सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 119

२३२ क्षेमकुतूहलम्
राजपायस
क. विधि- मिनौर (जलहित) पाय (दुग्ध) में श्यामाक नवीन तनुल (साँवा के
चावल)- अष्टम भाग प्रक्षेपण करके, निभृतन्तरीसना (अन्दर की गर्मी) से पाक
करके, घृत एवं खण्ड (शर्करा) मिश्रित करें। इस रीति से पक्व (सिद्ध) सरस
पायस अमृत सदृश होता है, जो राजा (भूपति) को छोड़कर कौन सेवन कर
सकता है (कोलेदि)।
ख. गुण- १. दुर्जर २. बल्य
३. धातुपुष्टि निवधर्म ४. विष्टम्भ जनन
५. रक्तपित्त ६. अग्निमांद्य
७. वातरोग (नाशक-५-७)
अथ नारङ्गक्षीरिणीनिर्माणविधिर्गुणाश्च
क्षिप्त्वा नारङ्गमज्ञां वै पचेत्सर्पिषि तापिते।
तत्र खण्डं च निक्षिप्य पक्वं मत्वाऽवतारयेत्॥५॥
शीतीभूते विनिक्षिप्य मात्रेवार्धशृतं पयः।
नारङ्गीक्षीरिणी चैषा सुगन्ध्सुरभीकृता॥६॥
नारङ्गक्षीरिणी
१. नारङ्ग मज्जा को तप्त घृत को पका करके, खण्ड (शर्करा) का मिश्रण करे, तथा
पकने पर अग्नि से पृथक करते हैं। शीतभूत (ठंडे होने पर) दुग्ध अर्धपक्व) को
मात्रापूर्वक लेकर, सुगन्धित द्रव्यों से सुवासित करते हैं। इस व्यंजन को
'नारंगक्षीरिणी' कहा जाता है।
यह विष्टम्भिवी, वात-पित्तहर तथा गुरु पाचिका होती है॥५-६॥
अथ नालिकेरक्षीरिकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
विष्टम्भिनी हरेद्वातं पित्तं च गुरुपाचिका।
नालिकेरं पयः स्विन्नं खण्डितं सिक्थकाकृतिः॥७॥
मेलयेच्छर्करायुक्ते क्षीरे क्वथितगालिते।
धूपिताऽगुरुणा क्षीरीनालिकेरादिजा भवेत्॥८॥
नालिकेरोद्भवा क्षीरी स्निग्धा शीताऽतिपुष्टिदा।
गुर्वी सुमधुरा वृष्या रुच्या पित्तानिलापहा॥९॥
द्वादशोत्सवः २३३
एवं कूष्माण्डमजदेस्तथा वंशाङ्कुरादपि।
कदलीनां फलामूलात् कर्तव्या क्षीरिका बुधैः॥१०॥
नालिकेर क्षीरिका
क. विधि- नालिकेर (नारियल) सिक्थ (मोम) के समान को खण्ड करके, जल
पक्व करके, (क्ववलित कर) सान्द्र (गाढा) दुग्ध-शर्करायुक्त-दुग्ध मे प्रक्षेपण
करके तथा सुगन्धित कर लेते हैं। इस व्यंजन को 'नालिकेरक्षीरिणी' कहा
जाता है।
ख. गुण- १. स्निग्ध २. शीतल
३. अतिपुष्टिकारक ४. गुरु
५. मधुर ६. वीर्यवर्धक
७. रुच्य ८. पित्त-वातनाशक
ग. अन्य क्षीरिका व्यंजन- कूष्माण्ड आदि फलों की मज्जा, वंशांकुर कदली के
मूल एवं फल से क्षीरिका का निर्माण किया जा सकता है॥७-१०॥
अथ दधिवष्कयिण्याः निर्माणविधिर्गुणाश्च
बहुब्रध्नास्तु गोः क्षीरं महिषं वा विपाचितम्।
सुशीतं स्थापितं पात्रे नवीने तक्रसंस्कृतम्॥११॥
शङ्खानुकारि तच्छुभ्रं चन्द्रवत्सरं दधि।
इष्टं तन्मकराधारैः? स्फोटितं परिवेषितम्॥१२॥
दधि निर्माण
दधिवष्कयिण्या
गो-मल (अधिक व्यधि की प्रसका/प्रसूता) अथवा मासिव (भैंस) के क्षीर (दुग्ध)
पक्व करके शीतल करें, फिर तक्र संस्कृत (मट्ठे का अंश डालकर या जावन देकर)
नवीन पात्र में स्थापित करते हैं। इसरीति से (परिणामः) शंखानुकारि-शुभ्र चन्द्रवत्सर
(चन्द्रमा सदृश खेत वर्णीय) दधि (दही) का निर्माण हो जायेगा।
यह दधि मकराधारों द्वारा स्फोटित एवं परिवेधित दधि उत्तम माना गया है- इस
रूप का दधि श्रेष्ठ वाजीकरण गुण सम्पन्न लेता है॥११-१२॥