क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ क्षेमकुतूहलम्
४. षण्मूत्री (छह बार मूत्र त्यागी)
५. द्विपुरीषक (दो बार मल त्याग)
इन नियमों का पालन करने वाला व्यक्ति सौ वर्ष (शतं वर्षाणि जीवति) जीवित
रहता है॥९३॥
उपसंहारः
दिनचर्या समाप्तऽथ भोक्ता च परिवेषकः।
पानीयं भोजनं चाथ रन्धनस्योच्यते विधिः॥९४॥
इति श्रीनरवैद्यमन्मथात्मजक्षेमशर्माविनिर्मिते क्षेमकुतूहले ग्रन्थे
दिनचर्याप्रशंसनो नाम पञ्चमोत्सवः॥५॥
उपसंहार
दिनचर्या पूर्ण हो गयी, अब भोक्ता, परिवेषक, मान योग जल, भोजन तथा
भोज्यविधि आगामी उत्सव (षष्ठ) के वर्ण्य विषय है॥९४॥
इति हिन्दी व्याख्या सहित क्षेमकुतूहल का दिनचर्या वर्णन नामक
पांचवाँ उत्सव समाप्त॥
अथ षष्ठोत्सवः
(षष्ठ प्रकरण)
'भोक्तुः स्वरूपम
अथ भोजनप्रकारस्तत्र भोक्ता
स्नातः सुधौतमृदुसुन्दरशुक्लवासा-
स्तत्कालधौतचरणः प्रियपुत्रमित्रैः।
स्त्रग्वी प्रसन्नहृदयो रसपाकवेद्यां
भोक्ता प्रविश्य हितसात्म्यसमानवैद्यैः ॥१॥
भोक्ता का स्वरूप तथा भोजन ग्रहण
भोक्ता को शुद्ध स्नात, सुन्दर वस्त्र धारण (मृदु- मुधौत-शुक्लवास) किए हुए,
धौत करण (पैर धुले), माला धारी, प्रसन्न हृदय, प्रिय पुत्र मित्रों के एक साथ महानस
में जाकर हितकर तथा सात्म्य भोजन (ग्रहण) करना चाहिए॥१॥
अथासनम्
भोक्तुरासनम्
मृदुतूलमये स्थूले चारुवस्त्रावगुण्ठिते।
आसने प्राङ्मुखो भोक्तोपविशेद्वाऽप्युदङ्मुखः॥२॥
भोक्ता का आसन
सुन्दर वस्त्रधारी, मृदु, स्थूल, मोटे (स्थूल) आसन पर भोक्ता को पूर्वामुख
आसन ग्रहण करना चाहिए॥२॥
अथ भोजनपात्राणि
तिष्ठन्ति यत्र नवकाञ्चननिर्मितानि
श्रेणीकृतानि परितस्तु कचोलकानि।
राकाशशाङ्कनवमण्डलभास्वरं यत्
क्षोणीभृतां रजतनिर्मितपात्रकं स्यात्॥३॥