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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ २४२

२४२ क्षेमकुतूहलम्
शशिरंखा (शिखरिणी)
क. विधि- शुभ्र शर्करा युक्त भक्त में भृत दुग्ध को छान होते हैं। यह शशिरंखा
शिखरिणी बन जाती है।
ख. गुण- १. हिमा २. बाल्या
३. रुच्या ४. पुष्टिदा
५. वातहरा ६. श्रेष्ठा
७. पित्तशामक ८. महादाहविनाशिनी
अथाम्ररसाकृतिनिर्माणविधिर्गुणाश्च
शशिरंखा हिमा बाल्या रुच्या पुष्टिप्रदायिनी।
वातपित्तहरा श्रेष्ठा महादाहविनाशिनी ॥ ४० ॥
किञ्चित्कुङ्कुमसंमिश्रं विमस्तु दधि गालितम्।
सशर्करं भवेत्पीता पक्वाम्ररससन्निभा ॥ ४१ ॥
आम्ररसाकृति शिखरिणी
क. विधि- मस्तु रहित दधि को वस्त्र से गलित करते (छानकर) हैं, फिर किञ्चित्
कुंकुम (केशर) मिश्रित कर देते हैं, तथा (बाद में) शर्करा, मिला देते हैं, इससे
पक्वाग्र समान (पके आम के रस के समान पीले रंग (भवेत्पीता) की शिखरिणी
बन जाती है।
ख. गुण- १. लघु २. वर्णवती
३. हिमा ४. सुरुच्या
५. मधुरा ६. बाल्या
७. वातघ्न ८. पित्तहर
९. परम : (७-८)
पीता शिखरिणी या सा लघ्वी वर्णवती हिमा।
सुरुच्या मधुरा बाल्या वातपित्तहरा परा ॥ ४२ ॥


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द्वादशोत्सवः २४३
अथ रसालानिर्माणविधिर्गुणाश्च
ससितं दधि मध्वाज्यमरिचैलादिसंस्कृतम्।
मथितं कान्तकामिन्या कर्पूरपरिवासितम् ॥ ४३ ॥
रसाला शुक्रला बाल्या रोचिनी वातपित्तहा।
स्निग्धाऽऽतपप्रतिश्यायं विशेषेण विनाशयेत् ॥ ४४ ॥
रसाला
क. विधि- सिता सहित दधि, मधु, घृत, मरिच तथा एला (दोनों चूर्ण) मिश्रित
कर, कान्तकामिनी (पति से प्रेम / उत्कृष्ट अभिलाषिणी) स्त्री के द्वारा मथित तथा
कर्पूर मिलित पदार्थ से (सुगन्धित) को 'रसाला' कहा जाता है।
ख. गुण- १. शुक्रला २. बाल्या
३. रोचिनी ४. वातनाशक
५. पित्तहा ६. स्निग्धा
७. आतपहारीणी ८. प्रतिश्याम विनाशक
रसाला शिखरिण्युक्ता मर्जिंका मार्जिका बुधैः।
कथ्यन्ते बहुनामानि गुणास्तस्या हि योगतः ॥ ४५ ॥
रसाला-शिखरिणी नामावली
पाक विद्या एवं शास्त्र के शताओं (पण्डितों) ने इस भोज्य पदार्थ का विभिन्न
नामकरण किया है, यथा-
१. रसाला २. शिखरिणी गुण द्रव्यों के संयोग
३. मर्जिंका ४. मार्जिका (घटक द्रव्यों के अनुसार)
५. अन्य नाम
मोचाफल रसाला
निर्नीरं मथितं धनेन सहितं संभावितं शर्करा-
धूलीभिर्मरिचोद्भवेन रजसा व्यालोडितं किञ्चन।
जातीचम्पककेतकीसुरभितं मृत्पात्रमध्यस्थितं
जिह्वायां विदधात्युपक्रममिदं मोचाफलैश्चापलम् ॥ ४६ ॥