क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
:
भृष्ट (2) जी (1) र (1) यु (1) तं (1) चा (1) थ (1) = 8 syllables!
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"भृष्टजीर्युतं" -> wait, look at the letter between 'जी' and 'यु':
Wait, is that 'र'?
Look at 'जी': it has 'ी' matra.
Then next is 'र्यु'? There is a repha over 'यु'! So it is printed as "भृष्टजीर्युतं".
Let's check line 35:
"तक्रं वातहरं रुच्यं शूलाध्मानार्शसां हितम्।"
Line 36:
"अग्निसंजननं श्रेष्ठं कफपित्तनिबर्हणम्॥८२॥"
Line 43:
"चूर्णान्वितं च तत्तक्रं धूयेद्धृतहिङ्गुना ॥८३॥"
Line 44:
"पार्वत्या विहितं तक्रं सर्वदोषनिबर्हणम्।"
Line 45:
"सुरुच्यं पाचनं दिव्यं महेशाय महाप्रियम् ॥८४॥"
Line 54:
"वातेऽम्लं सैन्धवोपेतं स्वादु पित्ते सशर्करम्।"
Line 55:
"पिबेतक्रं कफे चापि व्योषक्षारसन्व
२५४ क्षेमकुतूहलम्
२. पित्तजन्य रोग : शर्करा युक्त मधुर तक्र
३. कफजन्य रोग : त्रिकटु युक्त क्षारीय तक्र
तक्रप्रशस्तिः
अमरत्वं यथा स्वर्गे देवानांममृताद्भवेत्।
तक्राद्भूभौ तथा नृणाममरत्वं हि जायते॥८६॥
तक्र (प्रशस्ति) प्रशंसात्मक महत्ता
जैसे देव गुणों को स्वर्ग में अमृत सेवन से अरत्व प्राप्त होता है (अमरत्वं यथा
स्वर्गे देवानांममृताद्भवेत्) उसी प्रकार पृथ्वी पर निवासी मनुष्यों को तक्र से हो अमरत्व
की प्राप्ति होती है (तक्राद्भूभौ तथा नृणाममरत्वं हि जायते)॥८६॥
तस्मात्तक्रं नरैः सेव्यं सर्वदोषनिबर्हणम्।
क्षयं मूर्च्छा भ्रमं दाहं रक्तपित्तामयं विना॥८७॥
तक्र के गुण-कर्मादि इस प्रकार है—
१. क्षयरोग २. मूर्च्छा ३. भ्रम
४. दाह ५. रक्तपित्त (रोग-निषिद्ध)
इनके अतिरिक्त (१-५ रोगों से पीड़ित), प्रायः समस्तविकारों में तक्र सेवन
उपयुक्त है (तस्मात्तक्रं नरैः सेव्यं) जो सर्वदोषनिबर्हण (सर्वव्याधिहर) होता है॥८७॥
अथ अच्छिकानिर्माणविधि
गतचिरवासरतक्रं वस्त्रेणागालितं ससैन्धवक्षोदम्।
रुचिकरधूपप्रधूमैर्धूपितमरिचेण रोचनं भवति॥८८॥
अच्छिका
तक्र-दो तीन दिन का पर्युषित (वासी)- वस्त्रेण गालित (कपड़े से छानकर) में
सैंधव सम्मिश्रण तथा रुचिकारक धूपन द्रव्यों से प्रधूमित-सुगन्धित कर लेते हैं।
यह 'अच्छिका' आशुरूप से रोचन प्रभाव करती हैं। (रुचिवर्द्धक)॥८८॥
अथ काञ्जिकनिर्माणविधिः
धान्याम्लमच्छतरयामुनवारिहारि
