क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० क्षेमकुतूहलम्
लेपन विधान
क. गन्ध से शरीर, को निर्भलीकरण; तदनन्तर, कृतवागुरु- केशर-चन्दन का
लेपन- उष्ण तथा श्रेष्ठ (शीतकाल में हितकर)।
ख. जल के साथ घर्षण-कर्पूर मिश्रित लेपन : शीतल एवं सुगन्धित (ग्रीष्मकाल में
हितकर)
ग. केशर- कस्तूरी युक्त चन्दन- न उष्ण- न शीत (वर्षा काल में हितकर)॥२६-
२८१/२॥
सन्ध्योपासनविधान
कुलाचारं तु कुर्वीत सन्ध्योपासनमादितः॥२९॥
सूर्योपास्तिं ततः कुर्यादिष्टदेवस्य चार्चनम्।
दत्त्वा दानं च विप्रेभ्यो गृह्णीयात्तेभ्य आशिषः॥३०॥
सन्ध्योपासन विधान
सर्वप्रथम (तदनन्तर) सन्ध्योपासन तथा कुलपचार (योगाभ्यास, प्राणायाम, सूर्य
नमस्कार आदि उपयुक्त यौगिक क्रियायें), इष्टदेव पूजन तथा ब्राह्मणों को देकर, उनके
आशीर्वाद को प्राप्त करना चाहिए॥२९-३०॥
केशानां निचये कुर्यात्कस्तूर्याद्यनुलेपनम्।
सुपुष्पाणि सुगन्धीनि नित्यं शीर्षे प्रधारयेत्॥३१॥
क्लेदायाससमुद्भूतस्वेददुर्गन्धनाशनम् ।
चक्षुष्यं दाहशमनं सौमनस्यं च जायते॥३२॥
केशप्रसाधनादि विधान
केशों को संवारने के पश्चात्, कस्तूरी-केशर-चन्दन आदि का अनुलेपन, सुगन्धित
पुष्पों की शिर पर धारण करें, जिससे परिश्रमजन्य क्लेद, त्रिदज दुर्गन्ध, नेत्ररोगनाशक,
दाहशामक तथा सौममस्य जनन (मानसिक आह्लादकर) होता है॥३१-३२॥
पुष्पधारणस्य नियमाः
तीक्ष्णाग्रक्लूमकैतक्याः कोमलं धारयेद्दलम्।
जातीपुष्पं च नैवालं सेवन्तीं कुटजं तथा॥३३॥
पाटलं च बृहत्पुष्पं बकुलं चम्पकं तथा।
पञ्चमोत्सवः ५१
श्रीखण्डं चैव गौलालं कस्तूर्या सह धारयेत्॥३४॥
मन्दारं मरुवं चैव कुमुदं नीलमुत्पलम्।
रक्तोत्पलं पूतिपुष्पं कर्पूरैः सह धारयेत्॥३५॥
पुष्पधारण विधान
क. तीक्ष्णाग्र केतकी कोमल दल, जाती पुष्प, नैवाल, सेवन्ती, कुरज, पाटला,
बृहत्पुष्प, बकुल, चम्पक, मलयगिरि चन्दन तथा तरुणी, कस्तूरी के साथ
धारण करते हैं।
ख. मन्दार, मरुद, कुमुद, नीलकमल, रक्तकमल, पूतिपुष्प- इनको कर्पूर भी साथ
धारण करते हैं। अरूपतावस्था में छोटी बेल का पुष्प धारण किया जाता है।
ग. स्नान के पश्चात् जाती (मालिका), बेल पुष्प, तथा अभ्यंग के समय केतकी पुष्प
तथा उत्पल पुष्प सदैव धारण करते हैं। पराग युक्त जाती, कुद, नेपाल, चन्दन,
बिल्व तथा मल्लिका- इनका पुष्प शिर पर धारण करना चाहिए॥३३-३७॥
पुष्पाणां गुणाः
अस्नातैर्मल्लिका धार्या सुस्नातैर्जातिबिल्वजम्।
अभ्यङ्गे केतकी धार्या धार्यं चोत्पलं सदा॥३६॥
जातीं कुन्दं च नैवालं श्रीखण्डं बिल्वमल्लिके।
मकरन्दे संयुक्तं शिरसा धारयेन्नरः॥३७॥
सर्वाण्येतानि तुल्यानि रसतो वीर्यतस्तथा।
त्रिदोषशमनीयानि सर्वकाले प्रधारयेत्॥३८॥
कैतकं बाकुलं पुष्पं श्रीखण्डं शतपत्रकम्।
गौलालं चम्पकं पुष्पं वातश्लेष्महरं परम्॥३९॥
उष्णवीर्यं च तत्प्रोक्तं शीतकाले प्रधारयेत्।
पुष्पों का गुण
यह समस्त पुष्प (उपरोक्त) रस-वीर्य मे समान है, त्रिदोषनाशक है, इसलिए
इनको सदैव धारण करें। केतकी, वकुल, चन्दन कमल, तरुणी तथा चम्पक पुष्प वात-
कफ नाशक (श्रेष्ठतम) एवं उष्ण वीर्य है। अतः इन पुष्पों को शीतकाल में धारण
करें॥३६-३९१/२॥