क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
२१२ क्षेमकुतूहलम्
क्षिप्त्वाऽन्यसमितालम्बपुटे वेष्ट्या घृतेपचेत्।
ततः खण्डे न्यसेत्पक्वे गुह्यकोऽयमुदाहृतः॥१००॥
गुह्यको बृंहणो वृष्यो हृद्यः पित्तानिलापहः।
मधुरोतिगुरुः पाके किञ्चित्सन्धानकृत्सरः॥१०१॥
गुह्या-संयावक
क. विधि- समिता (मैदा) को घृत में सुमृष्ट करके, सिता, द्राक्षा, प्रियाल आदि
सम्मिलित करें, तथा सुगन्धि द्रव्यों-एला, लवंग, कर्पूर, मरिच आदि से
परिवासित (सुगंधमय) करते हैं। इसके बाद मैदा (समिता) के अन्य आलम्बन
पुट (छोटी-रोटी के टुकड़े) की मध्य वेष्टित (भर) कर, घृत में पकायें (पूर का
मुख बन्द करके) तथा इसे खण्डपाक (चाशनी), में अन्ततः डुबो देते हैं
(न्यसेत्पक्वे)। इस पदार्थ को, गुह्या-गुह्यक कहा जाता है। सामान्य मन भाषा
(हिन्द आदि) में गुझिया-मुथिया संयाव कहने का प्रचलन है (जिसका लोक
समाजिक परम्परा के पर्वो के विशिष्ट व्यंजन के मिष्ट पदार्थों में, होलिका होली
पर सकी निर्माण उपयोग सर्वविदित है)।
ख. गुण- १. वृंहण २. वृष्य
३. हृद्य ४. पित्तावह
५. अनिलपह ६. मधुर
७. अतिगुरु ८. मधुरविपाकी
९. अल्पसंधानकारिकी १०. सर
अथामृतसंयावकनिर्माणविधिर्गुणश्च
समितां मधुदुग्धेन मर्दयित्वा सुशोभनाम्।
पचेद्धृतोत्तमे तप्ते न्यसेत्पक्वनवे घटे॥१०२॥
ततो मरिचचूर्णैलाखण्डचूर्णावचूर्णितम्।
कुर्यात्कर्पूरसंयुक्तं संयावममृतं स्मृतम्॥१०३॥
संयावममृतं स्वादु पित्तघ्नं मधुरं स्मृतम्।
वृष्य वातहरं हृद्य विपाके गुरु भाषितम्॥१०४॥
अमृत संयाव
क. विधि- समिता (मैदा) को मधु एवं दुग्ध में मर्दन-सुशोधन (भलीभाँति मसल
दशमोत्सवः २१३
कर), तश उत्तम घृत में पाक करें तथा नवीनघट में स्थापित करके, मरिच, एला,
खण्ड चूर्ण का सम्मिलन करें। तत्पश्चात् कर्पूर मिलाकर, यह आवृत करते हैं। इस
पदार्थ को 'अमृतसंयम' (अमृत गुजिया) नाम दिया गया है।
ख. गुण- १. मधुर (स्वादु) २. पित्तशामक
३. वृष्य ४. वातहर
५. हृद्य ६. गुरुविपाकी
अथ मधुशीर्षा-प्राज्यानिर्माणविधिः
मर्दयित्वा सुसमितामायुषोत्सवकः स्मृतः।
पक्वो घृते सितापङ्कैर्मण्डितो मधुशीर्षकः॥१०५॥
मधुशीर्षा (प्राज्या)
सुसमिता (उत्तम कोटिकी गेहूँ के आटे की बनी मैदा) को घृत में पाक करके,
खण्डपाक (शक्कर की चाशनी) में क्षेपण (सिलपङ्कमण्डितौ) करते हैं। इस पदार्थ को
'मधुशीर्षा' नाम दिया जाता है॥१०५॥
अथ मातुलुङ्गार्द्रकयुक्तमधुशीर्षकानां निर्माणविधिर्गुणाश्च
घृतेन मर्दिता तोये समितां मधुसंयुताम्।
मातुलुङ्गत्वचाखण्डसंयुक्तार्द्रकपूरिताम् ॥१०६॥
विधायोपूपकं तस्या गन्धाढ्यं शर्करान्वितम्।
पक्वं सर्पिषि तं सम्यङ्नाम्नाऽयं मधुशीर्षकः॥१०७॥
मधुशीर्षः सुमधुरो भव्यः पित्तानिलापहः।
सुष्टुवस्तुसुयोगेन हृद्यो रुच्योऽग्निकारकः॥१०८॥
विशिष्ट मधुशीर्षक
क. विधि- समिता (मैदा) मधु मिश्रित को घृत में मर्दन करके, जल के साथ
भलीभाँति मर्दित (मलकर) में निम्बू स्वरस मातुलुङ्गत्वचा तथा आर्द्रक खण्ड
सम्मिलित करें; फिर खण्ड (शर्करा) तथा सुगन्धित द्रव्यों से सुवासित करते हैं।
इसके अपूप (पुआ) बना सकते हैं, तथा घृत में पकाते हैं (पक्वं सर्पिषि)- इस
पदार्थ को 'मधुशीर्षक' (सम्यङ्नाम्नाऽयं मधुशीर्षकः) संज्ञा दी जाती है।
ख. गुण- १. सुमधुर २. भव्य (श्रेष्ठ)
२१४ क्षेमकुतूहलम्
३. वातनाशक ४. पित्तशामक
५. सुष्ठुवस्तु(युक्त)योगवान् ६. हृद्य
७. सच्य ८. अग्निकारक
अथ आपूपनिर्माणविधिर्गुणाश्च
समितां खण्डिताख्येन मेलयित्वा सुमर्दिताम्।
घृते विस्तार्य विपचेत्सुवृत्तो मृद्वपूपकः ॥१०९॥
अपूपः पुष्टिदो बल्यो हृद्यो गुरुतरः स्मृतः।
पित्तानिलहरो वृष्यः सुपक्वो रुचिकारकः॥११०॥
आपूप निर्माण
क. विधि-समिता (मैदा) को खण्ड (शर्करा) में मिश्रित करके, जल में घोलकर
(सुमर्दित), तप्त घृत में निक्षेप करते हैं; जिनको विस्तीरण करके, सुवृत्त
(गोलाकार) किया जाता है- इस रीति से मृदु (मुलायम) आपूप (पुआ) बन
जाता है।
ख. गुण- १. पुष्टिदा २. वृष्य
३. हृदय ४. गुरुतर
५. गुरुतर ६. पित्तशामक
७. वातनाशक ८. बल्य
९. सुपक्व रुचिकारक
अथ दधिवटिकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
शालिपिष्टं युतं दध्ना मर्दयित्वा घृते पचेत्।
वेष्टयेत्पक्वखण्डेन सुवृत्तं दध्यपूपकम् ॥ १११॥
दध्यपूपो गुरुर्वृष्यो बृंहणोऽनिलपित्तहा।
हृद्योऽग्निजनकश्चैव विशेषाद्रुचिकारकः॥ ११२॥
दध्यपूप
क. शालिपिष्ट (जड़हन धान के चावलों को पीसकर तैयार पीठी-पिष्ठी) को मर्दित
कर, गोलाकार घृत में पाक करते हं, तथा पक्व खण्ड (शक्कर की चाशनी)
में प्रद्विपण करते हैं। (वेष्टयेत् पक्व खण्डेन)। इससे सुवृत्त (गोलाकार) पूप
(पुआ) का निर्माण सम्पन्न हो जाता है।
दशमोत्सवः २१५
ख. गुण- १. गुरु २. वृष्य
३. वातनाशक ४. पित्तशामक
५. हृद्य ६. अग्निजनक
७. विशेषरूपेण रुचिकारक
अथ तरद्वटिकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
घृतेन मर्दिता दध्ना कणिकां फेणयेत्ततः।
विधाय वटिकास्तस्या घृते मन्दाग्निना पचेत्॥११३॥
प्रलिम्पाः खण्डपाकेन कर्पूरेण विमिश्रयेत्।
ततः एताः समरिचास्तरद्वट्य इति स्मृताः ॥११४॥
बल्याः पुष्टिकरा हृद्या वृष्याः पित्तानिलापहाः।
सुस्निग्धाः कफदाः शीघ्रं किञ्चित्सन्धानकृद्धिमाः ॥ ११५॥
तरद्विका-तरुद्धटी
क. विधि- कणिका (मैदा) को घृत के साथ मर्दन करके, दही (दधि) के साथ
फेणते (फैंट लेते हैं, तथा मरिचचूर्ण का मिश्रण कर देती हैं। इसकी वटिका
बनाकर मन्दाग्नि पर घृत में पाक करते हैं, फिर खण्डपाक (चाशनी) से प्रलिप्त
कर देते हैं। तथा कर्पूर मिश्रण द्वारा सुगन्धित कर देते हैं। इस पदार्थ को
'तरहटी' नाम दिया जाता है।
ख. गुण- १. बल्य २. पुष्टिकरा
३. हृद्या ४. शुक्रला
५. वृष्या ६. पित्तशामक
७. अनिलावह ८. स्निग्ध
९. कफदा १०. शीतल
अथ बदरचूर्णपूरिकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
घृतमिश्रकणीकायां मेलितं पञ्चमांशकम्।
बदरत्वग्भवं चूर्णं जलेनालोड्य पीडयेत् ॥ ११६॥
पूरिका च घृते पक्वा खण्डपाकविलेहिता।
पूरिका बदरोन्मिश्रा स्निग्धा पित्तहरा हिमा॥ ११७॥
२१६ क्षेमकुतूहलम्
मधुरा तर्षवातघ्नी सरा छर्दिविनाशिनी।
एवं प्रियालखर्जूरशर्करानालिकेरकैः।
द्राक्षया च सुपुर्यास्तु पूरिकाः पूर्ववत्पचेत्॥ ११८॥
बदरचूर्णपूरिका
क. विधि- कणिका (मैदा) में घृत मिश्रित कर, बदर फल चूर्ण (पंचमांश)
सम्मिलित करके (जल में घोलकर) मर्दन कर लेते हैं (जलेनालोड्य पीडयेत्),