शुण्ठीरजोलवणजीरकसंस्कृतं यत्।
द्वादशोत्सवः २५५
आवासितं सुरभिहिङ्कणेन यत्ना-
त्तेनाशुशुक्षणकणोऽधिकतां प्रयाति॥८९॥
काञ्जिक
यमुना जल आच्छतर (शुद्धहर/सदृश) में शुण्ठी-लवण-जीरक चूर्ण में सुगन्धित
हिंगु के प्रयोग से, धान्याम्ल (काञ्जी) का निर्माण करते हैं, जो (शीघ्र/अष्ट) गुणवान
अधिक रूप से हो जाता है। यह अमिश्रित द्रव प्रस्तुत है।
काञ्जिक निर्माण विधि
स्वच्छ मृत्तिका घट-सर्षप तैल आलेपित (अन्तरंग), शुद्ध जल परिपूर्ण करके,
राजिका, जीरक, लवण, हिंगु, शुण्ठी तथा हरिद्राचूर्ण क्षेपण कर, घट मुख अतिबद्ध-
दिवस त्रय पर्यन्त-रखते हैं, अन्त में द्रव को पृथक् (उपयुक्त पात्र-बोतल आदि)
संरक्षित कर लेते हैं॥८९॥
करमर्दककाञ्जिकनिर्माणविधिर्गुणांश्च
एलामहौषधिविभावितमाणिमन्थ-
संसिद्धमामकरमर्दककाञ्जिकं यत्।
मन्दं विवर्धयति जाठरकाग्निहोत्रं
निर्वाणदीपमिव गन्धकचूर्णयोगः॥९०॥
करमर्दककाञ्जिक
क. विधि- आम (अपक्व) करमर्दक, के साथ एला, शुण्ठी, सैंधव का सम्मिश्रण
करके कांजिक निर्माण करते हैं। यह जाठराग्नि मन्द होने पर, उसका विवर्धन
करता है, जैसे अग्निहोम के अवसर (प्रक्रिया) में निर्वाणदोष को गंधक चूर्ण का
संयोग (अग्नि को) प्रज्वलित करता है॥९०॥
यः काञ्जिकं पिबति योजितसैन्धवं च
निष्पीडिताईकरसाश्रितजीरकं च।
तस्याग्निरोदनघृतेन शमं न याति
प्रस्फारितैर्वडववारिधिवारिपूरैः॥९१॥
ख. गुण-प्रयोग- सैन्धव युक्त आर्द्रक स्वरस (निष्पीहीत)- जीरक सहित-कांजी
का सेवन (पान) करने से, भक्त (चावल का भात) तथा घृत के सेवन से मन्द
२५६ क्षेमकुतूहलम्
(शान्त) पाचकाग्नि, मन्दता को प्राप्त नहीं होती, जिस प्रकार वडवानल, प्रस्फुरित
जल प्रवाह के कारण शान्त (शमन) नहीं हो पाता।
काञ्जिकं रुचिदं हृद्यं स्वस्थस्याग्निकरं परम्।
वातहृद्बलदं श्रेष्ठं गुर्वाहारस्य पाचकम्॥ ९२॥
कांजिक रुचिकर या रुचिकारक, हृदय को बल देने वालों (हृद्य), स्वस्थ व्यक्ति
की पाचकाग्नि को परम अग्निकर बनाती है॥९२॥
अथ गव्यवासाधिकस्य निर्माणविधिः
उदकरसनिवृत्तंगोमयाग्नौ विपक्वं
नवदलघनसारैर्वासितं बष्कयिण्याः।
पटमिलितसुखण्डं स्थापितं नव्यपात्रे
विगतरससुधांशो गीयते वासधिक्यः॥ ९३॥
गव्य वासाधिक
गोदुग्ध (बरकमिण्या-एक वर्ष की प्रसूता गौ से प्राप्त) को गोमयाग्नि पर
उदकरस निवृत्त (जल जल जाने तक) दुग्ध में, नवीन बल कर्पूर से सुगन्धित
