क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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६० क्षेमकुतूहलम्
अति व्यसन का परित्याग। शरीर, वाजी तथा वीर्य को वशीभूत, दूसरों (अन्य)
के अकार में पर्यन्त स्वार्थ बुद्धि (अन्य उपकार में ही अपना स्वार्थ) समझना आदि
सद्वृत्त के नियमान्तर्गत है॥८३॥
रात्रिचर्या
निशि स्वस्थमनास्तिष्ठेन्मौनी दण्डी सहायवान्।
एवं दिनानि मे यान्तु चिन्तयेदिति सर्वदा ॥८४॥
दुःखभाङ् न भवेत्येवं नित्यं सन्निहितस्मृतिः ।
एवं कृत्स्नं दिनं नीत्वा रात्रिं यामार्धिकावधिम् ॥८५॥
रात्रि चर्या
रात्रि (निशि) में स्वस्थ मन होकर। मौन धारण से, दण्डधारण करके, सहायक
के साथ ठहर कर, सदैव विचार करे कि हमारे दिन इसी प्रकार व्यतीत होते रहें। यह
निरन्तर स्मरण रखने से व्यक्ति को दुःख नहीं होता। इस प्रकार दूसरे (अगले) दिन की
चिन्ता न करके, एक प्रहर से अधिक रात्रि को व्यतीत करना चाहिए।।८४-८५।।
व्यवायस्य विधिः निषिद्धविधिश्च
दिवासन्ध्यं वर्जयित्वा सदा पर्वदिनानि च।
रात्रौ व्यवायं कुर्वीत योषिता निजया सह ॥८६॥
कुचैलां च कुशीलां च विधवां च पर स्त्रियम्।
नारीं नीचकुलोद्भूतां त्यजेत्सम्यग्विचक्षणः ॥८७॥
वयोधिकां स्त्रियं गत्वा तरुणः स्थविरायते ।
वृद्धोऽपि तरुणीं गत्वा यौवनत्वमवाप्नुयात् ॥८८॥
ऋतुकाले तु सुरतमवश्यं कारयेद्बुधः ।
स्त्रीनिःश्वासहतो ना हि दुर्भाग्यत्वमवाप्नुयात् ॥८९॥
व्यवाय (मैथुन) विधि
दिन, सायंकाल तथा पर्व दिवसों को छोड़कर, सदैव रात्रि को अपनी पत्नी के
साथ संभोग करना चाहिए। विद्वान व्यक्ति मलिन वस्त्रधारिणी, दुःश्चरित्रा, विधवा, पर
स्त्री तथा नीच कुल में उत्पन्न स्त्री को मैथुन हेतु त्याग कर दे।
अपने से अधिक आयु की स्त्री से संभोग न करें, अन्यथा युवा व्यक्ति वृद्ध हो
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पञ्चमोत्सवः ६१
जाता है। वृद्ध व्यक्ति युवती से मैथुन करने से व्यक्ति युवावस्था को प्राप्त करता है।
बुद्धिमान ऋतुकाल में (रजोनिवृत्ति के पश्चात) मैथुन करना चाहिए। अन्यथा स्त्री के
निःश्वास से आहत मनुष्य दुर्भाग्य शाली हो जाता है।।८६-८९।।
ऋते वै षोडषा दूर्ध्वन्तथाऽतिक्रान्तसप्ततेः।
स्त्रियं कामयमानस्य जायते हि बलक्षयः ॥९०॥
षोडश (सोलह) वर्ष के पूर्व तथा सत्तर वर्ष के बाद स्त्री से मैथुन करने वाले
व्यक्ति के बल का क्षय हो जाता है।।९०।।
ऋतुक्रमेण व्यवायस्य नियमाः
त्र्यहाद्वसन्तशरदोः पक्षाद्वृष्टिनिदाघयोः ।
प्रकामं तु निषेवेत मैथुनं शिशिरागमे ॥ ९१ ॥
शीते रात्रौ, दिवा ग्रीष्मे, प्रावृट्सु घनगर्जिते ।
वसन्ते च दिवा रात्रौ शरत्सु सरसः स्मरः ॥ ९२ ॥
ऋतुभेदानुसार मैथुन
१. वसन्त एवं शरद ऋतु : तीन-तीन दिन में
२. वर्षा एवं ग्रीष्म ऋतु : १५ दिन में संभोग करना उचित है।
३. शिशिर एवं हेमन्त ऋतु : स्वेच्छानुसार
ख. शीतकाल-रात्रि, ग्रीष्मकाल दिन तथा वर्षा में मेघ गर्जन होने पर तथा वसन्तकाल
दिन तथा शरद काल में रात्रि में कामदेव सरस (उद्दीप्त) रहा करता है- संभोग
हेतु उपयुक्त समय होता है।।९१-९२।।
स्वास्थ्याय विशेषकर्तव्यानि
वामशायी द्विभुञ्जानो षण्मूत्री द्विपरीषकः ।
स्वल्पमैथुनकारी च शतं वर्षाणि जीवति ॥ ९३ ॥
स्वास्थ्य रक्षक-वर्धक उपाय
१. वामशायी (बाँयी करवट सोना)
२. दिन-रात में दो बार भोजन (द्विभुंजान)
३. स्वल्प मैथुनकारी (संभोग कम से कम)
क्षे. कु. 5