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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 114

२२२ क्षेमकुतूहलम्
सेविका
क. विधि- गोधूम चूर्ण (कणिका) जल के साथ मर्दित की सूक्ष्म (तनुरमणाकार) वर्ती
बनाकर (शुष्क) खण्ड तथा घृत में भूनकर (शर्करा अविष्टित) भक्त (चावल के
भात) समान पाक करते हैं। इस व्यंजन को 'सेविका' नाम है, जो भोज्य है।
ख. गुण- १. गुर्वी २. पित्तानिलापहा
३. संधानजननी ४. स्तोकमात्रा सेवनीय
(श्रवण मास)
उपसंहारात्मक रूपरेखा
वर्तमान उत्सव (दशम प्रकरण) के अन्तर्गत पक्वान्न-व्यंजनों का विषय प्रतिपादित
है। इन पक्वान्न-पदार्थों (व्यंजनों) में विशेषतया सुधाजनक (आहार को भोजन हेतु
रुचि/ इच्छा जागृत करने हेतु उपयोगी) वस्तुओं (भोज्य पदार्थों-व्यंजनों आदि) के
विषय में परिचय दिया (विभिन्न पक्षों का) जाना (आगामी प्रकरण का) प्रतिपाद्य-विषय
होगा।
इति हिन्दी व्याख्या सहित पक्वान्ननिर्माणवर्णन
नामक दशवाँ उत्सव समाप्त॥
अथैकादशोत्सवः
(एकादश प्रकरण)
अथ क्षुदबोधकवस्तुन्निरूपणम्
तक्रं चिरं कथितमर्पितशृङ्गवेरं
बाह्लीकसैन्धवरजोमरिचाल्पचूर्णम्।
एलाभवेन रजसा सुरभीकृतं त-
त्पूर्णं प्रदीपयति शान्ततनूनपाम्॥ १ ॥
क्षुदबोधक(वर्धन) प्रतिपादनम्
शृंगवेर (आर्द्रक) अर्पित तक्र (चिरक्वथित), भृष्ट हिंगु, सैन्धव, मरिच (अल्प चूर्ण)
से युक्त तथा एला से सुरभीकृत् तक्र (मट्ठा) पाचकाग्नि की शीघ्र तत्काल (शान्ततनूनपादम्)
प्रदीपन करने में सक्षम होता है॥१॥
अजाजीधान्याकैर्मरिचरजनीमेथिककणैः
समं पिष्टं तक्रे कथितममलैः सारकफैः।
युतं सिंधूत्थेन ज्वलितनवबाह्लीकंसुरभिः
प्रलेहः संदेहं जनयति सुधायामतरिसः॥ २ ॥
प्रलेहः पाचनो हृद्यो रुच्यो वह्निप्रदो लघुः।
कफानिलविबन्धघ्नः किञ्चित्पित्तप्रकोपकः॥ ३ ॥
हरीतकी क्वाथ
क. विधि- जीरक, धान्यक, मरिच, हरिद्रा, मेथि का तथा पिप्पली (समभाग) पिष्ट
को, अमल हरीतकी फल के क्वाथ-सैन्धव लवण युक्त- को नवीन हिंगु से
सुरभित किया जाता है। यह अतिरस रूप प्रलेह अमृत को भी संदिग्ध बनाने की
सामर्थ्य रखता है (सन्देहं जनयति सुधायामतिरसः)॥२-३॥
अथ नारङ्गक्षुदबोधकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
नारङ्गकेसरमपाकृतबीजपुञ्जं
योऽश्नाति खण्डमरिचोद्भवचूर्णमिश्रम्।