नवमृत्तिकापात्र में स्थापित करें तथा वस्त्रमलित (कपड़े से छान) कर, सुखण्ड (शर्करा)
का मिश्रण करते हैं।
इस रीति से निर्मित 'गव्य वासधिक रस' अमृत का अंश माना जाता है (विगत)
ससुधांशोगीर्यते वासधिक्यः)॥९३॥
अथ महिषीदुग्धजवासाधिकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
क्षीरं माहिषसंभवं घनतरं संपाचितं वह्निना
कारीषेण सुवासितं धुसृणकैः संस्थापितं मृन्मये।
पात्रे नव्यतरे सुधूपविहिते भुञ्जन्ति ते मानवा
यैराराधि सितासितोदकरतैर्माघे सदा माधवः॥ ९४॥
वासाधिका सुमधुरा वृष्या मेदःप्रदा गुरुः।
सुस्निग्धा बृंहणी बल्या सुशीता तृप्तिकारिणी॥ ९५॥
महिषीदुग्धजवासाधिक
क. विधि- महिषी दुग्ध (भैंस के दूध) को करीषाग्नि (उपलों की आग पर) घनतर
द्वादशोत्सवः २५७
(गाढ़ा) करके, कर्पूर से सुगन्धित करते हैं, फिर हींग (धुसृण) आदि से सुगन्धित
नवीन मृत्पात्र में रखकर, वासाधिक का निर्माण कर लेते हैं।
इस रीति से प्रस्तुत वासाधिक की व्यक्ति द्वारा सेवन करने से, माघ मास में (गंगा-
यमुना जल में स्नान करके) माधव (भगवान श्रीकृष्ण) की आराधना रत होते हैं।
ख. गुण- १. सुमधुर २. वृष्य
३. मेदःप्रदा ४. गुरुः
५. सुस्निग्ध ६. बृंहिणी
७. बल्या ८. सुशीता
९. तृप्तिकारिणी
अथ करम्भकस्य निर्माणविधिर्गुणाश्च
सुशीतं क्रियते भक्तं दध्याढ्यं दुग्धकावधि।
नातिद्रवं नातिसान्द्रं मिश्रितं तत्करम्भकम्॥ ९६॥
करम्भसंज्ञा ये भक्ष्या हृद्याः शीतातिपुष्टिदाः।
अत्यर्थं मनुजैः सेव्याः शरत्कालनिदाघयोः॥ ९७॥
करम्भक
क. विधि- दध्याढ्य दुग्ध (दूध का दही बनना) में भक्त (चावल का भात) भिक्षेपण
करके, न अधिक सान्द्र (गाढ़ा)- न अधिक द्रव (पतला) पदार्थ बना लेते हैं-
इसको 'करम्भक' कहा जाता है (अर्थात् यह दधिमिश्रित भक्त का स्वरूप है)।
ख. गुण- १. हृद्य २. शीत
३. अतिपुष्टिदा ४. शरद्
५. ग्रीष्म
करम्भसंज्ञक पदार्थों के सामान्य गुण-कर्म इस प्रकार हैं- इस प्रकार ऋतुओं में
अधिक सेवन योग्य मनुष्यों द्वारा (सत्तू दधि मिश्रण की संज्ञा भी करम्भक)।
अथ भोजनान्ते शुद्धदुग्धसेवनविधानम्
गव्यं वा माहिषं क्षीर कारिषानलपाचितम्।
शोषितं षड्विभागेन कदुष्णं प्राशितं बुधैः॥ ९८॥
१५८ क्षेमकुतूहलम्
भोजनान्तर दुग्ध प्रयोग
गौदुग्ध या माहिष दुग्ध-करीषाग्नि (उपलों की आग) पर पक्व तथा षड्भाग