फिर इस द्रव्य की पूरिका (पूड़ी) बनाकर, घृत में पकाते हैं, जिससे खजुपाक
(चाशनी) से प्रलिप्त कर लेते हैं (विलेहिता)। इस व्यंजन को 'बदरचूर्ण पूरिका'
कहा जाता है।
ख. गुण- १. स्निग्ध २. पित्तहरा
३. हिम (शीतल) ४. मधुर
५. तर्पण ६. वातघ्नी
७. सरा ८. छर्दिविनाशिनी
ग. वैशिष्ट्- इस रीति से प्रियाल, खर्जूर, शर्करा, नालिकेर, द्राक्षा को मिलाकर,
पूरिका (पूरी) का निर्माण किया जाता है।
अथ चणकपूरिकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
त्रिभागं चाणकं चूर्णं गोधूमस्यैकभागकम्।
यवानीहिङ्गुलवणैः सार्धं तैले विपाचिता॥ ११९॥
कटुके कफवातघ्नी रुच्या वह्निप्रबोधिनी।
चणक पूरिका
क. विधि- चणक (चना) का चूर्ण (त्रिभाग चाणक चूर्ण), गोधूम चूर्ण (एक
भाग)- इनको सम्मिश्रित करके, यवानी-हिंग-लवण के साथ जल में सावते
(मर्दन) करते यहाँ लेते हैं)। इस द्रव्य से पूरिका (पुड़ी) के आकार को बनाकर,
तैल में विपाचन (पकाते हैं) करते हैं। इस रीति से 'चणक पूरिका' का निर्माण
हो जाता है।
ख. गुण- १. कटु(क) २. कफवाघ्नी
३. रुच्या ४. वह्निबोधनी
दशमोत्सवः २१७
अथ धारापूपकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
घृतोन्मिश्रा कणिकाया दुग्धेनालडिता तुमा।
धाराख्यापूपकं स्वाज्ये पक्वं खण्डेन योजयेत्॥ १२०॥
आपूपकं सुमधुरं वृष्यं पित्तहरं परम्।
सुस्निग्धं रोचनं हृद्यमत्यर्थं वातनाशनम्॥ १२१॥
धारापूपक
क. विधि- कणिका (मैदा) घृत मिश्रित- को दुग्ध में शर्करा के साथ आलोड़ित
(घोलकर) घ
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२१८ क्षेमकुतूहलम्
पूर्णतया (या उपयुक्त) पाक ही जाने पर बाहर निष्कासित कर लिया जाता है।
आ. इस कुण्डलाकार द्रव्य (उपरोक्त) को सितालेह या खण्डपाक (गाढ़ी शक्कर की
चाशनी या पतले लेह) विनिक्षेपण कर देते हैं। फिर यथासमय (अनपाल के
पश्चात्) बाहर निकाल लेते हैं।
इस कार्य में पाचक को चाहिए कि वृष्योग्य कर्पूर से सुगन्धित कंकण (कँगल)
के समान परिपक्व द्रव्य को शर्करा लेह-खण्डपाक में प्लुत (प्रक्षेपित) करते हैं।
इस व्यंजन को 'कुण्डलिका' तथा (लोक भाषा में) जलेबी कहा जाता है।
स. गुण— १. धातु पुष्टिकरा २. वृष्या
३. हृद्या ४. इन्द्रियतर्पणी
अथ बर्वरनिर्माणविधिर्गुणाश्च
जलेनालोडितं शालिपिष्टकं खण्डमिश्रितम्।
धारापूपकवत्पाच्यं प्रोक्तं तद्बर्बराख्यकम्॥ १२६॥
बर्बरं बलकृत्सद्यः श्रेष्ठं पित्तानिलापहम्।
रोचनं कफकृच्छीतं हृद्यं हल्लासनाशनम्॥ १२७॥
बर्वरसख्य पूरक
क. विधि— शालि तण्डुल (चावल) की पिण्डी (पीठी) मैशर्करा मिश्रित करके,
जल के घोलकर, धारापूर्वक के समान घृत में पाक करते हैं। इसका नामकरण
'बर्वराख्य पूरक' (बर्वरपुआ) किया गया है।
ख. गुण— १. सद्यः बलकृत् २. पित्तवातपट्टम् (श्रेष्ठ)
३. रोचन ४. कफकृत्
५. शीत ६. हृद्य
अथ खण्डखर्जूरनिर्माणविधिर्गुणाश्च
दध्नाऽऽलोडितया शालिपिष्टयुक्तकणीकया।
धारायाः युक्तिसंपक्वं पादुकाकृतिदीर्घकम्॥ १२८॥
बहिः खण्डेन लिप्तं च खण्डखर्जूरकं विदुः।
खर्जूरं वातहृद्बल्यं सुस्निग्धं स्वादुशीतलम्॥ १२९॥
पित्तहृद्बृंहणं हृद्यं किञ्चित्कफकरं सरम्।
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दशमोत्सवः २१९
खण्ड खर्जूर
क. विधि—कफ कणिकार (शालि तण्डुल) पिष्टी में गोधूम चूर्ण (शुद्ध-महीन आटा)
का मिश्रित कर, दधि के साथ पीसते हैं (दध्नाऽऽलोहिता), फिर इस द्रव्य से
पादुकाकृति बनाकर, पक्व घृत में करते हैं (धागपूपकवत्), तथा बाह्य रूप से
शर्करा खण्ड का आलेपन कर देते हैं— इसको विद्वानों ने 'खण्डखर्जूर' नाम दिया
है।
ख. गुण— १. वातहृत् २. बल्य
३. सुस्निग्ध ४. स्वादु
५. शीतल ६. पित्तहृत्
७. बृंहण ८. हृद्य
९. किंचित् कफकर १०. सर
अथामृतरसनिर्माणविधिर्गुणाश्च
तृतीयभागखण्डेन मिश्रितं षष्टिकपिष्टकम्।
शुभ्रमीषदधियुतं मर्दयेद्दृढपाणिना॥ १३०॥
एवं सुमर्दितं कृत्वा स्थापयेद्रजनीमितम्।
ततोऽन्यस्मिन्नहन्येव गतत्वक्तिलचित्रितम्॥ १३१॥
विधायापूपकं चैव तविकायां घृते पचेत्।
ततोऽमृतरसा एव वातहृद्बलवर्धना॥ १३२॥
कणिका सर्पिषा युक्ता तोये पिण्डतमर्दिता।
अमृतरसा
क. विधि—पिष्ट के तृतीयांश खण्ड (शर्करा) के सम्मिश्रण के बाद, शुभ्र (सफेद)
दधि मिलाकर दृढपाणि (कठोर हाथो) से मर्दन करके, एक रात्रि तक रखा रहने
देते हैं, अगले दिन निस्तुषतिल मिलाते हैं, इसका पूप (पुआ) बनाकर टविका
(तवा) पर घृत का पाक करते हैं। इस व्यंजन को 'अमृतरसा' कहा जाता हैं।
ख. गुण— १. कटहृत् २. बलवर्धक
३. अरोचक हरा ४. हृद्या
५. सुशीता ६. पित्तहृत्
७. हिम
२२० क्षेमकुतूहलम्
अथ कर्पूरनालिकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
ततः कृता पोलिकेव पीठके चतुरस्रिका ॥ १३३॥
वेष्टयेत्पक्वखण्डे द्वे पार्श्वभ्यां चतुरङ्गुले।
ततस्ते नालिके ह्येते चित्रयेदथ पाचयेत् ॥ १३४॥
घृतेऽथ तत आकृष्य कर्पूरेण नलीद्वयम् ।
पूरितं घृतखण्डाभ्यां कर्पूरी नलिका भवेत् ॥ १३५ ॥
कर्पूरनालिका
कणिका (गेहूँ के चूर्ण) में घृत तथा उचित मात्रा में जल मिलाकर-मर्दन करके
पिण्ड बनाते हैं, इस पीठ को चौकोर, सछिद्र (पोली) बनायें, इसमें दोनों पार्श्वों से चार
अंगुल पक्व खण्ड का आवेष्टन करते हैं, दोनों नलिकाओं को चित्रित करते हैं तथा घृत
में पाक कर लेते हैं, फिर उसे खींचकर (आकृतय) कर्पूर, घृत एवं खण्ड (शर्करा) से
पूरण करते हैं। इस व्यंजन को 'कर्पूरनलिका' कहा जाता है॥१३३-१३५॥
अथामृतनालिकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
किञ्चित्कणीकया युक्ता नष्टदुग्धमयी च सा।
कृता कर्पूरनालीवत्सैवामृतनली मता ॥ १३६॥
कूर्परनालिका बल्या वृष्या पित्तानिलापहा।
पुष्टिदारुचिदा स्निग्धा गुर्वी सन्धानकृत्सरा ॥ १३७॥
अमृतनालिका
क. विधि- कणिका (मैदा) में नष्टदुग्ध (छैना) अल्पमात्रा में मिलाकर, मर्दन
करके, 'कर्पूरनलिका' के समान बनाते हैं, इसे घृत में पाक करते हैं- खण्ड
पाक (चाशनी) से आवेष्टन किया जाता है। इस व्यंजन को 'अमृतनलिका'
नाम हैं।
ख. गुण- १. बल्या २. वृष्या
३. पित्तानिलापहा ४. पुष्टिदा
५. रुचिदा ६. स्निग्धा
७. गुर्वी ८. संधानकृत
९. सरा
दशमोत्सवः २२१
अथ कासारनिर्माणविधिर्गुणाश्च
घृते तप्ते विनिष्क्षिप्य कणिकां पाचयेन्मनाक्।
ततस्तत्र विनिष्क्षिप्य खण्डं भागसमं पचेत् ॥ १३८ ॥
ततश्चाकृष्य तत्पात्रे क्षिप्तं सम्यक्सुचिक्कणे ।
चतुरस्त्रीकृतं ह्येतद्भवेत्कासारसंज्ञकम् ॥ १३९॥
कासारं रुचिरं श्रेष्ठं नातिरूक्षं न पिच्छिलम् ।
