क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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अथ परिवेषकलक्षणम्
स्नातश्चन्दनचर्चितः सुवसनः स्रग्वी प्रसन्नाननः
स्पृष्टात्मा सुभगः प्रसन्नहृदयः श्रीकान्तपूजारतः।
स्वामिस्नेहपरः सुपाकनिपुणः प्रौढो वदान्यः शुचि-
र्विप्रो वा परिवेषकः सुकुलश्चान्योऽपि वा भूपतेः ॥ १५ ॥
योग्य परिवेषक
स्नात, चन्दन आलेषित, स्वस्थ वस्त्र धारित, पुष्पमाला धारण कश्यं, प्रसन्न
गुण, स्वस्थ आत्मा, सुन्दर, प्रसन्न हृदय, विष्णुपुजा रत, स्वामी सेवा परापण, सुपाक
में चतुर, युवा, दासी, पवित्र ब्राह्मण, सुकुल में उत्पन्न, अन्य (उपरोक्त गुणों से युक्त)
सत्पात्र व्यक्ति राजा का परिवेषक (खाना परोसने वाला) होना चाहिए॥१५॥
स्नाता विशुद्धवसना नवधूपिताङ्गी
कर्पूरसौरभमुखी नयनाभिरामा ।
बिम्बाधरा शिरसि बद्धसुगन्धिपुष्पा
मन्दस्मितमता क्षितिभृतां परिवेषिका स्यात् ॥ १६ ॥
श्रेष्ठा परिवेषिका
स्नाता, स्वच्छ वस्त्रधारिणी, नवीन धूप से सुगन्धित शरीर, कर्पूर से सुगन्धित
मुखवाली, सुन्दर नेत्र, पकव बिम्बी फल, शिर के बालों में सुगन्धित पुष्प (बद्ध
सुगन्धित पुष्पा), मुस्कान (मन्दस्मिता) से युक्त-स्त्री परिवेषिका (खाना परोसने वाली)
होना चाहिए॥१६॥
अथ भक्तम्
भोजनस्य प्रकाराः
भक्तादेः पत्रशाकादेरन्नानां मत्स्यमांसयोः।
क्षीरादेर्गोधूमादेश्च प्रकारा एवमादयः ॥ १७ ॥
वक्ष्यन्ते तत्र भक्तस्य रन्धने विधिरुच्यते।
भोजन के प्रकार-
भक्त रूप आदि, पत्र-फल-कन्द-शाक आदि, मांस, मत्स्य, दुध आदि, गोधूम
आदि अनेक प्रकार के भोजन अनेक प्रकार है॥१७१/२॥
षष्ठोत्सवः ६७
भक्तनिर्माणविधिः
वारिणा बहुशः शालितण्डुलान् क्षालितान् बहून् ॥ १८ ॥
तक्रे संसिच्य तान् तप्ते स्थाल्ल्याम्भसि विनिक्षिपेत् ।
ततः पयो घृतं क्षिप्त्वा स्विन्नानास्त्रावयेदिमान् ॥ १९ ॥
राजाहं तद्भवेद्भक्तं गन्धवर्णरसान्वितम् ।
एवं हि धान्यजातीनां रन्धनस्य त्वयं क्रमः॥ २०॥
भक्तपाक
शालि तण्डुल (धान के चावलों) को भलीप्रकार धोकर, तक्र से सिंचन कर, इन
चावलों को भोजन पाक पात्र (उष्ण जल से परिपूर्ण) मे छोड़ें तथा इसके बाद दुग्ध,
घी डालकर, सब चावलों को पकानें। यह गन्ध, वर्ण, रस से युक्त राजा के योग्य
भोजन तैयार हो जाता है। यही विधि धान्यवर्ग के अन्य पदार्थों को पाक करने की यही
विधि अनुसरण योग्य है॥१८-२०॥
स्वेदं शालेयमन्नं शशिकरनिकरोज्ज्वलं सिद्धसारं
भ्राग्यद्वाष्पाच्छलेन त्रिदशपुरसुधायैयमाधुर्यतत्वत् ।
अन्योन्यं नैव लग्न परिमलभरिताङ्गरवेदीविभागं
स प्राप्नोति प्रसन्नः प्रमथपरिवृढो यस्य पुंसः सदा स्यात् ॥ २१ ॥
ग्राह्य भक्त का सुन्दर स्वरूप
चन्द्र किरण सम उज्ज्वल, सुपरिपक्व, वाष्प भ्रायी, स्वर्ग-अमृत समान मधुर
रस युक्त, परस्पर विभिन्न प्रकार की सुगन्धों से युक्त स्वर्गमयी अमृत के मधुर रस युक्त,
अंगार सदृश विभक्त, शालि अन्य तण्डुलों से भक्त (भात) जिसको प्राप्त होता है, वह
सर्वाधिक प्रसन्न रहता है॥२१॥
भक्तस्य गुणाः
भक्तं वह्निकरं पथ्यं तर्पणं मूत्रलं लघु।
सधौतं स्त्रावितं चोष्णं विशदं गुणवन्मत्तम् ॥ २२ ॥
रन्धनस्य प्रकारोक्तो भक्तस्य च गुणोत्तमः।
यस्य धान्यस्य यद्भक्तं तस्य तद्गुणमावहेत् ॥ २३ ॥