शोषित, कदुष्ण या सुखोष्ण, भोजन करने के पश्चात् (अन्त में) विज्ञ (बुद्धिमान)
मनुष्य को दुग्ध सेवन (पान) करना चाहिए।।९८।।
बहुधा पटसम्पूतं नव्ये पात्रे सुपाचितम्।
सनागरमजादुग्धं सुसिद्धारुणवर्णकम् ।। ९९ ।।
अजादुग्ध सेवन
पटसंपूत (वस्त्र से छानकर), नव्य मृत्तिकापात्र में अजादुग्ध (बकरी के दूध) में
शुण्ठी मिश्रित कर पाकोपरन्त अरुण वर्णीय हो जाने पर- सुखोष्ण पान करना चाहिए।
गव्यं सुशीतलं क्षीरं स्निग्धं गुरु रसायनम्।
अल्पाभिष्यन्दकृद्रक्तपित्तघ्नं वातनाशनम् ।। १०० ।।
१. सुशीतल २. स्निग्ध ३. गुरु
४. रसायन ५. अल्पाभिष्यन्दी ६. समपित्तनाशक
७. वातनाशक
महिषदुग्धस्य गुणाः
माहिषं मधुरं स्निग्धं सुशीतं बृंहणं गुरु।
निद्राकरं मतिहरं स्तोकमग्निप्रबोधकम् ।। १०१ ।।
माहिष दुग्ध
गुण-
१. मधुर २. स्निग्ध ३. अतिशीतल
४. बृंहण ५. गुरु ६. निद्राकर
७. मतिहर ८. अग्नि प्रबोधक (स्तोक)
अथ दुग्धस्य गुणाः
आजं लघुतरं क्षीरं कासश्वासनिबर्हणम्।
दीपनं शोषिणां पथ्यं गव्यदुग्धगुणावहम् ।। १०२ ।।
द्वादशोत्सवः २५९
आजदुग्ध
गुणा-
१. लघुतर २. कास ३. श्वास
४. क्षय (नाशक २-४) ५. दीपन ६. शोष रोगियों को पथ्य
७. गव्य दुग्ध समान गुणवान्
कालक्रमेण वयःक्रमेण च पीतदुग्धस्य गुणाः
वृष्यं बृंहणमग्निदीपनकरं पूर्वाह्नकाले पयो
मध्याह्ने बलवर्धनं कफहरं पित्तापहं दीपनम्।
बाले वृद्धिकरं क्षये क्षयहरं वृद्धेषु रेतोवहं
रात्रौ पथ्यमनेकदोषशमनं क्षीरं सदा चाक्षुषम् ।। १०३ ।।
काल-आयु क्रमानुसार दुग्ध सेवन
अ. प्रातःकाल : बल्य, बृंहण, वृष्य
आ. पूर्वाह्ण : बल्य, कफ-पित्तनाशक, दीपन
इ. बाल्यावस्था : देह वृद्धिकर
ई. क्षीणावस्था : क्षयहर
उ. वृद्धावस्था : वीर्यवर्धक
ऊ. रात्रिकाल : पथ्य (सदैव), अनिक दोषशमन, चक्षुष्य
अथ खाण्डवनिर्माणविधिर्गुणाश्च
कोलामलकजं चूर्णं शुण्ठ्येलाशर्करान्वितम्।
मातुलुङ्गरसेनोक्तं शोषितं सूर्यरश्मिभिः ।। १०४ ।।
एवं तु बहुशोऽभ्यक्तं शोषितं च पुनः पुनः।
ईषल्लवणसंयुक्तं चूर्णं खाडवमुच्यते ।। १०५ ।।
खाण्डव
क. विधि- कोल (बदर) तथा आमलक (धात्री) चूर्ण में शुण्ठी-एला (चूर्ण) तथा
शर्करा मिश्रितकर, मातुलुंग (बीजपूर) स्वरस से प्लावित सूर्य रश्मि में शोषित
(मुहुर्मुहु) का चूर्ण सैन्धवयुक्त बनाये। इसको 'खाण्डव' कहा जाता है।
२६० क्षेमकुतूहलम्
ख. गुण- १. मुखवैशद्यकर २. रुचिधारक
३. हृद्रोगशमन ४. मुखवैरस्य नाशन
