क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
पृष्ठ 118, कुल 136 में से
संदर्भ में पढ़ें२३० क्षेमकुतूहलम्
आमलक फल योग
क. विधि- ज्वलन्त अग्नि शिला के समान धात्री फल (आमलक) को स्निग्ध पात्र
में छोड़कर भृष्ट हिंगु, हरिद्राचूर्ण, सर्षप तैल, सैन्धव त्रिकटु (व्योष) का चूर्ण
सम्मिलित करते हैं। कुछ दिनों में (संश्लिष्ट जातपाकम्) सुगन्धित (सौरभाढ्य)
फल प्रस्तुत हो जाते हैं।
ख. वैशिष्ट्य- इस प्रकार के आमलक फल (धात्री) के स्वाद (स्वादानुवाद) ईश्वर
भी करने में समर्थ नहीं हो पाते (वरी नेश्वरः कस्तदन्यः), तब अन्य लोगों का
नाश में नहीं होगा।
हन्ति पित्तं तु माधुर्यात् कफं तिक्तकषायतः।
वायुमम्लप्रभावत्वाद्धात्री दोषत्रयापहा ॥ २८ ॥
ग. गुण- १. पित्तनाशक (माधुर्यात्) २. कफघ्न (तिक्तकषायता)
३. वातघ्न (अम्लप्रभावात्) ४. त्रिदोषहार
अग्निसंजननं द्रव्यमुक्तमेकादशोत्सवे।
यदग्निपोषकं वस्तु क्षीरतत्क्रमथोच्यते ॥ २९ ॥
इति श्रीनरवैद्यमन्मथात्मजक्षेमशर्माविनिर्मिते क्षेमकुतूहले ग्रन्थे
क्षुद्बोधकवस्तुप्रशंसनो नामैकादशोत्सवः ॥११॥
उपसंहारात्मक रूपरेखा
एकादश उत्सव में आतिसंजनन द्रव्यों (पदार्थों-योगी-व्यंजनों आदि) का वर्णन
किया गया है। आगामी द्वादशोत्सव में अग्नि पोषक वस्तुओं तथा क्षीर एवं तक्रनिर्मित
द्रव्यों का प्रतिपादन किया जायेगा।
इति हिन्दी व्याख्या सहित क्षेमकुतूहल का क्षुद्बोधक पदार्थ-
वर्णन नामक ग्यारहवां उत्सव समाप्त।
अथै द्वादशोत्सवः
(द्वादश प्रकरण)
अथ गोरसपानकादिकथनम्
अथ चन्द्रप्रभा-क्षीरिकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
शुभेऽर्धक्वथिते दुग्धे घृताक्तान् तन्दुलांन्यसेत्।
संसिद्धा मधुसंमिक्ता क्षीरी चन्द्रप्रभा भवेत् ॥ १॥
कुङ्कुमं च विनिक्षिप्य पचेत्पीतत्वहेतुना।
चन्द्रप्रभाकृतिः क्षीरी रक्तपित्तविनाशिनी ॥ २॥
विष्टम्भजननी बल्या धातुपुष्टिप्रदायिनी।
गोरस (दुग्ध) विभिन्न प्रकार तथा दुग्धमिर्र्नित व्यंजनादि
चन्द्रप्रभा-सीरिका
क. विधि- अर्धपक्व दुग्ध में घृत तलित तन्दुल का पाक करते हैं, फिर मधु का
सम्मिश्रण करे। यह चक्रवत् प्रभायुक्त क्षीरिका (खीर) बन जाती है। (संसिद्ध)।
यदि इस (क्षीरिका) को पीत वर्ण की प्रस्तुह करना है। तब कुङ्कुम (केशर)
मिश्रित कर पाक करते हैं।
ख. गुण-
(चन्द्रप्रभाकृति क्षीरी) १. रक्तपित्त विनाशिनी २. विष्टम्भव-जननी
३. बल्य ४. धातुपुष्टिदायक
अथ राजपायसनिर्माणविधिर्गुणाश्च
निर्नीरपाचितपयः प्रहिताष्टभागं
श्यामाकतन्दुलनवं निभृतान्तरोष्मा।
तत्यायसं सरसमावसथं सुधायाः
को लेढि भूपतिमृते घृतखण्डसाकम् ॥ ३ ॥
पायसं दुर्जरं बल्यं धातुपुष्टिविवर्धनम्।
विष्टम्भननं हन्ति रक्तपित्ताग्निमारुतान् ॥ ४ ॥