हृल्लासकफपित्तघ्नं विरूचौरुचिकारकम् ॥ १४०॥
पूर्ववन्माषशृङ्गाटकसेरूणां पृथक्पृथक् ।
शालूकस्य च कर्तव्यं कासारं खण्डसर्पिषा ॥ १४१ ॥
कासार
क. विधि- कणिका (गोधूम चूर्ण) की तप्तघृत में पका (भून) कर, खण्ड (शर्करा)
एकभाग (भाग सम) का निक्षेपणकर पाक करते हैं, इसको स्निग्ध पात्र (सुचिक्कण)
में स्थापित कर दे तथा चौकोर (चतुरस्त्रीकृत) बनायें। इस पदार्थ को कासार
(कसार) कहते हैं।
ख. गुण- १. रुचिर २. श्रेष्ठ
३. अल्परूक्ष ४. अल्पस्निग्ध
५. हल्लासहर ६. पित्त शामक
७. रुचिर
ग. वैशिष्ट्य- माष, शृंगाटक, कशेरुक एवं शालूक का कासार- खण्ड एवं सर्पि
मिलाकर-निर्माण किया जा सकता है।
अथ सेविकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
कणिकावर्तिकाः कृत्वा सुसूक्ष्मा यवमात्रिकाः।
सुशुष्का भक्तवत्पाच्या भोज्या खण्डघृतान्विताः ॥ १४२ ॥
सेदिकेति समाख्याता गुर्वी पित्तानिलापहा।
सन्धानजननी सेव्या श्रावण्यां स्तोकमात्रया ॥ १४३॥
पक्वान्नं यदिह ज्ञातं तदुक्तं दशमोत्सवे ।
क्षुद्बोधनजनकं वस्तु किञ्चिदाचक्षतेऽधुना ॥ १४४ ॥
इति श्रीनरवैद्यमन्मथात्मजक्षेमशर्माविनिर्मिते क्षेमकुतूहले ग्रन्थे
पक्वान्नप्रशंसनो नाम दशमोत्सवः ॥ १० ॥
क्षे. कु. 15
२२२ क्षेमकुतूहलम्
सेविका
क. विधि- गोधूम चूर्ण (कणिका) जल के साथ मर्दित की सूक्ष्म (तनुरमणाकार) वर्ती
बनाकर (शुष्क) खण्ड तथा घृत में भूनकर (शर्करा अविष्टित) भक्त (चावल के
भात) समान पाक करते हैं। इस व्यंजन को 'सेविका' नाम है, जो भोज्य है।
ख. गुण- १. गुर्वी २. पित्तानिलापहा
३. संधानजननी ४. स्तोकमात्रा सेवनीय
(श्रवण मास)
उपसंहारात्मक रूपरेखा
वर्तमान उत्सव (दशम प्रकरण) के अन्तर्गत पक्वान्न-व्यंजनों का विषय प्रतिपादित
है। इन पक्वान्न-पदार्थों (व्यंजनों) में विशेषतया सुधाजनक (आहार को भोजन हेतु
रुचि/ इच्छा जागृत करने हेतु उपयोगी) वस्तुओं (भोज्य पदार्थों-व्यंजनों आदि) के
विषय में परिचय दिया (विभिन्न पक्षों का) जाना (आगामी प्रकरण का) प्रतिपाद्य-विषय
होगा।
इति हिन्दी व्याख्या सहित पक्वान्ननिर्माणवर्णन
नामक दशवाँ उत्सव समाप्त॥
अथैकादशोत्सवः
(एकादश प्रकरण)
अथ क्षुदबोधकवस्तुन्निरूपणम्
तक्रं चिरं कथितमर्पितशृङ्गवेरं
बाह्लीकसैन्धवरजोमरिचाल्पचूर्णम्।
एलाभवेन रजसा सुरभीकृतं त-
त्पूर्णं प्रदीपयति शान्ततनूनपाम्॥ १ ॥
क्षुदबोधक(वर्धन) प्रतिपादनम्
शृंगवेर (आर्द्रक) अर्पित तक्र (चिरक्वथित), भृष्ट हिंगु, सैन्धव, मरिच (अल्प चूर्ण)
से युक्त तथा एला से सुरभीकृत् तक्र (मट्ठा) पाचकाग्नि की शीघ्र तत्काल (शान्ततनूनपादम्)
प्रदीपन करने में सक्षम होता है॥१॥
अजाजीधान्याकैर्मरिचरजनीमेथिककणैः
समं पिष्टं तक्रे कथितममलैः सारकफैः।
युतं सिंधूत्थेन ज्वलितनवबाह्लीकंसुरभिः
प्रलेहः संदेहं जनयति सुधायामतरिसः॥ २ ॥
प्रलेहः पाचनो हृद्यो रुच्यो वह्निप्रदो लघुः।
कफानिलविबन्धघ्नः किञ्चित्पित्तप्रकोपकः॥ ३ ॥
हरीतकी क्वाथ
क. विधि- जीरक, धान्यक, मरिच, हरिद्रा, मेथि का तथा पिप्पली (समभाग) पिष्ट
को, अमल हरीतकी फल के क्वाथ-सैन्धव लवण युक्त- को नवीन हिंगु से
सुरभित किया जाता है। यह अतिरस रूप प्रलेह अमृत को भी संदिग्ध बनाने की
सामर्थ्य रखता है (सन्देहं जनयति सुधायामतिरसः)॥२-३॥
अथ नारङ्गक्षुदबोधकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
नारङ्गकेसरमपाकृतबीजपुञ्जं
योऽश्नाति खण्डमरिचोद्भवचूर्णमिश्रम्।
२२४ क्षेमकुतूहलम्
अन्नं गले विशति तस्य नरस्य तूर्णं
संगृह्यमाण इव राहुजवेन चन्द्रः ॥ ४ ॥
नारङ्गं तु वरं रुच्यं सुगन्धमतिचारुणम्।
वातघ्नं कफदं किञ्चित्पित्तघ्नं विशदं स्मृतम् ॥ ५ ॥
नारङ्गशुदबोधक (वर्धन) योग
क. विधि- बीज रहित नारंग केशर (फल दल), खण्ड तथा मरिच चूर्ण जो व्यक्ति
भक्षण करता है, उसके गले (कण्ठ) में अन्न शीघ्र प्रवेश कर जाता है (विशति
तल्य नस्य तूर्णम्), जैसे राहु के वेग से चन्द्र स्वयं ग्रहित हो जाता है
(संग्रहयमाण इव सहुजवेनचन्द्रः)।
ख. गुण- १. पाचकाग्नि तीव्र कारक (सुधाजनन) २. अन्नरुचिकारक (उत्तम)
३. सुगन्धित ४. अरुण (अतिसुन्दर)
५. वातघ्न ६. कफकारक
७. किंचित् पित्तघ्न ८. विशद
अथ जम्बीरभवक्षुद्बोधकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
विभावितं शुभ्रसिताभरीचै
रैलारजोभावनयाऽतिरुच्यम्।
जीवातवे तस्य नरस्य भोक्तु-
र्जम्बीरजं केसरमार्द्रयन्ति ॥ ६ ॥
जम्बीरः पाचनो हृद्यः कफवातहरः परः।
सुरभिर्दीपनो रुच्यो मुखवैशद्यकारकः ॥ ७ ॥
जम्बीर क्षुद्बोधक (वर्धन) योग
क. विधि- शुभ्रसिता, मरिच तथा एला चूर्ण से भावित जम्बीर निम्बूक के सर
(दल), का भक्षण करने वाले मनुष्य के जीवन हेतु औषध को सरस बनाने
वाला हे (जीवातवे तस्य नरस्य भोक्तु)।
ख. गुण- १. पाचन २. हृद्य
३. कफवातहर (परम्) ४. सुरभि
५. दीपन ६. रुच्य
७. मुखवैशद्यकारक
एकादशोत्सवः २२५
अथ बीजपूरकक्षुद्बोधकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
सैन्धवार्द्रकसंयुक्तं बीजपूरकमत्ति यः।
शाकिनीभिरिवाकृष्टं विशत्युदरमोदनम् ॥ ८ ॥
केसरं मातुलुङ्गस्य लघु श्लेष्मानिलापहम्।
रोचनं दीपनं हृद्यं गुल्मशूलार्शसां जयेत् ॥ ९ ॥
बीजपूरक क्षुद्वर्धन (बोधक) योग
क. विधि-बीजपूर निम्बूक का सेवन, सैंधव तथा आर्द्रक मिश्रित, का सेवन करने
से, उदर में शाकिनियों द्वारा आकृष्ट (खींचे जाने के समान), ओदन स्वयं उदर
में प्रवेश कर जाता है (विशत्युदरमोदनम्) - इस तरह यह प्रयोग पाचकाग्नि
तथा क्षुधा को तीव्रता प्रदान करता है।
ख. गुण- १. लघु २. श्लेष्मापिलापह
३. रोचन ४. दीपन
५. हृद्य ६. गुल्म
७. शूल ८. अर्श नाशक (६-८)
अथ बीजपूरकस्य षड्ऋतुभक्षणविधिनिरूपणम्
सिन्धूत्थेन घनागमे च सितया काले शरत्सातपे
हेमन्ते लवणाईहिङ्गुमरिचैः सिद्धार्थतैलान्वितैः।
एतैस्तैः शिशिरे मधावपि तथा ग्रीष्मे गुडेनान्यथा
सर्वान् दोषचयान् करोति नितरां द्राग्बीजपूरः सदा ॥ १० ॥
बीजपूरक-विभिन्न ऋतु सेवन
बीजपूरक निम्बूक (बिजौरानीबू) का षड्ऋतु भक्षण विधान का निर्देश (निम्नांकित-
रूपेण) किया गया है-परन्तु इसके विपरीत सेवन समस्त दोष प्रकोपक होगा-
१. वर्षाकाल : सैन्धव लवण
२. शरतकाल (आतप सहित) : सिता (शर्करा)
३. हेमन्त काल : सर्वपतैल युक्त लवण-आर्द्रक के हिंगु-मरिच
४. शिशिर
५. वसन्तकाल : समस्त द्रव्य
६. ग्रीष्मकाल : गुड़
-ट-मां-शान् क्षि-पेत्-त-त्र (८)
तन्-दु-लांस्-त्रि-त्व-चांस्-ति-लान् (८)
It is indeed "तन्दुलांस्त्रित्वचांस्तिलान्"!
