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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ २३६

२३६ क्षेमकुतूहलम्
२. दधि का सेवन (यदि करना है-सं. १) सूपक (दाल के साथ मिलाकर) मिश्रित
भक्षण कर सकते है।
३. दधि को मधु, शर्करा तथा आमलकी के साथ सेवन करते हैं। (अतिरिक्त
प्रयोग)।
४. शरद तथा वसन्त ऋतुओं में दधि का सेवन निषिद्ध है (प्रायः)।
५. वर्षा, शिशिर तथा हेमन्त ऋतुओं में दधिका सेवन पण्डितों के अनुसार उपयुक्त
है (संसेव्य दधि पण्डितैः)।
शाल्योदनेन संयुक्तं सततं माहिषं दधि।
गोष्ठगोपाङ्गनादत्तं प्रत्यहं स्मरणं हरेः ॥ २०॥
शाल्योदन
१. शालिधान्य (जड़हन चावल) का ओदन (भक्त-भात) के साथ गोष्ठ गोपांगना
(गऊशाला की गोपियों) द्वारा प्रदत्त माहिष दुग्ध का निरन्तर सेवन उपयुक्त है-
तथा प्रतिदिन-सदैव हरिस्मरण करना प्रशस्त-मंगलदायक एवं श्रेयस्कर है
(प्रत्यहं स्मरणं हरेः)।
बल्यं दध्योदनं वातपित्तहत्पुष्टिकारकम् ।
सुरुच्यं ग्राहिकं हृद्यं स्थूलत्वमतिकारकम् ॥ २१ ॥
२. दध्योदन गुण- १. बल्य २. वातघ्न
३. पित्तहृत् ४. पुष्टिकारक
५. सुरुच्य ६. ग्राही
७. हृद्य ८. स्थूलमतिकारकम्
अथ शर्करादिसहितदधिगुणाः
सशर्करं दधि श्रेष्ठं तृष्णापित्तास्त्रदाहजित् ।
सगुडं वातनुद्वृष्यं बृंहणं कफदं गुरु ॥ २२ ॥
सुमधुर दधि
सशर्कर दधि (शर्करा मिश्रित दही उत्तम) तृषा, रक्तपित्त एवं दाहशामक है।
बृंहण एवं गुरु होता है॥२२॥


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द्वादशोत्सवः २३७
अथर्तुविशेषे दध्नः सेवनविधिन्निषेधञ्च
हेमन्ते शिशिरे चापि वर्षासु दधि शस्यते।
शरद्वसन्तीग्रीष्मेषु प्रायशस्तद्विगर्हितम् ॥ २३ ॥
ऋत्वनुसारेण दधि प्रयोग
सेवन प्रशस्त सेवन निषिद्ध (प्रायः)
१. हेमन्त ऋतु १. शरद ऋतु
२. वर्षा ऋतु २. वसन्त ऋतु
३. ग्रीष्म ऋतु
अथ घोल-मठादिनिर्माणविधिर्गुणाश्च
मस्तुना रहितं गाल्यं दधि शुभ्रतरे पटे।
जीरसैन्धवसंमिश्रं घोलं घनतरं स्मृतम् ॥ २४ ॥
घोल
घोल (मठा-मट्ठा) निर्माण की विधि इस प्रकार है- मस्तु (छाली) रहित दधि को
श्वेतवस्त्र (शुभ्रतरे पटे) में रखकर छानते हैं (मस्तुना रहित गाल्यम्); तथा भृष्ट जीरक
(भुना जीरा) तथा सैन्धव लवण का सामिश्रण करते हैं- इससे घनतर घोल (गाढ़ा
घोल) तैयार हो जायेगा॥२४॥
जीरसैन्धवसंयुक्तं घोलं वातस्य नाशनम्।
अतिसारे च मन्दान्नौ हितं रुच्यं बलप्रदम्॥ २५ ॥
घोल के गुण इस प्रकार हैं-
जीरक तथा सैन्धव लवण युक्त दधि घोल वातनाशक, अतिस्वर एवं अतिसार
नाशक तथा मन्दानि में व्याकरण, रुच्य एवं बलप्रद होता है॥२५॥
अथ हिङ्गुवासितघोलकनिर्माणं गुणाश्च
वस्त्रे दृढतरं बद्धं दधि दुग्धेन गालितम्।
हिङ्गुना धूपिते पात्रे स्थापितं सैन्धवान्वितम् ॥ २६ ॥
हिङ्गुवासित घोलक की निर्माण विधि इस प्रकार है-
दुग-दधि को मजबूत वस्त्र में बाँधकर (वस्त्रे दृढतरं बद्धं)। छानते हैं (गालितम्)।
क्षे. कु. 16