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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 117

२२८ क्षेमकुतूहलम्
आम्रपल्लव - मुकुल योग
आम्रपल्लव - आम्र के प्रवाल (ताम्रवर्ण समान नव पल्लव) के खण्डों में लवण
मिश्रित (तथा मर्दित) कर पिण्डीकृत रूप में, घृत तथा (हिंगु-धूप से सुवासितं-घृत तथा
दुग्ध में पाक कर लेते हैं। यह व्यंजन पवन सखा (वायु का मित्र) अग्नि का प्रदीपन करता
है।
मुकुलः सहकारशाखिनः
शतखण्डीकृतसैन्धवान्वितः।
दधिमन्थमरीचसंस्कृत-
श्चिरजामरुचिं छिनत्ति हि ॥ २१॥
कफपित्तहरौ हृद्यौ मुखवैरस्यनाशनौ।
वह्निर्संजननौ रुच्यौ चूतजौ पुष्पपल्लवौ॥२२॥
क. विधि-मुकुल- आम्र मुकल (आम के बौर) को शत खण्डीकृत् रूप में,
लवण तथा दधिमन्थ, मरिचचूर्णसहित, पाक करते हैं। यह व्यंजन चिरकालीन
अरुचि को नष्ट कर देता है।
ख. गुण- चूतज (आम्रजन्य) पल्लव-मुकुल
१. कफपित्तहर २. हृद्य ३. मुखवैरस्यनाशन
४. वह्निर्संजनन ५. रुच्य
अथ मृणालस्य क्षुदबोधनिर्माणविधिर्गुणाश्च
बिशाङ्कुराश्चन्द्रकलानुकारिणो
विभावितः सैन्धवनिम्बुकाभ्याम्।
विकीर्य खण्डीकृतशृङ्गबेर-
जलेऽपि वह्निं लघु दीपयन्ति ॥ २३ ॥
मृणालं शीतलं हृद्यं कषायं कफनाशनम्।
रक्तपित्तहरं स्वादु दुर्जरं दाहनाशनम् ॥ २४॥
मृणालस्य योग
क. विधि- चन्द्र किरण समान कमल के मृणाल तन्तु में सैन्धन तथा निम्बक स्वरस
से मात्रित, आर्द्रक खण्ड स्वरस सम्मिलित कर सेवन कराना चाहिए। इससे
मन्द पाचकाग्नि तीव्र (प्रदीप्त) हो जाती है।


एकादशोन्मेषः २२९
ख. गुण- १. शीतल २. हृद्य
३. कषाय ४. कफनाशन
५. रक्तपित्तहर ६. स्वादु
७. दुर्जर ८. दाहनाशन
अथ शिग्रुमूलक्षुद्बोधकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
धौतं कुञ्जरदन्तदीप्तिसदृशं सिन्धूत्थतैलासुरी
पीताभिः क्रमतोत्तरोत्तररसं मूलं नवं शिग्रुजम्।
तस्याहो वन्दनान्तरे निविशते श्रीचन्द्रचूडप्रिया-
पादाम्भोरुहरेणुरञ्जितशिरा यः पूर्वकाले पुमान् ॥ २५ ॥
शिग्रुमूल योग
क. विधि- प्रक्षालित, स्वच्छ, हस्तिदन्त समान श्वेतनवीन शिग्रु (सहिजन) मूल,
सैंधव, सर्षप तैल, राजिका, हरिद्रा (के साथ क्रमशः उत्तरोत्तर) मिश्रणकर भोज्य
पदार्थ का निर्माण कर लेते हैं।
ख. वैशिष्ट्य- वह आहार-पदार्थ, उस व्यक्ति के गुण में प्रवेश करता है, जो पूर्व
जन्म में भगवान शंकर तथा उनकी पत्नी उमा के चरण-कमल धूलि को अपने
सिर पर धारण (रंजित) करता है।
शिग्रुमूलं तु वातघ्नं श्रेष्ठशोविनाशनम्।
शमनं स्नायुरोगस्य पित्तकृत्कफनाशनम् ॥ २६ ॥
गुण
१. वातघ्न २. श्रेष्ठ अर्श विनाशनम् ३. स्नायुरोग शमन
४. पित्तकारक ५. कफघ्न
अथामलकफलस्य क्षुद्बोधकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
स्निग्धं धात्रीफलं यज्जवलदनलशिखासन्निभं स्निग्धपात्रे
क्षिप्तं प्रभृष्टहिङ्गुप्रकरजनिरजस्तैलसिन्धूत्थव्योषैः।
संश्लिष्टं जातपाकं कतिपयदिचसैरूल्लसत्सौरभाढ्य
तस्य स्वादानुवादं कथितुमपि वरो नेश्वरः कस्तदन्यः ॥ २७॥