Line 33:
"प्रियालपनसाब्जानां मज्जां मात्रासमां क्षिपेत् ॥ १६ ॥"
प्रि-या-ल-प-न-साब्-जा-नां (८)
मज्-जां मा-त्रा-स-मां क्षि-पेत् (८)
Line 34:
"क्षीरार्धं घृतं चैव शर्करा च तथा न्यसेत्।"
क्षी-रार्र्-धं घृ-तं चै-व (८)
शर्-क-रां च त-था न्य-सेत् (८)
Yes, "शर्करां च तथा न्यसेत्।"
Line 35:
"सिद्धे त्रिकटुकोपेतः कूर्परेणाधिवासितः ॥ १७ ॥"
सिद्-धे त्रि-क-टु-को-पे-तः (८)
कूर्-प-रे-णा-धि-वा-सि-तः (८)
Line 36:
"एष विष्यन्दनो नाम देवलोकेऽपि दुर्लभः।"
ए-ष विष्-यन्-द-नो ना-
२२८ क्षेमकुतूहलम्
आम्रपल्लव - मुकुल योग
आम्रपल्लव - आम्र के प्रवाल (ताम्रवर्ण समान नव पल्लव) के खण्डों में लवण
मिश्रित (तथा मर्दित) कर पिण्डीकृत रूप में, घृत तथा (हिंगु-धूप से सुवासितं-घृत तथा
दुग्ध में पाक कर लेते हैं। यह व्यंजन पवन सखा (वायु का मित्र) अग्नि का प्रदीपन करता
है।
मुकुलः सहकारशाखिनः
शतखण्डीकृतसैन्धवान्वितः।
दधिमन्थमरीचसंस्कृत-
श्चिरजामरुचिं छिनत्ति हि ॥ २१॥
कफपित्तहरौ हृद्यौ मुखवैरस्यनाशनौ।
वह्निर्संजननौ रुच्यौ चूतजौ पुष्पपल्लवौ॥२२॥
क. विधि-मुकुल- आम्र मुकल (आम के बौर) को शत खण्डीकृत् रूप में,
लवण तथा दधिमन्थ, मरिचचूर्णसहित, पाक करते हैं। यह व्यंजन चिरकालीन
अरुचि को नष्ट कर देता है।
ख. गुण- चूतज (आम्रजन्य) पल्लव-मुकुल
१. कफपित्तहर २. हृद्य ३. मुखवैरस्यनाशन
४. वह्निर्संजनन ५. रुच्य
अथ मृणालस्य क्षुदबोधनिर्माणविधिर्गुणाश्च
बिशाङ्कुराश्चन्द्रकलानुकारिणो
विभावितः सैन्धवनिम्बुकाभ्याम्।
विकीर्य खण्डीकृतशृङ्गबेर-
जलेऽपि वह्निं लघु दीपयन्ति ॥ २३ ॥
मृणालं शीतलं हृद्यं कषायं कफनाशनम्।
रक्तपित्तहरं स्वादु दुर्जरं दाहनाशनम् ॥ २४॥
मृणालस्य योग
क. विधि- चन्द्र किरण समान कमल के मृणाल तन्तु में सैन्धन तथा निम्बक स्वरस
से मात्रित, आर्द्रक खण्ड स्वरस सम्मिलित कर सेवन कराना चाहिए। इससे
मन्द पाचकाग्नि तीव्र (प्रदीप्त) हो जाती है।
एकादशोन्मेषः २२९
ख. गुण- १. शीतल २. हृद्य
३. कषाय ४. कफनाशन
५. रक्तपित्तहर ६. स्वादु
७. दुर्जर ८. दाहनाशन
अथ शिग्रुमूलक्षुद्बोधकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
धौतं कुञ्जरदन्तदीप्तिसदृशं सिन्धूत्थतैलासुरी
पीताभिः क्रमतोत्तरोत्तररसं मूलं नवं शिग्रुजम्।
तस्याहो वन्दनान्तरे निविशते श्रीचन्द्रचूडप्रिया-
पादाम्भोरुहरेणुरञ्जितशिरा यः पूर्वकाले पुमान् ॥ २५ ॥
शिग्रुमूल योग
क. विधि- प्रक्षालित, स्वच्छ, हस्तिदन्त समान श्वेतनवीन शिग्रु (सहिजन) मूल,
सैंधव, सर्षप तैल, राजिका, हरिद्रा (के साथ क्रमशः उत्तरोत्तर) मिश्रणकर भोज्य
पदार्थ का निर्माण कर लेते हैं।
ख. वैशिष्ट्य- वह आहार-पदार्थ, उस व्यक्ति के गुण में प्रवेश करता है, जो पूर्व
जन्म में भगवान शंकर तथा उनकी पत्नी उमा के चरण-कमल धूलि को अपने
सिर पर धारण (रंजित) करता है।
शिग्रुमूलं तु वातघ्नं श्रेष्ठशोविनाशनम्।
शमनं स्नायुरोगस्य पित्तकृत्कफनाशनम् ॥ २६ ॥
गुण
१. वातघ्न २. श्रेष्ठ अर्श विनाशनम् ३. स्नायुरोग शमन
४. पित्तकारक ५. कफघ्न
अथामलकफलस्य क्षुद्बोधकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
स्निग्धं धात्रीफलं यज्जवलदनलशिखासन्निभं स्निग्धपात्रे
क्षिप्तं प्रभृष्टहिङ्गुप्रकरजनिरजस्तैलसिन्धूत्थव्योषैः।
संश्लिष्टं जातपाकं कतिपयदिचसैरूल्लसत्सौरभाढ्य
तस्य स्वादानुवादं कथितुमपि वरो नेश्वरः कस्तदन्यः ॥ २७॥
२३० क्षेमकुतूहलम्
आमलक फल योग
क. विधि- ज्वलन्त अग्नि शिला के समान धात्री फल (आमलक) को स्निग्ध पात्र
में छोड़कर भृष्ट हिंगु, हरिद्राचूर्ण, सर्षप तैल, सैन्धव त्रिकटु (व्योष) का चूर्ण
सम्मिलित करते हैं। कुछ दिनों में (संश्लिष्ट जातपाकम्) सुगन्धित (सौरभाढ्य)
फल प्रस्तुत हो जाते हैं।
ख. वैशिष्ट्य- इस प्रकार के आमलक फल (धात्री) के स्वाद (स्वादानुवाद) ईश्वर
भी करने में समर्थ नहीं हो पाते (वरी नेश्वरः कस्तदन्यः), तब अन्य लोगों का
नाश में नहीं होगा।
हन्ति पित्तं तु माधुर्यात् कफं तिक्तकषायतः।
वायुमम्लप्रभावत्वाद्धात्री दोषत्रयापहा ॥ २८ ॥
ग. गुण- १. पित्तनाशक (माधुर्यात्) २. कफघ्न (तिक्तकषायता)
३. वातघ्न (अम्लप्रभावात्) ४. त्रिदोषहार
अग्निसंजननं द्रव्यमुक्तमेकादशोत्सवे।
यदग्निपोषकं वस्तु क्षीरतत्क्रमथोच्यते ॥ २९ ॥
इति श्रीनरवैद्यमन्मथात्मजक्षेमशर्माविनिर्मिते क्षेमकुतूहले ग्रन्थे
क्षुद्बोधकवस्तुप्रशंसनो नामैकादशोत्सवः ॥११॥
उपसंहारात्मक रूपरेखा
एकादश उत्सव में आतिसंजनन द्रव्यों (पदार्थों-योगी-व्यंजनों आदि) का वर्णन
किया गया है। आगामी द्वादशोत्सव में अग्नि पोषक वस्तुओं तथा क्षीर एवं तक्रनिर्मित
द्रव्यों का प्रतिपादन किया जायेगा।
इति हिन्दी व्याख्या सहित क्षेमकुतूहल का क्षुद्बोधक पदार्थ-
वर्णन नामक ग्यारहवां उत्सव समाप्त।
अथै द्वादशोत्सवः
(द्वादश प्रकरण)
अथ गोरसपानकादिकथनम्
अथ चन्द्रप्रभा-क्षीरिकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
शुभेऽर्धक्वथिते दुग्धे घृताक्तान् तन्दुलांन्यसेत्।
संसिद्धा मधुसंमिक्ता क्षीरी चन्द्रप्रभा भवेत् ॥ १॥
कुङ्कुमं च विनिक्षिप्य पचेत्पीतत्वहेतुना।
चन्द्रप्रभाकृतिः क्षीरी रक्तपित्तविनाशिनी ॥ २॥
विष्टम्भजननी बल्या धातुपुष्टिप्रदायिनी।
गोरस (दुग्ध) विभिन्न प्रकार तथा दुग्धमिर्र्नित व्यंजनादि
चन्द्रप्रभा-सीरिका
क. विधि- अर्धपक्व दुग्ध में घृत तलित तन्दुल का पाक करते हैं, फिर मधु का
सम्मिश्रण करे। यह चक्रवत् प्रभायुक्त क्षीरिका (खीर) बन जाती है। (संसिद्ध)।
यदि इस (क्षीरिका) को पीत वर्ण की प्रस्तुह करना है। तब कुङ्कुम (केशर)
मिश्रित कर पाक करते हैं।
ख. गुण-
(चन्द्रप्रभाकृति क्षीरी) १. रक्तपित्त विनाशिनी २. विष्टम्भव-जननी
३. बल्य ४. धातुपुष्टिदायक
अथ राजपायसनिर्माणविधिर्गुणाश्च
निर्नीरपाचितपयः प्रहिताष्टभागं
