो दृष्टि स्वाभाविक
है, आत्मदृष्टि दोष को नाश करते हैं- इसके लिए नारद मुनि का स्मरण करना
चाहिए॥३४-३५॥
अञ्जनीगर्भसंभूतं कुमारं ब्रह्मचारिणम्।
दुष्टदृष्टिविनाशाय हनुमन्तं स्मराम्यहम्॥३६॥
भोजन पर दुष्ट दृष्टि का निवारण (रक्षण) करने के लिए, अंजनी के गर्भ से
उत्पन्न कुमार, ब्रह्मचारी, हनुमान का स्मरण किया जा रहा है॥३६॥
पठतीत्यादिकं वाक्यं भोजनादौ भिषग्वरः।
सर्वदोषविनाशाय भुक्तं शीघ्रं यथा पचेत्॥३७॥
उत्तम महानसिक वैद्य भोजन के प्रारम्भ में, मुख्य वाक्यों (श्लोकों-पूर्व में
लिखित) से समस्त दोषों के नाशनार्थ पाठ करते हैं, इससे युक्त आहार का पाचन शीघ्र
हो जाता है॥३७॥
पञ्चग्रासं तु मौनेने प्राणापानादिकाश्रितम्।
अन्यद्वैद्यसहालापैः कर्तव्यं भोजनं नृपैः॥३८॥
राजा को चाहिए, पंच ग्रास मौन होकर पंच वायु/प्राणों-यथा प्राण, अपान,
व्यान, उदान तथा समान को स्मरण करते हुए, विशेष अन्न (आहार) राजाओं के साथ
वार्तालाप करते हुए, उनके साथ भोजन ग्रहण में सहभागिता करनी चाहिए॥३८॥
अथ पर्पटः
मुद्द्जीरकवाहीकस्वर्जिका मरिचान्विताः ।
अरोचकजिगीषूर्णां पर्पटाः पुरतो भटाः॥३९॥
अङ्गारभृष्टास्ते श्रेष्ठा न तु स्नेहविपाचिताः।
पर्पटा लघवो रुच्या मुद्रजा विधिपाचिताः॥४०॥
पर्पट (पापड़)
पर्पट (पापड़) का निर्माण जीरक केशर, स्वर्जिका क्षार तथा मरिच के साथ मुद्ग
के साथ करते हैं। इसका सेवन से अरोचकनाशक सभी आहार द्रव्यों मे उत्तम माना
जाता हैं, जब कि स्नेह विपाचित (तैल आदि में मुनि) पापड़ (उसके समान) गुणकारी

७२ क्षेमकुतूहलम्
नहीं होते। सामान्यतः मुद्ग (मँग) के पापड़ लघु एवं रुचिकर आदि गुणों को प्रदान
करते है- (विधिपाचितः)॥३९-४०॥
अथ पटोलफलम्
फलं पटोलं विहितद्विखण्डं विशुद्धद्रव्यार्हत शुष्कपाकम्।
वाघारितं हिङ्कणे सहाज्ये ससैन्धवं बोधयति क्षुधां च॥४१॥
पटोलं पाचनं हृद्यं वृष्यं लध्वग्निदीपनम्।
स्निग्धोष्णं हन्ति कासार्शोज्वरदोषत्रयकृमीन्॥४२॥
पटोल फल (परवल)
पटोल के फलों के द्विखण्डों को घृत-हिंगु में भूनकर, विशुद्ध द्रव्य, (बेसवार) तथा
सैंधव लवण मिश्रित करने के साथ पकाते है (यह अग्निदीपन, पाचक, हृद्य, वृष्य, लघु,
स्निग्ध, उष्ण तथा कास-अर्श-ज्वर-त्रिदोष-कृमिनाशन होता है॥४१-४२॥
अथ ताहडी
निरस्थिवेसवाराढ्यं पलं पक्वं सतन्दुलैः।
घृतार्द्रमार्द्रकैर्युक्तं नाम्ना तत्ताहडी स्मृता॥४३॥
वातपित्तहरा गुर्वी शुक्रपुष्टिप्रदा भृशम्।
गुणानां यो विशेषोऽय मांसभेदात्स जायते॥४४॥
ताहड़ी (ताहरी)
अस्थिरहित वेसवार युक्त तन्दुल (चावल) से पतन, घृत सहित (आर्द्र) तथा
आर्द्रक युक्त मांस-को 'तहड़ी' नाम दिया जाता है। यह मल का आहार है। यह वात-
पित्तनाशक, गुरु तथा शुक्रपुष्टिदायक हैं; ताहडी के गुण अन्य मल के गुणों (मल मुखर