अथ भुक्तोच्छिष्टान्नदानविधानम्
खाडवं मुखवैशद्यकारकं रुचिधारकम्।
हृद्रोगशमनं चेति मुखवैरस्यनाशनम्॥ १०६॥
मुद्भुक्तोच्छिष्टमन्नं तु भुञ्जन्तु पित्तरोऽधमाः।
तेषामन्नं मया दत्तमक्षय्यमुपतिष्ठतु॥ १०७॥
भुक्तोच्छिष्टान्न विधान
अ. मेरे भोजन (के उपरान्त) अवशिष्ट/ उच्छिष्ट अन्न भाग (अंश) का अधम
पितृगण ग्रहण करें ऐसी धारणापूर्वक विधान है॥१०६-१०७॥
रौरवेऽपुण्यनिलये पद्माम्वुधिनिवासिनाम्।
प्राणिनामुदकं ह्येतदक्षय्यमुपतिष्ठतु॥ १०८॥
आ. शंख संज्ञक अपुण्य स्थान में पद्माम्वुधि में निवासी प्राणियों को अक्षय्य उदक
प्रदान करता हूँ- इसे ग्रहण कीजिए॥१०८॥
अथाचमनोदकपानविधानं गुणाश्च
काले धाराधराणां निपटततितरां व्योम्नि वारिप्रपूर्णे
स्वच्छं त्वम्भोजवृन्दद्युतिमतिसरसि त्वानवीनाच्च कुम्भात्
पूर्णोदानीयमम्भः प्रतिदिनममलं न्यस्तकर्पूरसारं
भुङ्क्ते संसेव्यमानं नृपवरशुचिदं वारि चारोग्यकारि॥ १०९॥
आचमनोदक पान
मेघ कमल समूह (जलपूर्णाकाश) प्रकाशमान् सरास में पतित स्वच्छ जलको नव
घट से प्राप्त- कर्पूर सुगन्धित जल- का पान (सेवन) करते हुए आहार ग्रहण करते
हैं- ऐसा जलपान नृपों को शुचि-पवित्रता तथा आरोग्य प्रदान करता है॥१०९॥
अथेषिकाखण्डकस्य विधानं गण्डूषकरणस्य फलञ्च
दन्तनिष्कोषणं कार्यं रोहिषस्य शलाकया।
ततो गण्डूषकरणमास्योच्छिष्टविशुद्धये॥ ११०॥
द्वादशोत्सवः २६१
इषिका खण्डक विधि
भोजनोपरान्त रोहिण शलाका से दन्त-मध्य को स्वच्छ करें। (दन्त निष्को वर्ण);
फिर उच्छिष्ट मुख की विशुद्धि हेतु गण्डूष धारण करते हैं॥११०॥
अथ जानुस्पर्शनविधानम्
मा करेण करं पार्थ मा गण्डौ मा च चक्षुषी।
जानुनी स्पृश राजेन्द्र भर्तव्या बहवो यदि॥ १११॥
जानुस्पर्शनम्
हे! राजेन्द्र, यदि प्रजा का पालन-पोषण (भर्तव्या बहनो यदि) करने की
अभिलाषा है, तो अपने हाथों (या करेण कर) से हाथ, (हस्त), उभार गण्डस्थल तथा
उभय (दोनों) नेत्रों का स्पर्श नहीं करके, इसके स्थान पर उभय जानु का स्पर्श करना
चाहिए॥१११॥
अथचमनान्ते करमर्दनचन्दनस्य विधानम्
कृष्णागुरुप्रभृतिकैरतिसौरभैश्च
कर्पूरसाररजसाऽऽचमनान्तमुच्चैः।
आराधितत्रिपुरवैरिपदाम्बुजानां
भुक्तावसानकरमर्दन चन्दनं स्यात्॥ ११२॥
करमर्द चन्दनम्
कृष्णागुरु प्रभृति सुगन्धि द्रव्य तथा कर्पूरसार के चन्दन से आचमन करे, उसके
अन्त में त्रिपुरवैरि (भगवान् शंकर) का पूजन (पदाधुजानाम्) करने के उपरान्त,