श्यामाकतन्दुलनवं निभृतान्तरोष्मा।
तत्यायसं सरसमावसथं सुधायाः
को लेढि भूपतिमृते घृतखण्डसाकम् ॥ ३ ॥
पायसं दुर्जरं बल्यं धातुपुष्टिविवर्धनम्।
विष्टम्भननं हन्ति रक्तपित्ताग्निमारुतान् ॥ ४ ॥
२३२ क्षेमकुतूहलम्
राजपायस
क. विधि- मिनौर (जलहित) पाय (दुग्ध) में श्यामाक नवीन तनुल (साँवा के
चावल)- अष्टम भाग प्रक्षेपण करके, निभृतन्तरीसना (अन्दर की गर्मी) से पाक
करके, घृत एवं खण्ड (शर्करा) मिश्रित करें। इस रीति से पक्व (सिद्ध) सरस
पायस अमृत सदृश होता है, जो राजा (भूपति) को छोड़कर कौन सेवन कर
सकता है (कोलेदि)।
ख. गुण- १. दुर्जर २. बल्य
३. धातुपुष्टि निवधर्म ४. विष्टम्भ जनन
५. रक्तपित्त ६. अग्निमांद्य
७. वातरोग (नाशक-५-७)
अथ नारङ्गक्षीरिणीनिर्माणविधिर्गुणाश्च
क्षिप्त्वा नारङ्गमज्ञां वै पचेत्सर्पिषि तापिते।
तत्र खण्डं च निक्षिप्य पक्वं मत्वाऽवतारयेत्॥५॥
शीतीभूते विनिक्षिप्य मात्रेवार्धशृतं पयः।
नारङ्गीक्षीरिणी चैषा सुगन्ध्सुरभीकृता॥६॥
नारङ्गक्षीरिणी
१. नारङ्ग मज्जा को तप्त घृत को पका करके, खण्ड (शर्करा) का मिश्रण करे, तथा
पकने पर अग्नि से पृथक करते हैं। शीतभूत (ठंडे होने पर) दुग्ध अर्धपक्व) को
मात्रापूर्वक लेकर, सुगन्धित द्रव्यों से सुवासित करते हैं। इस व्यंजन को
'नारंगक्षीरिणी' कहा जाता है।
यह विष्टम्भिवी, वात-पित्तहर तथा गुरु पाचिका होती है॥५-६॥
अथ नालिकेरक्षीरिकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
विष्टम्भिनी हरेद्वातं पित्तं च गुरुपाचिका।
नालिकेरं पयः स्विन्नं खण्डितं सिक्थकाकृतिः॥७॥
मेलयेच्छर्करायुक्ते क्षीरे क्वथितगालिते।
धूपिताऽगुरुणा क्षीरीनालिकेरादिजा भवेत्॥८॥
नालिकेरोद्भवा क्षीरी स्निग्धा शीताऽतिपुष्टिदा।
गुर्वी सुमधुरा वृष्या रुच्या पित्तानिलापहा॥९॥
द्वादशोत्सवः २३३
एवं कूष्माण्डमजदेस्तथा वंशाङ्कुरादपि।
कदलीनां फलामूलात् कर्तव्या क्षीरिका बुधैः॥१०॥
नालिकेर क्षीरिका
क. विधि- नालिकेर (नारियल) सिक्थ (मोम) के समान को खण्ड करके, जल
पक्व करके, (क्ववलित कर) सान्द्र (गाढा) दुग्ध-शर्करायुक्त-दुग्ध मे प्रक्षेपण
करके तथा सुगन्धित कर लेते हैं। इस व्यंजन को 'नालिकेरक्षीरिणी' कहा
जाता है।
ख. गुण- १. स्निग्ध २. शीतल
३. अतिपुष्टिकारक ४. गुरु
५. मधुर ६. वीर्यवर्धक
७. रुच्य ८. पित्त-वातनाशक
ग. अन्य क्षीरिका व्यंजन- कूष्माण्ड आदि फलों की मज्जा, वंशांकुर कदली के
मूल एवं फल से क्षीरिका का निर्माण किया जा सकता है॥७-१०॥
अथ दधिवष्कयिण्याः निर्माणविधिर्गुणाश्च
बहुब्रध्नास्तु गोः क्षीरं महिषं वा विपाचितम्।
सुशीतं स्थापितं पात्रे नवीने तक्रसंस्कृतम्॥११॥
शङ्खानुकारि तच्छुभ्रं चन्द्रवत्सरं दधि।
इष्टं तन्मकराधारैः? स्फोटितं परिवेषितम्॥१२॥
दधि निर्माण
दधिवष्कयिण्या
गो-मल (अधिक व्यधि की प्रसका/प्रसूता) अथवा मासिव (भैंस) के क्षीर (दुग्ध)
पक्व करके शीतल करें, फिर तक्र संस्कृत (मट्ठे का अंश डालकर या जावन देकर)
नवीन पात्र में स्थापित करते हैं। इसरीति से (परिणामः) शंखानुकारि-शुभ्र चन्द्रवत्सर
(चन्द्रमा सदृश खेत वर्णीय) दधि (दही) का निर्माण हो जायेगा।
यह दधि मकराधारों द्वारा स्फोटित एवं परिवेधित दधि उत्तम माना गया है- इस
रूप का दधि श्रेष्ठ वाजीकरण गुण सम्पन्न लेता है॥११-१२॥
२३४ क्षेमकुतूहलम्
एकं शशाङ्कधवलं दधिशुक्लनीरं
संक्षिमसैन्धवयुतं सह शृङ्गवेरम्।
प्रभृष्टजीरसुरभीकृतमस्य योगा-
दुद्दीपितो भवति जाठरजातवेदाः॥१३॥
जठरजातवेदा दधि योग
शशांक धवल दधि शुक्ल नीर (चन्द्रमा सदृशा श्वेत दधि जलयुक्त), सैंधव-
आर्द्रक प्रभृष्ट जीरक (भुना जीरा) से सुगन्धित पानक के समान निर्माण (सेवनयोग्य)
करते हैं। इससे नष्टप्रायः पाचकाग्नि पुनः प्रदीप्त हो जाती है॥१३॥
शृतक्षीराच्च यज्जातं गुणवद्दधि तत्स्मृतम्।
वातपित्तहरं रुच्यं धात्वग्निबलवर्धनम्॥१४॥
शृतक्षीरज दधि
१. शृतक्षीर (दुग्ध को पूर्णतया पका कर) से बना दधि (दही) गुणवान् (गुणवद्दधि)
माना गया है।
२. इस कोटिका दधि इन गुणों से युक्त है—
१. वातहर २. पित्तशामक ३. रुच्य रोचक (रुचिजनन)
४. धातुवर्धक ५. अग्नि वर्धक ६. बल्य
अथ गव्यस्य गुणनिरूपणम्
गव्यं दध्युत्तमं बल्यं स्वाद पाके रुचिप्रदम्।
पवित्रं दीपनं हृद्यं पुष्टिकृद्दोषनाशनम्॥१५॥
गव्यदधि
गाय के दुग्ध से बना (जमाया) दधि उत्तम होता है (गव्यं दध्युत्तमं), जिसके गुण
जिसमे विविध गुण होते हैं—
१. बल्य २. स्वादु ३. मधुरपाकी
४. रुचिप्रद ५. पवित्र ६. दीपन
७. हृद्य ८. पुष्टिकृत ९. दोषनाश (त्रिदोषहर)
द्वादशोत्सवः २३५
अथ माहिषस्यगुणनिरूपणम्
माहिषं मधुरं पाके वृष्यं पित्तानिलापहम्।
बलमेदःकरं स्निग्धं सुशीतं कफकृद्दरम्॥१६॥
माहिष दधि
माहिष दधि (भैंस का दही) विविध गुण युक्त है—
१. मधुरपाक २. वृष्य ३. पित्तशामक
४. अनिलापह ५. बल्य ६. मेदाकर
७. स्निग्ध ८. सुशीत ९. कफकृत्
अथाजस्य गुणनिरूपणम्
दध्याजं कफपित्तघ्नं लघु वातक्षयापहम्।
दुर्नामश्वासकासेषु हितमग्नेश्च दीपनम्॥१७॥
अजाज दधि
अजा जन्य दुग्धोत्पादित दधि (बकरी के दूध का दही)— दध्याज इस तरह
गुणवान् होता है—
१. कफघ्न २. पित्तशामक ३. लघु
४. वातजरोग ५. क्षय ६. दुर्नाम (अर्श)
७. श्वासवृद्धि ८. कास ९. दीपन
अथ दघ्नः सामान्यसेवनविधिर्गुणाश्च
दधि नक्तं न सेवेत सेव्यं चैद्वै ससूपकम्।
सक्षौद्रं शर्करोन्मिश्रं सेवेतामलकैर्युतम्॥१८॥
शरद्सन्तयोर्वैद्यैर्निन्दितं प्रायशो दधि।
प्रावृट्शिशिरहेमन्ते संसेव्यं दधि पण्डितैः॥१९॥
दघ्न सामान्य गुण ऋत्वनुसार सेवन
दधि (दही) का समय (काल) के अनुसार (ऋतु आधारित) सेवन करने का
विधान प्रस्तुत किया गया है—
१. रात्रि को दही नहीं खाना चाहिए (दधि नक्तं स सेवेत्)।
पृष्ठ २३६
२३६ क्षेमकुतूहलम्
२. दधि का सेवन (यदि करना है-सं. १) सूपक (दाल के साथ मिलाकर) मिश्रित
भक्षण कर सकते है।