घटक द्रव्य) के अनुसार होती हैं॥४३-४४॥
अथ कृशरा
तन्दुलैः षष्टिसंभूतैः कण्डितैर्न च खण्डितैः।
अष्टभागयुतैर्मुद्गैः संयुक्तैर्द्वादशांशकैः॥४५॥
सार्द्रा नार्द्रा सुगन्धाना सवाहीका वरान्विता।
सस्नेहा कामिनीवेयं कृशरा शिशिरे हिता॥४६॥
कृशरा दुर्जरा बल्या गुर्वी वातविनाशिनी।
बलपुष्टिमलश्लेष्मपित्तविष्टम्भकृत्सरा ॥४७॥


षष्ठोत्सवः ७३
कृशरा (खिचड़ी)
अखण्डित तन्दुल (तण्डुल-चावल) अष्टभाग तथा मुद्ग द्वादश भाग, केशर एवं
सुगन्धित द्रव्य (वेसवार), हरिद्रा मिश्रित- शुष्क या आर्द्र पाक किया जाता है। यह
आहार-द्रव्य घृत के साथ खाने से, नवयौवक (कामिनी) स्त्री के समान शिशिर (हिम)
ऋतु में हितकारी है। यह दुर्जर, वस्त्र, मुद्र, वातनाशक, बल्य, पुष्टिदा, मल-कफ-
वातावरोध (आनाह-विष्टम्भ) जनक तथा सारक होती है॥४५-४७॥
अथ कर्चरी
क्षाराम्लकृतसंस्कारा शुष्का स्नेहविपाचिता।
अरोचकादिरोगाणां कर्चरी कण्ठकर्तरी॥४८॥
कर्चरी रुचिकृद्बल्या सुस्वादी त्वतिलेखनी।
उष्णा पित्तपरा प्रोक्ता कफकृत्सारका स्मृता॥४९॥
कर्चरी (कचरी)
क्षार एवं अम्ल पदार्थों के मिश्रण से पक्व शुष्क कर्चरी बनती है। यह अरोचक
आदि रोगनाशक, कण्ठ कर्चरी (गले को साफ करनेवाले) होती है। रुचि, बलवर्धन,
स्वादु, अतिलेखनी (मल पतला करने वाली), उष्ण, पित्त-कफकारक तथा सारक होती
हे॥४८-४९॥
अथ मूलकम्
सुकलितमतिसूक्ष्मं बालमूलस्य मूलं
लवणमथितमुच्चैः पीडितं पाणियुग्मे।
सुरभितमतिनिम्बूहिङ्गुधूपेन युक्तं
भवति जठरवह्नेस्तूर्णमुद्दीपनाय॥५०॥
मूलक (मूली)
बालमूलक (छोटी मूली) के अत्यन्त सूक्ष्म (पतले) मूल में लवण मिलाकर,
दोनों हाथों से मसलकर, निम्बूक स्वरस तथा भृष्ट हिंगु मिश्रितकर सुगंधित करते हैं।
यह मूलक का आहार-द्रव्य तुरन्त जाठराग्नि का प्रदीपन करता है॥५०॥
मूलकं वातलं रुच्यं वीर्योष्णं पाचनं लघु।
हन्ति दोषत्रयं श्वासं सुष्ठुयोगाच्च पीनसान्॥५१॥

७४ क्षेमकुतूहलम्
महत्तदेव विष्टम्भिर् रूक्षं दोषत्रयप्रदम्।
स्निग्धसिद्धं तदेव स्यद्गोषत्रयविनाशनम्॥५२॥
तत्पुष्पं श्लेष्मपित्तघ्नं फलं वातकफापहम्॥५३॥
वात मूलक (छोटी मूली) शाक के गुण- १. वातनिःसारक, २. रोचक,
३. उष्णवीर्य, ४. पाचक, ५. लघु, ६. त्रिदोष हर (रोगनाशक द्रव्यों के संयोग से),
७. श्वासवृद्धि, ८. पानसनाशक है।
मूलक (बड़ी मूली) आनाहकारक- १. रूक्ष, २. त्रिदोषवर्धक। घृत तलित
मूलक (मूली) त्रिदोषहर। मूलक पुष्प कफपित्तहर तथा फल (फली) वातकफ नाशक
होते हैं॥५१-५३॥
अथार्द्रकम्
भोजनाऽग्रेसदा पथ्यं जिह्वाकण्ठविशोधनम्।
अग्निसंजननं श्रेष्ठअठं लवणाऽर्द्रकभक्षणम्॥५४॥
आर्द्रक (अदरक)
भोजन के पूर्व (आहार भक्षण प्रारम्भ करने के पहले) आर्द्रक (अदरक) खण्ड
(टुकड़ों) को लवण (नमक) मिलाकर खाना सर्वद (सदैव) पथ्य, हितकर तथा