अयोजन के अन्त में, करमर्दन चन्दन किया जाना चाहिए॥११२॥
अथ भोजनपरिणामार्थश्लोकपाठविधानम्
भोजनान्ते हि सद्भिप्रस्वेतद्वाक्यानि वै पठेत्।
आहारपरिणामार्थमायुर्वृद्धिकराणि च॥ ११३॥
भोजन से परिपाकवार्थ ईश्वर प्रणधान
स्वेत् विप्र (सुब्राह्मण) द्वारा गृहीत आहार का सम्यक् पाचन (परिणाम) के उद्देश्य
से मन्त्र (श्लोक) सत् वाक्यों को भोजनान्त में पाठन (उच्चारण) करना अपेक्षित
है॥११३॥
पृष्ठ २६२
२६२ क्षेमकुतूहलम्
नेत्रशक्तिवर्द्धकोमन्त्रः
शर्यातिं च सुकन्यां च च्यवनं शक्रमश्विनौ।
भोजनान्ते स्मरेद्यस्तु चक्षुस्तस्य न हीयते ॥११४॥
चक्षुष्यमन्त्र
शर्याति, सुकन्या, च्यवन, इन्द्र, अश्विनौ, (उभयकुमार) को स्मरण करने से नेत्र
(दृष्टि) शक्ति वृद्धि होती है॥११४॥
भोजनस्य परिपाकाय मन्त्रः
अगस्त्यं कुम्भकर्णं च शनिं च वडवानलम्।
आहारपरिणामार्थं संस्मरेच्च वृकोदरम् ॥११५॥
भोजन सुपरिपाक विधान
अगस्त्य मुनि, कुम्भकर्ण, (रावणभ्राता) शनैश्चर, बडवानल एवं वृकोदर
(भीम) का आहार का परिणाम (पाचन) हेतु भोजन के अन्त में स्मरण करना
चाहिए॥११५॥
विष्णुः समस्तेन्द्रियदेहदेही प्रधानभूतो भगवान् यथैकः।
सत्येन तेनान्नमशेषमेतदारोग्यमन्तं परिणाममेतु ॥११६॥
समस्त इन्द्रियाँ शरीर की आत्मा एक ही प्रधानभूत भगवान् विष्णु है- इसे सत्य
(स्मरण करने) के कारण आरोग्य प्राप्ति- निर्व्याधि अवस्था-शरीर को हो सके, तदर्थ
(भगवान विष्णु) का स्मरण किया जाना हितकर है॥११६॥
इत्यादिबहुवाक्यानि भोजनान्तेषु यः पठेत्।
स भवेद्वल्लभो राज्ञां चायुरवाप्नुयात् ॥११७॥
इस प्रकार (पूर्वोक्त) सदवाक्यों- मन्त्रों-स्मरणीय वचनों आदि का जो व्यक्ति
पाठन करता है, वह भोजनार्थी एवं सदोच्चारण के कारण, राजवल्लभ (राजाओं का
प्रिय) हो जाता है, तथा राजा स्वयं दीर्घायुष्य का लाभ प्राप्त करता है (राजा
आयुरवाऽप्नुयात्)॥११७॥
अथ ताम्बूलभक्षणविधानम्
ताम्बूलं स्वर्णवर्णं क्रमुकफलयुतं साग्रमग्र्यं गृहीतं
कर्पूरैणाण्डजाभ्यां कृतखदिरवटीसौरभेणातिपूर्णम्।
पृष्ठ २६३
द्वादशोत्सवः २६३
चूर्णं ग्रावानुजातं शशधरकिरणप्रोज्ज्वलं तेन सार्कं
दत्त्वा विप्राय पूर्वं तदनु नरपतिर्भक्षयेदामदत्तम् ॥११८॥
ताम्बूल भक्षण
स्वर्ण वर्णिय अग्रभाग समान (सहित) ताम्बूल, में पूगखण्ड (क्रमुक), कर्पूर
एवं कस्तूरी मिश्रित सुगन्धित खदिर वटी (कत्था) तथा चन्द्र किरण समान चूर्ण (चूना)
