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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 115

२२४ क्षेमकुतूहलम्
अन्नं गले विशति तस्य नरस्य तूर्णं
संगृह्यमाण इव राहुजवेन चन्द्रः ॥ ४ ॥
नारङ्गं तु वरं रुच्यं सुगन्धमतिचारुणम्।
वातघ्नं कफदं किञ्चित्पित्तघ्नं विशदं स्मृतम् ॥ ५ ॥
नारङ्गशुदबोधक (वर्धन) योग
क. विधि- बीज रहित नारंग केशर (फल दल), खण्ड तथा मरिच चूर्ण जो व्यक्ति
भक्षण करता है, उसके गले (कण्ठ) में अन्न शीघ्र प्रवेश कर जाता है (विशति
तल्य नस्य तूर्णम्), जैसे राहु के वेग से चन्द्र स्वयं ग्रहित हो जाता है
(संग्रहयमाण इव सहुजवेनचन्द्रः)।
ख. गुण- १. पाचकाग्नि तीव्र कारक (सुधाजनन) २. अन्नरुचिकारक (उत्तम)
३. सुगन्धित ४. अरुण (अतिसुन्दर)
५. वातघ्न ६. कफकारक
७. किंचित् पित्तघ्न ८. विशद
अथ जम्बीरभवक्षुद्बोधकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
विभावितं शुभ्रसिताभरीचै
रैलारजोभावनयाऽतिरुच्यम्।
जीवातवे तस्य नरस्य भोक्तु-
र्जम्बीरजं केसरमार्द्रयन्ति ॥ ६ ॥
जम्बीरः पाचनो हृद्यः कफवातहरः परः।
सुरभिर्दीपनो रुच्यो मुखवैशद्यकारकः ॥ ७ ॥
जम्बीर क्षुद्बोधक (वर्धन) योग
क. विधि- शुभ्रसिता, मरिच तथा एला चूर्ण से भावित जम्बीर निम्बूक के सर
(दल), का भक्षण करने वाले मनुष्य के जीवन हेतु औषध को सरस बनाने
वाला हे (जीवातवे तस्य नरस्य भोक्तु)।
ख. गुण- १. पाचन २. हृद्य
३. कफवातहर (परम्) ४. सुरभि
५. दीपन ६. रुच्य
७. मुखवैशद्यकारक
एकादशोत्सवः २२५
अथ बीजपूरकक्षुद्बोधकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
सैन्धवार्द्रकसंयुक्तं बीजपूरकमत्ति यः।
शाकिनीभिरिवाकृष्टं विशत्युदरमोदनम् ॥ ८ ॥
केसरं मातुलुङ्गस्य लघु श्लेष्मानिलापहम्।
रोचनं दीपनं हृद्यं गुल्मशूलार्शसां जयेत् ॥ ९ ॥
बीजपूरक क्षुद्वर्धन (बोधक) योग
क. विधि-बीजपूर निम्बूक का सेवन, सैंधव तथा आर्द्रक मिश्रित, का सेवन करने
से, उदर में शाकिनियों द्वारा आकृष्ट (खींचे जाने के समान), ओदन स्वयं उदर
में प्रवेश कर जाता है (विशत्युदरमोदनम्) - इस तरह यह प्रयोग पाचकाग्नि
तथा क्षुधा को तीव्रता प्रदान करता है।
ख. गुण- १. लघु २. श्लेष्मापिलापह
३. रोचन ४. दीपन
५. हृद्य ६. गुल्म
७. शूल ८. अर्श नाशक (६-८)
अथ बीजपूरकस्य षड्ऋतुभक्षणविधिनिरूपणम्
सिन्धूत्थेन घनागमे च सितया काले शरत्सातपे
हेमन्ते लवणाईहिङ्गुमरिचैः सिद्धार्थतैलान्वितैः।
एतैस्तैः शिशिरे मधावपि तथा ग्रीष्मे गुडेनान्यथा
सर्वान् दोषचयान् करोति नितरां द्राग्बीजपूरः सदा ॥ १० ॥
बीजपूरक-विभिन्न ऋतु सेवन
बीजपूरक निम्बूक (बिजौरानीबू) का षड्ऋतु भक्षण विधान का निर्देश (निम्नांकित-
रूपेण) किया गया है-परन्तु इसके विपरीत सेवन समस्त दोष प्रकोपक होगा-
१. वर्षाकाल : सैन्धव लवण
२. शरतकाल (आतप सहित) : सिता (शर्करा)
३. हेमन्त काल : सर्वपतैल युक्त लवण-आर्द्रक के हिंगु-मरिच
४. शिशिर
५. वसन्तकाल : समस्त द्रव्य
६. ग्रीष्मकाल : गुड़