क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२० क्षेमकुतूहलम्
अथ कर्पूरनालिकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
ततः कृता पोलिकेव पीठके चतुरस्रिका ॥ १३३॥
वेष्टयेत्पक्वखण्डे द्वे पार्श्वभ्यां चतुरङ्गुले।
ततस्ते नालिके ह्येते चित्रयेदथ पाचयेत् ॥ १३४॥
घृतेऽथ तत आकृष्य कर्पूरेण नलीद्वयम् ।
पूरितं घृतखण्डाभ्यां कर्पूरी नलिका भवेत् ॥ १३५ ॥
कर्पूरनालिका
कणिका (गेहूँ के चूर्ण) में घृत तथा उचित मात्रा में जल मिलाकर-मर्दन करके
पिण्ड बनाते हैं, इस पीठ को चौकोर, सछिद्र (पोली) बनायें, इसमें दोनों पार्श्वों से चार
अंगुल पक्व खण्ड का आवेष्टन करते हैं, दोनों नलिकाओं को चित्रित करते हैं तथा घृत
में पाक कर लेते हैं, फिर उसे खींचकर (आकृतय) कर्पूर, घृत एवं खण्ड (शर्करा) से
पूरण करते हैं। इस व्यंजन को 'कर्पूरनलिका' कहा जाता है॥१३३-१३५॥
अथामृतनालिकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
किञ्चित्कणीकया युक्ता नष्टदुग्धमयी च सा।
कृता कर्पूरनालीवत्सैवामृतनली मता ॥ १३६॥
कूर्परनालिका बल्या वृष्या पित्तानिलापहा।
पुष्टिदारुचिदा स्निग्धा गुर्वी सन्धानकृत्सरा ॥ १३७॥
अमृतनालिका
क. विधि- कणिका (मैदा) में नष्टदुग्ध (छैना) अल्पमात्रा में मिलाकर, मर्दन
करके, 'कर्पूरनलिका' के समान बनाते हैं, इसे घृत में पाक करते हैं- खण्ड
पाक (चाशनी) से आवेष्टन किया जाता है। इस व्यंजन को 'अमृतनलिका'
नाम हैं।
ख. गुण- १. बल्या २. वृष्या
३. पित्तानिलापहा ४. पुष्टिदा
५. रुचिदा ६. स्निग्धा
७. गुर्वी ८. संधानकृत
९. सरा
दशमोत्सवः २२१
अथ कासारनिर्माणविधिर्गुणाश्च
घृते तप्ते विनिष्क्षिप्य कणिकां पाचयेन्मनाक्।
ततस्तत्र विनिष्क्षिप्य खण्डं भागसमं पचेत् ॥ १३८ ॥
ततश्चाकृष्य तत्पात्रे क्षिप्तं सम्यक्सुचिक्कणे ।
चतुरस्त्रीकृतं ह्येतद्भवेत्कासारसंज्ञकम् ॥ १३९॥
कासारं रुचिरं श्रेष्ठं नातिरूक्षं न पिच्छिलम् ।
हृल्लासकफपित्तघ्नं विरूचौरुचिकारकम् ॥ १४०॥
पूर्ववन्माषशृङ्गाटकसेरूणां पृथक्पृथक् ।
शालूकस्य च कर्तव्यं कासारं खण्डसर्पिषा ॥ १४१ ॥
कासार
क. विधि- कणिका (गोधूम चूर्ण) की तप्तघृत में पका (भून) कर, खण्ड (शर्करा)
एकभाग (भाग सम) का निक्षेपणकर पाक करते हैं, इसको स्निग्ध पात्र (सुचिक्कण)
में स्थापित कर दे तथा चौकोर (चतुरस्त्रीकृत) बनायें। इस पदार्थ को कासार
(कसार) कहते हैं।
ख. गुण- १. रुचिर २. श्रेष्ठ
३. अल्परूक्ष ४. अल्पस्निग्ध
५. हल्लासहर ६. पित्त शामक
७. रुचिर
ग. वैशिष्ट्य- माष, शृंगाटक, कशेरुक एवं शालूक का कासार- खण्ड एवं सर्पि
मिलाकर-निर्माण किया जा सकता है।
अथ सेविकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
कणिकावर्तिकाः कृत्वा सुसूक्ष्मा यवमात्रिकाः।
सुशुष्का भक्तवत्पाच्या भोज्या खण्डघृतान्विताः ॥ १४२ ॥
सेदिकेति समाख्याता गुर्वी पित्तानिलापहा।
सन्धानजननी सेव्या श्रावण्यां स्तोकमात्रया ॥ १४३॥
पक्वान्नं यदिह ज्ञातं तदुक्तं दशमोत्सवे ।
क्षुद्बोधनजनकं वस्तु किञ्चिदाचक्षतेऽधुना ॥ १४४ ॥
इति श्रीनरवैद्यमन्मथात्मजक्षेमशर्माविनिर्मिते क्षेमकुतूहले ग्रन्थे
पक्वान्नप्रशंसनो नाम दशमोत्सवः ॥ १० ॥
क्षे. कु. 15