रखकर सर्वप्रथम राजा ब्राह्मण (द्विपु) को प्रदान करे, फिर विश्वस्त व्यक्ति (आप्तदत्तम्)
द्वारा प्राप्त, राजा से स्वयं (नरपतिर्भक्षयेत्) चर्वण (भक्षण) करना चाहिए॥११८॥
अथाजीर्णोपशमनद्रव्याणि
विरुद्धाध्यशनात्यर्थचिन्ताविण्मूत्रधारणात् ।
असात्म्यभोजनाद्द्वेषात्क्रोधात्स्वप्नविपर्ययात् ॥११९॥
इत्यादिकारणैर्जन्तोर्यदा त्वन्नं न पच्यते।
तदाऽन्नपरिपाकार्थमेतद्द्रव्यान्तरं भजेत् ॥१२०॥
पिष्टान्ने सलिलं प्रियालफलजे पथ्या हिता मांसजे
क्षीरे गव्यभवे च तक्रमुचितं मोचाफलं सर्पिषि।
नारङ्गे गुडभक्षणं च कथितं मत्स्योद्भवे काञ्जिकं
गोधूमेऽपि च कर्कटी हितेतरा शेषाणि बुद्ध्या भजेत् ॥१२१॥
अजीर्ण निवारण विधानम्
क. अजीर्ण के हेतु आहार-विहार
१. विरुद्ध भोजन २. अध्यशन ३. अतिचिन्ता
४. असात्म्य भोजन ५. द्वेष ६. क्रोध
७. निद्रा विपर्यय ८. अन्य कारण
ख. अजीर्ण का शमन
१. पिष्टान्न : जल २. मांस : हरीतकी ३. गोदुग्ध : तक्र
४. घृत : कदली ५. नारंग : गुड़ ६. मत्स्य : कर्कटी
अन्य द्रव्यों (आहार-विहार) से उत्पन्न अजीर्ण की स्थिति में (शेषाणि बुद्ध्या
भजेत) स्वबुद्धि/ आवश्यकतानुसार उपयुक्त पाचक द्रव्यों/ उपायों का अनुसरण/
प्रयोग हितकर होता है।
२६४ क्षेमकुतूहलम्
ग्रन्थकर्तृवंशवर्णनम्
वंशोऽयं किमु वर्ण्यते सुविमलो नानागुणैरुन्नतो
यत्रैकेन विभीषणश्च भिषजा नीरोगतामाप्तवान्।
श्रीरामादपरेण या सुविदिता लब्धा ह्यकोलापूरी
ग्रामा द्वादश एव चान्यविदुषा लब्धा हि दिल्लिश्वरात्॥१२२॥
ग्रन्थ कर्त्ता-वंश वृत्त
अनेक गुणों से उन्नत तथा सुविमल ग्रन्थकार के वंश का क्या वर्णन किया जा
सकती है अर्थात् उनका वंश अत्युत्तम है। जिस वंश के एक वैद्य (भिषक्) विभीषण
को रोग से विमुक्ति की थी (निरोगता)। एक अन्य चिकित्सक ने भी राम के द्वारा
सुप्रसिद्ध अकोलापुरी को प्राप्त किया था। उसी वंश के अन्य विद्वान (विदुषा) ने दिल्ली
नरेश (दिल्ली खर) से बारह ग्राम (ग्रामा द्वादश) प्राप्त किये थे॥१२२॥
पुत्राः क्षेमभिषग्वरस्य षडिमे नानागुणैरुन्नता
गोपालो शिवपालमाधववरौ नारायणस्त्वद्भुतः।
रामो लक्ष्मणसंज्ञकः सुविदिताः संवत्सराणां शत
जीव्यासुः पृथीतलेऽतिसुखिनो नित्योत्सवैरुत्सुकाः॥१२३॥
भिषखर (चिकित्साकों) में श्रेष्ठ-उत्तम गुणों से युक्त छह (षडिमे) पुत्र हुए-
