क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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तथा चाग्निबलं वीक्ष्य कुर्याद्भोजनकं नरः।
एक एव न भुञ्जीत यदीच्छेत्तित्द्धिमात्मनः॥६१॥
द्वित्रिभिर्बहुभिः सार्धं भोजनं तु दिवानिशम्।
ततश्चाभीष्टसिद्धिः स्यादिष्टकामं तु संपदः॥६२॥
भोजन विधान
अपनी पत्नी- आभूषण एवं वस्त्रादि धारण करने से सुसज्जित- से युक्त
भोजनालय में पहुँचकर, अपनी जाठराग्नि से बल का अनुभव करके भोजन व्यक्ति
को करना चाहिए। स्वकल्याणकारी व्यक्ति को एकाकी (अकेले) भोजन नहीं
करना चाहिए। दिवा-रात्रि (दोनों समत्त) तीन या बहुतों के साथ भोजन करना चाहिए।
इससे अभीष्ट की सिद्धि होती है तथा अभिलाषा के अनुरूप धन की प्राप्ति होती
है॥६०-६२॥
ताम्बूलभक्षणगुणाः
ताम्बूलं भक्षयेत्पश्चाद्दत्वा विप्राय शोभनम्।
मनसो हर्षदं श्रेष्ठं रतिदं मदकारकम्॥६३॥
मुखरोगकृमिहरं ताम्बूलं रुचिकारकम्।
ताम्बूल भक्षण के गुण
राजा को चाहिए, पहले ब्राह्मण को दान देवें तथा फिर पान (ताम्बूल) का भक्षण
(चर्वण) करें। यह हर्षदायक, अभीष्टकारी, को रतिद (कामोत्तेजक), मदकारक (नशीला),
मुखराग एवं कृमि कर तथा रुचिकारक होता है॥६३१/२॥
भोजनान्तरं कर्माणि
दिवास्वप्नं न कुर्वीत संयतो हि कफावहम्॥६४॥
दिवा स्त्रीगमनं नृणामायुःक्षयकरं भवेत्।
धर्मशास्त्राणि सततं पुराणश्रवणं तथा ॥६५॥
कारयेद्विधिना सम्यगात्मतत्त्वविवेचनम्।
भोजनान्तर कर्म (कर्तव्य)
भोजन के पश्चात् दिन में शयन नहीं करना चाहिए, क्योंकि दिवा निद्रा कफवर्धक
है। दिन में स्त्री मैथुन से पुरुष की आयु क्षय होती है। धर्मशास्त्र एवं पुराणों का अध्ययन
पञ्चमोत्सवः ५७
निरन्तर करते रहना चाहिए, तथा विधिपूर्वक (सम्यक् रूपेण); आत्म तत्त्व का विवेचन
करते रहना चाहिए॥६४-६५१/२॥
अथ सद्वृत्तम्
सुखार्थाः सर्वभूतानाः मताः सर्वाः प्रवृत्तयः॥६६॥
सुखं च न विना धर्म तस्माद्धर्मपरो भवेत्।
हिंसास्तेयान्यताकामं पैशुन्यं परुषानृतम्॥६७॥
दुर्गेष्ट्यहितचिन्ता च परद्रव्यस्य चिन्तनम्।
पापकर्मेति दशधा कायवाङ्मानसैस्त्यजेत्॥६८॥
सद्वृत्त
समस्त प्राणियों की सर्वप्रवृत्ति सुखार्थ (सुख के लिए) होती हैं, सुख धर्म के
बिना नहीं मिल सकता, इसलिए व्यक्ति को धर्म कार्य में तसर रहना चाहिए।
हिंसा- अस्तेय (चोरी)- यथाकाम (मनमाना कार्य), पैशुन्य, कठोरवाचक,
असत्यवादन, दुर्जन संगति अन्य के अहित की चिन्ता, दूसरे का धन (परद्रव्य) की
चिन्ता (योजना बनाना)- इस प्रकार के पापों को शरीर, वाणी तथा मन से विरत
(त्याग) कर देना चाहिए॥६६-६८॥
अवृत्तिव्याधिशोकार्ताननुवर्तेत शक्तितः।
भक्त्या सेवेत मित्रिणि, नसेवेताहिताज्ञान्॥६९॥
अवृत्ति व्यवसाय वृति रहित- (धनहीन), रोगी तथा शोक पीड़ितों को विशक्ति-
समाथ्य्र के अनुसार व्यक्ति द्वारा सहायता व्यक्ति द्वारा जानी चाहिए। मित्र संगति
शक्तिपूर्वक तथा हानिकारक पुरुषों के संग का परित्याग कर देना चाहिए॥६९॥
आत्मवत्सततं पश्येत्सर्वजन्त्वापिपिलिकम्।
उपकारप्रधानः स्यादपकारपरेऽप्यरौ ॥७०॥
पिपीलिका (चींटी) से सर्व जन्तुओं (हस्ति तक) को आत्मवत् (अपने सभाव)
देर बना समझाना चाहिए। हानिकारक शत्रुओं में भी उपकार की भावना करनी
चाहिए॥७०॥
काले हितं मितं ब्रूयान्नाहितं तु कदाचन।
हिताभिलाषी सुमुखो भवेच्च करुणो मृदुः॥७१॥