३. दधि को मधु, शर्करा तथा आमलकी के साथ सेवन करते हैं। (अतिरिक्त
प्रयोग)।
४. शरद तथा वसन्त ऋतुओं में दधि का सेवन निषिद्ध है (प्रायः)।
५. वर्षा, शिशिर तथा हेमन्त ऋतुओं में दधिका सेवन पण्डितों के अनुसार उपयुक्त
है (संसेव्य दधि पण्डितैः)।
शाल्योदनेन संयुक्तं सततं माहिषं दधि।
गोष्ठगोपाङ्गनादत्तं प्रत्यहं स्मरणं हरेः ॥ २०॥
शाल्योदन
१. शालिधान्य (जड़हन चावल) का ओदन (भक्त-भात) के साथ गोष्ठ गोपांगना
(गऊशाला की गोपियों) द्वारा प्रदत्त माहिष दुग्ध का निरन्तर सेवन उपयुक्त है-
तथा प्रतिदिन-सदैव हरिस्मरण करना प्रशस्त-मंगलदायक एवं श्रेयस्कर है
(प्रत्यहं स्मरणं हरेः)।
बल्यं दध्योदनं वातपित्तहत्पुष्टिकारकम् ।
सुरुच्यं ग्राहिकं हृद्यं स्थूलत्वमतिकारकम् ॥ २१ ॥
२. दध्योदन गुण- १. बल्य २. वातघ्न
३. पित्तहृत् ४. पुष्टिकारक
५. सुरुच्य ६. ग्राही
७. हृद्य ८. स्थूलमतिकारकम्
अथ शर्करादिसहितदधिगुणाः
सशर्करं दधि श्रेष्ठं तृष्णापित्तास्त्रदाहजित् ।
सगुडं वातनुद्वृष्यं बृंहणं कफदं गुरु ॥ २२ ॥
सुमधुर दधि
सशर्कर दधि (शर्करा मिश्रित दही उत्तम) तृषा, रक्तपित्त एवं दाहशामक है।
बृंहण एवं गुरु होता है॥२२॥
पृष्ठ २३७
द्वादशोत्सवः २३७
अथर्तुविशेषे दध्नः सेवनविधिन्निषेधञ्च
हेमन्ते शिशिरे चापि वर्षासु दधि शस्यते।
शरद्वसन्तीग्रीष्मेषु प्रायशस्तद्विगर्हितम् ॥ २३ ॥
ऋत्वनुसारेण दधि प्रयोग
सेवन प्रशस्त सेवन निषिद्ध (प्रायः)
१. हेमन्त ऋतु १. शरद ऋतु
२. वर्षा ऋतु २. वसन्त ऋतु
३. ग्रीष्म ऋतु
अथ घोल-मठादिनिर्माणविधिर्गुणाश्च
मस्तुना रहितं गाल्यं दधि शुभ्रतरे पटे।
जीरसैन्धवसंमिश्रं घोलं घनतरं स्मृतम् ॥ २४ ॥
घोल
घोल (मठा-मट्ठा) निर्माण की विधि इस प्रकार है- मस्तु (छाली) रहित दधि को
श्वेतवस्त्र (शुभ्रतरे पटे) में रखकर छानते हैं (मस्तुना रहित गाल्यम्); तथा भृष्ट जीरक
(भुना जीरा) तथा सैन्धव लवण का सामिश्रण करते हैं- इससे घनतर घोल (गाढ़ा
घोल) तैयार हो जायेगा॥२४॥
जीरसैन्धवसंयुक्तं घोलं वातस्य नाशनम्।
अतिसारे च मन्दान्नौ हितं रुच्यं बलप्रदम्॥ २५ ॥
घोल के गुण इस प्रकार हैं-
जीरक तथा सैन्धव लवण युक्त दधि घोल वातनाशक, अतिस्वर एवं अतिसार
नाशक तथा मन्दानि में व्याकरण, रुच्य एवं बलप्रद होता है॥२५॥
अथ हिङ्गुवासितघोलकनिर्माणं गुणाश्च
वस्त्रे दृढतरं बद्धं दधि दुग्धेन गालितम्।
हिङ्गुना धूपिते पात्रे स्थापितं सैन्धवान्वितम् ॥ २६ ॥
हिङ्गुवासित घोलक की निर्माण विधि इस प्रकार है-
दुग-दधि को मजबूत वस्त्र में बाँधकर (वस्त्रे दृढतरं बद्धं)। छानते हैं (गालितम्)।
क्षे. कु. 16
फिर हिंगु तथा सैंधव मिश्रित कर- हिंगु से धूपन से सुगन्धित पात्र में स्थापित करना
चाहिए॥२६॥
घोलकं वातहृद्बल्यमर्शोतिसारनाशनम्।
सुरुच्यं पुष्टिदं वृष्यं पक्वशूलविनाशनम्॥२७॥
घोलक के गुण (हिंगु, सुगन्धित) इस प्रकार है-
१. वातहत २. बल्य ३. रुच्य
४. पुष्टिदा ५. वृष्य ६. पक्वशूल (परिणामशूल)
७. अर्श ८. अतिसार ९. अग्निमांद्य
(नाशक- ६-९)
अथ तक्रनिर्माणविधिर्गुणश्च
तुर्यांशेन जलेन संयुतमतिस्थूलं सदम्लं दधि
प्रायो माहिषमंशुकेन विमले मृद्भाजने गालयेत्।
भृष्टं हिङ्गु च जीरकं च लवणं राजीं च किञ्चिन्मितां
पिष्ट्वा तत्र विमिश्रयेद्भवति तत्तक्रं न कस्य प्रियम्॥२८॥
तक्र
क. विधि- अति स्थूल-सदम्ल दधि (तुर्यांशेन जलेन स्युत) माहिष दधि- (भैंस के
दूध की दधि) में चौथाई भाग जल मिश्रित करके, स्वच्छ कपड़े से छान लेते
हैं-मिट्टी के पात्र में रखते हैं (मृद्भाजने गालयेत्)।
२. भृष्ट हिंगु (भुनी हिंगु), जीरक, लवण तथा राजिका (किंचित मात्रा) को पीसकर
(तक्र दधि) में सम्मिलित कर देते हुए। इस प्रकार का संस्कृत तक्र किसको प्रिय
नहीं होता अर्थात् सभी को इस तक्र की आकांक्षा पान हेतु रहती है (तत्तक्रं न
कस्य प्रियम्)।
तक्रं रुचिकरं वह्निदीपनं पाचनं परम्।
उदरे ये गदास्तेषां नाशनं तृप्तिकारकम्॥२९॥
ख. गुण- १. रुचिकर २. वह्निदीपन
३. पाचन (परम्) ४. तृप्तिकारक
५. उदरगद नाशक (उदर रोग हर)
अथ दुग्धसेवनकालनिरूपणम्
विदाहीन्यन्नपानानि यानि भुङ्क्ते हि मानवः।
तद्विदाहप्रशान्त्यर्थं भोजनान्ते पयः पिबेत्॥३०॥
दुग्धस्यापरे गुणा उक्ता एव।
दुग्ध
व्यक्ति (मनुष्य-मानक) जब विदाही अन्न-पान का सेवन करता है, उनसे उत्पन्न
दाह की शान्त (विदाहप्रशान्त्यर्थम्) करने के लिए भोजन कर चुकने के पश्चात्
(भोजनान्ते पयः पिबेत्) दुग्ध को पान करने से लाभ होता है- ऐसा विधान (दाहनाशक)
है। दुग्ध के अन्य/सामान्य गुण पूर्व में वर्णित हैं (दुग्धस्यापरे गुणा उक्ता एव)॥३०॥
अथ पश्चात्परिवेष्याणि
तत्र रसाला-शिखरिणीनिर्माणविधिर्गुणश्च
आदौ माहिषमम्लमम्बुरहितं दध्याढकं शर्करां
शुभ्रां प्रस्थयुगोन्मितां शुचिपटे किंचिच्च किंचित्क्षिपेत्।
दुग्धेनार्धघनेने मृन्मयनवस्थाल्यां दृढं स्थापये-
देलाबीजलवङ्गचन्दमरिचैर्योगैश्च तद्योजयेत्॥३१॥
भीमेन प्रियभोजनेन रचिता नाम्ना रसाला स्वयं
श्रीकृष्णेन पुरा पुनः पुनरियं प्रीत्या समास्वादिता।
एषा येन वसन्तवर्जितदिने संसेविता नित्यश-
स्तस्य स्यादतिवीर्यवृद्धिरनिशं सर्वेन्द्रियाणां बलम्॥३२॥
रसाला-शिखिरिकी (शिखरिणी)
क. १. विधि- सर्वप्रथम जलरहित (अम्बु रहित) माहिष अम्ल दधि (एक आढक चार
कि.ग्रा.) तथा (शुभ्रा) श्वेत शर्करा (एक प्रस्थ एक कि.ग्रा.)- इन दोनों द्रव्यों को
सम्मिश्रित करते हैं इसको श्वेत वस्त्र में थोड़ा-थोड़ा छोड़ते जायें (शुचि पटे
किंचित्क्ष किंचित्क्षिपेत्)। इसमें आधा दूध (पक्व रहने पर) के साथ छान लेते
हैं- इसको मृत्तिका पात्र में स्थापित कर देते हैं।
२. फिर, एला, लवणं, कर्पूर मरिच तथा अन्य उपयुक्त (सुगन्धित-सुरुचि) वस्तुओं
का चूर्ण रूप में मिश्रण कर देते हैं।
' has an upper circle/loop with a top line cut, then a stroke down, a lower loop, and a vertical bar.