गोपाल, शिवपाल, माधववर, अद्भुत सम्पन्न नारायण, राम तथा लक्ष्मण। यह समस्त
पृथ्वी पर अतिसुखी, नित्यप्रति अनेक उत्सवों से प्रसन्न (नित्योत्सवैरुत्सुकाः) रह कर
ख्यातनामा थे॥१२३॥
प्रजाक्षेमकृता क्षेमशर्मणा वंशपद्धतिः।
स्वकीया स्वयमावर्त्य वर्णविन्यासशालिना॥१२४॥
वर्णों को यथास्थान चुनावपूर्व स्थापित-कुशल (कवि) वर्णविन्याशाली-क्षेम शर्मा
वे स्वयं स्ववंश परम्परा का परिचर्या, प्रजाक्षेम (प्रजाओं-जनमानस के कल्याणार्थ)
प्रस्तुत था॥१२४॥
परदोषकथास्वनादरा बहवः सन्त्यवनौ सुसज्जनाः।
इति चेतसि सन्निधाय यत्क्रमेवाद्रियतां तदार्यकैः॥१२५॥
इस पृथ्वी पर बहुत से सज्जन (बहवः सत्यवनौ सुसज्जनाः) अन्य व्यक्तियों के
द्वादशोत्सवः २६५
दोषों पर ध्यान नहीं देते (परदोषकथास्वनादरा), इस धारणा को मन में रखकर (चेतसि
सन्निधाय), जो कुछ मैंने लेखन ग्रन्थ रूप में किया है, इसका सम्मान आर्यजन (यत्कृत
मेवाद्रियतां तदार्यकैः:) को करना चाहिए, ऐसी आशा (विश्वासपूर्वक) है॥१२५॥
नन्दन्तां नीतिभाजः सकलवसुमतीजातयः पान्तु विश्वं
दुर्हत्ता यान्तु नाशं भवतु वसुमती सस्यसंपन्नदेशा।
नीरं यच्छन्तु मेघाः कलयतु सुकविः काव्यकौशल्यलीला-
मव्यादव्याजभाजं परिहतदुरितं क्षेमशर्माणमीशः॥१२६॥
नीति का पालन कर्त्ता (नीतिभाज नन्दताम्), समस्त पृथ्वी पर निवास करने वाले
संसार का पालन करें (सकलवसुमतीजातयः पान्तु विश्व), दुर्जन नष्ट हो जायें (दुर्हत्ता
यान्तु नाशं भवतु वसुमती सस्यसंपन्नदेशा), मेघ जल की वर्षा करें (नीरं यच्छन्तु मेघाः
कलयतु), सुकवि काला कुशलता की लीला प्रगट करें (सुकविः काव्यकौशल्यलीलाम-
व्याजभांज परिहत दुरितं) तथा भगवान् शिव शंकर का निष्कयोजन (निष्कास) भजन
कर्त्ता निष्पाप क्षेम शर्मा (क्षेमशर्माणमीशः) की सुरक्षा प्रदान करें।
बाणाकाशसुते नादे (१६०५) वत्सरे विक्रमाङ्किते।
ऊर्जे शुक्लत्रयोदश्यां ग्रन्थः पूर्णोऽयमैन्दवे॥१२७॥
इति श्रीनरवैद्यमन्थात्मजक्षेमशर्माविनिर्मिते क्षेमकुतूहले ग्रन्थे
गोरसपानकादिप्रशंसनो नाम द्वादशोत्सवः॥१२॥
विक्रम संवत्सर सौलह सो पाँच (१६०५) कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी सोमवार के
दिन यह ग्रन्थ ने पूर्णता को प्राप्त किया॥१२७॥
इति हिन्दी व्याख्या सहित क्षेमकुतूहल का गोरस-पानक निर्माण-
वर्णननामक बारहवां उत्सव समाप्त॥
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