लाभदायक है (भोजनाग्रे सदा पथ्यं निवर्णर्द्रक भक्षणम्- अन्य ग्रन्थ/ संहिता)। यह
जिह्वा तथा कण्ठ का विशोधन कारक है तथा जठराग्नि का श्रेष्ठ रूप से (भलीप्रकार)
प्रदीपन करता है॥५४॥
मृत्त्वचारहितमङ्कुरवच्च क्षालितं सुविमलैर्बहुतोयैः।
मिश्रितं लवणाम्निम्बुपयोभिर्बालमार्द्रकमुमापतियोग्यम्॥५५॥
मृदा एवं वल्क रहित, अंकुर सहित आर्द्रक कन्द-स्वच्छ जल से धौत-सुविमल
कन्द, निम्बू स्वरस मिश्रित लघु खण्ड (आर्द्रक) भगवान् शंकर के सेवन योग्य है; यह
यह स्वादिष्ट तथा सर्वजन प्रिय होती हैं॥५५॥
तैलासूरीरजनिसिन्धुजपङ्कषद्भि-
प्रस्यन्दमाननवनिम्जुरसप्रसिक्तम्।
स्वादूत्तरं शिशिरवासरभोजनेषु
कस्येति वर्णनपथं खलु शृङ्गवेरम्॥५७॥


षष्ठोत्सवः ७५
तैल, राजिका, हरिद्रा तथा सैंधव को निम्बूक स्वरस में आर्द्रक मिश्रित कर;
स्वाद मुक्त शिशिर ऋतु में भोजन के साथ प्रार्थना का किसका विषय नही है। अर्थात्
सेवन योग्य है॥५७॥
एके वदन्त्यमृतमस्ति पुरेसुरणामन्येऽपि चारुवनिताधरपल्लवेषु।
ब्रूमो वयं सकलवैद्यमतानुसारं जम्बीरनीरपरिपूरितशृङ्गवेरे॥५८॥
अमृत रस स्वादी कहते हैं कि देवताओं के नगर (स्वर्ग) में अमृत है, तथा सुन्दर
स्त्री के अधर पल्लव में अमृत का वास बताया गया है (कुछ व्यक्तियों द्वारा)। परन्तु
समस्त वैद्यों का मत है कि जम्बीर (निम्बूक) स्वरस में परिपूरित (लुप्त) शृंगवेर
(अदरक) के अमृत से भी उत्तम होता है॥५८॥
वव्योष्णं दीपनं हृद्यं सस्नेहं लघु पाचनम्।
रोचनं प्रीणनं बल्यमार्द्रकं परिकीर्तितम्॥५९॥
आर्द्रक वृष्य, दीपन, हृद्य, स्निग्ध, लघु, पाचक, रुचिकर, प्रीणन (प्रसन्नतादायक)
तथा बल्य होता है॥५९॥
अथ हरीसाः
कृत्तं निरस्थि संपक्त्रमाज्ये स्वोपस्करान्वितम्।
मांसं गोधूमसंयुक्तं हरीसेत्याह सूदकः॥६०॥
हरीसा (आसा)
अस्थि रहित मांस खण्ड, उपस्कार (वेशवार) से युक्त, गोधूम के साथ घृत में
पकाकर, व्यंजन को पाचक (सूदक) गण हरीसा की संज्ञा देते हैं॥६०॥
बल्या समधुरा गुर्वी शीतोष्णाऽनिलपित्तहा।
स्निग्धा शुक्रप्रदा हृद्या सरा सन्धानकारिणी॥६१॥
हरीसा के गुण- बल्य, मधुर, गुरु, शीतोष्ण, वातपित्तनाशक, स्निग्ध, वीर्यवर्धक,
हृद्य, सर तथा सन्धानकारिणी॥६१॥
अथ मांस्रन्थनविधिः
ग्राम्यस्यानूपजस्यापि जाङ्गलस्याण्डजस्य च।
बिलौकसश्च मांसानां रन्थनस्योच्यते विधिः॥६२॥

मांसरन्धन क्रिया
मांस को पकाने की विधि यह है कि मांस (ग्राम्यज), आनूपज एवं जांगल
प्राणियों तथा अण्डज एवं विलेशय जन्तुओं के मांस का पाक किया जाता है॥६२॥
तलितं भृष्टकं स्विन्नं शुष्कं बहुरसं स्मृतम्।
तान्दूरं वण्टितं चैवं शूल्यं च पुटपाकजम्॥६३॥
तलित, भृष्टक, स्विन्न, शुष्क, बहुरस, तन्दूर (तान्दूर), वण्टित, शूल्य तथा
पुटपाकज आदि विभिन्न प्रकार मांस पाक के होते हैं॥६३॥
