क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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क्षिप्त्वाऽन्यसमितालम्बपुटे वेष्ट्या घृतेपचेत्।
ततः खण्डे न्यसेत्पक्वे गुह्यकोऽयमुदाहृतः॥१००॥
गुह्यको बृंहणो वृष्यो हृद्यः पित्तानिलापहः।
मधुरोतिगुरुः पाके किञ्चित्सन्धानकृत्सरः॥१०१॥
गुह्या-संयावक
क. विधि- समिता (मैदा) को घृत में सुमृष्ट करके, सिता, द्राक्षा, प्रियाल आदि
सम्मिलित करें, तथा सुगन्धि द्रव्यों-एला, लवंग, कर्पूर, मरिच आदि से
परिवासित (सुगंधमय) करते हैं। इसके बाद मैदा (समिता) के अन्य आलम्बन
पुट (छोटी-रोटी के टुकड़े) की मध्य वेष्टित (भर) कर, घृत में पकायें (पूर का
मुख बन्द करके) तथा इसे खण्डपाक (चाशनी), में अन्ततः डुबो देते हैं
(न्यसेत्पक्वे)। इस पदार्थ को, गुह्या-गुह्यक कहा जाता है। सामान्य मन भाषा
(हिन्द आदि) में गुझिया-मुथिया संयाव कहने का प्रचलन है (जिसका लोक
समाजिक परम्परा के पर्वो के विशिष्ट व्यंजन के मिष्ट पदार्थों में, होलिका होली
पर सकी निर्माण उपयोग सर्वविदित है)।
ख. गुण- १. वृंहण २. वृष्य
३. हृद्य ४. पित्तावह
५. अनिलपह ६. मधुर
७. अतिगुरु ८. मधुरविपाकी
९. अल्पसंधानकारिकी १०. सर
अथामृतसंयावकनिर्माणविधिर्गुणश्च
समितां मधुदुग्धेन मर्दयित्वा सुशोभनाम्।
पचेद्धृतोत्तमे तप्ते न्यसेत्पक्वनवे घटे॥१०२॥
ततो मरिचचूर्णैलाखण्डचूर्णावचूर्णितम्।
कुर्यात्कर्पूरसंयुक्तं संयावममृतं स्मृतम्॥१०३॥
संयावममृतं स्वादु पित्तघ्नं मधुरं स्मृतम्।
वृष्य वातहरं हृद्य विपाके गुरु भाषितम्॥१०४॥
अमृत संयाव
क. विधि- समिता (मैदा) को मधु एवं दुग्ध में मर्दन-सुशोधन (भलीभाँति मसल
दशमोत्सवः २१३
कर), तश उत्तम घृत में पाक करें तथा नवीनघट में स्थापित करके, मरिच, एला,
खण्ड चूर्ण का सम्मिलन करें। तत्पश्चात् कर्पूर मिलाकर, यह आवृत करते हैं। इस
पदार्थ को 'अमृतसंयम' (अमृत गुजिया) नाम दिया गया है।
ख. गुण- १. मधुर (स्वादु) २. पित्तशामक
३. वृष्य ४. वातहर
५. हृद्य ६. गुरुविपाकी
अथ मधुशीर्षा-प्राज्यानिर्माणविधिः
मर्दयित्वा सुसमितामायुषोत्सवकः स्मृतः।
पक्वो घृते सितापङ्कैर्मण्डितो मधुशीर्षकः॥१०५॥
मधुशीर्षा (प्राज्या)
सुसमिता (उत्तम कोटिकी गेहूँ के आटे की बनी मैदा) को घृत में पाक करके,
खण्डपाक (शक्कर की चाशनी) में क्षेपण (सिलपङ्कमण्डितौ) करते हैं। इस पदार्थ को
'मधुशीर्षा' नाम दिया जाता है॥१०५॥
अथ मातुलुङ्गार्द्रकयुक्तमधुशीर्षकानां निर्माणविधिर्गुणाश्च
घृतेन मर्दिता तोये समितां मधुसंयुताम्।
मातुलुङ्गत्वचाखण्डसंयुक्तार्द्रकपूरिताम् ॥१०६॥
विधायोपूपकं तस्या गन्धाढ्यं शर्करान्वितम्।
पक्वं सर्पिषि तं सम्यङ्नाम्नाऽयं मधुशीर्षकः॥१०७॥
मधुशीर्षः सुमधुरो भव्यः पित्तानिलापहः।
सुष्टुवस्तुसुयोगेन हृद्यो रुच्योऽग्निकारकः॥१०८॥
विशिष्ट मधुशीर्षक
क. विधि- समिता (मैदा) मधु मिश्रित को घृत में मर्दन करके, जल के साथ
भलीभाँति मर्दित (मलकर) में निम्बू स्वरस मातुलुङ्गत्वचा तथा आर्द्रक खण्ड
सम्मिलित करें; फिर खण्ड (शर्करा) तथा सुगन्धित द्रव्यों से सुवासित करते हैं।
इसके अपूप (पुआ) बना सकते हैं, तथा घृत में पकाते हैं (पक्वं सर्पिषि)- इस
पदार्थ को 'मधुशीर्षक' (सम्यङ्नाम्नाऽयं मधुशीर्षकः) संज्ञा दी जाती है।
ख. गुण- १. सुमधुर २. भव्य (श्रेष्ठ)