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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 122

फिर हिंगु तथा सैंधव मिश्रित कर- हिंगु से धूपन से सुगन्धित पात्र में स्थापित करना
चाहिए॥२६॥
घोलकं वातहृद्बल्यमर्शोतिसारनाशनम्।
सुरुच्यं पुष्टिदं वृष्यं पक्वशूलविनाशनम्॥२७॥
घोलक के गुण (हिंगु, सुगन्धित) इस प्रकार है-
१. वातहत २. बल्य ३. रुच्य
४. पुष्टिदा ५. वृष्य ६. पक्वशूल (परिणामशूल)
७. अर्श ८. अतिसार ९. अग्निमांद्य
(नाशक- ६-९)
अथ तक्रनिर्माणविधिर्गुणश्च
तुर्यांशेन जलेन संयुतमतिस्थूलं सदम्लं दधि
प्रायो माहिषमंशुकेन विमले मृद्भाजने गालयेत्।
भृष्टं हिङ्गु च जीरकं च लवणं राजीं च किञ्चिन्मितां
पिष्ट्वा तत्र विमिश्रयेद्भवति तत्तक्रं न कस्य प्रियम्॥२८॥
तक्र
क. विधि- अति स्थूल-सदम्ल दधि (तुर्यांशेन जलेन स्युत) माहिष दधि- (भैंस के
दूध की दधि) में चौथाई भाग जल मिश्रित करके, स्वच्छ कपड़े से छान लेते
हैं-मिट्टी के पात्र में रखते हैं (मृद्भाजने गालयेत्)।
२. भृष्ट हिंगु (भुनी हिंगु), जीरक, लवण तथा राजिका (किंचित मात्रा) को पीसकर
(तक्र दधि) में सम्मिलित कर देते हुए। इस प्रकार का संस्कृत तक्र किसको प्रिय
नहीं होता अर्थात् सभी को इस तक्र की आकांक्षा पान हेतु रहती है (तत्तक्रं न
कस्य प्रियम्)।
तक्रं रुचिकरं वह्निदीपनं पाचनं परम्।
उदरे ये गदास्तेषां नाशनं तृप्तिकारकम्॥२९॥
ख. गुण- १. रुचिकर २. वह्निदीपन
३. पाचन (परम्) ४. तृप्तिकारक
५. उदरगद नाशक (उदर रोग हर)


अथ दुग्धसेवनकालनिरूपणम्
विदाहीन्यन्नपानानि यानि भुङ्क्ते हि मानवः।
तद्विदाहप्रशान्त्यर्थं भोजनान्ते पयः पिबेत्॥३०॥
दुग्धस्यापरे गुणा उक्ता एव।
दुग्ध
व्यक्ति (मनुष्य-मानक) जब विदाही अन्न-पान का सेवन करता है, उनसे उत्पन्न
दाह की शान्त (विदाहप्रशान्त्यर्थम्) करने के लिए भोजन कर चुकने के पश्चात्
(भोजनान्ते पयः पिबेत्) दुग्ध को पान करने से लाभ होता है- ऐसा विधान (दाहनाशक)
है। दुग्ध के अन्य/सामान्य गुण पूर्व में वर्णित हैं (दुग्धस्यापरे गुणा उक्ता एव)॥३०॥
अथ पश्चात्परिवेष्याणि
तत्र रसाला-शिखरिणीनिर्माणविधिर्गुणश्च
आदौ माहिषमम्लमम्बुरहितं दध्याढकं शर्करां
शुभ्रां प्रस्थयुगोन्मितां शुचिपटे किंचिच्च किंचित्क्षिपेत्।
दुग्धेनार्धघनेने मृन्मयनवस्थाल्यां दृढं स्थापये-
देलाबीजलवङ्गचन्दमरिचैर्योगैश्च तद्योजयेत्॥३१॥
भीमेन प्रियभोजनेन रचिता नाम्ना रसाला स्वयं
श्रीकृष्णेन पुरा पुनः पुनरियं प्रीत्या समास्वादिता।
एषा येन वसन्तवर्जितदिने संसेविता नित्यश-
स्तस्य स्यादतिवीर्यवृद्धिरनिशं सर्वेन्द्रियाणां बलम्॥३२॥
रसाला-शिखिरिकी (शिखरिणी)
क. १. विधि- सर्वप्रथम जलरहित (अम्बु रहित) माहिष अम्ल दधि (एक आढक चार
कि.ग्रा.) तथा (शुभ्रा) श्वेत शर्करा (एक प्रस्थ एक कि.ग्रा.)- इन दोनों द्रव्यों को
सम्मिश्रित करते हैं इसको श्वेत वस्त्र में थोड़ा-थोड़ा छोड़ते जायें (शुचि पटे
किंचित्क्ष किंचित्क्षिपेत्)। इसमें आधा दूध (पक्व रहने पर) के साथ छान लेते
हैं- इसको मृत्तिका पात्र में स्थापित कर देते हैं।
२. फिर, एला, लवणं, कर्पूर मरिच तथा अन्य उपयुक्त (सुगन्धित-सुरुचि) वस्तुओं
का चूर्ण रूप में मिश्रण कर देते हैं।