क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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५. सुगन्धित पाटला पुष्प- ज्वर, मूर्च्छा, तृष्णाहार, आयुष्य तथा दाहशामक।
ऋतुक्रमेण पुष्पधारणविधिः
हेमन्ते शिशिरे चैव शतपत्रं तु शोभनाम्।
वसन्ते केतकी धार्या घर्मे नैपाल मालती ॥५३॥
प्रावृट्सु पाटलं धार्यं चम्पकं शरदि स्मृतम्।
विभिन्न ऋतुओं में पुष्पधारण
१. हेमन्त तथा शिशिर - कमल पुष्प
२. वसन्त - केतकी पुष्प
३. ग्रीष्म - नैपाल-जातीपुष्प
४. वर्षा - पाटला पुष्प
५. शरद् - चम्पक पुष्प
आभूषणधारणविधिस्तस्य फलञ्च
भूषणैर्भूषयेदङ्गं यथाविभवसारतः ॥५४॥
शुचि सौभाग्यसन्तोषदायकं काञ्चनं स्मृतम्।
रत्नानां भूषणानां च धारणं ग्रहतुष्टिकृत् ॥५५॥
आभूषण धारण
स्वधन सम्पत्ति के अनुकूल आभूषणों से अंगों का विभूषण करना चाहिए।
कांचन (स्वर्ण) आभूषण पवित्र (शुचि), सौभाग्य एवं सन्तोषदायक होता है। रत्नों का
आभूषण धारण से ग्रहों की तुष्टि प्राप्त होती है॥५४-५५॥
धार्मिककार्यविधिस्तस्य फलञ्च
धर्मसंग्रहणं कार्यं दीनदानोपवासकैः।
स्वबन्धुपिट्देवानां ब्राह्मणानां च तर्पणम् ॥५६॥
कार्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं पापहरं परम्।
धार्मिक कृत्य विधान
क. दरिद्रों को दान
ख. उपवास-व्रत द्वारा धर्मसंग्रह (उपजीवन)
पञ्चमोत्सवः ५५
ग. बन्धु-बान्धव, पितृ, देवता, ब्राह्मणों का तर्पण : यश, आयु वर्धक, स्वर्गप्रदानकर्ता,
पाप नाशक (परम्)॥५६१/२॥
भोजनकालिकविधिः
ततो भोजनवेलायां कृताचारः सहात्मवान् ॥५७॥
देवान् पितॄन् समभ्यर्च्य कुर्यान्मङ्गलवीक्षणम्।
भोजन कालिक विधान
कृताचार उपरान्त संयमी व्यक्ति रुदात्तारों से युक्त, भोजन के समय देव-पितृ
पूजन कर, व्यक्ति को मांगलिक वस्तुओं का अवलोकन करना चाहिए॥५७१/२॥
अष्टौ मंगलवस्तूनि
लोकेऽस्मिन्मङ्गलान्यष्टौ ब्रह्मणौ गौर्हुताशनः ॥५८॥
हिरण्यं सर्पिरादित्य आर्यो राजा तथाऽष्टमः।
एतानि सततं पश्येन्नमस्येदर्चयेत्तथा ॥५९॥
अष्टमाङ्गलिक पदार्थ
१. ब्राह्मण ५. घृत
२. गौ ६. सूर्य
३. अग्नि ७. आर्य
४. स्वर्ण ८. राज्ञ (राजा)
इन समस्त- अष्टमंगलदायक वस्तुओं का दर्शन तथा नमस्कार करना
चाहिए॥५८-५९॥
प्रदक्षिणायाः फलम्
प्रदक्षिणं सदा नित्यमायुर्वर्धनमुत्तमम्।
प्रदक्षिण
प्रतिदिन प्रदक्षिणा करना आयुवर्धक तथा अति उत्तम होती है॥५९१/२॥
भोजनविधिः
पलीविहितशृङ्गारं प्राप्य भोजनमण्डपम्॥६०॥