क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ क्षेमकुतूहलम्
मधुरा तर्षवातघ्नी सरा छर्दिविनाशिनी।
एवं प्रियालखर्जूरशर्करानालिकेरकैः।
द्राक्षया च सुपुर्यास्तु पूरिकाः पूर्ववत्पचेत्॥ ११८॥
बदरचूर्णपूरिका
क. विधि- कणिका (मैदा) में घृत मिश्रित कर, बदर फल चूर्ण (पंचमांश)
सम्मिलित करके (जल में घोलकर) मर्दन कर लेते हैं (जलेनालोड्य पीडयेत्),
फिर इस द्रव्य की पूरिका (पूड़ी) बनाकर, घृत में पकाते हैं, जिससे खजुपाक
(चाशनी) से प्रलिप्त कर लेते हैं (विलेहिता)। इस व्यंजन को 'बदरचूर्ण पूरिका'
कहा जाता है।
ख. गुण- १. स्निग्ध २. पित्तहरा
३. हिम (शीतल) ४. मधुर
५. तर्पण ६. वातघ्नी
७. सरा ८. छर्दिविनाशिनी
ग. वैशिष्ट्- इस रीति से प्रियाल, खर्जूर, शर्करा, नालिकेर, द्राक्षा को मिलाकर,
पूरिका (पूरी) का निर्माण किया जाता है।
अथ चणकपूरिकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
त्रिभागं चाणकं चूर्णं गोधूमस्यैकभागकम्।
यवानीहिङ्गुलवणैः सार्धं तैले विपाचिता॥ ११९॥
कटुके कफवातघ्नी रुच्या वह्निप्रबोधिनी।
चणक पूरिका
क. विधि- चणक (चना) का चूर्ण (त्रिभाग चाणक चूर्ण), गोधूम चूर्ण (एक
भाग)- इनको सम्मिश्रित करके, यवानी-हिंग-लवण के साथ जल में सावते
(मर्दन) करते यहाँ लेते हैं)। इस द्रव्य से पूरिका (पुड़ी) के आकार को बनाकर,
तैल में विपाचन (पकाते हैं) करते हैं। इस रीति से 'चणक पूरिका' का निर्माण
हो जाता है।
ख. गुण- १. कटु(क) २. कफवाघ्नी
३. रुच्या ४. वह्निबोधनी
दशमोत्सवः २१७
अथ धारापूपकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
घृतोन्मिश्रा कणिकाया दुग्धेनालडिता तुमा।
धाराख्यापूपकं स्वाज्ये पक्वं खण्डेन योजयेत्॥ १२०॥
आपूपकं सुमधुरं वृष्यं पित्तहरं परम्।
सुस्निग्धं रोचनं हृद्यमत्यर्थं वातनाशनम्॥ १२१॥
धारापूपक
क. विधि- कणिका (मैदा) घृत मिश्रित- को दुग्ध में शर्करा के साथ आलोड़ित
(घोलकर) घ