Now look at this word in line 16:
The first character has: a loop at the top? No, it's a loop of 'व' connected to 'य'!
Wait, does it have an upper loop?
Wait, look at "व्यक्तियों" in line 18:
Let's compare the word in line 16 with "व्यक्तियों" in line 18!
In line 18: "पीड़ित व्यक्तियों का शरीर..." -> the word is "व्यक्तियों". It starts with 'व्य'.
In line 16: it has the EXACT same first conjunct: 'व्य'!
Wait, why did I think 'भ'? Because the half-'व' in this font has a small loop, then joins 'य'.
Then the next part is 'क्त्ति' (क+त conjunct with i-matra).
So it is definitely "व्यक्ति"!
"जो व्यक्ति मदोन्मत्त स्त्री के साथ संयोग करने से मानसिक"
Ah, wonderful! It is "व्यक्ति", which makes 100% sense!
Now check line 17:
"रूप से स्विन्न हो गये हैं (प्रमत्त नितासु रतातिखिन्नाः), तथा जिन मनुष्यों का"
Wait, is it "स्विन्न" or "खिन्न"?
Look at line 17:
"रूप से स्विन्न हो गये
पृष्ठ २४२
२४२ क्षेमकुतूहलम्
शशिरंखा (शिखरिणी)
क. विधि- शुभ्र शर्करा युक्त भक्त में भृत दुग्ध को छान होते हैं। यह शशिरंखा
शिखरिणी बन जाती है।
ख. गुण- १. हिमा २. बाल्या
३. रुच्या ४. पुष्टिदा
५. वातहरा ६. श्रेष्ठा
७. पित्तशामक ८. महादाहविनाशिनी
अथाम्ररसाकृतिनिर्माणविधिर्गुणाश्च
शशिरंखा हिमा बाल्या रुच्या पुष्टिप्रदायिनी।
वातपित्तहरा श्रेष्ठा महादाहविनाशिनी ॥ ४० ॥
किञ्चित्कुङ्कुमसंमिश्रं विमस्तु दधि गालितम्।
सशर्करं भवेत्पीता पक्वाम्ररससन्निभा ॥ ४१ ॥
आम्ररसाकृति शिखरिणी
क. विधि- मस्तु रहित दधि को वस्त्र से गलित करते (छानकर) हैं, फिर किञ्चित्
कुंकुम (केशर) मिश्रित कर देते हैं, तथा (बाद में) शर्करा, मिला देते हैं, इससे
पक्वाग्र समान (पके आम के रस के समान पीले रंग (भवेत्पीता) की शिखरिणी
बन जाती है।
ख. गुण- १. लघु २. वर्णवती
३. हिमा ४. सुरुच्या
५. मधुरा ६. बाल्या
७. वातघ्न ८. पित्तहर
९. परम : (७-८)
पीता शिखरिणी या सा लघ्वी वर्णवती हिमा।
सुरुच्या मधुरा बाल्या वातपित्तहरा परा ॥ ४२ ॥
पृष्ठ २४३
द्वादशोत्सवः २४३
अथ रसालानिर्माणविधिर्गुणाश्च
ससितं दधि मध्वाज्यमरिचैलादिसंस्कृतम्।
मथितं कान्तकामिन्या कर्पूरपरिवासितम् ॥ ४३ ॥
रसाला शुक्रला बाल्या रोचिनी वातपित्तहा।
स्निग्धाऽऽतपप्रतिश्यायं विशेषेण विनाशयेत् ॥ ४४ ॥
रसाला
क. विधि- सिता सहित दधि, मधु, घृत, मरिच तथा एला (दोनों चूर्ण) मिश्रित
कर, कान्तकामिनी (पति से प्रेम / उत्कृष्ट अभिलाषिणी) स्त्री के द्वारा मथित तथा
कर्पूर मिलित पदार्थ से (सुगन्धित) को 'रसाला' कहा जाता है।
ख. गुण- १. शुक्रला २. बाल्या
३. रोचिनी ४. वातनाशक
५. पित्तहा ६. स्निग्धा
७. आतपहारीणी ८. प्रतिश्याम विनाशक
रसाला शिखरिण्युक्ता मर्जिंका मार्जिका बुधैः।
कथ्यन्ते बहुनामानि गुणास्तस्या हि योगतः ॥ ४५ ॥
रसाला-शिखरिणी नामावली
पाक विद्या एवं शास्त्र के शताओं (पण्डितों) ने इस भोज्य पदार्थ का विभिन्न
नामकरण किया है, यथा-
१. रसाला २. शिखरिणी गुण द्रव्यों के संयोग
३. मर्जिंका ४. मार्जिका (घटक द्रव्यों के अनुसार)
५. अन्य नाम
मोचाफल रसाला
निर्नीरं मथितं धनेन सहितं संभावितं शर्करा-
धूलीभिर्मरिचोद्भवेन रजसा व्यालोडितं किञ्चन।
जातीचम्पककेतकीसुरभितं मृत्पात्रमध्यस्थितं
जिह्वायां विदधात्युपक्रममिदं मोचाफलैश्चापलम् ॥ ४६ ॥
२४४ क्षेमकुतूहलम्
रसालां रसवद्द्रव्यं मधुरं पित्तनाशनम्।
सुहृद्यं कफकृत्स्तोकं किञ्चिद्विष्टम्भकारकम्॥४७॥
मोचाफल रसाला
क. विधि- निर्नीर (जलरहित) दधि के साथ मोचाफल मथित कर, शर्करा मिलाकर,
मरिच चूर्ण लाती तथा केतकी पुष्प सुगन्धित मृत् भाजन में स्थापित करें। इसका
नाम 'मोचाफल रसाला' है।
यह विशिष्ट रसाला उपक्रम (भोज्य प्रस्तुति) का नाम 'मोचाफल रसाला' है।
ख. गुण- १. बल्य २. मधुर
३. पित्तनाशन ४. सुहृद्य
५. कफकृत् (स्तोक) ६. किंचितविष्टम्भकारकम्
अथ खार्बुजेयं रसालनिर्माणं गुणाश्च
मधुरदधिनो मध्ये शर्करां सन्नियोज्य
शुभविदलितखण्डं प्रक्षिपेत्खार्बुजेयम्।
करविलुलितमानैर्वासितं चातिगन्धै-
र्जिगमिषुजठराग्नि स्थापयत्येव नूनम्॥४८॥
रसालं खार्बुजस्येदं विष्टम्भि रुचिकारकम्।
हृद्यं च कफदं बल्यं पित्तघ्नं मूत्रकृद्धरम्॥४९॥
खार्बुजेय रसाला
क. विधि- मधुर दधि-शर्करा मिश्रित-में खर्बूज खण्ड (खरबूजे के छोटे टुकड़े)
डालकर, हस्त-मर्दन करें तथा सुगन्धित द्रव्यों से सुवासित करते है। इसका नाम
'खार्बुजेय रसाला' है।
यह भृष्ट जाठराग्नि को पुनस्थापित कर देती है।
ख. गुण- १. विष्टम्भि २. रुचिकारक
३. हृद्य ४. कफजनन
५. बल्य ६. पित्तघ्न
७. मूत्रकृत् (उत्तम मशाल) ८. अग्निजनन
द्वादशोत्सवः २४५
अथाम्ररसालानिर्माणं गुणाश्च
सखण्डं खार्बुजं खण्डं चन्द्रार्द्रकविमण्डितम्।
पक्वाम्ररससंयुक्तमत्याराधितवान् रविम्॥५०॥
पक्वाम्ररसखण्डाभ्यां संस्कृतं खार्बुजं दलम्।
वातपित्तहरं सर्वरसालेषूत्तमोत्तमम्॥५१॥
आम्र रसाला
क. विधि- सखण्ड खर्बूज (दल) खण्ड को कर्पूर तथा आर्द्रक से आवृत्त करें तथा
पक्वाम्र रस क्षेपण करते हैं, सूर्यातप में शुष्क करती हैं। इस तरह 'आम्ररसाला'
बन जाती है।
ख. गुण- १. वातघ्न
२. पित्तशामक
३. सर्वोत्तम रसाला (सर्वरसालेषूत्तमोत्तमम्)
अथ पानकानि
अथापक्वाम्रफलपानकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
आमाम्रं परिसिन्नं मर्दितं मुष्टिना दृढम्।
पयसाऽर्धयुते तोये शर्करामरिचान्विते॥५२॥
अपक्वाम्ररसोद्भूतं पानकं वातनाशनम्।
कफपित्तकरं किञ्चित् प्रत्यहं यदि सेवितम्॥५३॥
पानक
अपक्वाम्रफल पानक
क. विधि- आम (कच्चे) आम्रफल को परिसिन्न (उबाल) करके, दृष्टि मुष्टि
(मजबूत हाथों की मुट्ठी) से मर्दन करते हैं, फिर इसमें अर्ध दुग्ध मिश्रित
जल में शर्करा एवं मरिच मिला देते हैं। यह 'आम्रफल' पानक तैयार हो
गया।
ख. गुण- १. वातनाशक
२. कफ ] (किंचित वर्धक-प्रत्यहं यदि सेवितम्
३. पित्त ] नित्य या अधिक सेवन करने पर)
२४६ | क्षेमकुतूहलम्
अथ सुपक्वआम्रफलपानकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
सुपक्वमाम्रस्य फलं सुमुष्टिना
संमर्दितं शर्करया समन्वितम्।
एलालवङ्गार्द्रकवासवासितं