तलितं त्रिविधं प्रोक्तं भृष्टकं द्विविधं स्मृतम्।
सुस्विन्नमस्थिगलितं शुष्कं तद्रसव्रर्जितम्॥६४॥
सरसं रसवज्ज्ञेयं तान्दूरं वह्निपाचितम्।
वण्टितं तु शिलापिष्टं तत्पाको बहुधा स्मृताः॥६५॥
तलितं मांस के तीन प्रकार हैं- भृष्ट मांस दो प्रकार का होता है। अस्थि गलित
करने हेतु मांस स्विन्न, रसरहित को शुष्क तथा रसयुक्त को सुरस (सरस), अग्नि पर
पकाने मांस को तन्दूर शिला-पिष्ट मांस वण्टित पाक कहते हैं। यह मांसपाक विविध
प्रकार का होता है॥६४-६५॥
शूलेन पक्वं मांसं यत्तज्ज्ञेयं शूलपाचितम्।
गर्तयन्त्रेण यत्पक्वं तज्ज्ञेयं पुटपाकजम्॥६६॥
एवं बहुविधः पाकः सूपकारधिया कृतः।
यस्य जन्तोर्हि यन्मांसं तन्मासं तद्गुणावहम्॥६७॥
विशेषोऽत्र यदुद्दिष्टः स ज्ञेयः सुष्ठुपाकतः।
शूल (लौह के डंडी पर पकाये मांस का प्रकार) द्वारा पक्व मांस को शूल्य या
शूलपाचित मांस कहा जाता है। गर्ततन्त्र (भूधर तन्त्र) में पकाये मांस को पुटपाकज
मांस कहते हैं। उस प्रकार सूदक (पाचक) के मतानुसार अनेक प्रकार के पाठ होते हैं।
जिस प्राणी का मांस पका है, गुण इसी के अनुसार हो जाते हैं। परन्तु मांस में विशेष
गुण उसकी पाक विधि द्वारा आता है॥६६-६७॥
मांसप्रक्षालनस्य विधिः
एवं बहुविधं मांसं प्रत्यङ्गं च पृथक्कृतम्॥६८॥
स्थूलातिस्थूलविहितं सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं च तत्।
खण्डशः कलितं मांसं धान्यहिङ्ग्वम्बुना क्रमात्॥६९॥
क्षालयित्वा पनुर्हिङ्गुतोयमिश्र पचेत्ततः।
मांस प्रक्षालन
मांस के अंग-प्रत्यंग पृथक कर, स्थूल से सूक्ष्म खण्ड बनाकर, हिंगु तथा
धान्यक जल से प्रक्षालन करते हैं, तदनन्तर हिंगु जल मिलाकर मांस का पाक
(अग्निपर) करते हैं॥६८-६९१/२॥
इति प्रक्षालनम्
अथ मांसवाचनविधिः
हिङ्ग्वार्द्रजीरमरिचैर्यैर्युक्तं वेसवारकम्॥७०॥
तच्च तैले पचेत्पूर्वमाज्ये वा सात्म्ययोगतः।
अर्धस्विन्ने क्षिपेत्तक्रमथवा दाडिमीरसम्॥७१॥
सिद्धे पाके च दातव्यं चूर्णमुद्धूलनस्य यत्।
मांस का तैल या घृत से युक्त (मतानुसार/ पाचन) पात्र (कढ़ाई आदि) में तप्त
कर, हिंगु, आर्द्रक, जीरक, मरिच आदि वेसवार सहित) पकाते हैं, तथा उसी में मांस
खण्ड को डाल देते हैं। अर्ध पका हो जाने पर, इसमें तक्र या दाडिम स्वरस मिश्रित
करते हैं, मांस सिद्ध (पक्व) हो जाने पर मसाले का चूर्ण भलीप्रकार मिला देते
हैं॥७०-७१॥
तैलपक्वमांसस्य गुणाः
मांसं तैलेन यत्सिद्धं तन्मांसं गुरु पित्तलम्॥७२॥
वीर्योष्णं रुचिदं वृष्यं वातघ्नं पुष्टिकारकम्।
तैल पक्व मांस
तैल के साथ पकाये मांस के गुण- गुरु (गरिष्ट), पित्तजनक, उष्णवीर्य, रुचि
कर, वृष्य, वातघ्न तथा पुष्टिकारक॥७२१/२॥
घृतपक्वमांसस्य गुणाः
मांसमाज्येन यत्सिद्धं लघु रुच्यमपित्तलम्॥७३॥
अनुष्णवीर्य बलदं हृद्यं दृष्टिप्रसादनम्।
क्षे. कु. 6