सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 112

पृष्ठ २१८

२१८ क्षेमकुतूहलम्
पूर्णतया (या उपयुक्त) पाक ही जाने पर बाहर निष्कासित कर लिया जाता है।
आ. इस कुण्डलाकार द्रव्य (उपरोक्त) को सितालेह या खण्डपाक (गाढ़ी शक्कर की
चाशनी या पतले लेह) विनिक्षेपण कर देते हैं। फिर यथासमय (अनपाल के
पश्चात्) बाहर निकाल लेते हैं।
इस कार्य में पाचक को चाहिए कि वृष्योग्य कर्पूर से सुगन्धित कंकण (कँगल)
के समान परिपक्व द्रव्य को शर्करा लेह-खण्डपाक में प्लुत (प्रक्षेपित) करते हैं।
इस व्यंजन को 'कुण्डलिका' तथा (लोक भाषा में) जलेबी कहा जाता है।
स. गुण— १. धातु पुष्टिकरा २. वृष्या
३. हृद्या ४. इन्द्रियतर्पणी
अथ बर्वरनिर्माणविधिर्गुणाश्च
जलेनालोडितं शालिपिष्टकं खण्डमिश्रितम्।
धारापूपकवत्पाच्यं प्रोक्तं तद्बर्बराख्यकम्॥ १२६॥
बर्बरं बलकृत्सद्यः श्रेष्ठं पित्तानिलापहम्।
रोचनं कफकृच्छीतं हृद्यं हल्लासनाशनम्॥ १२७॥
बर्वरसख्य पूरक
क. विधि— शालि तण्डुल (चावल) की पिण्डी (पीठी) मैशर्करा मिश्रित करके,
जल के घोलकर, धारापूर्वक के समान घृत में पाक करते हैं। इसका नामकरण
'बर्वराख्य पूरक' (बर्वरपुआ) किया गया है।
ख. गुण— १. सद्यः बलकृत् २. पित्तवातपट्टम् (श्रेष्ठ)
३. रोचन ४. कफकृत्
५. शीत ६. हृद्य
अथ खण्डखर्जूरनिर्माणविधिर्गुणाश्च
दध्नाऽऽलोडितया शालिपिष्टयुक्तकणीकया।
धारायाः युक्तिसंपक्वं पादुकाकृतिदीर्घकम्॥ १२८॥
बहिः खण्डेन लिप्तं च खण्डखर्जूरकं विदुः।
खर्जूरं वातहृद्बल्यं सुस्निग्धं स्वादुशीतलम्॥ १२९॥
पित्तहृद्बृंहणं हृद्यं किञ्चित्कफकरं सरम्।


पृष्ठ २१९

दशमोत्सवः २१९
खण्ड खर्जूर
क. विधि—कफ कणिकार (शालि तण्डुल) पिष्टी में गोधूम चूर्ण (शुद्ध-महीन आटा)
का मिश्रित कर, दधि के साथ पीसते हैं (दध्नाऽऽलोहिता), फिर इस द्रव्य से
पादुकाकृति बनाकर, पक्व घृत में करते हैं (धागपूपकवत्), तथा बाह्य रूप से
शर्करा खण्ड का आलेपन कर देते हैं— इसको विद्वानों ने 'खण्डखर्जूर' नाम दिया
है।
ख. गुण— १. वातहृत् २. बल्य
३. सुस्निग्ध ४. स्वादु
५. शीतल ६. पित्तहृत्
७. बृंहण ८. हृद्य
९. किंचित् कफकर १०. सर
अथामृतरसनिर्माणविधिर्गुणाश्च
तृतीयभागखण्डेन मिश्रितं षष्टिकपिष्टकम्।
शुभ्रमीषदधियुतं मर्दयेद्दृढपाणिना॥ १३०॥
एवं सुमर्दितं कृत्वा स्थापयेद्रजनीमितम्।
ततोऽन्यस्मिन्नहन्येव गतत्वक्तिलचित्रितम्॥ १३१॥
विधायापूपकं चैव तविकायां घृते पचेत्।
ततोऽमृतरसा एव वातहृद्बलवर्धना॥ १३२॥
कणिका सर्पिषा युक्ता तोये पिण्डतमर्दिता।
अमृतरसा
क. विधि—पिष्ट के तृतीयांश खण्ड (शर्करा) के सम्मिश्रण के बाद, शुभ्र (सफेद)
दधि मिलाकर दृढपाणि (कठोर हाथो) से मर्दन करके, एक रात्रि तक रखा रहने
देते हैं, अगले दिन निस्तुषतिल मिलाते हैं, इसका पूप (पुआ) बनाकर टविका
(तवा) पर घृत का पाक करते हैं। इस व्यंजन को 'अमृतरसा' कहा जाता हैं।
ख. गुण— १. कटहृत् २. बलवर्धक
३. अरोचक हरा ४. हृद्या
५. सुशीता ६. पित्तहृत्
७. हिम