क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ क्षेमकुतूहलम्
नैकः सुखी न सर्वत्र विश्वब्धो न च शङ्कितः ।
उचित समय पर हितकर वचन तथा सीमित (मित) भाषी, अहित की बाते कभी
भी न बोले अहितकांक्षी सुमुख, दयालु, कोमल स्वभाव युक्त होते हैं; अकेला-सर्वत्र-
विश्वब्ध तथा सशंकित सुखी नहीं हो पाता।।७१^१/२।।
न कञ्चिदात्मनः शत्रुं नात्मानं कस्यचिद्रिपुम् ।।७२।।
प्रकाशयेन्नापमानं न च निःस्नेहतां व्रजेत् ।
निज शत्रु को तथा किसी का शत्रु अपने को घोषित (प्रकाशित) नहीं करना चाहिए।
किसी का अपमान नहीं करें तथा निस्नेहता (द्वेष/वैर) नहीं रखना चाहिए।।७२^१/२।।
न पीडयेदिन्द्रियाणि नात्यर्थं लालयेद्बुधः ।।७३।।
परस्पराविरुद्धो यस्त्रिवर्गस्तं समाचरेत् ।
हस्त, वाद, मुख आदि इन्द्रियों को पीड़ित न करे या न अधिक लालन
(आराम) देवें। पस्पर अविरोधी त्रिवर्ग (धर्म-अर्थ-काम) का सम्पादन-अनुसरण करना
चाहिए।।७३^१/२।।
अनुयायात्प्रतिदिनं सर्वधर्मेषु मध्यमाम् ।।७४।।
कृत्तरोमनखश्मश्रुः शुद्धवेशधरो भवेत् ।
समस्त धर्मों का प्रतिदिन समान भाव से आचरण करना चाहिए। बाल-नख, रोम
का प्रतिदिन कर्तन करायें तथा शुद्ध वेश धारण करना चाहिए।।७४^१/२।।
चैत्यपूज्यध्वजाशस्तच्छायाभस्मत्तुपाशुचीन् ।।७५।।
नाक्रामेच्छर्करालोष्ठबलिस्रानभुवोऽपि च ।
नदीं तरेन्न बाहुभ्यां नाभिस्र्कन्धमभिब्रजेत् ।।७६।।
सन्दिग्धनावं वृक्षं च नारोहेद्दुष्टयानकम् ।
चैत्य, पूज्य, ध्वजा, अपवित्र छाया, भस्म, अपवित्र वस्तु, शर्करा, लोष्ठ, वति
स्थान पर पृथ्वी के ऊपर से नहीं लांघना/ चलना चाहिए। दोनों भुजाओं से नदी को न
तैरें, अग्निकंधे पर लेकर चलना, सन्दिग्ध नाव, वृक्ष तथा दुष्ट यान का प्रयोग (सेवन
उपयोग) न करे।।७५-७६^१/२।।
नासंवृतमुखः कुर्यात् क्षुतं हास्यं विजृम्भणम् ।।७७।।
पञ्चमोत्प्लवः ५९
अङ्गानि लोडयेन्नैव नासीतोत्कटुकश्चिरम् ।
नोर्ध्वजानुश्चिरं तिष्ठेन्नक्तं सेवेत न द्रुमम् ।।७८।।
तथा चत्वरचैत्यं च चतुष्पथसुरालयान् ।
शून्याटवीं शून्यगृहं श्मशानानानि दिवाऽपि च ।।७९।।
सुवथ, हास्य तथा (जृम्भा के समय मुख को न संवृत (फेला कर); अंगों को
अधिक न मोड़े (लोडयेत्); विषमासन पर न बैठें, जंघा के सहारे बहुत देर तक खड़ा
न हो।
रात्रि में वृक्ष, चत्वर, चैत्य, चतुष्पक्ष, देवालय के पास न रहें। एकान्त जंगल
(वन), एकान्तगृह तथा श्मसान में दिन में भी नहीं रहना चाहिए।।७७-७९।।
त्यजेदुष्णातपरजस्तुषारपरुषानिलान् ।
कु(कू) लच्छायान्नृपद्वेषिवालदंष्ट्रिविषाणिनः ।।८०।।
दुष्टातप, अतिधर्म, वर्षा एवं रूक्षता युक्त वायु का सेवन नहीं करना चाहिए।
नदी तट की छाया में राजा से द्वेष, बालदंष्ट्री, विषाण (सींग) वाले पशुओं का त्याग
कर देना चाहिए।।८०।।
सन्ध्यासु भोजनं स्वप्नं मैथुनाध्ययने त्यजेत् ।
गात्रवक्त्रनखैर्वाद्यं हस्तकेशावधूननम् ।।८१।।
प्रातःकाल भोजन, शयन, मैथुन तथा अध्ययन वर्जित है। शरीर, नख मुख से
ध्वनि न निकाले तथा हाथ से बालों को फटकाना (हस्तकेशावधूननम्) अनुचित है।
मद्यातिसक्तिं विश्रम्भं स्वातन्त्र्यं स्त्रीषु च त्यजेत् ।
शास्त्रं नृत्यं च गीतं च वाक्यं सेवेद्विचक्षणोत् ।।८२।।
१. अति मद्यपान का अभ्यास न करें
२. स्त्रियों का विश्वास तथा स्वतन्त्रता का त्याग
३. शास्त्र, मीत, नृत्य गीत, विद्वानो के शास्त्रीय वाक्यो (उपदेशो) का सेवन करना
हितकर।।८२।।
अत्यर्थं व्यसनं त्याज्यं कायवाग्रेतसां दमः ।
स्वार्थबुद्धिः परार्थेषु पर्याप्तमिति सद्ब्रतम् ।।८३।।