क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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अर्धार्धप्रतिमादर्शि कांस्यमादर्शवच्छुचि।
कांस्यं बुद्धिप्रदं भव्यं पालाशं रुचिकृद्वरम्॥४॥
भोजन पात्र
भोजनालय में नव स्वर्ण निर्मित, पंक्तिबद्ध कचोलक (आलमारी) स्थित होता है
वहाँ राजा का पाव रात्रि- चन्द्रमा के नवीन बिम्ब के समस्त रजत पात्र तथा आः
प्रतिमादर्शी (शीशे) के समय स्वच्छ भास्य पात्र रखा हो। कांस्यपात्र बुद्धिप्रद एवं भव्य
(सुन्दर) निर्मित पालाश (पत्तल) रुचिकृत् (श्रेष्ठ) है॥३-४॥
अथाचमनोदकम्
(भोजनकाले पेयजलम्)
उषितं पटसंपूतं सौवर्णे भाजने स्थितम्।
सव्यभागे जलं भोक्तुः स्थापितं चन्द्रवासितम्॥५॥
भोजन पात्र
जल उष्ण करके, वस्त्रपूर्ति पश्चात् स्वर्ण पत्र में स्थित, कर्पूर से सुगंधित जल
भोक्ता के दक्षिण पार्श्व में स्थित हो॥५॥
ऋतुकमेण जलस्य गुणः
हेमन्ते शिशिरे चैव सरोजं वातडागजम्।
सुशीतं रक्तपित्तघ्नं तृष्णादाहरुजापहम्॥६॥
वसन्तग्रीष्मयोः कौपं वाप्यं नैर्झरमेव च।
सक्षारं पित्तलं कौपं दोषघ्नं चारु नैर्झरम्॥७॥
प्रावृट्सु कौपं दिव्यं वा क्वथितं चैन्द्रसंभवम्।
कौपं वातहरं प्रोक्तं दिव्यं दोषत्रयापहम्॥८॥
शरत्प्रसन्नमुदयादगस्त्यस्याखिलं हितम्।
तत्तोयं गुणवज्ज्ञेयं बल्यं दोषत्रयापहम्॥९॥
ऋतु के अनुसार जल
क. हेमन्त तथा शिशिर ऋतु : सरोज या तडागज जल : शीतल रक्तपित्तनाशक
तृष्णा-दाह-संग हर
ख. वसन्त तथा ग्रीष्म ऋतु : कौप्य, कप्य, नैर्झर जल : क्षारयुक्त, पित्तकर, कूप
षष्ठोत्सवः ६५
जल दोषनाशक एवं
नैर्झर जल स्वच्छ-
सुन्दर
ग. वर्षा : कूपज, दिव्य जल या : दोषनाशक; कूपज
उष्ण किया, जल वातनाशक; दिव्य जल
(अकाश का जल) त्रिदोषहर।
घ. शरद ऋतु : उदय (अगस्त तारा के : सर्वप्रकार हितकर,
पश्चात्) स्वच्छ जल गुणवान्, बल
त्रिदोषहर।
स्थालीपात्रे परिवेशस्य नियमाः
पुरस्ताद्विमलं पात्रं सुविस्तीर्णं मनोरम्।
स्थापितं पीठके शुभ्रे नाभिदेशसमुन्नते॥१०॥
तत्र भक्तं परिन्यस्तं मध्यभागे सुसंयतम्।
सूपः सर्पिः पलं शाकं पिष्टमन्नं तु मत्स्यकम्॥११॥
स्थापयेद्दक्षिणे पार्श्वे भुञ्जानस्य यथाक्रमम्।
प्रलेहाद्या द्रवाः सर्वे पानीयं पानकं पयः॥१२॥
चोष्यं सन्धानकं लेह्यं सव्ये पार्श्वे प्रदापयेत्।
सर्वं इक्षुविकाराश्च पक्वान्नं पायसं दधि॥१३॥
पुरतः स्थापयेद्भोक्तुर्दयोः पङ्क्त्योश्च मध्यतः।
एवं विज्ञाय मतिमान् परिवेशप्रकल्पनम्।
ततोऽर्हो भवति प्राज्ञः सम्यक् परिवेषितुम्॥१४॥
स्थाली पात्र परिवेषनम्
भोक्ता के सम्मुख भक्ति नाभि तक उच्च, श्वेत पीठिका, मनोहर, बड़ा तथा स्वच्छ
पात्र रखना चाहिए। स्थाली (थाली) के मध्य भाग में ससंयुत भक्त तथा क्रम से सूप
(दाल), घृत, बल (मांस), शाक तथा मत्स्यादि दक्षिण पार्श्व मे परोसकर रखना
चाहिए। प्रलेह आदि पदार्थ, द्रव पदार्थ, पानीय जल, दुग्ध, चोष्य, संधानक तथा
लेह्य, सव्य पदार्थ। समस्त गुड निर्मित पदार्थ, पकवान, पायस, दधि-भोक्ता के दोनों
पंक्ति के मध्य भाग मे स्थित करते है। इस प्रकार परिवेषक मतिमान् सुज्ञात परिवेषन
(परोसने की) कला से युक्त होना चाहिए॥१०-१४॥