वर्णान्वितं कस्यन रोचकप्रदम्॥५४॥
पानकं त्वाभ्रसंभूतं स्वाद्वम्लं गुरु पित्तजित्।
सुहृद्यं श्लेष्मकृद्वल्यं वर्ण्यंवृष्यं रुचिप्रदम्॥५५॥
सुपक्वआम्रफल पानक
क. विधि- सुपक्व आम्र फल (भलीभाँति/ पूरे तरह पके) को अपनी मुट्ठी
(स्वमुष्टित्वा) मर्दन करके, शर्करा का मिश्रण करें, एला, लवंग तथा आर्द्रक की
सुगन्ध से सुवासित करें।
इस रीति से वर्णयुक्त पानक किसको रुचिकारक नहीं होता- यह पानक
सर्वप्रिय-स्वाद जनक होता है।
ख. गुण- १. स्वादु २. अम्ल
३. गुरु ४. पित्तजित्
५. सुहृद्य ६. श्लेष्मकृत
७. बल्य ८. वर्ण्य
९. वृष्य १०. रुचिप्रद
अथाम्लिकाफलपानकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
अम्लिकायाः फलं पक्वं मर्दितं वारिणा दृढम्।
शर्करामरिचोन्मिश्रं लवङ्गेनाधिवासितम्॥५६॥
अम्लिका फल पानक- १
चिंचा (अम्लिका) के पूर्णपक्व फलों का जल में डालकर मर्दन करके, शर्कर
एवं मरिच चूर्ण- साथ ही लवंग चूर्ण सुगन्धित बनाने हेतु-मिश्रित कर देते हैं। इसे
'अम्लिका पानक' कहते हैं।
चान्त्रेयं शर्करायुक्तं कर्पूरोदकमर्दितम्।
फलमार्द्रकसंयुक्तं प्राह तत्पानकान्तरम्॥५७॥
द्वादशोत्सवः २४७
अम्लिका फल पानक- २
अम्लिका फल को जल में मर्दन करके, शर्करा तथा कर्पूर मिश्रित कर, आर्द्रक
स्वरस जल देते हैं।
अम्लिकाफलसंभूतं पानकं वातनाशनम्।
कफपित्तकरं किञ्चित्सुरुच्यं वह्निबोधकम्॥५८॥
ख. गुण- १. वातनाशक २. किंचित् कफ कारक
३. किंचित् पित्त जनक ४. रुचिकारक
५. वह्निबोधक (अग्नि तीव्र कर)
अथ जम्बूफलपानकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
जम्बूफलं त्वस्थिविवर्जितं हि
सुमर्दितं शर्करयाऽम्बुनाऽलम्।
सुवासितं वल्लिजभृङ्गपत्रै
रुचिं विधत्ते विरुचौ जनानाम्॥५९॥
जम्बूफलभवं रुच्यं पानकं कफनाशनम्।
कषायं वातकृत्स्तोकं स्वाद्वम्लं ग्राहिकं वरम्॥६०॥
जम्बूफल पानक
क. विधि- जम्बूफल (अस्थि रहित) को जल में मर्दन करके, शर्करा मिश्रित कर
दें, फिर मरिच, भृंग (त्वक-दालचीनी) तथा पत्र (तेजपत्र) का चूर्ण डालकर
सुगन्धित करें। यह 'जम्बूफलपानक' निर्माण हो गया है।
यह पानक (जम्बूफल पानक) व्यक्तियों की अरुचि विकार को नष्ट करके, रुचि
उत्पन्न कर देता है।
ख. गुण- १. रुच्य २. कफनाशन
३. कषाय ४. किंचित् वातनाशक
५. स्वादु ६. अम्ल
७. ग्राही (वरम्)
अथ बीजपूरपाननिर्माणविधिर्गुणाश्च
मातुलुङ्गरसे योज्यं त्रिगुणं शार्करं जलम्।
कर्पूरमरिचोन्मिश्रं पानकं स्यादिदं वरम्॥६१॥
मातुलुङ्गभवं पानं शूलाजीर्णविनाशनम्।
श्वासकासारुचौ वातविड़बन्धेषु च पूजितम्॥ ६२॥
बीजपूर पानक
क. विधि- बीजर (बीजौरा-विजौरा नीबू) या मातुलय के स्वरस में उससे त्रिगुण
जल में शर्करा (मात्रपूर्वक) मिला दें इसे कर्पूर तथा मरिच चूर्ण से सुगन्धित करें।
ख. गुण- १. शूल २. अजीर्ण
३. श्वासवृद्धि ४. कास
५. अरुचि ६. वातवरोध
७. मलावरोध (नाशक-१-७)
अथ हेमकिरणपानकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
शर्करा नालिकेरं च बीजपूररसप्लुतम्।
पटपूतं भवेद्धमकिरणं नाम पानकम्॥ ६३॥
पानकं हेमकिरणं रुच्यं वृष्यं बलप्रदम्।
सुस्निग्धं वातहच्छुभ्रं किञ्चित्कफकरं गुरु॥ ६४॥
क. विधि- शर्करा, नालिकेर जल तथा बीजपूर स्वरस मिश्रण को, पटपूत करके
(वस्त्र से छानकर) रखते हैं। इसको 'हेम किरण पानक' संज्ञा दी जाती है।
ख. गुण- १. रुच्य २. वृष्य
३. बल्य ४. स्निग्ध
५. वातनाशक ६. शुभ्र
७. किंचित् कफवर्धक ८. गुरु (गरिष्ठ)
अथ निम्बूफलपानकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
भागैकं निम्बुजं तोयं षड्भागं शर्कराेदकम्।
लवङ्गमरिचोन्मिश्रं पानकं पानकोत्तमम्॥ ६५॥
निम्बूफलभवं पानमत्यम्लं वातनाशनम्।
हृद्यं रुचिकरं भव्यं सर्वाहारस्य पाचकम्॥ ६६॥
निम्बूफलपानक
क. विधि- निम्बुज (नीबू का रस) एक भाग, शर्करा मिश्रित जल-छह भाग मिश्रित
कर, लवंग एवं मरिच चूर्ण डालें।
यह उत्तम पानक (पानकोत्तमम्) बन जाता है।
ख. गुण- १. अत्यधिक अम्ल २. वातनाशक
३. हृद्य ४. रुचिकर
५. भव्य (श्रेष्ठ) ६. सर्वाहार पाचक
अथ कारमर्दकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
लवङ्गार्द्रकसंयुक्तं सुपिष्टं वारिणा युतम्।
कारमर्दं करैमर्द समभागसितान्वितम्॥ ६७॥
वातहृद्रुचिदं बल्यं हृद्यमम्लतरं स्मृतम्।
रक्तपित्तकरं चोक्तमकण्ठ्यं कारमर्दकम्॥ ६८॥
कारमर्द पानक
क. विधि- करमर्द (करौंदे-करवन) फलों को जल में सुपिष्ट भलीभाँति पीसकर,
लवंग एवं आर्द्रक के साथ समभाग सिता (शर्करा) कर-मिश्रित तथा गालित
कर (छान) लेते हैं। यह 'करमर्दपानक' प्रस्तुत है।
ख. गुण- १. वातहृत् २. रुचिद
३. बल्य ४. हृद्य
५. अम्लतर ६. समपित्तकर
७. अकण्ठ्य ८. कण्ठ (गल अहितक)
९. आम-पक्व (मधुराम्ल) फलोपयोगी
अथ नारङ्गफलपानकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
सुपक्वनारङ्गफलं सुपीड़ितं
संयोजितं शर्करयाऽतिशुभ्रया।
सदार्द्रकं चेन्दुकणेन वासितं
महीतलेकेन न संस्तुतं क्षणम्॥ ६९॥
नारङ्गफलसम्भूतं पानकं वातनाशनम्।
मधुरं विशदं रुच्यं सुस्निग्धं पित्तहृद्गरम्॥ ७०॥
नारङ्गफल पानक
क. विधि- सुपक्व नारंग (नारंगी) फलों को सुपीडितकर (स्वरस निकालने हेतु),
at that first word:
Wait, the first letter has a loop... wait, no, look at:
ह्र or ह्य?
It is ह्य! The loop of य is at the bottom right of ह.
Then above it, is there an e-matra? Yes, an e-matra slanting to the left.
Wait, what is that vertical line?
Wait, there is NO vertical line next to ह!
Wait, look at the next letter: it is 'त'!
Then next: 'त्' joined to 'पा'!
Wait, why does 'त्पा' look like that?
Because 'त्' is on the left, and 'पा' has a vertical stem!
Wait, that vertical stem of 'पा' is what I might have thought was something else!
Wait, let's re-read:
ह्ये - त - त् - पा - न - क... wait!
Is there a त before त्पा?
Wait, if there's a त, and then त्पा, that would be "ह्येतत्पानक"!
Yes! ह्ये - त - त् - पा - न - क = ह्येतत्पानक!
Wait, in Hindi/Sanskrit typing, "ह्येतत्पानक":
ह्येतत् (ह्ये + त + त्) + पानक (पा + न + क) = ह्येतत्पानक!
Yes, exactly! ह्येतत्पानक!
Wait, is