क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१४ क्षेमकुतूहलम्
३. वातनाशक ४. पित्तशामक
५. सुष्ठुवस्तु(युक्त)योगवान् ६. हृद्य
७. सच्य ८. अग्निकारक
अथ आपूपनिर्माणविधिर्गुणाश्च
समितां खण्डिताख्येन मेलयित्वा सुमर्दिताम्।
घृते विस्तार्य विपचेत्सुवृत्तो मृद्वपूपकः ॥१०९॥
अपूपः पुष्टिदो बल्यो हृद्यो गुरुतरः स्मृतः।
पित्तानिलहरो वृष्यः सुपक्वो रुचिकारकः॥११०॥
आपूप निर्माण
क. विधि-समिता (मैदा) को खण्ड (शर्करा) में मिश्रित करके, जल में घोलकर
(सुमर्दित), तप्त घृत में निक्षेप करते हैं; जिनको विस्तीरण करके, सुवृत्त
(गोलाकार) किया जाता है- इस रीति से मृदु (मुलायम) आपूप (पुआ) बन
जाता है।
ख. गुण- १. पुष्टिदा २. वृष्य
३. हृदय ४. गुरुतर
५. गुरुतर ६. पित्तशामक
७. वातनाशक ८. बल्य
९. सुपक्व रुचिकारक
अथ दधिवटिकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
शालिपिष्टं युतं दध्ना मर्दयित्वा घृते पचेत्।
वेष्टयेत्पक्वखण्डेन सुवृत्तं दध्यपूपकम् ॥ १११॥
दध्यपूपो गुरुर्वृष्यो बृंहणोऽनिलपित्तहा।
हृद्योऽग्निजनकश्चैव विशेषाद्रुचिकारकः॥ ११२॥
दध्यपूप
क. शालिपिष्ट (जड़हन धान के चावलों को पीसकर तैयार पीठी-पिष्ठी) को मर्दित
कर, गोलाकार घृत में पाक करते हं, तथा पक्व खण्ड (शक्कर की चाशनी)
में प्रद्विपण करते हैं। (वेष्टयेत् पक्व खण्डेन)। इससे सुवृत्त (गोलाकार) पूप
(पुआ) का निर्माण सम्पन्न हो जाता है।
दशमोत्सवः २१५
ख. गुण- १. गुरु २. वृष्य
३. वातनाशक ४. पित्तशामक
५. हृद्य ६. अग्निजनक
७. विशेषरूपेण रुचिकारक
अथ तरद्वटिकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
घृतेन मर्दिता दध्ना कणिकां फेणयेत्ततः।
विधाय वटिकास्तस्या घृते मन्दाग्निना पचेत्॥११३॥
प्रलिम्पाः खण्डपाकेन कर्पूरेण विमिश्रयेत्।
ततः एताः समरिचास्तरद्वट्य इति स्मृताः ॥११४॥
बल्याः पुष्टिकरा हृद्या वृष्याः पित्तानिलापहाः।
सुस्निग्धाः कफदाः शीघ्रं किञ्चित्सन्धानकृद्धिमाः ॥ ११५॥
तरद्विका-तरुद्धटी
क. विधि- कणिका (मैदा) को घृत के साथ मर्दन करके, दही (दधि) के साथ
फेणते (फैंट लेते हैं, तथा मरिचचूर्ण का मिश्रण कर देती हैं। इसकी वटिका
बनाकर मन्दाग्नि पर घृत में पाक करते हैं, फिर खण्डपाक (चाशनी) से प्रलिप्त
कर देते हैं। तथा कर्पूर मिश्रण द्वारा सुगन्धित कर देते हैं। इस पदार्थ को
'तरहटी' नाम दिया जाता है।
ख. गुण- १. बल्य २. पुष्टिकरा
३. हृद्या ४. शुक्रला
५. वृष्या ६. पित्तशामक
७. अनिलावह ८. स्निग्ध
९. कफदा १०. शीतल
अथ बदरचूर्णपूरिकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
घृतमिश्रकणीकायां मेलितं पञ्चमांशकम्।
बदरत्वग्भवं चूर्णं जलेनालोड्य पीडयेत् ॥ ११६॥
पूरिका च घृते पक्वा खण्डपाकविलेहिता।
पूरिका बदरोन्मिश्रा स्निग्धा पित्तहरा हिमा॥ ११७॥